Skip to main content

मैं हूँ न

 “मैं कह रहा हूँ, रश्मि… तुम हर बात में आग क्यों ढूँढ लेती हो?” देवेन्द्र ने अखबार मोड़ते हुए कहा, “मालती ने कुछ नहीं किया। बस एक छोटी-सी बात को तूफान बना दिया।”

रश्मि की आँखें लाल थीं—रातभर जागने का असर था या भीतर का गुस्सा, समझना मुश्किल था। “छोटी-सी बात?” वह तिरछी हँसी हँस पड़ी, “आपको हर बात छोटी लगती है, क्योंकि चोट आपकी तरफ नहीं आती। घर की बहू पर उंगली उठे, तो उसे छोटा मत कहिए।”

देवेन्द्र ने लंबी साँस ली। “बहू पर उंगली उठाई किसने? उसके मन में शक बैठा किसने? वो अपने आप तो इतना नहीं उलझती थी।”

रश्मि चौंक कर बोली, “आप क्या कहना चाहते हैं?”

“मैं वही कह रहा हूँ, जो सच है,” देवेन्द्र का स्वर पहली बार सख्त हुआ, “तुम्हारी आदत… हर बात का मतलब निकालना, हर इशारे में साजिश ढूँढना—यही आदत अब मालती के भीतर भी उतर गई है। और आज उसी आदत ने उसके घर की नींव हिला दी।”

रश्मि ने पलभर को जैसे कुछ कहने के लिए मुंह खोला, फिर जोर से बोली, “अच्छा! तो सारी गलती मेरी? मैं तो बस उसे सतर्क करती हूँ। जमाना खराब है। कोई किसी का सगा नहीं।”

देवेन्द्र ने टेबल पर उंगली टिकाई। “सतर्क और संदेही में फर्क होता है, रश्मि। सतर्कता रिश्ते बचाती है… संदेह रिश्ते खा जाता है।”

उसी समय कमरे के कोने में खड़ी मालती ने धीमे से कहा, “पापा… अब रहने दीजिए।”

दोनों चौंक गए। उन्हें लगा ही नहीं था कि वह इतनी देर से वहीं खड़ी सुन रही है। मालती की आँखों में पानी नहीं था, पर चेहरे पर थकान बहुत थी। जैसे कोई रोने की सारी ताकत भी हार चुका हो।

देवेन्द्र ने नरम पड़कर पूछा, “बेटा… तुम ठीक तो हो?”

मालती ने होंठ दबाकर सिर हिलाया। “ठीक होने जैसा कुछ बचा ही नहीं, पापा।”

रश्मि झट से आगे बढ़ी। “तू चिंता मत कर, मालू। तू यहीं रहेगी। उस घर में तुझे किसी की जरूरत नहीं। मैं हूँ न।”

मालती ने माँ की तरफ देखा। “माँ, मुझे आपका ‘मैं हूँ न’ सबसे ज्यादा डराता है।”

रश्मि जैसे पत्थर हो गई। “ये… ये क्या बोल रही है?”

मालती ने धीरे से कहा, “आप जब भी ‘मैं हूँ न’ कहती हैं, उसके बाद किसी का घर… किसी का रिश्ता… या किसी का मन… बचता नहीं।”

देवेन्द्र ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं। उसे याद आया—बरसों पहले भी ऐसा ही हुआ था। तब रश्मि की यही “सावधानी” और “दूसरों पर नजर” की आदत उनके अपने संयुक्त परिवार से अलग होने की वजह बनी थी। पर उसने कभी घर में खुलकर नहीं कहा था—कि बेटी उन जख्मों की विरासत बनकर बड़ी हो रही है।

मालती की शादी को अभी तीन महीने भी पूरे नहीं हुए थे। वरुण से विवाह हुआ था—शांत स्वभाव का, अपने छोटे-से स्टार्टअप में डूबा रहने वाला लड़का। उसका परिवार भी सामान्य था—माँ-पिता, एक बड़ा भाई-भाभी जो दूसरे शहर में रहते थे। घर में कोई अजीब-सा दबाव नहीं था, न कोई साजिश। फिर भी मालती के भीतर हर दूसरे दिन कुछ टूटता था।

शादी के शुरू के हफ्तों में वह खुश थी। वरुण ध्यान रखता, छोटी-छोटी बातों में उसे हँसाता। पर धीरे-धीरे मालती को लगने लगा—घर में कुछ बातें उसके सामने अधूरी रह जाती हैं। कभी कमरे में अचानक चुप्पी, कभी फोन आते ही आवाज धीमी। वह अपने आप को समझाती—“शायद मुझे ही लग रहा है।”

पर एक दिन उसने माँ को फोन कर दिया। बस ऐसे ही, बिना सोचे।

“माँ, मुझे लगता है… वो लोग कुछ छुपाते हैं।”

रश्मि की आवाज तुरंत तेज हो गई थी, “छुपाते हैं? अरे ये तो होना ही था। तू नई-नई गई है, इसलिए तुझे बाहर वाला समझते होंगे। तू ध्यान रख। तू सुनने की कोशिश कर… पता कर असल बात क्या है।”

“पर माँ, ये ठीक है क्या?”

“ठीक-गलत छोड़, अपना हित देख। और एक बात—बिना सबूत के वहाँ चुप मत बैठना। दुनिया बहुत चालाक है।”

उस दिन मालती की किसी अंदरूनी दीवार पर पहली दरार पड़ गई थी। वह सचमुच “ध्यान” देने लगी। ध्यान, जो धीरे-धीरे जासूसी जैसा हो गया।

एक शाम वरुण अपने पिता के साथ बैठा था। मालती रसोई में थी। उसने सुना—

“अगले महीने अस्पताल वाली किस्त भरनी है,” वरुण के पिता बोले।
वरुण ने धीमे से कहा, “हाँ पापा… मैं देख लूंगा।”

बस यही दो वाक्य मालती के भीतर बिजली बनकर गिरे। “अस्पताल… किस्त… किसके लिए?” वह सोचती रही। उसके मन में माँ की बात घूम गई—“दुनिया चालाक है।”

अगली सुबह उसने माँ को बताया।
रश्मि ने बिना ठहरे कहा, “देखा! मैंने कहा था न। जरूर कोई बड़ा खर्च छुपा रहे हैं। ये लोग तुझे बाद में फँसाएंगे। तू अभी से साफ कर दे कि तेरा पैसा… तेरा जीवन… उनकी जिम्मेदारी नहीं।”

“मेरा पैसा? माँ, मैं तो नौकरी भी नहीं करती…”

“तो क्या हुआ? कल को कर लेगी। बहू को तो वैसे ही पकड़ लेते हैं। तू वरुण से बात कर। पूछ—किसका अस्पताल? किसकी किस्त? और साफ-साफ कह कि बिना बताए कुछ नहीं होगा।”

मालती ने उसी दिन वरुण से पूछ लिया।
वरुण ने चौंककर कहा, “ये बात तुमने कहाँ सुनी?”

मालती रुक गई। सच बताती तो… उसकी हरकत सामने आती। उसने उल्टा कह दिया, “घर में बातें होती हैं… सुनाई देती हैं।”

वरुण ने मन ही मन कुछ समझ लिया, पर शांत रहा। “पापा की पुरानी सर्जरी का लोन है। बस वही।”

मालती को राहत मिलनी चाहिए थी, पर राहत नहीं मिली। क्योंकि माँ के शब्द अब उसकी सोच की नसों में उतर चुके थे। “आज पापा का… कल मेरे पति का… फिर सबका…”

उस शाम उसने माँ को फिर फोन किया।
रश्मि ने कहा, “देख, अब तो पकड़ा गया ना। तुझे बताना चाहिए था। तू उनके सामने कमजोर मत पड़।”

मालती का मन भारी होता गया। और भारी मन जब घर में चलता है, तो बात-बात पर टकराता है।

असल विस्फोट तब हुआ, जब एक दिन वरुण का भाई आया। खाने की मेज पर बात चल रही थी कि अगले हफ्ते परिवार में एक छोटी-सी पूजा रखनी है। वरुण की माँ ने कहा, “मालती, तुम्हें बताने वाली थी… तुम्हारे मायके वालों को भी बुला लेंगे।”

मालती ने अचानक कह दिया, “पहले आप लोग आपस में तय कर लें कि पैसे किसके देने हैं। फिर पूजा करना।”

पूरा घर सन्न।
वरुण ने गुस्से में नहीं, दुख में पूछा, “तुम्हें ये बातें क्यों चुभने लगी हैं?”

मालती ने वही किया जो डर और आदत सिखाते हैं—उसने चोट से पहले वार किया। “मुझे पता है आप लोग क्या करते हैं। मेरे पीछे मेरे बारे में बातें करते हैं।”

वरुण की माँ की आँखें भर आईं। “बेटा… हमने तो कभी…”

वरुण ने धीरे से कहा, “मालती, तुम मेरे घर में रहती हो… पर तुम्हारा मन यहाँ नहीं है। तुम हर बात में छेद ढूँढ रही हो।”

मालती ने रोकर कहा, “क्योंकि मुझे लगता है… यहाँ सब छुपाते हैं।”

वरुण पहली बार तेज हुआ, “छुपाते नहीं हैं। बस हर बात मेहमान को नहीं बताई जाती। रिश्तों में सीमाएँ होती हैं। तुम सीमाएँ नहीं, साजिश ढूँढती हो।”

उसी रात मालती ने अपना बैग निकाला, और बिना किसी नाटकीयता के घर से निकल आई। वरुण ने रोका नहीं। उसने बस इतना कहा, “तुम्हें अगर भरोसा नहीं है, तो साथ रहने का कोई मतलब नहीं।”

मालती मायके पहुँची, तो रश्मि ने उसे सीने से लगा लिया। “देखा, मैंने कहा था ना।”
देवेन्द्र ने बस चुपचाप पानी दिया।

आज वही चुप्पी फटकर बहस बन गई थी।

मालती ने पिता की ओर देखा। “पापा, मैं यहाँ सुकून के लिए आई थी। पर यहाँ भी मुझे वही बातें सुननी हैं—कौन सही, कौन गलत। मुझे सच बताइए… क्या मैं सच में गलत हूँ?”

देवेन्द्र ने धीरे से कहा, “गलत शब्द छोटा है बेटा। बात ये है—तुम्हें आदत पड़ गई है हर चीज़ को डर के चश्मे से देखने की।”

रश्मि ने तुरंत कहा, “मैंने डर नहीं सिखाया, सावधानी सिखाई है।”

देवेन्द्र ने शांत स्वर में पूछा, “तो फिर तुम्हारी सावधानी ने तुम्हें कितने रिश्ते दिए?”

रश्मि के चेहरे पर झटका सा लगा।
देवेन्द्र ने आगे कहा, “सावधानी ने तुम्हें अकेलेपन का घर दिया, रश्मि। और अब वही घर तुम बेटी को देना चाहती हो?”

मालती की आँखों से पहली बार आँसू निकले। “माँ… मैं सच में खुश रहना चाहती थी। पर मेरा मन… हर समय चौकन्ना रहता था। जैसे कोई मुझे धोखा देने वाला है।”

रश्मि का स्वर अचानक धीमा पड़ गया। “मैंने तो बस…”

मालती ने बात काटी, “आपने बस मुझे बताया कि हर घर दुश्मन होता है। हर चुप्पी धोखा होती है। हर सीमित बात साजिश होती है। फिर मैं कैसे शांत रहूँ?”

रश्मि का चेहरा ढीला पड़ने लगा।
देवेन्द्र ने धीरे-धीरे कहा, “रश्मि, सच ये है—तुमने अपने जीवन में विश्वास खो दिया था। और विश्वास खो जाए तो इंसान दूसरों के घर नहीं, अपने ही मन में कैद हो जाता है।”

कई मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला। बाहर गली में किसी बच्चे के हँसने की आवाज आई। घर के भीतर, हवा भारी थी।

मालती ने आँसू पोंछे। “पापा… मैं वरुण के साथ रहना चाहती हूँ। लेकिन अब… कैसे?”

देवेन्द्र ने कहा, “पहले तुम अपने आप से एक वादा करो—तुम जो नहीं जानतीं, उसे कल्पना से मत भरो। जो तुम्हें समझ नहीं आता, उसे सवाल बनाओ, आरोप नहीं।”

मालती ने सिर हिलाया।
फिर उसने माँ की तरफ देखा। “और माँ… आप मुझे रोकना। जब मैं पुरानी आदत में फिसलूँ।”

रश्मि के होंठ काँपे। “मैं… मैं रोकूँ?”

मालती ने धीरे से कहा, “हाँ। क्योंकि ये आदत आपके भीतर भी है। और मैं… आपकी बेटी हूँ। मैं इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहती।”

रश्मि की आँखें भीग गईं, पर इस बार आँसू में जिद नहीं थी। “मैंने समझा था कि मैं तुझे बचा रही हूँ… पर शायद मैं तुझे डराती रही।”

देवेन्द्र ने धीमे से कहा, “बचाना है तो भरोसा सिखाओ। और भरोसा—पहले खुद करना पड़ता है।”

उसी शाम देवेन्द्र ने वरुण को फोन किया। कोई बहस नहीं, कोई सफाई नहीं। बस एक साफ बात—“बेटा, मालती लौटना चाहती है। लेकिन इस बार हम दोनों परिवार मिलकर उसे समझदारी देंगे, शक नहीं।”

वरुण कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “अंकल… मैं मालती से नाराज़ नहीं हूँ। मैं बस… टूट गया था। रोज़ अदालत नहीं बन सकता था।”

देवेन्द्र ने कहा, “मुझे पता है। और वो भी अब समझ रही है।”

अगले दिन मालती अकेली नहीं गई। उसके साथ देवेन्द्र गया। रश्मि भी गई—पहली बार बिना हथियार के, बिना तंज के।

वरुण के घर के दरवाजे पर मालती ने सिर झुकाकर कहा, “मुझसे गलती हुई। मैंने चुप्पी का मतलब धोखा मान लिया। अब मैं सीखना चाहती हूँ… आप लोगों के साथ रहना, आपके तरीके से—डर से नहीं, समझ से।”

वरुण की माँ ने उसे गले लगा लिया। “बेटा… घर में गलतियाँ होती हैं। पर घर टूटता तब है, जब हम एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं।”

रश्मि ने पहली बार खुद को रोते हुए पाया। उसने मालती की पीठ पर हाथ रखा और बस इतना कहा, “मैं… भी सीखूँगी।”

देवेन्द्र ने मन ही मन सोचा—कभी-कभी रिश्ते टूटते नहीं, आदतें तोड़नी पड़ती हैं।

और उस दिन, किसी कागज़ पर नहीं—तीन लोगों के भीतर प्रायश्चित की शुरुआत हुई।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...