कमरे के कोने में पड़ी उस पुरानी, धूल से सनी आरामकुर्सी को देखते ही सुधा के मन में एक अजीब सी टीस उठी. पिछले तीन दिनों से घर का सामान समेटा जा रहा था. पैकिंग के गत्ते, रस्सियां और टेप पूरे घर में बिखरे पड़े थे. पैंतीस साल… जी हाँ, पूरे पैंतीस साल इस बड़े से सरकारी बंगले में बिताने के बाद अब रिटायर्मेंट का वक्त आ गया था और साथ ही आ गया था इस घर को खाली करने का फरमान.
सुधा के पति, अविनाश, दूसरे कमरे में किताबों के ढेर से जूझ रहे थे. सुधा ने एक गहरी साँस ली और उस आरामकुर्सी पर हाथ फेरा. यह कुर्सी उसके ससुरजी की थी, फिर अविनाश की पसंदीदा जगह बनी, और सुधा? सुधा के लिए तो इस घर में ‘आराम’ शब्द जैसे वर्जित ही रहा था.
साठ की दहलीज पर खड़ी सुधा आज भी उतनी ही फुर्तीली थी जितनी उस दिन थी, जब वह इक्कीस साल की नई-नवेली दुल्हन बनकर इस घर की देहरी लांघकर आई थी. फर्क बस इतना था कि तब आँखों में सुनहरे सपने थे, और आज उन आँखों में थकान और एक अनकहा खालीपन था.
अविनाश एक सफल प्रशासनिक अधिकारी थे. शहर दर शहर तबादले, बड़ी-बड़ी पार्टियां, समाज में रूतबा—सब कुछ था उनके पास. और सुधा? वह उस रूतबे को संभालने वाली एक कुशल 'मनेजर' मात्र बनकर रह गई थी. लोग कहते थे, "सुधा भाभी जैसी किस्मत तो चिराग लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलेगी," पर सुधा जानती थी कि उस चिराग के नीचे कितना अंधेरा था.
अविनाश का स्वभाव बेहद सख्त और अनुशासित था. वे भावनाओं को कमजोरी मानते थे. घर में हर चीज़ घड़ी की सुई के हिसाब से चलती थी. सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, सब कुछ एक निर्धारित समय पर होना चाहिए था. सुधा ने अपनी पूरी जवानी इसी अनुशासन को बनाए रखने में खपा दी थी. उसे याद है, शादी के शुरूआती दिनों में उसे पेंटिंग का कितना शौक था. कैनवस पर रंग बिखेरना उसे ऐसा लगता था जैसे वह अपनी रूह को पंख दे रही हो. लेकिन ससुराल में रंगों की जगह मसालों के डिब्बों ने ले ली थी और कैनवस की जगह घर की दीवारों और पर्दों के रखरखाव ने.
"सुधा! ज़रा इधर आना," अविनाश की आवाज़ ने उसे अतीत के भंवर से बाहर खींचा.
सुधा पल्लू ठीक करती हुई स्टडी रूम में गई. अविनाश ज़मीन पर बैठे पुरानी फाइलों और डायरियों के ढेर के बीच किसी बच्चे की तरह उलझे हुए थे.
"क्या हुआ? इतनी धूल में क्यों बैठे हैं? अस्थमा उखड़ जाएगा," सुधा ने आदतन चिंता जताई, भले ही मन में एक कड़वाहट थी कि इस आदमी को अपनी सेहत की फिक्र भी उसे ही करनी पड़ती है.
"ये देखो, पुरानी एल्बम मिल गई," अविनाश ने एक भारी सी एल्बम उसकी तरफ बढ़ाई.
सुधा ने बेमन से एल्बम हाथ में ली. पन्ने पलटते ही तस्वीरें बोलने लगीं. बच्चों के जन्मदिन, अविनाश के प्रमोशन की पार्टियां, रिश्तेदारों की शादियाँ. हर तस्वीर में सुधा मुस्कुरा रही थी. एक सधी हुई, शिष्ट मुस्कान. एक आदर्श पत्नी और बहू वाली मुस्कान.
"देखो, तुम इसमें कितनी सुंदर लग रही हो," अविनाश ने एक तस्वीर पर उंगली रखी.
सुधा ने देखा. वह तस्वीर उनकी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह की थी. सुधा ने भारी कांजीवरम साड़ी पहन रखी थी और गले में भारी गहने थे. उसे याद आया, उस दिन उसे तेज़ माइग्रेन था, लेकिन घर में सौ मेहमान थे. अविनाश ने एक बार भी नहीं पूछा था कि वह कैसा महसूस कर रही है. बस इतना कहा था, "सुधा, मेहमान आ गए हैं, और तुम अभी तक तैयार नहीं हुई?"
सुधा ने एल्बम बंद कर दी. "सुंदरता और खुशी में फर्क होता है अविनाश," उसके मुँह से अचानक निकल गया.
अविनाश ने चश्मा उतारकर उसे देखा. "क्या मतलब?"
सुधा आज चुप नहीं रहना चाहती थी. शायद यह घर छूटने का डर था या फिर अब कुछ भी खोने का भय नहीं बचा था. "मतलब यह कि इन तस्वीरों में जो दिख रहा है, वह सच नहीं है. यह सिर्फ एक प्रदर्शन है. एक सफल अधिकारी की खुशहाल गृहस्थी का प्रदर्शन. इसमें मेरी थकान, मेरे मारे हुए सपने और मेरा अकेलापन कहीं नहीं दिखता."
कमरे में सन्नाटा छा गया. धूल के कण धूप की लकीर में नाचते हुए दिखाई दे रहे थे. अविनाश कुछ पल उसे देखते रहे, फिर धीरे से बोले, "तुम्हें लगता है कि मैंने कभी तुम्हारी परवाह नहीं की?"
"परवाह?" सुधा की आवाज़ में व्यंग्य था. "अविनाश, परवाह का मतलब सिर्फ बैंक बैलेंस और साड़ियों की अलमारी भरना नहीं होता. परवाह का मतलब होता है मन की बात सुनना. याद है, जब मैंने पेंटिंग दोबारा शुरू करने की बात की थी? आपने क्या कहा था? 'सुधा, अब बच्चों की बोर्ड परीक्षाएं हैं, घर में पेंट और तारपीन की महक से उनकी पढ़ाई खराब होगी.' उसके बाद मैंने कभी ब्रश नहीं उठाया. बच्चे बड़े हो गए, विदेश चले गए, लेकिन मेरा कैनवस कोरा ही रह गया."
अविनाश ने नज़रें झुका लीं. वे एक डायरी के पन्ने पलटने लगे.
सुधा का दिल भर आया था. वह वहाँ से उठकर जाने ही वाली थी कि अविनाश ने उसका हाथ पकड़ लिया. उनका स्पर्श ठंडा था, लेकिन पकड़ मज़बूत थी.
"रुको," अविनाश की आवाज़ थोड़ी कांप रही थी. "मुझे पता था कि यह गुबार एक दिन फूटेगा. शायद मैं इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था."
वे उठे और अलमारी के सबसे ऊपरी रैक की तरफ इशारा किया, जो अब खाली हो चुकी थी, सिवाय एक बड़े से पुराने संदूक के. "उसे उतारने में मेरी मदद करो."
सुधा ने हैरान होकर देखा. वह संदूक हमेशा बंद रहता था. अविनाश कहते थे कि उसमें ज़रूरी सरकारी दस्तावेज़ हैं. दोनों ने मिलकर भारी संदूक नीचे उतारा.
अविनाश ने अपनी जेब से एक छोटी सी चाबी निकाली और ताला खोला.
सुधा ने सोचा था कि अंदर फाइलें होंगी, लेकिन जैसे ही ढक्कन खुला, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं.
संदूक के अंदर कोई फाइल नहीं थी. वहां ढेर सारे कैनवस, रंगों की नई और पुरानी डिब्बियां, बेहतरीन ब्रश के सेट और आर्ट की महंगी किताबें भरी पड़ी थीं. और सबसे ऊपर एक लिफाफा रखा था जिस पर लिखा था - "सुधा के लिए".
सुधा कांपते हाथों से सामान छूने लगी. "यह सब... यह सब यहाँ क्या कर रहा है?"
अविनाश ने एक गहरी साँस ली और ज़मीन पर ही बैठ गए. "सुधा, तुम मुझे एक कठोर, भावनाहीन अफ़सर समझती हो, और शायद मैं हूँ भी. मुझे जज़्बात ज़ाहिर करना कभी नहीं आया. मेरे पिता ने मुझे सिखाया था कि मर्द घर की छत होता है, उसे सख्त होना चाहिए ताकि दीवारें सुरक्षित रहें. मैंने वही किया. मैंने अनुशासन बनाया, तुम्हें रोका-टोका, ताकि यह संयुक्त परिवार बिखर न जाए. मेरी माँ, मेरे भाई-बहन... सबकी उम्मीदें मुझ पर थीं और उन उम्मीदों का बोझ मैंने अनजाने में तुम्हारे कंधों पर डाल दिया."
अविनाश ने एक कैनवस उठाया. यह कोरा था. "जिस दिन मैंने तुम्हें पेंटिंग करने से मना किया था, उस रात मुझे नींद नहीं आई थी. मुझे लगा जैसे मैंने किसी पंछी के पर काट दिए हों. लेकिन उस वक्त घर के हालात ऐसे थे कि अगर तुम अपनी दुनिया में खो जातीं, तो घर की धुरी टूट जाती. मैं स्वार्थी था, सुधा. मैं मानता हूँ."
सुधा की आँखों से आँसू बहने लगे. वह चुपचाप सुनती रही.
"लेकिन," अविनाश ने बात आगे बढ़ाई, "मैं यह भी जानता था कि एक दिन यह सब ज़िम्मेदारियाँ खत्म होंगी. बच्चे अपने पैरों पर खड़े होंगे, माँ-बाबूजी चले जाएंगे, और मैं रिटायर हो जाऊंगा. तब... तब मुझे मेरी सुधा वापस चाहिए होगी. वो सुधा, जो रंगों से बात करती थी."
अविनाश ने बताया कि पिछले पंद्रह सालों से, जब भी वे किसी दूसरे शहर या देश के दौरे पर जाते, वहां से सबसे बेहतरीन आर्ट का सामान खरीद लाते और चुपचाप इस संदूक में जमा कर देते. वे उस दिन का इंतज़ार कर रहे थे जब वे 'ड्यूटी' से मुक्त होंगे और सुधा को उसकी 'ज़िंदगी' वापस लौटा सकेंगे.
"मैं जानता हूँ कि बीता हुआ वक्त वापस नहीं आ सकता," अविनाश की आवाज़ भारी हो गई थी. "मैं उन तीस सालों की भरपाई नहीं कर सकता जब तुमने रसोई के धुएं में अपने सपने घोंट दिए. लेकिन सुधा, अब हमारे पास वक्त है. यह घर सरकारी था, छूट रहा है. लेकिन अब हम जिस छोटे फ्लैट में जा रहे हैं, वहां की सबसे बड़ी बालकनी मैंने तुम्हारे लिए तैयार करवाई है. वहां रोशनी बहुत अच्छी आती है. वहां कोई मेहमान नहीं आएगा, कोई चाय की फरमाइश नहीं होगी."
सुधा रो रही थी, लेकिन यह रोना दुख का नहीं था. यह उस बर्फ के पिघलने जैसा था जो बरसों से उसके सीने पर जमी थी. उसने देखा कि अविनाश की आँखों में भी नमी थी. वह सख्त प्रशासक, जिसे उसने कभी पिघलते नहीं देखा था, आज एक पश्चातापी प्रेमी की तरह उसके सामने बैठा था.
सुधा ने कांपते हाथों से रंगों की एक डिब्बी उठाई. 'विंसर एंड न्यूटन'—यह वो ब्रांड था जिसे खरीदने का सपना वह कॉलेज के दिनों में देखा करती थी.
"तुमने कभी बताया क्यों नहीं?" सुधा ने सिसकते हुए पूछा. "अगर बता देते तो शायद सफर इतना मुश्किल न लगता."
"बता देता तो तुम शायद समझौता कर लेतीं, लेकिन मुझे माफ़ नहीं करतीं. और मैं नहीं चाहता था कि तुम इंतज़ार में अपना मन मारो. मैं चाहता था कि जब तुम दोबारा ब्रश उठाओ, तो पूरी आज़ादी के साथ उठाओ," अविनाश ने सुधा के हाथ को अपने हाथों में ले लिया. "सुधा, मैंने तुमसे तुम्हारा अतीत छीना, क्या तुम मुझे अपना भविष्य संवारने का एक मौका दोगी?"
सुधा ने अविनाश के चेहरे को गौर से देखा. झुर्रियां पड़ गई थीं, बाल सफेद हो चुके थे, लेकिन आँखों में एक नई चमक थी. एक उम्मीद.
उसने अपने आँसू पोंछे और संदूक से एक कोरा कैनवस निकाला. "भविष्य का तो पता नहीं अविनाश, लेकिन अभी... अभी मुझे इस कैनवस पर कुछ बनाना है."
"अभी? इस उथल-पुथल के बीच?" अविनाश ने मुस्कुराते हुए पूछा.
"हाँ, अभी," सुधा ने एक ब्रश उठाया. "मुझे तुम्हारी तस्वीर बनानी है. वो अविनाश नहीं जो दुनिया के लिए सख्त साहब बहादुर था, बल्कि वो अविनाश जिसने पंद्रह साल तक इस संदूक में मेरे सपनों को ज़िंदा रखा."
उस दोपहर, जब पैकिंग वाले सामान उठाने आए, तो उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग जोड़ा ड्राइंग रूम के फर्श पर बैठा है. चारों तरफ सामान बिखरा है, लेकिन वे अपनी ही दुनिया में मगन हैं. पत्नी एक स्केच बना रही है और पति मंत्रमुग्ध होकर उसे देख रहा है, जैसे वह दुनिया का आठवां अजूबा देख रहा हो.
घर छूट रहा था, लेकिन घर का 'घरौंदा' अब बन रहा था.
शाम को जब वे कार में बैठे नए घर की ओर जाने के लिए, तो सुधा ने पीछे मुड़कर उस सरकारी बंगले को नहीं देखा. उसकी गोद में रंगों का वह संदूक रखा था. अविनाश गाड़ी चला रहे थे.
"अविनाश," सुधा ने धीरे से पुकारा.
"हम्म?"
"वो बालकनी... क्या सच में बहुत बड़ी है?"
अविनाश मुस्कुरा दिए. "इतनी बड़ी कि तुम्हारे सारे आसमान उसमें समा जाएंगे."
सुधा ने खिड़की से बाहर देखा. सूरज ढल रहा था, लेकिन उसे लग रहा था जैसे उसकी ज़िंदगी का असली सवेरा अब हो रहा है. उसने मन ही मन तय कर लिया था. वह सिर्फ पेंटिंग नहीं करेगी, वह अविनाश को भी रंगों की पहचान कराएगी. आखिरकार, ज़िंदगी के कैनवस पर अब सिर्फ दो ही रंग बचे थे—एक उसका और एक अविनाश का, और दोनों मिलकर ही अब एक नई तस्वीर मुकम्मल करने वाले थे.
गाड़ी नए रास्ते पर दौड़ रही थी, और सुधा के मन में एक नया राग बज रहा था. शिकायतों का शोर अब थम चुका था, बची थी तो बस एक मीठी सी धुन, जो शायद उन रंगों के संदूक से निकलकर सीधे उसकी रूह में उतर रही थी. उसे अहसास हुआ कि प्रेम कभी-कभी शब्दों में नहीं, बल्कि खामोशी से सहेजे गए संदूकों में मिलता है.
लेखिका : विनीता सिंह
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