मंजरी अपनी बालकनी में खड़ी सूखी तुलसी के पौधे को निहार रही थी, तभी दरवाजे पर कॉल-बेल की कर्कश आवाज़ गूंजी। वह धीरे-धीरे, अपनी लाठी के सहारे ड्रॉइंग रूम की तरफ बढ़ी। घुटनों का दर्द आज कुछ ज्यादा ही था, मानो हड्डियों के बीच कोई आरी चल रही हो। अभी उसने कुंडी खोली ही थी कि उसका बेटा अनिरुद्ध और बहू गरिमा झटके से अंदर आए।
"हद है माँ! कम से कम पांच बार बेल बजाई होगी मैंने। आप अंदर सो जाती हैं क्या? ऑफिस से थक कर आओ और फिर बाहर दस मिनट खड़े रहो, चिड़चिड़ाहट नहीं होगी तो क्या होगा?" अनिरुद्ध ने अपना लैपटॉप बैग सोफे पर पटकते हुए कहा।
मंजरी ने दीवार का सहारा लिया और शांत स्वर में बोली, "बेटा, सोई नहीं थी। बस किचन से यहाँ तक आने में थोड़ा समय लग जाता है। पैरों की नसें अब पहले जैसी लचीली नहीं रहीं।"
तभी बेडरूम से तैयार होकर निकलती गरिमा ने अपनी ऊँची एड़ी की सैंडल ठीक करते हुए टोका, "रहने दीजिए मम्मी जी! शाम को जब पार्क में अपनी सहेलियों के साथ सत्संग और गप्पें लड़ाती हैं, तब तो आपकी रफ्तार देखने लायक होती है। जैसे ही घर का दरवाजा खोलना हो या कोई छोटा काम करना हो, आपकी बीमारी उभर आती है। अनिरुद्ध को ऑफिस से आने दीजिए, फिर आपके ये बहाने शुरू हो जाते हैं।"
मंजरी अवाक रह गई। वह गरिमा को क्या बताती कि दिन भर के उस अकेलेपन और घर की अंतहीन पहरेदारी के बीच, शाम का वह आधा घंटा ही उसे जीवित होने का अहसास दिलाता है। गरिमा सुबह दस बजे 'सोशल वर्क' और किट्टी के नाम पर निकल जाती थी, और अनिरुद्ध सुबह नौ बजे का गया रात को लौटता था। इस बीच घर का पूरा जिम्मा मंजरी पर ही तो था। सुबह दूध वाले से हिसाब करना, कामवाली बाई के पीछे लगकर कोने-कोने की सफाई करवाना, दोपहर में बिजली का बिल जमा करने आए कर्मचारी को देखना और पोते के स्कूल से आने पर उसे संभालना—मंजरी यह सब चुपचाप करती थी ताकि बहू-बेटे की बाहरी दुनिया में कोई खलल न पड़े।
कुछ दिनों पहले मंजरी ने अपने पैरों के दर्द के लिए एक फिजियोथेरेपिस्ट को घर बुलाने की बात कही थी। दो दिन वह आया भी, लेकिन गरिमा ने तीसरे दिन उसे गेट से ही वापस कर दिया। उसका तर्क था, "मम्मी जी, ये सब फिजूलखर्ची है। आप बस घर में थोड़ा टहला कीजिए, सब ठीक हो जाएगा। बाहर वालों को घर में घुसाना सुरक्षित नहीं है।" असल में, गरिमा को डर था कि अगर मंजरी पूरी तरह ठीक हो गई, तो वह घर के मामलों में और ज्यादा दखल देने लगेगी।
मंजरी की खामोशी उस दिन और गहरी हो गई जब उसने सुना कि अनिरुद्ध और गरिमा अगले हफ्ते छुट्टियां मनाने विदेश जा रहे हैं। उन्होंने मंजरी से एक बार पूछा तक नहीं। उसे तो बस एक 'होम-गार्ड' की तरह घर और पोते की रखवाली के लिए तैनात कर दिया गया था।
एक रात, जब घर में सब सो रहे थे, मंजरी को प्यास लगी। वह जैसे ही उठी, उसके पैर में एक भयानक ऐंठन उठी और वह फर्श पर गिर पड़ी। उसने अनिरुद्ध को आवाज दी, "अनी... बेटा... सुनना।" लेकिन दूसरे कमरे में गहरी नींद में सो रहे बेटे-बहू तक उसकी कराह नहीं पहुँची। वह पूरी रात उसी ठंडे फर्श पर पड़ी रही। सुबह जब कामवाली ने आकर दरवाजा पीटा और मंजरी ने नहीं खोला, तब जाकर अनिरुद्ध की नींद खुली।
डॉक्टर ने आकर बताया कि यह गंभीर मांसपेशियों का खिंचाव था और आराम न मिलने के कारण हालत बिगड़ गई थी। डॉक्टर ने साफ शब्दों में कहा, "इन्हें दवा से ज्यादा देखभाल और मानसिक शांति की जरूरत है। शरीर मशीन नहीं होता, और साठ साल के बाद तो बिल्कुल नहीं।"
उस दिन पहली बार अनिरुद्ध ने अपनी माँ के सूजे हुए पैरों को गौर से देखा। उसे याद आया कि कैसे बचपन में उसकी एक खरोंच पर माँ नंगे पांव भागती थी। गरिमा भी बगल में खड़ी थी, उसकी नजरें पहली बार शर्म से झुकी हुई थीं। उसे अहसास हुआ कि जिस 'मशीन' को वह घर की चाबी और पहरेदारी सौंपकर निश्चिंत रहती थी, वह दरअसल एक जीता-जागता इंसान है जिसकी अपनी तकलीफें हैं।
मंजरी बेड पर लेटी हुई थी। उसने कोई शिकायत नहीं की, बस उसकी आँखों के कोने से एक आंसू ढलक कर तकिये में समा गया। उस एक आंसू ने अनिरुद्ध के भीतर के 'बेटे' को झकझोर कर रख दिया। उसने गरिमा की ओर देखा और कहा, "शायद हम दरवाजा देर से खुलने पर इसलिए चिल्लाते थे क्योंकि हम माँ को सिर्फ एक 'सुविधा' समझ बैठे थे, इंसान नहीं।"
उस शाम, अनिरुद्ध ने खुद चाय बनाई और माँ के पास बैठ गया। उसने वह विदेश यात्रा रद्द कर दी थी। गरिमा ने भी पास आकर मंजरी का हाथ थाम लिया और बिना कुछ कहे उनके पैरों पर मरहम लगाने लगी। मंजरी ने महसूस किया कि घर का दरवाजा भले ही अब भी धीरे खुलता हो, लेकिन अपनों के दिल के दरवाजे अब पूरी तरह खुल चुके थे।
लेखिका : कुमुद मोहन
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