"सुमित, तुम भी ना! बेकार में इतना सोच रहे हो। भैया और भाभी ने खुद आगे बढ़कर कहा है कि जब तक हमारा नया स्टार्टअप सेटल नहीं हो जाता और हम आर्थिक रूप से दोबारा मज़बूत नहीं हो जाते, हम उनके विला में शिफ्ट हो सकते हैं। वैसे भी वो इतना बड़ा घर है, वे दोनों अकेले रहते हैं। हमारे जाने से घर में रौनक ही आएगी।" कावेरी ने कपड़े तह करते हुए सुमित को समझाने की कोशिश की।
सुमित खिड़की के बाहर देख रहा था। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ थीं। उसने धीमे स्वर में कहा, "कावेरी, खून के रिश्ते और ससुराल के रिश्तों में बहुत फर्क होता है। वहां तुम 'बेटी' जैसी हो सकती हो, लेकिन मैं हमेशा 'दामाद' ही रहूंगा। और दामाद की इज़्ज़त तभी तक है जब तक वह मेहमान बनकर जाए। परमानेंट रहने पर इज़्ज़त और स्वतंत्रता, दोनों की नीलामी हो जाती है।"
"उफ़्फ़! तुम्हारा यह ईगो!" कावेरी झुंझला गई। "अरे, भाई हैं वो मेरे। बचपन में हम एक ही थाली में खाते थे। और श्वेता भाभी तो मेरी सहेली जैसी हैं। किराए के इस छोटे मकान में दम घुटता है, वहां खुला बगीचा है, नौकर-चाकर हैं, आरव के खेलने के लिए जगह है। प्रैक्टिकल बनो सुमित।"
सुमित ने गहरी सांस ली और बहस खत्म कर दी। कावेरी की ज़िद और अपनी तंगहाली के आगे उसे झुकना पड़ा। अगले ही रविवार, वे अपना सामान समेटकर कावेरी के मायके—'अग्रवाल विला'—में शिफ्ट हो गए।
घर वाकई आलीशान था। कावेरी के भाई, अनिरुद्ध, और भाभी, श्वेता, ने उनका स्वागत भी गर्मजोशी से किया। अनिरुद्ध ने सुमित के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "यार, अच्छा किया तुम लोग आ गए। यह घर हमें काटने को दौड़ता था। अब आरव की किलकारियों से घर गूंजेगा।"
शुरुआती दिन किसी सपने जैसे बीते। सुबह बेड-टी मिलती, खाने में तरह-तरह के व्यंजन होते, और आरव को खेलने के लिए बड़ा लॉन मिल गया था। कावेरी बहुत खुश थी। उसे लग रहा था कि उसने सुमित को गलत साबित कर दिया है। सुमित भी धीरे-धीरे रिलैक्स होने लगा था, हालाँकि वह अभी भी एक अदृश्य सीमा रेखा के भीतर ही रहता था।
लेकिन, बदलाव बहुत धीमे और महीन तरीके से आना शुरू हुआ।
सुमित अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था, तभी श्वेता भाभी वहां आईं।
"सुमित जी, बुरा मत मानिएगा, लेकिन आप अपनी यह वर्क-टेबल ड्राइंग रूम से हटाकर गेस्ट रूम के कोने में शिफ्ट कर लेंगे? दरअसल, शाम को मेरी किटी पार्टी की फ्रेंड्स आ रही हैं, और ड्राइंग रूम का डेकोर थोड़ा बिगड़ रहा है," श्वेता ने बहुत ही मिठास से कहा।
"जी, ज़रूर भाभी," सुमित ने तुरंत लैपटॉप बंद किया और मेज़ वहां से हटा ली। उस शाम सुमित को गेस्ट रूम के एक अंधेरे कोने में बैठकर काम करना पड़ा क्योंकि वहां वाई-फाई का सिग्नल ठीक से नहीं आ रहा था, लेकिन उसने कावेरी से कुछ नहीं कहा।
कुछ दिनों बाद, रविवार की दोपहर थी। कावेरी ने सोचा कि आज वह सबके लिए अपनी स्पेशल 'दम-बिरयानी' बनाएगी। वह उत्साह से रसोई में गई।
रसोइया, रामदीन, सब्ज़ियां काट रहा था।
"रामदीन काका, आज हटो, मैं खाना बनाऊंगी," कावेरी ने हंसते हुए कहा।
रामदीन झिझका। "बिटिया, वो मेमसाहब ने... आज के लिए इटालियन मेनू तय किया है। पास्ता और गार्लिक ब्रेड बनने वाला है। सामान भी आ गया है।"
"अरे, तो पास्ता रात को बन जाएगा। आज दोपहर में बिरयानी खाते हैं," कावेरी ने एप्रन पहनते हुए कहा।
तभी श्वेता वहां आ गई। "अरे कावेरी, तुम क्यों परेशान हो रही हो? और प्लीज, आज बिरयानी मत बनाओ। उस दिन तुमने बनाई थी तो पूरे घर में खड़े मसालों की महक दो दिन तक नहीं गई थी। अनिरुद्ध को वो स्ट्रॉन्ग स्मेल पसंद नहीं है। तुम आराम करो न, तुम्हें किचन में खटने की क्या ज़रूरत है?"
कावेरी का हाथ रुक गया। यह वही अनिरुद्ध भैया थे जो बचपन में उसके हाथ की बिरयानी खाने के लिए ज़िद करते थे। आज उन्हें महक से दिक्कत होने लगी? उसने चुपचाप एप्रन उतार दिया। वह बाहर तो आ गई, लेकिन उसका उत्साह मर गया था।
बातें यहीं नहीं रुकीं। धीरे-धीरे कावेरी को महसूस होने लगा कि इस घर में उसकी हैसियत एक 'लाड़ली बहन' की नहीं, बल्कि एक 'सुविधाभोगी मेहमान' की हो गई है। बिजली का बिल ज़्यादा आने पर श्वेता का नौकरों को डांटना—"तुम लोग दिन भर एसी चलाते रहते हो, बिल क्या तुम्हारे बाप भरेंगे?"—सुनाना नौकरों को होता था, लेकिन निशाना कावेरी और सुमित होते थे, क्योंकि दिन भर घर पर वही रहते थे।
एक रात, सुमित और कावेरी अपने कमरे में थे। सुमित ने कहा, "कावेरी, मुझे लगता है हमें अब अपना इंतज़ाम कर लेना चाहिए। मेरा प्रोजेक्ट शुरू हो गया है, कुछ पैसे आने लगे हैं।"
"तुम फिर शुरू हो गए? यहाँ क्या कमी है सुमित? भैया ने कभी कुछ कहा तुमसे?" कावेरी ने चिढ़कर कहा।
"मुंह से कहना ही सब कुछ नहीं होता कावेरी। आँखों की भाषा भी होती है। कल जब मैं आरव के लिए बाज़ार से खिलौने लाया, तो अनिरुद्ध ने हंसते हुए कहा था—'पैसे बचा ले सुमित, सेविंग्स काम आएगी, खिलौने तो मैं ले ही आता हूँ।' तुम्हें यह प्यार लगा होगा, लेकिन मुझे यह ताना लगा कि मैं अपने बेटे के शौक पूरे करने के लायक नहीं हूँ।"
कावेरी चुप रही। उसे लगा सुमित ज़्यादा सोच रहे हैं।
लेकिन असली झटका कावेरी को दो दिन बाद लगा।
शाम का वक़्त था। कावेरी अपने बेटे आरव को लॉन में साइकिल चलाना सिखा रही थी। आरव ने उत्साह में साइकिल तेज़ चलाई और गलती से श्वेता के पसंदीदा गमले से टकरा गया। एक महंगा विदेशी 'बोनसाई' का गमला टूटकर बिखर गया।
आवाज़ सुनकर श्वेता दौड़ी चली आई। गमले को टूटा देख उसका चेहरा लाल हो गया।
"आरव! क्या किया तुमने?" वह चिल्लाई।
"भाभी, बच्चा है, गलती से लग गया," कावेरी ने बचाव किया।
श्वेता ने कावेरी की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब तक छिपा हुआ लिहाज़ ख़त्म हो चुका था।
"कावेरी, तुम्हें पता है यह प्लांट मैंने बैंकॉक से मंगवाया था? इसकी कीमत पंद्रह हज़ार रुपये थी। बच्चा है तो क्या सर पर चढ़ा लोगी? जब चीज़ों की कीमत खुद की जेब से नहीं जाती न, तो दर्द नहीं होता। यहाँ सब मुफ्त मिल रहा है, तो कद्र क्या होगी?"
कावेरी सन्न रह गई। "मुफ्त?" यह शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा।
"और क्या?" श्वेता अब रुकने के मूड में नहीं थी। "दो महीने हो गए कावेरी। मेहमान तीन दिन अच्छे लगते हैं, तीन महीने नहीं। अनिरुद्ध कुछ नहीं कहते क्योंकि वो भाई हैं, लेकिन घर तो मेरा भी है। मेरी भी प्राइवेसी है। सुमित दिन भर घर में रहते हैं, मुझे अपने ही घर में कपड़े पहनने से लेकर सोफे पर बैठने तक में सोचना पड़ता है। अब यह गमला... तुम लोग समझते क्यों नहीं कि हर चीज़ की एक लिमिट होती है?"
कावेरी की आँखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। उसे अचानक सुमित की हर बात याद आ गई। 'परमानेंट रहने पर इज़्ज़त की नीलामी हो जाती है।'
उस रात डिनर टेबल पर सन्नाटा था। अनिरुद्ध ने माहौल हल्का करने की कोशिश की, "क्या हुआ? सब चुप क्यों हैं?"
श्वेता ने चम्मच चलाते हुए कहा, "कुछ नहीं, बस आरव को थोड़ा अनुशासन सिखाना ज़रूरी है।"
कावेरी ने सुमित का हाथ मेज़ के नीचे थाम लिया। सुमित ने प्रश्नवाचक नज़रों से उसे देखा। कावेरी ने आँखों से ही कुछ इशारा किया।
अगली सुबह, अनिरुद्ध और श्वेता नाश्ते की मेज़ पर थे, जब कावेरी और सुमित अपना सामान लेकर नीचे आए।
"अरे? यह क्या? तुम लोग कहीं जा रहे हो?" अनिरुद्ध हैरान रह गया।
श्वेता भी चौंक गई, उसके चेहरे पर हल्का सा पछतावा और हल्की सी राहत, दोनों थे।
"हाँ भैया," कावेरी ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी मुस्कान में अब वह बेफिक्री नहीं, बल्कि एक परिपक्वता थी। "सुमित का प्रोजेक्ट पास हो गया है। हमें शहर के दूसरे छोर पर एक छोटा सा फ्लैट मिल गया है। ऑफिस के पास है, तो आने-जाने में आसानी होगी।"
"लेकिन इतनी जल्दी क्या है? अभी तो रुको," अनिरुद्ध ने औपचारिकता निभाई।
"नहीं भैया," कावेरी ने श्वेता की आँखों में देखते हुए कहा। "गमले में लगा पौधा तभी तक सुंदर लगता है जब तक उसकी जड़ें गमले को न तोड़ने लगें। और जड़ों को फैलने के लिए अपनी ज़मीन चाहिए होती है, दूसरे के आंगन की मिट्टी नहीं।"
श्वेता नज़रें नहीं मिला पाई।
वे टैक्सी में बैठे। सुमित ने कावेरी की तरफ देखा, "तुम ठीक हो?"
"मैं बहुत ठीक हूँ सुमित," कावेरी ने एक गहरी सांस ली, जैसे बरसों बाद खुली हवा में सांस ले रही हो। "मुझे माफ़ कर देना। मैं आलीशान पिंजरे को महल समझ बैठी थी। मुझे समझ नहीं आया कि दूसरे के घर में रानी बनकर रहने से बेहतर है, अपनी झोपड़ी की मालकिन बनकर रहना।"
दो घंटे बाद। एक पुराना, थोड़ा सीलन भरा 'वन बीएचके' फ्लैट। दीवारों का पेंट उखड़ रहा था। पंखा चलते हुए आवाज़ कर रहा था।
कावेरी ने रसोई में जाकर चाय बनाई। वहां कोई रसोइया नहीं था, कोई इटालियन मार्बल नहीं था। उसने दो कप चाय और बिस्किट लाकर ज़मीन पर बिछी चटाई पर रख दिए।
सुमित और कावेरी वहां बैठे। आरव खाली कमरे में दौड़ रहा था।
सुमित ने चाय की चुस्की ली। "चीनी थोड़ी कम है।"
कावेरी खिलखिला कर हंस पड़ी। "पी लो चुपचाप। यहाँ कोई शेफ नहीं है, जो मिलेगी वही पीनी पड़ेगी।"
सुमित भी हंस पड़ा। उस छोटे से कमरे में गूंजती उनकी हंसी, उस विशाल विला की खामोशी से कहीं ज़्यादा कीमती थी।
"जानते हो सुमित," कावेरी ने सुमित के कंधे पर सिर रखते हुए कहा, "उस विला में, मैं मखमल के गद्दे पर भी पूरी रात करवटें बदलती थी कि कहीं मेरी वजह से चादर पर सिलवट न आ जाए। और यहाँ... यहाँ इस सख्त ज़मीन पर भी मुझे लग रहा है कि मैं दुनिया के सबसे आरामदायक बिस्तर पर हूँ।"
सुमित ने मुस्कुराते हुए कहा, "इसे ही कहते हैं सुकून, कावेरी।"
कावेरी ने मन ही मन उस टूटे हुए गमले को धन्यवाद दिया। अगर वह नहीं टूटता, तो शायद उसका भ्रम कभी नहीं टूटता। उसने समझ लिया था कि स्वाभिमान की रोटी, अपमान के छप्पन भोग से कहीं ज़्यादा स्वादिष्ट होती है। घर ईंट-पत्थरों से नहीं, अधिकार और आज़ादी से बनता है। और आज, इस छोटे से किराए के मकान में, वे सचमुच अपने "घर" में थे।
मूल लेखिका
विभा गुप्ता
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