हरिशंकर बाबू ने थरथराते हाथों से पेचकस (screwdriver) उठाया और मिक्सर के प्लग को खोलने की कोशिश करने लगे। रसोई में रश्मि की आवाज़ गूंज रही थी, जो फ़ोन पर अपनी माँ से बात कर रही थी।
"हाँ माँ, क्या बताऊँ! काम वाली बाई आज फिर नहीं आई। विकास ऑफिस जा चुके हैं, और चिंटू का टिफिन अभी पैक होना बाकी है। ऊपर से ये मिक्सर सुबह-सुबह खराब हो गया। समझ नहीं आता अकेली जान क्या-क्या करूँ!"
रश्मि की झुंझलाहट भरी आवाज़ ड्राइंग रूम तक साफ़ सुनाई दे रही थी। हरिशंकर बाबू से रहा नहीं गया। 72 वर्ष की उम्र में मोतियाबिंद का ऑपरेशन और घुटनों का दर्द उनके साथी बन चुके थे, फिर भी वे खुद को 'नाकारा' नहीं मान सकते थे। जवानी में वे बिजली विभाग में इंजीनियर थे; घर का हर फ्यूज़, हर खराब मशीन उनके एक स्पर्श से ठीक हो जाया करती थी। आज उन्होंने सोचा कि रश्मि की मदद कर दें, शायद बहू खुश हो जाएगी।
तभी रश्मि फ़ोन काटते हुए बाहर निकली और ससुर जी के हाथ में खुला हुआ प्लग और पेचकस देखकर चौंक गई।
"पापा! आप फिर शुरू हो गए?" रश्मि ने लगभग चीखते हुए कहा और उनके हाथ से पेचकस छीन लिया। "आपको कितनी बार कहा है कि इन चीज़ों को मत छेड़ा करिए। अभी करंट लग जाता तो? या मिक्सर का कोई पुर्जा खो जाता तो? मैकेनिक को बुला लिया है मैंने, वो ठीक कर देगा।"
हरिशंकर बाबू ने अपनी सफाई में कुछ कहना चाहा, "बेटा, वो तो बस तार ढीला था, मैं सोच रहा था कि ठीक कर दूँ तो तुम्हारा मसाला पिस जाएगा..."
"रहने दीजिए पापा," रश्मि ने चिढ़ते हुए कहा। "आप बस आराम से सोफे पर बैठकर टीवी देखिए। वैसे भी आपको घुटनों में दर्द रहता है न? जब हम कहते हैं कि पार्क में टहलने चलिए, तो आप कहते हैं चला नहीं जाता। और अब घर की रिपेयरिंग के लिए आपके हाथ-पैर चलने लगे?"
हरिशंकर बाबू चुप हो गए। यह ताना नया नहीं था। उनका बेटा विकास और बहू रश्मि अक्सर यह नहीं समझ पाते थे कि पार्क में 'टहलना' एक व्यायाम था जो दर्द देता था, लेकिन घर के काम करना उनकी 'जरूरत' थी, ताकि वे खुद को इस घर का हिस्सा महसूस कर सकें। पत्नी सुमित्रा के जाने के बाद से वे घर में एक पुराने फर्नीचर की तरह हो गए थे, जिसे झाड़-पोंछ कर एक कोने में सजा दिया गया था। सुमित्रा थी, तो उनकी हर छोटी-बड़ी कोशिश को सराहती थी। अब उनकी कोशिशें 'दखलअंदाजी' बन गई थीं।
दोपहर को जब रश्मि अपने कमरे में आराम करने चली गई, तो दरवाजे की घंटी बजी। हरिशंकर बाबू ने दीवार घड़ी देखी—दो बज रहे थे। इतनी धूप में कौन आया होगा? वे अपनी छड़ी के सहारे धीरे-धीरे मुख्य द्वार की ओर बढ़े। घुटनों का दर्द आज कुछ ज्यादा ही था। उन्होंने कुंडी खोली तो सामने कुरियर वाला खड़ा था।
"साहब, थोड़ी जल्दी किया करो न! पांच मिनट से खड़ा हूँ। धूप देख रहे हो?" कुरियर वाले ने पसीना पोंछते हुए झुंझलाकर कहा।
हरिशंकर बाबू ने कांपते हाथों से पैकेट लिया और हस्ताक्षर किए। अंदर आते ही उन्हें चक्कर सा आया और वे सोफे पर निढाल होकर बैठ गए। तभी रश्मि कमरे से बाहर आई।
"कौन था पापा? और इतनी देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में? बेल की आवाज़ मेरे कमरे तक आ रही थी।"
"कुरियर था बेटा... घुटने जाम हो गए थे, उठने में वक्त लग गया," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा।
रश्मि ने मुँह बिचकाया, "पापा, गजब है! अभी सुबह आप मिक्सर ठीक करने के लिए उतावले हो रहे थे, तब तो खड़े होकर पूरा इंजीनियरिंग का काम कर रहे थे। और अब दरवाजा खोलने में आपको तकलीफ हो रही है? विकास सही कहते हैं, बुजुर्गों को ध्यान खींचने की आदत हो जाती है।"
शाम को विकास ऑफिस से लौटा। घर का माहौल तनावपूर्ण था। रश्मि ने चाय देते हुए सुबह का किस्सा और दोपहर की घटना, दोनों नमक-मिर्च लगाकर सुना दीं। विकास ने पिता की ओर देखा जो बालकनी में उदास बैठे थे। वह उनके पास गया।
"पापा, आपको किसी चीज़ की कमी है क्या? हम आपकी हर ज़रूरत पूरी करते हैं, फिर आप ये मैकेनिक बनने की ज़िद क्यों करते हैं? और अगर तबीयत खराब है, तो साफ़-साफ़ बताया करिए। ये कभी 'हाँ' और कभी 'ना' वाला रवैया रश्मि को परेशान करता है।"
हरिशंकर बाबू ने अपनी धुंधली आँखों से बेटे को देखा। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बोले, "विकास, कमी चीज़ों की नहीं, 'वजूद' की है बेटा। जब मशीन पुरानी हो जाती है, तो उसे जंग से बचाने के लिए चलाना पड़ता है। मैं मिक्सर इसलिए ठीक नहीं कर रहा था कि पैसे बचा लूँ, मैं इसलिए कर रहा था ताकि मुझे लगे कि मैं आज भी इस घर के किसी काम का हूँ।"
वे रुके, थोड़ा खासें और फिर बोले, "और रही बात दरवाजा खोलने की... तो बेटा, ये घुटने मेरे मन के गुलाम नहीं हैं। जब मैं खुश होता हूँ कि कुछ कर सकता हूँ, तो दर्द कम लगता है। जब मुझे एहसास कराया जाता है कि मैं बोझ हूँ, तो शरीर का पोर-पोर दुखने लगता है। तुम्हारी माँ थी, तो वो मेरे 'दर्द' और 'कोशिश' के बीच का फर्क समझती थी। अब तुम लोग सिर्फ मेरी 'उम्र' देखते हो, मेरा 'मन' नहीं।"
बालकनी में सन्नाटा पसर गया। विकास के हाथ से चाय का कप हिल गया। उसने गौर से अपने पिता के चेहरे को देखा। झुर्रियों के बीच छिपी वह लाचारी आज पहली बार उसे दिखाई दी। उसे याद आया कि कैसे बचपन में जब उसकी साइकिल की चेन उतरती थी, तो यही पिता पसीने में लथपथ होकर उसे ठीक करते थे, भले ही वो थके हुए हों।
अंदर खड़ी रश्मि भी यह सब सुन रही थी। उसे अपनी सुबह की कही बातें काँटों की तरह चुभने लगीं। उसे एहसास हुआ कि जिसे वह 'नौटंकी' या 'दखल' समझ रही थी, वह असल में एक पिता का अपनी गरिमा बनाए रखने का संघर्ष था।
अगली सुबह, रश्मि रसोई में थी। मिक्सर अभी भी खराब था। हरिशंकर बाबू नहाकर निकले और चुपचाप अपने कमरे की ओर जाने लगे। तभी रश्मि की आवाज़ आई।
"पापा... ज़रा सुनिएगा। यह मिक्सर का प्लग शायद सच में ढीला है। मैकेनिक शाम तक आएगा, तब तक मसाला कैसे पिसेगा? आप एक बार देख लेते तो..."
हरिशंकर बाबू ठिठक गए। उन्होंने मुड़कर देखा। रश्मि के हाथ में पेचकस था और चेहरे पर एक विनम्र मुस्कान। विकास भी डाइनिंग टेबल पर बैठा अखबार के पीछे से मुस्कुरा रहा था।
हरिशंकर बाबू की आँखों में एक चमक आ गई। वे अपनी छड़ी को वहीं दीवार से टिकाकर, बिना सहारे के रसोई की ओर बढ़े। घुटनों में दर्द अब भी था, पर कदमों में एक नई जान थी।
"लाओ बेटा, अभी देखता हूँ। ये आजकल के प्लगज़ में जान ही कहाँ होती है," कहते हुए उन्होंने पेचकस थाम लिया। घर का वह 'पुराना फर्नीचर' आज फिर से अपनी जगह पा चुका था।
इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि बुजुर्गों को केवल दवाई और भोजन की नहीं, बल्कि सम्मान और भागीदारी की भी उतनी ही आवश्यकता होती है।
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