राघव गुस्से और हैरानी के मिश्रण से भर गया। "मुझे घुमाओ मत सुमेधा! सच बताओ। क्या तुमने अपने पिता से पैसे लिए? या तुमने घर गिरवी रखा? मेरे बिना तुम यह सब नहीं कर सकती थीं।"
सुमेधा ने पास की मेज़ से एक फाइल उठाई और राघव की ओर बढ़ा दी।
"यह इस घर के पिछले दो साल के अकाउंट्स हैं। एक-एक पैसे का हिसाब। मैंने किसी से एक रुपया भी उधार नहीं लिया।"
शहर के पॉश इलाके 'गुलमोहर पार्क' के विला नंबर 45 में आज रात सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन यह शांति तूफ़ान से पहले की थी। डाइनिंग टेबल पर महज़ चम्मच और प्लेटों के टकराने की आवाज़ आ रही थी।
राघव मल्होत्रा, जो शहर के एक नामी आर्किटेक्ट और बिल्डर थे, अपनी पत्नी सुमेधा की ओर तीखी नज़रों से देख रहे थे। सुमेधा ने एम.बी.ए. किया था, गोल्ड मेडलिस्ट थी, लेकिन शादी के बाद राघव की ज़िद और परिवार की ज़िम्मेदारियों के चलते उसने अपना करियर छोड़ दिया था। वह अब एक बेहतरीन होममेकर थी, लेकिन राघव की नज़रों में उसकी यह भूमिका 'बेरोजगारी' और 'आराम' से ज़्यादा कुछ नहीं थी।
"तुम्हें लगता है कि यह आलीशान घर, यह गाड़ियाँ और यह लक्ज़री लाइफ अपने आप चल रही है?" राघव ने पानी का गिलास मेज़ पर पटकते हुए कहा। "सुमेधा, तुम दिन भर घर में रहकर बस रोटियां तोड़ती हो। तुम्हें क्या पता कि बाहर की दुनिया में पैसा कमाना लोहे के चने चबाने जैसा है। तुम तो मेरे पैसों पर ऐश कर रही हो।"
सुमेधा ने शांति से निवाला निगला और बोली, "राघव, घर संभालना और एक परिवार को जोड़कर रखना किसी मल्टीनेशनल कंपनी को चलाने से कम नहीं होता। बस फ़र्क इतना है कि यहाँ पगार नहीं मिलती, सिर्फ़ ताने मिलते हैं।"
"ओह! तो अब तुम मुझे लेक्चर दोगी?" राघव ने व्यंग्य से हंसा। "ठीक है। अगर तुम्हें अपनी काबिलियत पर इतना ही गुमान है, तो एक शर्त लगाते हैं।"
सुमेधा ने प्रश्नवाचक नज़रों से पति को देखा।
राघव ने अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई और खड़े होकर बोला, "अगले महीने मुझे अपने ड्रीम प्रोजेक्ट 'स्काईलाइन टावर्स' के लिए दो साल के लिए दुबई जाना है। मैं तुम्हें एक चुनौती देता हूँ। मैं तुम्हारे सारे क्रेडिट कार्ड्स ब्लॉक करवा दूंगा और तुम्हें महीने का खर्चा देना बंद कर दूंगा। मेरे जाने के बाद, तुम्हें न सिर्फ़ यह घर चलाना है, बल्कि इन दो सालों में अपनी काबिलियत से इतना कमाना है कि तुम इस घर की एक और मंजिल बनवा सको। और हाँ, अगर तुम हार गई, तो ज़िंदगी भर मेरे फैसलों पर सवाल नहीं उठाओगी और वही करोगी जो मैं कहूँगा।"
सुमेधा के स्वाभिमान को आज गहरी चोट लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और राघव की आँखों में आँखें डालकर कहा, "मंजूर है। लेकिन अगर मैंने यह कर दिखाया, तो आपको मानना होगा कि एक पत्नी, पति की जागीर नहीं, उसकी अर्धांगिनी होती है।"
राघव हंसते हुए वहाँ से चला गया। उसे यकीन था कि सुमेधा दो महीने भी नहीं टिक पाएगी और रोते हुए उसे फोन करेगी।
एक महीने बाद राघव दुबई चला गया। जाते वक़्त उसने सुमेधा के हाथ में घर की चाबियां दीं, लेकिन बैंक अकाउंट का एक्सेस नहीं दिया।
सुमेधा अकेली रह गई थी। उसके पास बचत के नाम पर सिर्फ़ उसकी शादी से पहले की कुछ एफडी (FD) और गहने थे। लेकिन उसने कसम खाई थी कि वह गहनों को हाथ नहीं लगाएगी। सुमेधा जानती थी कि अब रोने का वक़्त नहीं है। उसने अपने पुराने संपर्कों को खंगाला। उसे याद आया कि वह शेयर बाज़ार और फाइनेंशियल एनालिसिस में कितनी तेज़ थी।
उसने अपनी छोटी सी बचत से एक पुराना लैपटॉप ठीक करवाया और 'फ्रीलांस फाइनेंशियल कंसल्टेंट' के रूप में काम तलाशना शुरू किया। लेकिन शुरुआत इतनी आसान नहीं थी। कोई भी एक हाउसवाइफ को अपना पोर्टफोलियो देने को तैयार नहीं था।
सुमेधा ने हार नहीं मानी। उसने एक छद्म नाम (Pseudonym) चुना—'मिस्टर एस. कुमार'। उसने सोचा कि पुरुष-प्रधान समाज में शायद एक पुरुष के नाम पर काम मिलना आसान हो। उसने ऑनलाइन ट्रेडिंग और मार्केट एनालिसिस के ब्लॉग लिखने शुरू किए। उसकी भविष्यवाणियाँ इतनी सटीक होती थीं कि धीरे-धीरे 'मिस्टर एस. कुमार' का नाम फाइनेंस की दुनिया में चर्चित होने लगा।
उधर दुबई में, राघव की हालत पतली थी। उसका प्रोजेक्ट 'स्काईलाइन टावर्स' बुरी तरह से फँस गया था। ग्लोबल मार्किट में मंदी आ गई थी और लोहे-सीमेंट के दाम आसमान छू रहे थे। उसके इन्वेस्टर हाथ खींच रहे थे। राघव को समझ नहीं आ रहा था कि वह प्रोजेक्ट की लागत को कम कैसे करे और डूबते हुए जहाज़ को कैसे बचाए। वह रातों की नींद हराम कर चुका था।
करीब आठ महीने बीत गए। राघव डिप्रेशन के करीब था। तभी उसके एक दोस्त ने उसे सलाह दी, "राघव, इंडिया में एक नया कंसल्टेंट आया है, 'एस. कुमार'। लोग कहते हैं कि उसका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है। वह डूबती कंपनियों को बचाने में माहिर है। एक बार उससे सलाह ले लो।"
मरता क्या न करता। राघव ने 'एस. कुमार' को ईमेल किया। उसने अपनी समस्या बताई और मदद मांगी।
इधर भारत में, सुमेधा अपने लैपटॉप पर बैठी थी जब उसे राघव का ईमेल मिला। ईमेल पढ़ते ही उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई। वह राघव की हर कमज़ोरी और ताकत जानती थी। वह जानती थी कि राघव कहाँ ग़लती कर रहा है—उसका अहंकार उसे ज़मीन की हकीकत देखने नहीं दे रहा था।
सुमेधा ने 'एस. कुमार' बनकर राघव को रिप्लाई किया। उसने न सिर्फ़ राघव की समस्या का समाधान बताया, बल्कि उसे कॉस्ट-कटिंग के ऐसे नायाब तरीके बताए जो राघव ने कभी सोचे भी नहीं थे। सुमेधा ने अपनी सलाह के बदले एक मोटी फीस की मांग की।
राघव के पास कोई विकल्प नहीं था। उसने फीस चुकाई। 'एस. कुमार' की सलाह जादू की तरह काम कर गई। राघव का प्रोजेक्ट वापस पटरी पर आ गया। मुनाफा बढ़ने लगा। राघव 'एस. कुमार' का मुरीद हो गया। वह अक्सर 'एस. कुमार' से वीडियो कॉल पर बात करने की ज़िद करता, लेकिन सुमेधा हमेशा यह कहकर टाल देती कि "मैं कैमरा पर नहीं आता, मेरी आवाज़ और मेरा काम ही मेरी पहचान है।" और बात सिर्फ़ ईमेल या वॉयस चेंजर के ज़रिये ऑडियो कॉल पर होती।
अगले डेढ़ साल तक, राघव अपनी हर छोटी-बड़ी समस्या के लिए 'एस. कुमार' पर निर्भर हो गया। उसने अनजाने में अपनी ही पत्नी को लाखों रुपये फीस के तौर पर दिए। उसे इस बात का गुमान तक नहीं था कि जिस 'दिमाग' की वह पूजा कर रहा है, वह वही दिमाग है जिसे उसने 'रसोई के लायक' बताकर छोड़ा था।
दो साल पूरे होने को आए। राघव का प्रोजेक्ट ख़त्म हुआ और उसे भारी मुनाफा हुआ। वह वापस भारत लौटने की तैयारी कर रहा था। उसके मन में 'एस. कुमार' से मिलने की तीव्र इच्छा थी, और साथ ही यह अहंकार भी कि अब जाकर सुमेधा की खबर लेगा। उसे यकीन था कि सुमेधा ने घर का सामान बेच दिया होगा या अपने मायके से मदद ली होगी।
राघव भारत लौटा।
जैसे ही उसकी कार 'गुलमोहर पार्क' के विला नंबर 45 के सामने रुकी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। विला अब पहले जैसा नहीं था। उसके ऊपर एक और मंजिल बन चुकी थी, जो बेहद आधुनिक और कलात्मक थी। घर के बाहर एक नई चमचमाती लग्ज़री कार खड़ी थी। बागीचा पहले से ज़्यादा हरा-भरा और व्यवस्थित था।
राघव हड़बड़ाते हुए अंदर गया। घर के अंदर का इंटीरियर भी बदल चुका था।
सुमेधा ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी लैपटॉप पर काम कर रही थी। उसने एक एलिगेंट साड़ी पहनी थी और चेहरे पर एक विजेता का आत्मविश्वास था।
"तुम...?" राघव के मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी। "यह सब... यह सब कैसे हुआ? तुमने घर कैसे चलाया? यह फ्लोर किसने बनवाया? और वो कार...?"
सुमेधा ने लैपटॉप बंद किया और मुस्कुराते हुए उठी। "स्वागत है राघव। आशा है आपका दुबई का ट्रिप सफल रहा।"
राघव गुस्से और हैरानी के मिश्रण से भर गया। "मुझे घुमाओ मत सुमेधा! सच बताओ। क्या तुमने अपने पिता से पैसे लिए? या तुमने घर गिरवी रखा? मेरे बिना तुम यह सब नहीं कर सकती थीं।"
सुमेधा ने पास की मेज़ से एक फाइल उठाई और राघव की ओर बढ़ा दी।
"यह इस घर के पिछले दो साल के अकाउंट्स हैं। एक-एक पैसे का हिसाब। मैंने किसी से एक रुपया भी उधार नहीं लिया।"
राघव ने फाइल खोली। उसमें बैंक स्टेटमेंट थे। लाखों रुपयों की आवक (Credit) दिखाई दे रही थी। और सोर्स का नाम था—'दुबई प्रोजेक्ट कंसल्टेंसी'।
राघव चकरा गया। "यह क्या है? तुम्हें दुबई से पैसे कौन भेज रहा था?"
सुमेधा ने धीमे कदमों से चलकर राघव के सामने खड़ी हो गई।
"राघव, याद है जब आप मुसीबत में थे, तो आपने 'मिस्टर एस. कुमार' को हायर किया था?"
"हाँ, तो? उससे तुम्हारा क्या लेना-देना?" राघव चिल्लाया। "वह तो एक जीनियस आदमी है। उसने मुझे बचाया है।"
सुमेधा हंस पड़ी। एक खनकती हुई, आज़ाद हंसी।
"राघव, कभी गौर किया? 'एस. कुमार'... यानी 'सुमेधा कुमार'। मैं ही एस. कुमार हूँ।"
राघव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह बुत बनकर खड़ा रह गया। "क्या? यह... यह नामुमकिन है। मैंने उससे बात की है। उसकी समझ, उसकी स्ट्रैटेजी..."
"वो समझ उसी औरत की थी जिसे आपने 'रोटियां तोड़ने वाली' कहा था," सुमेधा ने अपनी आवाज़ में कड़वाहट नहीं, बल्कि गर्व भरते हुए कहा। "राघव, आपने मुझे चुनौती दी थी कि मैं कमा नहीं सकती। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले डेढ़ साल से आपका बिज़नेस मेरी ही सलाह पर चल रहा है। जिस फीस से आपने अपनी 'जान' बचाई, उसी फीस से मैंने यह 'मंजिल' बनवाई है।"
राघव सोफे पर धम्म से बैठ गया। उसका अहंकार, उसका पुरुषार्थ, उसका घमंड—सब कांच की तरह चकनाचूर हो गया था। उसे याद आया कि उसने 'एस. कुमार' की कितनी तारीफें की थीं, उसे अपना 'गॉडफादर' तक कहा था। और वो कोई और नहीं, उसकी अपनी पत्नी थी।
सुमेधा उसके पास बैठी। उसने राघव का हाथ अपने हाथ में लिया।
"राघव, मैंने यह सब आपको नीचा दिखाने के लिए नहीं किया। मैंने यह सिर्फ इसलिए किया ताकि आप यह समझ सकें कि बुद्धि और काबिलियत का जेंडर से कोई लेना-देना नहीं होता। आप बाहर की दुनिया जीतने निकले थे, लेकिन घर की नींव को कमज़ोर समझ बैठे। अगर मैं 'एस. कुमार' बनकर आपकी मदद न करती, तो आज आप शायद दिवालिया होकर लौटते।"
राघव की आँखों में शर्मिंदगी के आंसू थे। वह जिस पत्नी को अनपढ़-गंवार समझकर छोड़ गया था, उसी ने परदे के पीछे रहकर उसकी इज़्ज़त बचाई थी।
"मुझे माफ़ कर दो सुमेधा," राघव की आवाज़ कांप रही थी। "मैं हार गया। मैं सिर्फ़ शर्त नहीं हारा, मैं एक इंसान के तौर पर भी हार गया। मैंने हीरे को पत्थर समझकर ठोकर मारी थी।"
सुमेधा ने उसके आंसू पोंछे। "हार-जीत तो खेल में होती है राघव, गृहस्थी में नहीं। यहाँ या तो दोनों जीतते हैं या दोनों हारते हैं। मुझे ख़ुशी है कि मेरा पति सफल होकर लौटा है। लेकिन अब सवाल यह है..."
सुमेधा ने राघव की आँखों में देखा।
"...अगर वो 'एस. कुमार' मेरी जगह कोई और होता, कोई दूसरा पुरुष होता, तो क्या आप उसकी सलाह को इतना ही महत्व देते जितना आपने मुझे (अनजाने में) दिया? और क्या अब आप, अपनी पत्नी को वही सम्मान देंगे जो आप 'एस. कुमार' को देते थे?"
राघव के पास कोई शब्द नहीं थे। उसने झुककर सुमेधा के पैर नहीं छुए, बल्कि उसे बराबरी से गले लगाया। उस दिन राघव ने जाना कि असली "आर्किटेक्ट" वह नहीं, बल्कि उसकी पत्नी थी, जिसने टूटे हुए स्वाभिमान और बिखरते हुए बिज़नेस, दोनों को एक साथ नया डिज़ाइन दे दिया था।
उस दिन के बाद, विला नंबर 45 में एक और मंजिल ज़रूर जुड़ी थी, लेकिन उससे भी ऊंची एक चीज़ और खड़ी हो गई थी—और वह थी एक औरत की गरिमा और एक पति का बदला हुआ नज़रिया।
लेखिका : शारदा सक्सेना
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