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असली गहना

 राघव की आँखों में पानी भर आया। उसने पोटली वापस सुधा की तरफ सरका दी। "पागल हो गई हो? ये तुम्हारी 'स्त्री-धन' है। और पिता जी की एफडी? वो उनके बुढ़ापे का सहारा है, उनके इलाज के पैसे हैं। अगर दुकान नहीं बची, तो हम सड़क पर आ जाएंगे, लेकिन मैं तुम लोगों को सड़क पर नहीं ला सकता।" 

पुराने मकान की सीलन भरी दीवारों को घूरते हुए राघव का सिर चकरा रहा था। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन उसके मन के भीतर जो तूफ़ान चल रहा था, उसके आगे बाहर का मौसम कुछ भी नहीं था। मेज पर पड़ा बैंक का 'कुर्की' का नोटिस हवा के झोंके से फड़फड़ा रहा था, मानो उसका मजाक उड़ा रहा हो।

"राघव, चाय ठंडी हो रही है," सुधा ने कमरे में प्रवेश करते हुए धीमी आवाज़ में कहा। उसके हाथ में चाय का कप था, लेकिन चेहरा उतरा हुआ था।

राघव ने नोटिस को अखबार के नीचे छिपाने की नाकाम कोशिश की। "सुधा, तुम्हें पता है न कि परसों तक अगर पच्चीस लाख रुपये जमा नहीं हुए, तो यह पुश्तैनी दुकान और शायद यह घर भी... सब नीलाम हो जाएगा। पिता जी ने पूरी जिंदगी लगाकर यह 'श्याम संस' की दुकान खड़ी की थी, और मैं... मैं इतना नालायक निकला कि उसे बचा भी नहीं पा रहा।"

सुधा ने चाय की प्याली मेज पर रखी और अपनी अलमारी की तरफ बढ़ी। उसने लोहे की पुरानी तिजोरी खोली और एक मखमली पोटली निकालकर राघव के सामने रख दी।

"यह क्या है?" राघव ने पूछा, हालांकि वह जानता था।

"ये मेरी माँ के दिए हुए कंगन हैं, और वो सेट जो आपने पहली सालगिरह पर दिया था। और ये... ये मुन्नू के जन्म पर चढ़ाया गया सोने का चेन है," सुधा की आवाज़ कांप रही थी, लेकिन इरादा पक्का था। "इन्हें गिरवी रख दो या बेच दो। सुनार कम से कम दस-बारह लाख तो दे ही देगा। बाकी का इंतज़ाम हम पिता जी की एफडी तुड़वाकर कर लेंगे।"

राघव की आँखों में पानी भर आया। उसने पोटली वापस सुधा की तरफ सरका दी। "पागल हो गई हो? ये तुम्हारी 'स्त्री-धन' है। और पिता जी की एफडी? वो उनके बुढ़ापे का सहारा है, उनके इलाज के पैसे हैं। अगर दुकान नहीं बची, तो हम सड़क पर आ जाएंगे, लेकिन मैं तुम लोगों को सड़क पर नहीं ला सकता।"

तभी बाहर के कमरे से खांसने की आवाज़ आई। बाबूजी, जो पिछले छह महीने से लकवे के कारण बिस्तर पर थे, अपनी टूटी-फूटी आवाज़ में राघव को पुकार रहे थे। राघव दौड़कर उनके पास गया।

"बेटा," बाबूजी ने अपने तकिये के नीचे से एक पुरानी फाइल निकाली। "ये इस घर के कागज हैं। मुझे पता है कि मार्किट मंदा है और तेरी पेमेंट फंस गई है। तू संकोच मत कर। घर बेच दे। हम किसी किराए के मकान में रह लेंगे। इज्जत बची रहनी चाहिए, छत तो फिर बन जाएगी।"

राघव का कलेजा मुंह को आ गया। जिस पिता ने ईंट-ईंट जोड़कर यह घर बनाया था, आज वही उसे बेचने की बात कर रहे थे। राघव ने बाबूजी का हाथ अपने हाथ में लिया और रो पड़ा। "नहीं बाबूजी, मैं मर जाऊंगा पर यह घर नहीं बिकने दूंगा। मैं कुछ करूंगा... कुछ न कुछ रास्ता जरूर निकलेगा।"

तभी घर के बाहर एक लंबी और महंगी कार के रुकने की आवाज़ आई। हॉर्न की आवाज़ सुनकर सुधा खिड़की की ओर लपकी।

"अरे! ये तो ननद रानी और ननदोई जी हैं," सुधा ने घबराहट में पल्लू ठीक करते हुए कहा। "इस वक्त? बिना बताए? राघव, घर में तो ठीक से नाश्ता भी नहीं है, और माहौल भी ऐसा है... अगर उन्हें पता चला कि हम दिवालिया होने की कगार पर हैं, तो कितनी बदनामी होगी।"

राघव ने जल्दी से अपनी आँखों के आंसू पोंछे। उसकी बहन वंदना और उसके पति, मिस्टर खन्ना, शहर के जाने-माने उद्योगपति थे। वंदना की शादी बड़े घर में हुई थी, और राघव हमेशा इस बात का ध्यान रखता था कि उसके ससुराल वालों के सामने कभी हाथ न फैलाना पड़े। मध्यम वर्गीय स्वाभिमान उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।

"सुधा, तुम जल्दी से चाय-नाश्ते का देखो। मैं बाहर जाता हूँ। और खबरदार, किसी के सामने बैंक या कर्ज का ज़िक्र भी किया तो," राघव ने हिदायत दी और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान चिपकाकर बाहर निकला।

दरवाजे पर वंदना चहकती हुई खड़ी थी। "भैया! सरप्राइज!" उसने राघव को गले लगा लिया। पीछे मिस्टर खन्ना (विवेक) खड़े थे, सूट-बूट में, चेहरे पर वही सौम्य लेकिन रौबदार मुस्कान।

"अरे वंदना, विवेक जी... आप लोग अचानक? सब खैरियत तो है?" राघव ने उनके पैर छूने की कोशिश की, लेकिन विवेक ने उसे गले लगा लिया।

"सब खैरियत है राघव बाबू। बस हम पास से गुजर रहे थे, तो सोचा ससुराल की चाय पीते चलें। वंदना कई दिनों से कह रही थी कि मायके की याद आ रही है," विवेक ने हंसते हुए कहा और अंदर सोफे पर बैठ गए।

घर के अंदर का तनाव छिपाए नहीं छिप रहा था। दीवारों से उखड़ा हुआ पेंट, पुराना सोफा, और राघव के चेहरे की हवाईयां—विवेक की पारखी नज़रों से कुछ भी नहीं बच रहा था। सुधा ट्रे में चाय और बिस्कुट लेकर आई। उसके हाथ कांप रहे थे।

वंदना ने चाय का घूंट भरा और बोली, "भैया, भाभी... आप लोग इतने चुप क्यों हैं? और बाबूजी कैसे हैं? मैं उनसे मिलने जाती हूँ।" वंदना अंदर वाले कमरे की तरफ बढ़ गई।

ड्राइंग रूम में अब सिर्फ़ राघव और विवेक बचे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिकटिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी।

विवेक ने चाय का कप मेज पर रखा और सीधे राघव की आँखों में देखा। "राघव, मार्किट में ख़बरें बहुत तेज़ उड़ती हैं। सुना है 'श्याम संस' पर बैंक का ताला लगने वाला है?"

राघव को लगा जैसे किसी ने तपता हुआ सीसा उसके कानों में डाल दिया हो। उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह नज़रे नहीं मिला पा रहा था। "वो... वो बस थोड़ी मंदी चल रही है जीजा जी। पेमेंट रोटेशन का चक्कर है। मैं मैनेज कर लूँगा।"

"पच्चीस लाख का 'रोटेशन' दो दिन में कैसे मैनेज करोगे राघव?" विवेक की आवाज़ सख्त नहीं, बल्कि गंभीर थी। "क्या घर बेचोगे? या सुधा भाभी के गहने?"

राघव टूट गया। उसका स्वाभिमान आंसुओं के साथ बह निकला। उसने सिर झुका लिया। "मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं नहीं चाहता था कि आप लोगों को पता चले। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ कि आप ऐसे वक्त में आए जब मैं आपका स्वागत भी ठीक से नहीं कर सकता।"

विवेक अपनी जगह से उठे और राघव के पास आकर बैठ गए। उन्होंने अपनी जेब से एक चेकबुक नहीं, बल्कि एक कानूनी फाइल निकाली।

"राघव, तुम्हें याद है दस साल पहले जब मेरी फैक्ट्री में आग लगी थी और इंश्योरेंस वाले पैसे देने में आनाकानी कर रहे थे? तब मेरे पास वर्करों को सैलरी देने के पैसे नहीं थे।"

राघव ने सिर उठाया, "हाँ, याद है।"

"तब तुमने क्या किया था?" विवेक ने पूछा।

"मैंने... मैंने बस अपनी पीएफ (PF) की सेविंग आपको दी थी। वो तो फर्ज था मेरा," राघव ने धीरे से कहा।

"वो सिर्फ़ पैसे नहीं थे राघव, वो उस वक्त मेरी इज़्ज़त थी। उस दो लाख रुपये ने मुझे मेरे स्टाफ के सामने चोर बनने से बचाया था। आज मेरी कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में है, लेकिन उसकी नींव में तुम्हारे वो दो लाख रुपये लगे हैं," विवेक की आवाज़ भारी हो गई थी।

उन्होंने फाइल राघव के हाथ में थमा दी।

"ये क्या है?" राघव ने कांपते हाथों से पूछा।

"ये पार्टनरशिप डीड (Partnership Deed) है," विवेक ने कहा। "मैं अपनी कंपनी का एक नया वेयरहाउस इस शहर में खोलना चाहता हूँ। मुझे एक भरोसेमंद जगह और एक भरोसेमंद आदमी चाहिए। मैंने बैंक से बात कर ली है। तुम्हारा जो पच्चीस लाख का लोन है, वो अब मेरी कंपनी ने टेक-ओवर कर लिया है। अब बैंक के कर्जदार तुम नहीं, मेरी कंपनी है।"

"लेकिन जीजा जी, मैं आपसे पैसे नहीं ले सकता... यह भीख होगी," राघव ने फाइल मेज पर रख दी।

तभी अंदर से वंदना बाहर आई, उसकी आँखों में आंसू थे। शायद बाबूजी ने उसे सब बता दिया था। वह आकर राघव के पास खड़ी हो गई।

"भैया," वंदना ने राघव का कंधा पकड़ा। "जब मैं शादी करके विदा हो रही थी, तो आपने पापा से कहा था कि 'वंदना पराया धन नहीं है, वो इस घर का हिस्सा हमेशा रहेगी'। आज जब उस हिस्से को अपना फर्ज निभाने का मौका मिल रहा है, तो आप उसे 'पराया' बना रहे हैं?"

विवेक ने बात आगे बढ़ाई, "राघव, यह भीख नहीं है, और न ही यह उधार है। यह बिज़नेस है। तुम्हारी दुकान की लोकेशन मेरे वेयरहाउस के लिए परफेक्ट है। मैं वहां अपना माल रखूंगा, तुम उसे बेचोगे। प्रॉफिट हम फिफ्टी-फिफ्टी बांटेंगे। तुमने जो मुझे दस साल पहले दिया था, यह उसका ब्याज नहीं, बल्कि उसका हक है। एक व्यापारी दूसरे व्यापारी की मदद कर रहा है, जीजा अपने साले की नहीं।"

राघव अवाक रह गया। विवेक ने न केवल उसकी आर्थिक मदद की थी, बल्कि उसके गिरते हुए आत्मसम्मान को भी संभाल लिया था। उन्होंने उसे 'बेचारा' नहीं, बल्कि 'पार्टनर' बनाया था।

सुधा, जो रसोई के दरवाजे पर खड़ी सब सुन रही थी, दौड़कर आई और वंदना के पैरों में गिरने लगी। वंदना ने उसे बीच में ही थाम लिया और गले लगा लिया।

"भाभी, यह आप क्या कर रही हैं? घर की लक्ष्मी जब रोती है, तो घर बरकत नहीं करता," वंदना ने मुस्कुराते हुए सुधा के आंसू पोंछे।

राघव ने कांपते हाथों से पेन उठाया। विवेक ने फाइल का पन्ना पलटा, जहाँ हस्ताक्षर करने थे।

"एक शर्त है राघव," विवेक ने अचानक गंभीर होकर कहा।

राघव का हाथ रुक गया। "क्या शर्त?"

"यही कि अगली बार जब मैं आऊं, तो नाश्ते में बाज़ार के बिस्कुट नहीं, बल्कि सुधा भाभी के हाथ के बने समोसे होने चाहिए। यह सूखे बिस्कुट खिलाकर तुमने मेरी मेहमाननवाजी की बेइज्जती की है," विवेक ने ठहाका लगाया।

कमरे का भारी माहौल एक पल में हल्का हो गया। राघव ने भी भीगी आँखों से मुस्कुराते हुए हस्ताक्षर कर दिए।

बाबूजी के कमरे से भी एक संतोष भरी आह सुनाई दी।

शाम को बारिश रुक चुकी थी। राघव, सुधा, विवेक और वंदना बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे।

विवेक ने कहा, "राघव, दुनिया कहती है कि बेटी को ब्याहने के बाद उसका घर पराया हो जाता है। लोग कहते हैं कि दामाद से मदद लेना उल्टा पानी बहाने जैसा है। लेकिन सच तो यह है कि परिवार कभी बंटता नहीं है। मुसीबत के वक्त न कोई मायका होता है, न ससुराल... बस 'अपने' होते हैं।"

राघव ने आसमान की तरफ देखा, जहाँ बादलों के बीच से अब सूरज की एक किरण निकल रही थी। उसने मन ही मन सोचा कि ईश्वर ने उसे धन भले ही कम दिया हो, लेकिन संबंध ऐसे दिए हैं जो किसी भी खजाने से कीमती हैं।

उस रात, 'श्याम संस' की दुकान पर नीलामी का नहीं, बल्कि 'नए शुभारम्भ' का बोर्ड लगने की तैयारी हो रही थी। और घर के अंदर, एक बूढ़े पिता ने अपनी बेटी और दामाद को वही आशीर्वाद दिया जो बरसों पहले विदाई के वक्त दिया था, लेकिन आज उस आशीर्वाद में 'विदाई' का दर्द नहीं, बल्कि 'वापसी' का सुकून था।

सुधा ने अपनी पोटली वापस तिजोरी में रख दी थी, क्योंकि आज उसे समझ आ गया था कि उसका असली गहना वह सोना नहीं, बल्कि वो लोग हैं जो उसके आंगन में बैठे हंस रहे थे।

(समाप्त)

लेखिका : निधि गुप्ता


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