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अधिकार

 अम्मा जी के चेहरे पर थकान की महीन-सी परत चढ़ी रहती थी, मगर आंखों में वही पुराना तेज़ अब भी बचा था। एकादशी के उद्यापन का दिन नज़दीक था। बरामदे में पंडित जी की सूची, रसोई की तैयारी और मेहमानों के बैठने की व्यवस्था—सब कुछ अम्मा के इर्द-गिर्द घूम रहा था। बड़े बेटे का परिवार शहर में था, मँझले का भी। घर में रह रहे थे छोटे बेटे विवेक और उसकी पत्नी नंदिनी, जो गर्भवती थी और हर समय “कमज़ोरी” का बहाना बनाकर बिस्तर से उठने में आनाकानी करती रहती थी।

उद्यापन से दो दिन पहले बड़ी बहू सुमित्रा और मँझली बहू पल्लवी भी आ पहुँचीं। आते ही दोनों की आवाज़ में मिठास कम, शिकायतें ज़्यादा थीं। “अम्मा, आपने इतना बड़ा कार्यक्रम रख दिया, अब आप ही देखिए सब… हमारा तो बच्चों के साथ आना ही मुश्किल होता है,” सुमित्रा ने बैग पटकते हुए कहा। पल्लवी ने नाक सिकोड़कर रसोई की तरफ देखा, “और ये घर… कोई ढंग की व्यवस्था नहीं। नौकरानी तो है नहीं, सब काम हमसे ही करवाएंगी क्या?”

अम्मा जी के कानों में जैसे किसी ने गरम सीसा उंडेल दिया हो। उन्हें समझ में आ गया—इस भीड़ में सबको पूजा चाहिए, पर जिम्मेदारी किसी को नहीं। उन्होंने उसी पल निर्णय ले लिया। शाम होते-होते दो नौकर रख दिए—एक रसोई के लिए, एक सफ़ाई और व्यवस्था के लिए। बहुओं ने राहत की सांस ली, जैसे उनका कोई बड़ा बोझ उतर गया हो। अम्मा जी ने कुछ नहीं कहा, बस भीतर से एक बात दर्ज कर ली—“सुख लेने की होड़ है, साथ देने की नहीं।”

उद्यापन अच्छी तरह हो गया। हवन-यज्ञ, ब्राह्मण भोज, प्रसाद वितरण—सब तय समय पर। मेहमान गए, बहुएं भी दो दिन में शहर लौटने की तैयारी करने लगीं। उस रात जब घर फिर से खाली-सा लगने लगा, अम्मा जी ने मंदिर के सामने बैठकर लंबी सांस ली। उन्हें लगा, घर की रौनक इतनी जल्दी लौट गई, जैसे आई ही न हो।

समय जैसे पंख लगाकर उड़ गया। नंदिनी ने कुछ महीनों बाद बेटे को जन्म दिया। घर में पहली बार सचमुच खुशी का शोर हुआ। अम्मा जी ने अपनी कांपती उंगलियों से नन्हे के माथे पर काजल का टीका लगाया, “मेरे लल्ला… घर की छत मजबूत रहे।” विवेक की आंखें भर आईं। उधर बड़े बेटे रोहन और मँझले बेटे करण फोन पर बधाइयाँ देकर फिर अपने-अपने काम में लग गए। कुछ दिन बाद फोटो आए, उपहार आए, लेकिन वे खुद कम ही आए।

इसी बीच दादाजी—यानी अम्मा जी के पति—की तबीयत गिरने लगी। पहले भूख कम हुई, फिर सांस फूलने लगी, और धीरे-धीरे वे बिस्तर पकड़ने लगे। शहर वाले बेटे-बहू बार-बार कहने लगे, “अस्पताल में भर्ती कर दो, हम पैसे भेज देंगे।” अम्मा जी ने सिर्फ इतना कहा, “पैसा भेजने से हाथ नहीं बन जाता बेटा।”

दादाजी की सेवा में विवेक और नंदिनी जुट गए। नंदिनी की तबीयत भी कमजोर थी, पर वह अब तक बिस्तर का बहाना नहीं बना रही थी। वह रात में उठकर पानी देती, दवा का समय देखती, और कई बार अम्मा जी के पैर दबाते हुए कह देती, “माँ… आप भी थोड़ी देर लेट जाइए, मैं देख लूंगी।” अम्मा जी हर बार चुप रह जातीं, पर उनके भीतर कोई बात धीरे-धीरे पिघलने लगी। सेवा दिखती नहीं, महसूस होती है—और नंदिनी का बदला हुआ रूप उन्हें साफ़ महसूस हो रहा था।

फिर एक दिन दादाजी ने अम्मा जी का हाथ दबाया, बहुत धीमे से बोले, “लड़के बड़े हो गए… पर जिनके हाथ में घर है… वही अपने हैं…” बस इतना कहकर उनकी आंखें स्थिर हो गईं। घर में सन्नाटा उतर आया। अम्मा जी देर तक उनकी छाती पर सिर रखे बैठी रहीं, जैसे उनका अपना सहारा उनसे छिन गया हो।

अंतिम संस्कार के लिए दोनों बेटे-बहू आए। तेरहवीं तक भीड़ रही। लोग “धैर्य रखिए” कहकर चले गए, लेकिन घर में जो खालीपन बचा, वह किसी की बातों से भरने वाला नहीं था।

तेरहवीं के दो दिन बाद की बात थी। बरामदे में सब बैठे थे। रोहन और करण जल्दी लौटने की बात कर रहे थे। सुमित्रा और पल्लवी की नजरें घर के अलमारी-तिजोरी पर टिक-टिक कर रही थीं, मानो दुख की राख के नीचे कोई और आग जल रही हो। विवेक चुप था। नंदिनी गोद में बच्चे को लेकर बैठी थी, बीच-बीच में उसकी पीठ थपथपा देती।

अम्मा जी ने खंखारकर गला साफ किया। “बच्चो…” उनका स्वर बहुत शांत था, लेकिन उसमें ऐसा वजन था कि सबकी बातचीत वहीं थम गई। “जिंदगी का भरोसा नहीं। आज दादाजी हैं, कल मैं भी नहीं रहूंगी। इसलिए मैं जायदाद का बंटवारा जीते जी कर देना चाहती हूं। लेकिन याद रहे… यह सब तुम्हें मेरे जाने के बाद ही मिलेगा। अभी तो बस कागज़ों पर फैसला होगा।”

रोहन ने तुरंत कहा, “माँ, आप ऐसा क्यों कह रही हैं? आप तो बहुत दिन रहेंगी।” पर उसके चेहरे पर जो चमक थी, वह माँ के लंबे जीवन की नहीं—कागज़ों की थी। करण ने भी गर्दन आगे कर ली। बहुएं भी एक-दूसरे की तरफ देखकर खामोश हो गईं।

अम्मा जी अंदर गईं और एक फाइल लेकर आईं। फाइल टेबल पर रखी, फिर धीरे-धीरे कागज़ फैलाए। सबने जैसे ही देखा, उनके चेहरों का रंग बदल गया। मकान, खेत और किराये की दुकान—सबकी नामांतरण सूची तैयार थी, लेकिन नाम देखकर सभी के होश उड़ गए।

रोहन लगभग चिल्ला पड़ा, “माँ! ये क्या? जायदाद बहुओं के नाम? बेटों के नाम नहीं? और… ये बड़ा हिस्सा नंदिनी के नाम?” सुमित्रा की आंखें फैल गईं, पल्लवी का मुंह खुला का खुला रह गया। करण ने गुस्से में कहा, “माँ, माँ के लिए तो सब बराबर होते हैं। बंटवारा करना था तो तीनों बहुओं में बराबर करतीं। या बेटों में बराबर…”

अम्मा जी ने उन्हें देखा—बहुत देर तक। उनकी आंखों में दुख नहीं था, अब सिर्फ स्पष्टता थी। “बराबरी?” उन्होंने धीमे से पूछा, “बराबरी तब होती है जब जिम्मेदारी भी बराबर हो।”

रोहन ने तड़पकर कहा, “हमने क्या नहीं किया? पैसे भेजे… जरूरत की चीजें…”

अम्मा जी मुस्कुराईं—वो मुस्कान जैसे किसी पुराने घाव पर नमक थी। “पैसे भेजना सहायता है बेटा, साथ नहीं। उद्यापन में तुम्हारी पत्नियों ने जिम्मेदारी उठाई? न बोलो कि ‘आए’ थे। आए थे—पर हाथ किसने बंटाया? जब दादाजी बीमार थे, तुम्हारा फोन भी दो-दो दिन तक नहीं लगता था। तुम सबको लगता था कि घर में सब अपने आप हो जाएगा। जिम्मेदारी से बचने के लिए बहाने बहुत होते हैं—बच्चे, नौकरी, थकान… लेकिन रिश्ते बहानों से नहीं चलते।”

करण ने बेचैनी से कहा, “तो इसका मतलब हम हकदार नहीं?”

अम्मा जी का स्वर अब थोड़ा कठोर हुआ। “हक… कर्तव्य से पैदा होता है। जिसने मेरा घर संभाला, जिसने मेरे बूढ़े आदमी को बिना दिखावे के पानी पिलाया, जिसके हाथों में मेरे पति ने आखिरी सांस ली—उसी के हाथों में अधिकार होगा। नंदिनी कहने को छोटी बहू है, लेकिन जिम्मेदारी उसने बड़ी निभाई है। और यह फैसला मैं किसी के दबाव में नहीं बदलूंगी।”

नंदिनी की आंखें भर आईं। उसने धीरे से कहा, “माँ, मुझे… मुझे इतना नहीं चाहिए। बस आप—”

अम्मा जी ने उसका वाक्य बीच में रोक दिया। “चुप। यह कोई इनाम नहीं है। यह एक भरोसा है। तूने घर को ‘काम’ नहीं समझा, घर को ‘अपना’ समझा। इसलिए मैंने घर भी तेरे नाम पर लिखा है।”

सुमित्रा का चेहरा उतर गया। पल्लवी ने होंठ भींच लिए। रोहन और करण को पहली बार अपने भीतर शर्म की चुभन महसूस हुई—जैसे किसी ने उनके माथे पर उनके ही सच की मुहर लगा दी हो। वे समझ गए कि माँ ने कागज़ नहीं बाँटे, माँ ने तराजू पर रिश्तों का वजन रखा है।

उस रात जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए, अम्मा जी आंगन में बैठीं रहीं। नंदिनी चुपचाप उनके पास आकर बैठ गई। बच्चे को पालने में सुलाकर वह आई थी। उसने धीरे से अम्मा जी के कंधे पर सिर रखा, “माँ… आप अकेली मत रहना। हम हैं न…”

अम्मा जी ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया। “अकेलापन घर में नहीं होता बहू… अकेलापन मन में होता है। और आज पहली बार… मेरा मन अकेला नहीं है।”

आसमान में चाँद साफ था। घर के भीतर भी एक नया उजाला उतर चुका था—अधिकार का नहीं, जिम्मेदारी का। और उसी उजाले में अम्मा जी को यकीन हो चला था कि घर का वारिस वही नहीं होता जो जन्म से “बेटा” कहलाए, वारिस वह होता है जो वक्त पड़ने पर “अपना” बनकर खड़ा हो जाए।

मूल लेखिका 

अर्चना खंडेलवाल 


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