ऑटो से उतरते ही अवनी ने किराया दिया और सिर झटककर रेस्टोरेंट के भीतर आ गई। अंदर आते ही उसका परिचित संसार उसे अपनी बाँहों में खींच लेने लगा—तवे की सोंधी महक, कटिंग बोर्ड पर सब्जियों की टक-टक, और हँसी-ठिठोली की हल्की गूंज।
वह सीधे किचन में घुसी तो माया आटे में हाथ सने, चेहरे पर हल्की चिंता लिए खड़ी थी।
“दी… आज लंच के लिए सिंघानिया फैमिली आने वाली है।”
अवनी ने चौंककर पलटा, “अच्छी बात है। कितने लोग?”
“कॉल आया था अभी,” माया बोली, “अर्जुन ने अटेंड किया। उन्होंने कहा—बारह बजे के आसपास।”
पीछे से अर्जुन ने किचन के बोर्ड पर मेनू वाला मैसेज खोलते हुए कहा, “और मेनू अमन भाई ने भेज दिया है। सारे आइटम लिखे हैं। बस टाइम पर सब निकल जाए।”
अवनी ने जल्दी से हाथ धोए, “ठीक है। उसी हिसाब से तैयारी रखो। मैं आधे घंटे में लौट आऊँगी।”
माया की आँखें फैल गईं, “अब कहाँ जा रही हो, दी?”
“मार्केट का छोटा सा काम है,” अवनी ने हल्का बनाते हुए कहा।
अर्जुन तुरंत बोला, “मैं साथ चलूँ? बाइक से जल्दी हो जाएगा।”
अवनी ने सिर हिलाया, “नहीं, तू यहीं रुक। आज यहाँ तेरा होना ज़रूरी है।”
उसी वक्त नील, जो ग्रेवी में चमचा घुमा रहा था, मुस्कुराते हुए बोला, “दी, ये टेस्ट करना ज़रा।”
अवनी ने एक चम्मच लेकर चखा। “टेस्ट सही है। बढ़िया।”
नील ने अपनी ही पीठ थपथपाई, “आखिर बनाया किसने है? मेरे हाथ में जादू है।”
माया ने नाक सिकोड़कर कहा, “खुद की तारीफ खुद करने वाला तोता!”
“अगर तुम लोग नहीं करोगे तो खुद ही करनी होगी ना,” नील ने आँख मारी।
कोने में खड़ी स्नेहा, जो अब तक बस मुस्कुरा रही थी, हँसी दबा न पाई।
अर्जुन ने झट से कहा, “चुपचाप साइड हो, मुझे भी काम करना है। आज बहुत ज्यादा काम है।”
सब हँस पड़े। हँसी में किचन कुछ हल्का हुआ, मगर अवनी के मन में एक गांठ बंधती जा रही थी।
कुछ देर बाद उसने एप्रन उतारा, “ठीक है, तुम लोग संभाल लेना। मैं बस आती हूँ।”
वह बाहर निकली, ऑटो रोका और ड्राइवर को एक पता बताया। रास्ते में शहर की आवाज़ें कान में पड़ रही थीं, मगर उसके भीतर सिर्फ एक सवाल घूम रहा था—क्या उसे वहाँ जाना चाहिए?
ऑटो में बैठी अवनी ने खुद से कहा, “मैंने रिश्ता खत्म कर लिया था… फिर वहाँ जाना… क्या सही है?”
उसने गहरी साँस ली, जैसे अपने डर को भीतर ही दबा देना चाहती हो।
थोड़ी दूर आगे ऑटोवाले ने कहा, “मैडम जी, यहीं उतर जाइए। आगे का रास्ता खराब है।”
अवनी उतरी। हवा में हल्की धूल थी। उसने दुपट्टा ठीक किया और बड़े कदमों से आगे बढ़ने लगी। हर कदम के साथ पुरानी यादें, पुरानी कड़वाहट, और एक अधूरी-सी कसक उसके साथ चलती रही।
“जो होगा… ठीक होगा,” उसने खुद को संभाला और सामने वाले घर के गेट तक पहुँच गई।
उसने बेल बजाई।
कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला। सामने सुमित्रा खड़ी थी—वही स्त्री जिसने घर की दीवारों में एक नया नाम लिख दिया था। सुमित्रा की आँखों में सवाल भी था और व्यंग्य भी।
“आप…?” सुमित्रा ने ठंडी आवाज़ में कहा, “शायद गलत घर आ गई हैं।”
अवनी का गला सूख गया। “जी… मुझे… पापा से बात करनी है। रघुवीर जी से।”
“आज कैसे याद आई उनकी?” सुमित्रा ने ताना मारा।
अवनी ने नजरें नीचे कर लीं, “आप ये बताइए… वो घर पर हैं?”
“हैं,” सुमित्रा ने दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया, “आइए।”
अवनी झिझकते हुए अंदर बैठ गई। घर वैसा ही था—साफ-सुथरा, पर भावनाओं से ठंडा। सुमित्रा चाय की ट्रे लेकर आई।
“चाय?”
“नहीं… थैंक्स,” अवनी ने जल्दी से कहा। उसे डर था—अगर चाय पकड़ ली तो बातचीत लंबी हो जाएगी, और लंबी बातचीत में दर्द भी बढ़ता है।
थोड़ी देर बाद सीढ़ियों से कदमों की आवाज आई।
रघुवीर जी नीचे आए—चेहरे पर थकान थी, पर बेटी को देखते ही आँखों में चमक। उन्होंने आगे बढ़कर उसे गले लगाने का हाथ बढ़ाया, मगर अवनी पीछे हट गई।
रघुवीर जी ठिठक गए। “अब भी नाराज़ हो, बिटिया?”
अवनी की आवाज़ स्थिर थी, “मैं बस एक बात कहने आई हूँ।”
“कह,” रघुवीर जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मेरी बेटी को क्या कहना है?”
अवनी ने उन्हें गहरे देखा। वह चाहती तो कह देती—तुम्हारे कारण मेरा बचपन काँपता रहा, तुम्हारे फैसलों ने मेरी माँ को तोड़ा, तुम्हारी खामोशी ने मुझे अकेला किया।
मगर आज वह उन सबके लिए नहीं आई थी। आज उसके भीतर सिर्फ डर था।
“आप ये काम छोड़ क्यों नहीं देते… जिसमें आपकी जान का खतरा बना हुआ है?”
रघुवीर जी चौंके, “मैं कोई ऐसा काम करता ही नहीं जिसमें जान का खतरा हो।”
अवनी का चेहरा सख्त हो गया, “तो फिर उन लोगों ने आपको मारने की कोशिश क्यों की?”
रघुवीर जी ने टालने की कोशिश की, “मुझे नहीं पता। आजकल राह चलते लोगों को मारना शौक बन गया है कुछ लोगों का।”
अवनी चुप रही, पर उसकी चुप्पी सवाल बनकर कमरे में फैल गई।
रघुवीर जी बोले, “आज की खबर देखो… एक आदमी की जान ले ली और ऊपर से झूठे आरोप भी लगा दिए।”
अवनी ने धीरे से पूछा, “आरोप झूठे थे?”
“हाँ,” रघुवीर जी ने कहा, “सब अफवाह है कि वे सिर्फ गलत लोगों को मारते हैं। उन्हें तो बस डर पैदा करना है। नाम का आतंक।”
अवनी की आँखों में डर उभर आया। “मुझे लगा… इस बारे में आपसे बात करनी चाहिए। इसलिए आई।”
रघुवीर जी की आवाज़ भर्रा गई, “अच्छा लगा… कि तू अभी भी… मेरी फिक्र करती है।”
अवनी ने पल भर को सिर झुकाया। “ठीक है… मुझे बस यही कहना था।”
वह उठी और दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगी। पीछे से रघुवीर जी की आवाज आई, “इतनी दूर आई हो तो खाना खाकर चली जाना।”
अवनी ने बिना पलटे कहा, “सॉरी… आज काम है।”
वह बाहर निकल आई। कुछ कदम चलकर उसने साँस छोड़ी, जैसे किसी भारी पत्थर को सीने से उतारा हो।
पीछे घर के अंदर रघुवीर जी खिड़की के पास खड़े रह गए।
“ये बात सोचने वाली है, सुमित्रा,” उन्होंने धीमे से कहा, “अगर मामला इतना गंभीर न होता तो अवनी यहाँ आती ही नहीं।”
सुमित्रा का चेहरा भी फीका पड़ गया, “मुझे भी डर लगता है… कहीं एक दिन मैं और रोहन… अकेले न रह जाएँ।”
रघुवीर जी ने पहली बार अपनी पत्नी के डर को ध्यान से सुना। “नहीं… ऐसा कुछ नहीं होगा।”
“तो आपने कुछ सोचा है?” सुमित्रा ने पूछा।
रघुवीर जी ने गंभीर होकर कहा, “सोचा है।”
उधर अवनी ऑटो में बैठकर वापस रेस्टोरेंट की ओर आ रही थी। चौराहे पर रेड लाइट हुई तो ऑटो रुक गया। अवनी का ध्यान अचानक सामने गया—एक जीप, जिसमें पाँच लड़के बैठे थे। सब हँस रहे थे, जैसे दुनिया का कोई डर उन्हें छू भी नहीं सकता।
अवनी के भीतर आग-सी उठी।
“इन्हें एहसास नहीं होता… इनके भी परिवार हैं… इनके बाद उनका क्या होगा?” उसने मन में कहा।
लाइट ग्रीन हुई और जीप आगे निकल गई। ऑटो भी चल पड़ा। अवनी ने हथेलियाँ कस लीं। उसे लगा जैसे उसकी जिंदगी का कोई धागा किसी अनदेखे हाथ ने खींच दिया हो।
रेस्टोरेंट पहुँची तो भीतर हलचल थी। तभी सामने अमन खड़ा दिखा—चेहरे पर बेचैनी, आँखों में इंतज़ार।
“कहाँ गई थी?” वह लगभग झल्लाकर बोला, “कब से इंतज़ार कर रहा हूँ।”
अवनी ने खुद को संभाला, “बाजार गई थी। क्या हुआ?”
“आज मेरी फैमिली आ रही है,” अमन ने कहा, “और तू गायब।”
अवनी ने हल्का-सा मुस्कुरा दिया, “पता है, माया ने बता दिया था। उनके आने से पहले सब तैयार है। तू इतनी टेंशन क्यों ले रहा है?”
अमन ने जल्दी से कहा, “नहीं… कुछ नहीं… बस यूँ ही।”
अवनी ने सीधा सवाल किया, “काव्या भी आ रही है क्या?”
अमन एकदम सख्त हो गया, “नहीं। वो क्यों आएगी?”
अवनी ने उसे गौर से देखा, “तूने अभी तक बात नहीं की क्या… अपने मम्मी-पापा से?”
अमन ने धीमे से कहा, “तू अभी काव्या को साइड रख।”
“क्यों?” अवनी ने चौंककर कहा।
अमन के माथे पर पसीना उभर आया। “वो लोग तुझसे कुछ पूछें… तो सोच समझकर जवाब देना। और काव्या के बारे में… मत बताना। प्लीज।”
अवनी का दिल बैठ गया। “क्यों? क्या हुआ?”
अमन ने उसकी तरफ देखा—ऐसी नजर जैसे सच बोलते ही सब टूट जाएगा।
“अभी बस समझ… मैं बाद में बताऊँगा,” उसने कहा।
अवनी ने धीरे से सिर हिला दिया, “ओके।”
लेकिन उसके भीतर एक तूफान उठ चुका था।
उसने महसूस किया—आज का दिन सिर्फ “लंच” का नहीं था।
आज का दिन रिश्तों की परीक्षा का था—किसका सच कब बाहर आएगा, कौन किसको बचाने के लिए झूठ बोलेगा, और कौन डर के आगे झुक जाएगा।
वह किचन की तरफ पलटी। हाथ अपने आप काम में लग गए, मगर मन बार-बार उसी एक बात पर लौट आता—अमन कुछ छिपा रहा है।
और जो छिपाया जा रहा है… वो सिर्फ एक लड़की का नाम नहीं, शायद किसी बड़ी सच्चाई की परछाईं है।
बारह बजने में अब बस कुछ मिनट थे। बाहर गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई। स्टाफ ने दौड़कर कहा, “मैडम, गेस्ट्स आ गए!”
अवनी की साँस अटक गई। उसने फौरन एप्रन ठीक किया, बाल संभाले, और अपने चेहरे पर वही पेशेवर मुस्कान चिपका ली—जो वह हर दिन पहनती थी।
पर आज… उसके दिल के भीतर एक डर भी बैठ चुका था।
क्योंकि उसे एहसास हो चुका था—कुछ सवालों के जवाब “सोच समझकर” नहीं, “सच बोलकर” देने पड़ते हैं।
और आज, शायद सच बोलने की कीमत… बहुत बड़ी होने वाली थी।
लेखिका : रमा मिश्रा
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