“अरे साहब, कुछ तो पैसे दे दीजिए… इस बूढ़े पर तरस खाइए। मैं इतनी दूर से आपको लेकर आया हूँ। चाहें तो आधे ही रुपये दे दीजिए…”
बूढ़ा आदमी हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था, मगर सामने खड़ा आदमी गुस्से में चिल्ला पड़ा—“रिक्शा तो तू ऐसे चला रहा था जैसे सड़क पर रेंग रहा हो! अगर चला नहीं सकता तो कुछ और कर। मेरा टाइम बर्बाद कर दिया। जिस काम के लिए आया था, वो भी नहीं हो पाएगा। चल हट यहाँ से!”
“साहब, पैसे नहीं देंगे तो आज भी मुझे भूखा सोना पड़ेगा…” बूढ़े की आवाज़ काँप रही थी।
“तू भूखा सोए या मर जाए, मुझे क्या मतलब!” आदमी रूखेपन से कहकर चला गया।
बूढ़ा उसी की पीठ देखता रह गया। आँखें भर आईं। मन ही मन ईश्वर से बोला—“हे प्रभु, जाने किस जन्म का बैर निकाल रहे हैं आप… अब तो इस बूढ़े पर तरस खाइए। या तो मुझे मौत दे दीजिए या मेरा पेट भर दीजिए… ये भूख अब सहन नहीं होती…”
काँपते हाथों से उसने रिक्शा संभाला, कुछ कदम चला… फिर थककर सड़क किनारे फुटपाथ पर बैठ गया। शरीर में इतनी ताकत नहीं बची थी कि दोबारा रिक्शा खींच सके। वह अपनी पत्नी को याद करने लगा—“तू तो भाग्यशाली थी… मुझसे पहले चली गई। ये सब दुख नहीं देखना पड़ा…”
आँसुओं के साथ वो लेट गया। यह बूढ़ा आदमी था—हरदेव प्रसाद। कभी उसकी जिंदगी भी ठीक थी, मगर वक्त ने उसे इस मोड़ पर ला खड़ा किया था कि दो वक्त की रोटी भी सुकून से नसीब नहीं होती थी।
उधर शहर के एक बड़े मैदान में कार्यक्रम की तैयारी पूरी हो चुकी थी। मंच सजा था, ग्राउंड लोगों की भीड़ से खचाखच भर गया था। सबकी नजरें दरवाजे की तरफ टिकी थीं—उस खास शख्स के इंतजार में, जिसे लोग “मसीहा” कहते थे।
जैसे ही हरदेव प्रसाद धीमे कदमों से दरवाजे के पास पहुँचे, तभी उनके बेटे और बहू का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। बेटा झपटकर बोला—“बूढ़े! हमारी इतनी बेइज्जती कराकर भी तुझे चैन नहीं मिला? यहाँ भी भिखारी की तरह आ पहुँचा!”
बहू हँसते हुए बोली—“अच्छा हुआ… यही तेरी औकात है!”
हरदेव प्रसाद की आँखें नम हो गईं। वह कुछ कह पाते, उससे पहले दोनों उनका मजाक उड़ाते हुए आगे बढ़ गए। हरदेव चुपचाप अंदर चला गया।
लेकिन जैसे ही वह हॉल में पहुँचा—पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। लोगों ने खड़े होकर स्वागत किया। मीडिया के कैमरे उनकी तरफ मुड़ गए। कई अधिकारी आगे बढ़कर उन्हें आदर से मंच की ओर ले जाने लगे।
बेटा-बहू सन्न रह गए। उन्हें समझ ही नहीं आया कि जिसे वे “फटीचर बूढ़ा” समझते थे, उसे देखकर लोग तालियाँ क्यों बजा रहे हैं।
तभी एक युवक उनके पास आया और बोला—“सर, स्टेज पर सब आपका इंतजार कर रहे हैं।”
हरदेव प्रसाद मंच पर पहुँचे। उनके हाथ में एक चेकबुक आई। उन्होंने मुस्कुराकर नीचे बैठे लोगों की तरफ देखा, फिर एक-एक करके कई लोगों को मंच पर बुलाने लगे। किसी को उन्होंने 1,11,000 रुपये दिए… किसी को नया रिक्शा… किसी को मदद का वादा।
सामने बैठे दर्जनों रिक्शावाले रो पड़े। भीड़ में खुशी की लहर दौड़ गई।
एक रिपोर्टर ने सवाल किया—“सर, आपके पास आज बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं, कई लोग आपको करोड़पति कह रहे हैं… फिर भी आप आज फटे कपड़ों में और रिक्शा लेकर क्यों आए?”
हरदेव प्रसाद ने शांत आवाज़ में कहा—“क्योंकि यही मेरा साथी है। जिस दिन अपनों ने मुझे सड़क पर भूखा छोड़ दिया था, उसी दिन इस रिक्शे ने मुझे जिंदा रहने की वजह दी। मैं आज भी इसे नहीं भूल सकता। मैंने सफर की शुरुआत इन्हीं कपड़ों में की थी… ताकि लोग समझें कि मैं कहाँ से उठा हूँ।”
दूसरा रिपोर्टर बोला—“सर, कृपया अपनी कहानी बताइए। आप ज़मीन से आसमान तक कैसे पहुँचे?”
हरदेव प्रसाद की आँखों के सामने बीते दिन घूम गए।
उस दिन शाम ढल रही थी। एक युवती ऑफिस से घबराई हुई निकली थी। चारों तरफ देखा—कोई कैब नहीं, कोई ऑटो नहीं। थोड़ी दूर सड़क किनारे एक रिक्शा दिखा। उसने राहत की साँस ली और पास गई।
“बाबा, चौक तक चलेंगे क्या? मुझे जल्दी घर जाना है… मेरा बच्चा बीमार है।”
रिक्शावाला उठकर बैठ गया। उसकी उम्र लगभग अस्सी के आसपास थी। ठंड से काँप रहा था, चेहरा पीला था, लेकिन आँखों में इज्जत थी।
उसने नम्रता से कहा—“बेटी, दो दिन से भूखा हूँ… बोनी नहीं हुई। अगर तुम्हें पहुँचा दूँ, तो आज शायद भूखा न सोऊँ।”
युवती का दिल भर आया। उसने बैग से पैसे निकालकर देना चाहा—“बाबा, ये पैसे रख लीजिए, खाना खा लीजिए… आप रिक्शा मत चलाइए।”
बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा—“भीख नहीं चाहिए बेटी… मेहनत करके कमाना है। अगर नहीं जाना चाहती तो मत जाओ… मगर मैं भीख नहीं लूंगा।”
युवती की आँखें भर आईं। “चलिए बाबा… आप चलिए।”
बूढ़े के चेहरे पर जैसे रोशनी लौट आई। उसने रिक्शा आगे बढ़ाया और उसे घर तक पहुँचा दिया।
घर पहुँचते ही युवती अपने बीमार बच्चे में उलझ गई। पैसे देना भूल गई। बूढ़ा आदमी सीढ़ियों पर बैठा रहा… बार-बार दरवाजे की तरफ देखता रहा। आधा घंटा बीत गया। फिर उसने चुपचाप आह भरी और बिना पैसे लिए ही चल दिया।
एक घंटे बाद युवती को याद आया। वह पैसे लेकर बाहर दौड़ी, मगर बूढ़ा कहीं नहीं था। वह परेशान होकर उसे ढूँढ़ने लगी, पर वह नहीं मिला। उसे बहुत अफसोस हुआ। रात भर उसे चैन नहीं आया।
उसी रात उसे अपने बचपन की याद आ गई—दुकानों वाली गली, सुबह का कोहरा, और एक छोटा-सा चाय का ठेला चलाने वाला बुजुर्ग दंपती। लोग उन्हें “चाय वाली अम्मा” और “सुनार बाबा” कहते थे। वे खून के रिश्तों से नहीं, मगर मोहब्बत से सबके अपने बन गए थे। उनका कोई अपना नहीं आता था, फिर भी पूरा कस्बा उनका परिवार था। एक दिन चाय वाली अम्मा चली गई, और ठीक एक महीने बाद सुनार बाबा भी। तब कस्बे ने ही उनका अंतिम संस्कार किया, उनकी याद में रोया। उस छोटी लड़की ने पहली बार समझा था—खून का रिश्ता ही सब कुछ नहीं होता।
सुबह होते ही वह युवती फिर उसी जगह गई, बूढ़े बाबा को खोजने… मगर वह नहीं मिले।
उधर बूढ़ा रिक्शावाला तीन दिन से भूखा था। किसी तरह एक सवारी बैठ गई। वह धीमे-धीमे रिक्शा खींच रहा था कि सवारी भड़क उठी—“अबे बूढ़े! चला नहीं सकता तो चलाता क्यों है? भीख मांगने का नया तरीका है क्या?”
बूढ़ा विनती करने लगा—“साहब, मेहनत करके कमाता हूँ… कृपा करके…”
सवारी ने पाँच रुपये का सिक्का उसके हाथ में ठूंस दिया—“ले! और अब मेरे सामने मत आना।”
“साहब, पचास रुपये बनते हैं…” बूढ़े की आवाज़ डूब गई।
सवारी बिना पलटे गेट के अंदर चला गया।
लेकिन वही पास खड़ा एक आदमी यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में अचानक एक पुरानी तस्वीर उभर आई—एक रिक्शा, एक बच्चा, और वही बूढ़ा जिसने उसे स्कूल पहुँचाया था। वह दौड़ा और बोला—“बाबू काका… आप?”
बूढ़े ने चौंककर देखा—“ये नाम… बहुत साल पहले एक बच्चा मुझे इसी नाम से बुलाता था… तुम कौन हो बेटा?”
उस आदमी की आँखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर बूढ़े को गले लगा लिया—“मैं हूँ करण… नेहरू नगर वाली गली याद है? आप मुझे रोज रिक्शा पर स्कूल छोड़ने आते थे…”
बूढ़ा फूट-फूट कर रो पड़ा। “बेटा… अब क्या बताऊँ… किस्मत परीक्षा लेती ही रहती है…”
करण ने उनके साथ चलने को कहा, मगर बूढ़ा हिचक रहा था—“मेरे पास मत आओ… मैं बीमार हूँ… तुम्हें कुछ हो गया तो…”
लेकिन करण नहीं माना। वह उन्हें ढूँढ़ता हुआ आगे बढ़ा। पता चला बूढ़ा आदमी फुटपाथ पर ही रहता है।
शाम को करण दोबारा गया। बूढ़ा वहीं बैठा था—कभी मच्छर मारता, कभी गमछे से चेहरा ढकता। करण ने उसका हाथ पकड़ा—“आज आप मेरे साथ चलेंगे। बस चलिए।”
वह बूढ़े को गाड़ी में बैठाकर घर ले आया।
घर में उसकी पत्नी मीरा थी। मीरा ने जैसे ही बूढ़े को देखा, बोल पड़ी—“ये तो वही बाबा हैं… जिनका आपने कल जिक्र किया था!”
मीरा दौड़कर अंदर गई, पानी लाई, फिर बड़े सम्मान से आरती उतारी। उन्हें गरम चाय दी, खाना दिया, और कहा—“पहले आप आराम कर लीजिए, फिर बातें करेंगे। ये पिताजी के कपड़े हैं… बुरा न मानें तो आप पहन लीजिए।”
बूढ़े की आँखें भर आईं। उसने काँपते हाथ से मीरा के सिर पर आशीर्वाद रखा—“बेटी… तुमने मुझे पिता जैसा सम्मान दिया है… ईश्वर तुम्हारे घर में हमेशा सुख रखे।”
नहाकर, साफ कपड़े पहनकर वह बैठा तो करण ने धीरे से पूछा—“काका… आपकी जिंदगी यहाँ तक कैसे पहुँची?”
बूढ़ा देर तक चुप रहा, फिर बोला—“बेटा, मैंने दिन में रिक्शा चलाकर, शाम को सब्जी बेचकर अपने बच्चों को पढ़ाया। पत्नी के जाने के बाद दूसरी शादी नहीं की। मेरा सपना था—बच्चे पढ़ जाएँ, मैं बुढ़ापे में चैन से दो रोटी खाऊँ…”
“मेरे दोनों बेटे काबिल बने। एक बैंक में अफसर, दूसरा डॉक्टर बनकर विदेश चला गया। लेकिन बेटा… दो रोटी देने की हिम्मत किसी में नहीं रही।”
वह रोने लगा। “एक समय मैंने रिक्शा छोड़ दिया था। बेटे की ‘इज्जत’ खराब हो रही थी। फिर घर में नौकरों से भी बदतर हालत हो गई। बहू की सहेलियाँ आतीं और वह मेरे बारे में हँसती—‘अच्छा है, घर का सारा काम ससुर कर देते हैं… वरना नौकर पर पैसे लगते।’… मैं दरवाजे के बाहर खड़ा सुनता रहा… और उसी दिन मैं घर से निकल गया। किसी से कह दिया—तीर्थ पर जा रहा हूँ… और फिर लौटकर नहीं गया।”
वह बताने लगा कैसे मंदिरों में रातें काटीं, भंडारे का खाना खाया, ठंड में बीमार पड़ा, अस्पताल पहुँचा… और फिर मजबूरी में फिर से रिक्शा चलाने लगा। मगर बुढ़ापे का शरीर कब तक बोझ खींचता।
करण चुपचाप सुनता रहा। उसकी आँखें नम थीं।
कुछ दिनों बाद बूढ़ा धीरे-धीरे उस घर का हिस्सा बन गया। समय काटने के लिए वह बगीचे में फूल लगाता, अखबार पढ़ता, और वृद्धाश्रम जाकर बुजुर्गों की मदद करता। वह उन्हें समझाता—“उम्र संख्या है… हिम्मत खत्म नहीं होनी चाहिए।”
एक दिन वह बहुत सोच में डूबा था। करण ने पूछा—“क्या सोच रहे हैं काका?”
बूढ़ा बोला—“बेटा, एक मदद चाहिए। मैं रिक्शा की एक छोटी-सी दुकान खोलना चाहता हूँ। कुछ लोगों को काम देना चाहता हूँ… ऐसे बुजुर्गों को, जो मेहनत करना चाहते हैं, मगर कोई मौका नहीं देता।”
करण हैरान रह गया—इतनी उम्र में भी इतना हौसला!
उसने पूरी मदद की। दुकान खुली। फिर दो… फिर तीन… धीरे-धीरे काम बढ़ने लगा। बूढ़ा अब खुद रिक्शा नहीं खींचता था, बल्कि लोगों को रिक्शा किराए पर देता था, काम सिखाता था, सहारा देता था।
उसने एक नियम बनाया। जो भी रिक्शा किराए पर लेता, उससे एक कागज पर साइन करवाता। लोग पूछते—“काका, इसमें क्या लिखा है?”
वह मुस्कुराकर कहता—“इसमें लिखा है—जब तक तुम्हारे माता-पिता जीवित हैं, उनका खाना-दवा और सम्मान तुम्हारी जिम्मेदारी होगी। उनकी सेवा करोगे, तभी काम मिलेगा।”
और जो युवक ईमानदारी से किस्त पूरी कर देता, बूढ़ा वही रिक्शा उसे उपहार में दे देता।
धीरे-धीरे उसका नाम फैल गया। सैकड़ों रिक्शे, दर्जनों गाड़ियाँ, एक बड़ा शोरूम… और सबसे बड़ी बात—कई बुजुर्गों के घर फिर से चूल्हा जलने लगा, क्योंकि उनके बेटे अपने माता-पिता की जिम्मेदारी समझने लगे थे।
एक दिन उसकी कहानी टीवी पर आई। उसके बेटे-बहू ने देखा तो दंग रह गए। शर्म से उनकी आँखें झुक गईं। वे भागते हुए मिलने आए, रिश्ते जोड़ने आए… मगर बूढ़े ने सिर्फ इतना कहा—“मेरे बेटे-बहू वही हैं जिन्होंने मुझे सम्मान दिया—करण और मीरा… और मेरे लिए उनका परिवार ही मेरा परिवार है।”
वह बूढ़ा अब कमजोर हो चला था, मगर हौसला वैसा ही था। हर दिन वह लोगों को यही कहता—“हिम्मत मत हारो। हालात और रिश्ते तुम्हें तोड़ेंगे, मगर तुम खुद को मत तोड़ना। जब तक सांस है, कुछ न कुछ करो… अपनी कमाई खाओ… और अपने आत्मसम्मान को बचाकर जियो।”
दोस्तों, यही सीख है—बुढ़ापा जीवन का अंत नहीं। उम्र तो बस एक संख्या है।
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लेखिका : नीमा सहाय
व्वाहहहहह
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सादर