“हमारी तो किस्मत ही फूटी है जो इन दोनों बूढ़े-बुढ़िया को साथ में रखना पड़ता है। काम के काज के नहीं और दुश्मन अनाज के हैं!” गुंजन चिल्लाते हुए नीरा से कहती है।
“जब देखो, कुछ काम करने को कहो तो कोई न कोई बहाना बना देते हैं। कभी कहते हैं पैर में दर्द है, कभी कहते हैं पीठ में। कामचोरी तो इन दोनों से सीखो! खाना चार लोगों के बराबर खाते हैं, लेकिन काम आधे आदमी के बराबर भी नहीं करते,” नीरा भी तंज कसती है।
दोनों देवरानियाँ एक-दूसरे से बात कर रही थीं और अपने सास-ससुर पर तीखे ताने मार रही थीं। “मेरा बस चले तो इन दोनों को धक्के मारकर घर से बाहर निकाल दूँ,” नीरा हँसकर बोली।
गुंजन भी बोली, “मन तो मेरा भी करता है, लेकिन कर भी क्या सकते हैं।”
उनकी जली-कटी बातें सास-ससुर दुखी मन से सुन रहे थे। उनका मन करता था कि चिल्लाकर दोनों का मुँह बंद करा दें, पर वे ऐसा कर नहीं सकते थे। मजबूर थे। बूढ़ी हड्डियों में इतनी जान भी नहीं बची थी कि वे कुछ बोल पाते। रह-रहकर भगवान से कहते—“हे ईश्वर! आपने बेकार में ही हमें ऐसी औलाद दी… जिस कारण हमें यह दिन देखना पड़ रहा है। इससे तो अच्छा था हमें बेऔलाद ही रखते। हमें नहीं पता था कि इतने पूजा-पाठ और दुआओं के बाद भी ऐसी नालायक औलाद मिलेगी, जो माता-पिता का सम्मान तो दूर, उन्हें दो वक्त की रोटी भी चैन से नहीं खिला सकती।”
बुजुर्ग पति-पत्नी एक-दूसरे का चेहरा देखते, आँसू पोंछते। “हम दोनों बहुओं को कितने प्यार से बहू बनाकर लाए थे,” वृद्धा बोली। “सोचा था बहुएँ नहीं, बेटियाँ हैं… बुढ़ापे में हमारी सेवा करेंगी। लेकिन यहाँ तो उल्टा हमें इनकी सेवा करनी पड़ती है, और फिर भी ये खरी-खोटी सुनाती रहती हैं। इन्हें हमारे बुढ़ापे पर जरा भी तरस नहीं आता।”
वृद्ध ने धीमे से कहा, “इनको क्या दोष दें… जब हमारा ही सिक्का खोटा है, तो बहुओं को क्या दोष दें जो दूसरे घर से आई हैं।”
ये कहानी है—रघुवीर जी और उनकी पत्नी सुलोचना जी की।
शादी के दस साल बाद, किसी की दवा तो किसी की दुआ से, बहुत मुश्किल से सुलोचना जी की गोद भरी। उन दस वर्षों में न जाने उन्होंने कितने ताने सुने होंगे—पर वे उल्टा जवाब नहीं देती थीं। उनका स्वभाव इतना नम्र था कि पत्थर दिल इंसान भी पिघल जाए, पर फिर भी ताने खत्म नहीं होते थे। एक दिन भगवान ने उन पर दया की और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
सुलोचना जी शादी से पहले सरकारी अस्पताल में स्टाफ नर्स थीं, लेकिन पहला बच्चा गोद में आते ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी—“बच्चे को खुद पालूँगी, संस्कार खुद दूँगी,” यही सोचकर। दो साल बाद उन्हें दूसरा बेटा हुआ। अब सुलोचना जी अपने दोनों बेटों—कुनाल और मयंक—की परवरिश में पूरी तरह जुट गईं।
रघुवीर जी कभी-कभी कहते, “दोस्त घूमने जा रहे हैं, हम भी चलें।” लेकिन सुलोचना जी बच्चों की तबीयत, पढ़ाई और देखभाल का हवाला देकर मना कर देतीं। धीरे-धीरे समय बीतता गया।
रघुवीर जी के दोस्त कहते, “यार, दिन-रात काम ही करते रहते हो। कुछ समय अपने लिए भी निकालो।” रघुवीर जी हँसकर कहते, “अरे भाई, हमारे दो बेटे हैं—यही तो बुढ़ापे की लाठी बनेंगे।”
उन्हें क्या पता था कि जिन्हें वे “बुढ़ापे की लाठी” समझ रहे हैं, वही लाठी बनकर बरसेंगे।
रघुवीर जी अपने ज़माने के जाने-माने कपड़े के व्यापारी थे। उन्होंने बहुत बड़ी दौलत नहीं, लेकिन बहुत इज्जत कमाई थी। उनकी साख ऐसी थी कि थोक हो या खुदरा, सभी उन्हीं से माल लेते थे। फिर दोनों बेटे बड़े हुए, तो रघुवीर जी ने दोनों की शादी धूमधाम से कर दी।
अमीर घरानों से भी रिश्ते आए थे, लेकिन उन्होंने सोचकर गरीब घर की लड़कियाँ चुनीं—“अमीर की बेटी को तो कोई भी बहू बना लेता है, गरीब की बेटी को बहू बनाना हर कोई पसंद नहीं करता।” उनकी सोच नेक थी, पर किस्मत ने दूसरा खेल खेला।
दोनों बहुएँ—गुंजन और नीरा—गरीबी में पली थीं। इतना धन-वैभव देखकर उनकी आँखें चौंधिया गईं। ऊपर से दोनों बेहद खूबसूरत थीं, और दोनों बेटे—कुनाल और मयंक—अपनी-अपनी पत्नियों के प्यार में डूब गए। शादी से पहले तक बेटे माता-पिता पर जान छिड़कते थे, लेकिन शादी के बाद धीरे-धीरे दूर होते चले गए—उन्हें खुद भी पता नहीं चला कैसे।
रघुवीर जी ने बेटों को शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ाया था, ताकि वे अच्छी नौकरी करें। मगर दोनों पढ़ाई में कमजोर निकले, इसलिए उन्होंने पिता का बिजनेस ही संभालना शुरू कर दिया। रघुवीर जी भी खुश थे—“कम से कम सामने रहेंगे।”
लेकिन एक दिन त्यौहार के सीजन में दुकान पर भीड़ थी। रघुवीर जी ने एक पुराने ग्राहक को उधार में माल दिया, मगर डायरी में नाम लिखना भूल गए। त्यौहार के बाद ग्राहक पैसे देने आया। रघुवीर जी ने ईमानदारी से कहा, “गलती हो गई, नाम लिखना रह गया… पर रकम मुझे याद है।” ग्राहक ने जब रसीद दिखाई, रकम वही थी। ग्राहक बहुत प्रभावित हुआ। उसने कहा, “आप जैसे सज्जन बहुत कम मिलते हैं।”
वहाँ रघुवीर जी का बड़ा बेटा कुनाल सब सुन रहा था। वह आग-बबूला हो गया। उसके मन में बैठ गया—“पापा अब दुकान के लायक नहीं रहे।”
उसी दिन उसने पिता से कहा, “पापा, आप थक गए हैं। घर जाइए, आराम कीजिए। जब ठीक लगे तब आना, वरना आने की जरूरत नहीं।” और यह कहते हुए उसने पिता को लगभग घसीटकर दुकान से बाहर कर दिया।
रघुवीर जी रास्ते भर रोते हुए घर लौटे। चेहरा सूजा हुआ था। सुलोचना जी घबरा गईं—“किसने कुछ कहा क्या?”
रघुवीर जी ने सब बता दिया। सुलोचना जी का दिल टूट गया। रात को खाना होने के बाद उन्होंने कुनाल को पास बुलाया, लेकिन वह सीधे कमरे में चला गया।
सुलोचना जी ने तेज आवाज़ में कहा, “कुनाल! मैंने क्या कहा था?”
कुनाल गुस्से से बाहर आया। उसी समय छोटा बेटा मयंक भी घर आ गया।
कुनाल बोला, “क्या मैं तुम दोनों का नौकर हूँ? जब कहो तब दौड़कर आ जाऊँ? सुन लो, आज से इस घर में वही होगा जो मैं चाहूँगा!”
मयंक तुरंत बोल पड़ा, “वाह भाई, छुपे रुस्तम निकले! पापा से चुपके से साइन कराने में, नकली कागज बनवाने में तो आपने मेरा सहारा लिया… और अब पलटी मार रहे हो!”
माँ-बाप सन्न रह गए। “ये क्या कह रहे हो?” सुलोचना जी की आवाज़ काँप गई।
कुनाल ने मयंक का कॉलर पकड़ लिया और हाथ उठा दिया। तभी मयंक की पत्नी नीरा बीच में आई। उसने शांत लेकिन कड़ी आवाज़ में कहा, “भैया, कानून की किताब मैंने भी पढ़ी है। आपने धोखे से पिता जी से पूरी संपत्ति अपने नाम करवा ली है। यह अपराध है। मैं चाहूँ तो केस कर सकती हूँ।”
कुनाल के चेहरे का रंग उड़ गया। वह तुरंत नरम पड़ा, “नहीं… मेरा मतलब वो नहीं था। हम दोनों भाई हैं, तो संपत्ति पर बराबर हक है… बस यही कहना चाहता था।”
नीरा हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली, “तो फिर सही रास्ता ही चलिए, वरना आगे क्या होगा, उसके लिए तैयार रहिए।”
रघुवीर जी के मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। उन्होंने हिम्मत करके बस इतना पूछा, “तुम दोनों ने मुझसे कागज कब साइन करवा लिए? मुझे तो पता ही नहीं चला।”
मयंक बोला, “बुड्ढे, हम नालायक नहीं हैं। हम इतने लायक हैं कि समय रहते सब अपने नाम करवा लिया। त्यौहार के सीजन में जब ढेर सारे कागज होते थे, मैं बीच-बीच में प्रॉपर्टी के पेपर भी रख देता था। आप हम पर भरोसा करके बिना देखे साइन कर देते थे। बस ऐसे ही… अब जमाना ऐसा है, बाप को औलाद पर भरोसा नहीं, तो औलाद को भी हथकंडे अपनाने पड़ते हैं।”
इतना कहकर मयंक और नीरा चले गए। कुनाल भी घूरता हुआ कमरे में चला गया। गुंजन भी पीछे-पीछे चली गई।
रघुवीर जी का सिर झुक गया। “वाह रे औलाद… जिनके लिए हमने कितनी मन्नतें माँगीं… वही ये दिन दिखाएँगे, यह सोचा न था।”
सुलोचना जी ने पति के आँसू पोंछे और टूटे स्वर में बोली, “लोग मुझे बाँझ कहकर ताने मारते थे, तब भी इतनी तकलीफ नहीं होती थी… जितनी आज अपनी औलाद की करतूत देखकर हो रही है।”
माँ-बाप की बातें बेटे-बहू छुपकर सुन रहे थे। जो दोनों भाई कुछ देर पहले लड़ रहे थे, अब एक हो गए। दोनों ने हाथ मिलाया और गुस्से में आकर बोले, “हमें नालायक कहते हो? नालायक तो तुम दोनों हो! अब तुम लोग किसी काम के लायक नहीं। अगर सलामती चाहते हो तो स्टोर रूम में जाकर रहो। वहीं सफाई करो और वहीं सोओ। और सुनो—खाने का नियम भी तय है। पंद्रह दिन माँ एक बेटे के घर काम करेगी, तो खाना उसी घर से मिलेगा। पंद्रह दिन पिता दूसरे बेटे के घर काम करेंगे, तो खाना उसी घर से मिलेगा। रात को दोनों स्टोर रूम में ही सोएंगे।”
रघुवीर जी ने विनती की, “बेटा, जितना कहोगे करेंगे… बस हमें अपने कमरे में सोने दो। तुम्हारी माँ को धूल से एलर्जी है।”
लेकिन बेटों ने साफ कह दिया, “शुक्र मनाओ कि घर में रहने दे रहे हैं, वरना बाहर निकालने में देर नहीं लगेगी।”
दोनों बुजुर्ग स्टोर रूम में पहुँचे। वहाँ धूल की मोटी परत थी। रघुवीर जी ने मुँह पर कपड़ा बाँधा, थोड़ी जगह साफ की और वहीं बिस्तर बिछा दिया। सुलोचना जी रोती रहीं। उनका मन बीमार रहने लगा, लेकिन काम न करने पर खाना बंद—यह नियम बहुओं ने भी मान लिया था। मजबूरी में उन्हें उस उम्र में भी काम करना पड़ता, नहीं तो भूखा रहना पड़ता।
दिन बीतते गए। दिन भर दोनों अलग-अलग बेटों के घर काम करते। पास रहकर भी एक-दूसरे को देख नहीं पाते। रात में स्टोर रूम में मिलते और बस एक-दूसरे का हाथ पकड़कर रो लेते।
सुलोचना जी कहतीं, “कुछ भी हो जाए, आप मुझे छोड़कर मत जाना।”
रघुवीर जी कहते, “मैं भी तुम्हारे बिना अधूरा हूँ। जिस दिन कुनाल ने मुझे दुकान से धक्के मारकर निकाला था, मैं उसी दिन मर गया होता… लेकिन तुम्हारा चेहरा सामने आ गया और मैं लौट आया।”
एक रात सुलोचना जी की तबीयत बहुत बिगड़ गई। ठीक से खाना नहीं, ऊपर से ज्यादा काम… बुखार तेज हो गया, बदन दर्द से वह कराह रही थीं। रघुवीर जी घबरा गए। उन्होंने पहले बड़े बेटे के दरवाजे पर दस्तक दी।
अंदर से आवाज आई, “कौन है?”
“बेटा, मैं… तुम्हारा पापा। तुम्हारी माँ की तबीयत बहुत खराब है। बुखार की दवा दे दो…”
कुनाल बोला, “आपको नहीं पता? आज माँ शनि… मतलब मयंक के हिस्से में है। उसी से मांगो। मुझे डिस्टर्ब मत करो, वरना अंजाम जानते हो।”
रघुवीर जी काँपते हुए छोटे बेटे के दरवाजे पर पहुँचे। नीरा ने दरवाजा खोला। ससुर को हाथ जोड़ते, रोते देखकर भी वह गुर्राई—“रात भर नींद नहीं आती क्या? हमें चैन से सोने दो!”
“बहू, माधुरी… मतलब तुम्हारी सास की तबीयत बहुत खराब है। दवा दे दे…”
नीरा बोली, “आप बड़े बेटे के घर काम करते हो, वहीं से मदद मांगो। और फिर कल से तो माँजी उधर जाने वाली हैं… तो मेरी जिम्मेदारी नहीं बनती।”
और उसने दरवाजा बंद कर दिया।
रघुवीर जी टूट गए। सुबह तक सुलोचना जी की हालत और बिगड़ गई। उस दिन सुलोचना जी काम पर नहीं जा पाईं। बड़ी बहू गुंजन गुस्से में स्टोर रूम में आ धमकी। रघुवीर जी पत्नी के माथे पर पट्टी रख रहे थे।
गुंजन चिल्लाई, “अरे बेशर्म! उम्र हो गई है और रंगरलियाँ! आज का काम कौन करेगा? तेरे लिए नौकर रखा है क्या?”
सुलोचना जी दर्द से कराह रही थीं। रघुवीर जी से यह सहा नहीं गया। उन्होंने हाथ उठाया, लेकिन कुनाल ने झपटकर उनका हाथ पकड़ लिया। फिर दोनों भाइयों का गुस्सा भड़क गया। उन्होंने बुजुर्गों का सामान उठाकर बाहर फेंक दिया। धक्के देकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। रघुवीर जी की आँखों के आगे अंधेरा छा गया, लेकिन पत्नी को संभालना था—इसलिए वे टूटते हुए भी चल पड़े।
सबसे पहले उन्होंने सुलोचना जी को ऑटो में बिठाकर अस्पताल पहुँचाया। इलाज हुआ। तबीयत सुधरी। मगर अब जाएँ कहाँ?
उसी अस्पताल में सुलोचना जी के दूर के रिश्ते के भाई का बेटा, दीपक, मिल गया। उसने बताया कि उसकी नौकरी दूसरे शहर में लग गई है, माता-पिता नहीं रहे, गाँव का घर खाली है। “अगर आप लोग कुछ दिनों के लिए वहाँ रह लें, तो घर भी संभल जाएगा… और मैं भी निश्चिंत रहूँगा।”
यह सुनकर दोनों के दिल को राहत मिली। वे गाँव चले गए। वहाँ की हवा-पानी से सुलोचना जी की तबीयत जल्दी सुधरने लगी। रघुवीर जी के मन में फिर से जीने की जिद जागी। उन्होंने दो साल की फसल के पैसों में से थोड़ा जमा किया था। दीपक ने कहा, “आप लोग मेहनत कर रहे हैं, ये पैसा आप ही इस्तेमाल कीजिए।”
रघुवीर जी ने सुलोचना जी से कहा, “खेती तो मौसम पर चलती है… क्यों न अपना पुराना काम फिर शुरू करें? मुझे अनुभव है।”
सुलोचना जी बोलीं, “इस उम्र में?”
रघुवीर जी की आँखों में चमक आ गई। “जब तक साँस है, तब तक कोशिश है।”
और उन्होंने छोटे स्तर से कपड़े का व्यापार फिर शुरू कर दिया। धीरे-धीरे पुराने ग्राहक वापस जुड़ने लगे—क्योंकि रघुवीर जी का व्यवहार वही था: सच्चा, साफ और भरोसे वाला। पुराने वर्कर्स भी लौट आए, जिन्होंने बेटों के बुरे व्यवहार से दुखी होकर नौकरी छोड़ी थी। अब रघुवीर जी की आमदनी बढ़ने लगी।
उधर कुनाल और मयंक अपने ही काम में चोरी करने लगे। वर्कर्स उनके रूखेपन से तंग आकर छोड़ते गए। दोनों भाई एक-दूसरे पर चोरी के आरोप लगाकर झगड़ने लगे। घर में भी पैसे की तंगी होने लगी।
इसी बीच उन्हें खबर मिली कि एक बड़े सेठ—जो बहुत अमीर हैं—गरीब लड़कियों और लड़कों का सामूहिक विवाह करवाते हैं। कुनाल का बेटा और मयंक की बेटी शादी लायक हो चुके थे, लेकिन उनके पास खर्च करने को पैसे नहीं थे। मजबूरी में उन्होंने अपने बच्चों के फॉर्म भी उसी में भर दिए।
शादी का दिन आया। मैरिज हॉल ऐसे सजा था जैसे स्वर्ग उतर आया हो। हर जोड़े को कपड़े, गहने और गृहस्थी का सामान दिया जा रहा था। यह सब खर्च वही सेठ कर रहा था—और वह सेठ कोई और नहीं, रघुवीर जी थे। उन्होंने अपने जीवन में पहली बार सुकून से मुस्कुराया—क्योंकि अब वे किसी के मोहताज नहीं थे।
तभी उनकी नजर रजिस्ट्रेशन लिस्ट पर गई। बच्चों के नाम के साथ माता-पिता के नाम पढ़ते ही उनकी आँखें ठहर गईं। कुनाल और मयंक… और उनकी बहुएँ… वही नाम!
रघुवीर जी का चेहरा एक पल को गंभीर हो गया। पत्रकारों की नजर पड़ गई। “सर, आप हर शादी में खुश रहते हैं, आज आपकी प्रतिक्रिया अलग क्यों?”
सुलोचना जी ने धीरे से पति का हाथ थाम लिया और कहा, “कह दीजिए… अब छुपाने से क्या होगा।”
रघुवीर जी ने सब सच बता दिया—दस साल का इंतजार, बच्चों के लिए कुर्बानियाँ, व्यापार की इज्जत, और फिर वही बेटे-बहू जिन्होंने उन्हें धक्के मारकर बाहर निकाला। उन्होंने कहा, “हमने हार नहीं मानी। हमने फिर मेहनत की। हमारे पुराने ग्राहक और वर्कर्स लौटे… और हमने फिर से अपना जीवन खड़ा किया। एक सफल इंसान के पीछे किसी न किसी का हाथ होता है… मेरे पीछे मेरी पत्नी का हाथ है।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। लोग भावुक हो गए। कैमरे घूम गए। उधर कुनाल-मयंक और उनकी पत्नियों की नजरें शर्म से झुक गईं।
कार्यक्रम खत्म हुआ। रघुवीर जी और सुलोचना जी कार की तरफ बढ़े। तभी दोनों बेटे-बहू दौड़कर आए और पैरों में गिर पड़े। “माफ कर दीजिए… हमें अपना लीजिए…”
पत्रकारों ने पूछा, “ये लोग कौन हैं?”
रघुवीर जी कुछ कहते, उससे पहले कुनाल बोल पड़ा, “हम इनके यहाँ काम करते थे… गलती हो गई थी… माफी मांग रहे हैं…”
तभी एक पुराना वफादार कर्मचारी आगे आया, जिसे कुनाल ने चोरी का झूठा इल्जाम लगाकर निकाला था। उसने साफ कहा, “ये इनके बेटे हैं। इन्होंने अपने मां-बाप को लात-घूंसे मारे, बीमार हालत में घर से निकाला… और आज बदनामी के डर से खुद को कर्मचारी बता रहे हैं।”
भीड़ में नाराजगी फैल गई। लोगों ने उन्हें धिक्कारा। सोशल मीडिया पर भी उनकी आलोचना होने लगी।
पत्रकारों ने पूछा, “सर, आपकी संपत्ति का क्या होगा?”
रघुवीर जी बोले, “हमारा जीवन अब कितना ही बचा है। लेकिन हमारा धन उन बच्चों के लिए होगा जिनके माता-पिता नहीं… उन बुजुर्गों के लिए होगा जिन्हें उनके बच्चे छोड़ देते हैं… और हर साल ऐसे सामूहिक विवाह में भी लगेगा।”
“और अपने बेटों के लिए?” सवाल आया।
रघुवीर जी ने सुलोचना जी की तरफ देखा।
सुलोचना जी बिना डरे बोलीं, “आज तक सुना था—पूत कपूत हो सकता है, माँ कुमाता नहीं। लेकिन आज मैं कुमाता बनना चाहती हूँ। जिनके लिए हमने अपना खून-पसीना एक किया, उन्होंने हमें लाठी समझकर सहारा नहीं दिया—लाठी बनकर मारा। मुझे मरने की हालत में बाहर निकाला, मेरे पति को पीटा… इसलिए मैं इन्हें एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूँगी।”
लोगों ने तालियों से उनके फैसले का सम्मान किया।
दोस्तों, आज की कहानी यही सिखाती है—माता-पिता का सम्मान सिर्फ शब्दों से नहीं, व्यवहार से होता है। जो अपने बूढ़े माँ-बाप को तिरस्कार देता है, वक्त उसे उसी आईने में खुद को दिखा देता है।
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लेखक : अरविंद भंडारी
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