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सस्ती सोच

 “जिस सफाईकर्मी को वह ‘नीचा’ समझता था… उसी ने उसकी जान बचाई”

अपनी नई-नई खरीदी हुई चमचमाती घड़ी को बार-बार कलाई पर घुमाकर देखते हुए समर ने ऑफिस के रिसेप्शन पर खड़ी लड़की से कहा, “देखो, आज की मीटिंग में कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए। क्लाइंट को पानी भी ग्लास में नहीं, बोतल में चाहिए। और हाँ… बाहर जो सफाई वाले हैं न, उनको लाउंज के पास मत आने देना। बदबू आती है।”

रिसेप्शन पर खड़ी अनन्या ने ‘जी सर’ कहकर सिर हिला दिया, पर उसके चेहरे पर हल्की सी असहजता उतर आई। समर ने नोटिस किया, फिर भी नजरअंदाज कर दिया। उसे अपनी छवि की फिक्र थी। आखिर नई पोस्ट मिली थी—ऑपरेशंस हेड। वह चाहता था कि लोग उसे “परफेक्ट” समझें—साफ-सुथरा, स्मार्ट, और “स्टैंडर्ड” वाला आदमी।

दोपहर तक सब ठीक चला। क्लाइंट चला गया, समर की तारीफ भी हुई। वह खुश था। उसी खुशी में वह अपने केबिन से निकला तो गलियारे में एक बुजुर्ग सफाईकर्मी—हरिहर—मोप लगाते दिखा। पसीने से भीगा, सिर झुका, काम में डूबा। समर ने रास्ता बदलने के बजाय तेज कदमों से उसके पास से निकलते हुए कहा, “अरे देख कर चलो! मेरे जूते पर छींटा आ गया तो?”

हरिहर ने तुरंत झुककर कहा, “माफ कीजिए साब… गलती हो गई।”

समर आगे बढ़ गया, लेकिन उसकी पीठ पीछे अनन्या ने देखा कि हरिहर की उंगलियां कांप रही थीं। वह चुपचाप उसकी बाल्टी किनारे करवा कर बोली, “काका, आप आराम से करिए… जल्दी नहीं है।”

हरिहर ने मुस्कराकर कहा, “बिटिया, नौकरी है… काम तो करना ही पड़ेगा।”

शाम होते-होते ऑफिस की लिफ्ट खराब हो गई। समर ने झुंझला कर टेक्निशियन को फोन किया। तभी पता चला कि बिल्डिंग के पीछे वाले हिस्से में बिजली का बड़ा फॉल्ट है और अगले दो घंटे तक लिफ्ट नहीं चलेगी। समर का फ्लैट 12वीं मंजिल पर था, और वह आज थका हुआ भी था।

“ये कैसी बिल्डिंग है!” वह बड़बड़ाया, “हर चीज में प्रॉब्लम!”

अनन्या ने धीमे से कहा, “सर, आज मौसम भी खराब है। न्यूज में बताया था रात को तेज बारिश—”

समर ने हाथ हिलाकर बात काट दी, “ठीक है, तुम लोग निकलो। मैं भी निकल रहा हूँ।”

बाहर आते ही हवा में अजीब सी नमी थी। बादल एक-दूसरे पर चढ़े जा रहे थे। समर ने कार स्टार्ट की और निकल पड़ा। रास्ते में उसने देखा—नाले का पानी सड़क पर फैलने लगा है, ट्रैफिक धीमा हो गया है। लेकिन समर ने सोचा, “ये शहर है, सब मैनेज हो जाता है।”

एक घंटे बाद अचानक बारिश टूट पड़ी। ऐसी बारिश जैसे आसमान फट गया हो। वाइपर की गति तेज की तो भी शीशा धुंधला-सा लगता। समर ने गाड़ी मोड़ी, लेकिन पानी के तेज बहाव में कार का इंजन हिचकने लगा। अगले ही पल कार झटका खाकर बंद हो गई।

“नो… नो… ये अभी बंद नहीं हो सकती!” समर ने चाबी घुमाई—एक बार, दो बार, तीन बार… इंजन ने जवाब नहीं दिया। पानी अब टायर के आधे तक आ चुका था। पीछे ट्रैफिक हॉर्न बजा रहा था, आगे सड़क खाली और काली। बिजली चमकी तो समर को पहली बार डर लगा।

उसने फोन निकाला—नेटवर्क एक लाइन, फिर गायब। उसने कार का दरवाजा खोलना चाहा, पर पानी का दबाव ऐसा था कि दरवाजा मुश्किल से खुला। वह बाहर निकला तो पानी ने उसके पिंडलियों को धक्का मारा। बारिश में सांस लेना भारी लग रहा था।

“हेल्प! कोई है?” उसने चिल्लाया।

दूर अंधेरे में कुछ लोग भागते दिखे। कोई उसकी तरफ नहीं आया। समर का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे याद आया—घर में मां अकेली है, और वह आज रात उनकी दवा भी लेकर आने वाला था। उसने कांपते हाथों से मां को कॉल मिलाया—कॉल कटा, फिर मिलाया—नेटवर्क नहीं।

पानी और तेज हो गया। अब कार का दरवाजा आधा डूब चुका था। समर घबरा गया। उसने सोचा—“अगर पानी और बढ़ा तो…?” उसकी आंखों के सामने अचानक सब छूटता दिखा—ऑफिस, पोस्ट, घड़ी, इमेज, क्लाइंट… सब व्यर्थ।

तभी पीछे से किसी ने ऊँची आवाज में कहा, “अरे साब! उधर मत जाइए! नाला खुला है, बह जाएंगे!”

समर ने पलट कर देखा—टॉर्च की रोशनी में एक चेहरा। वही हरिहर। उसके साथ दो-तीन और लोग थे। हरिहर ने कमर तक पानी में उतरकर एक रस्सी आगे बढ़ाई। “रस्सी पकड़िए साब, धीरे-धीरे!”

समर हक्का-बक्का था। “त…तुम?” उसके मुंह से बस यही निकला।

हरिहर ने बिना समय गंवाए कहा, “बाद में पहचानिएगा साब, पहले बाहर निकलिए।”

समर ने रस्सी पकड़ी। हरिहर और बाकी लोग उसे खींचते हुए सड़क के किनारे ऊँचे प्लेटफॉर्म की तरफ ले गए, जहाँ पानी थोड़ा कम था। समर की सांसें बेतरतीब थीं। कपड़े चिपक गए थे। हाथ पैर सुन्न।

हरिहर ने अपनी फटी हुई प्लास्टिक शीट निकालकर उसके कंधों पर डाल दी। “कांप रहे हैं साब, ये ओढ़ लीजिए।”

समर ने कांपते होंठों से कहा, “तुम… यहाँ कैसे?”

हरिहर ने जवाब नहीं दिया। बस बोला, “मेरी बस्ती इधर ही है। पानी बढ़ता देख सबको निकाल रहे हैं। आप… आप तो बड़े आदमी हैं, लेकिन पानी किसी को बड़ा-छोटा नहीं देखता साब।”

ये वाक्य समर के दिल में कहीं चुभ गया। उसे अपना सुबह वाला वाक्य याद आया—“सफाई वाले लाउंज के पास मत आने देना।” उसे पहली बार अपने शब्द गंदे लगे।

कुछ ही देर में पुलिस की जीप और नगर निगम की छोटी नाव आई। समर को सुरक्षित जगह पर बैठाया गया। हरिहर भी भीगता-भीगता लोगों को इशारे कर रहा था—कौन किस तरफ जाए, कहां गड्ढा है, कहां बहाव तेज है। वह जैसे इस पानी में भी रास्ता पढ़ सकता था।

समर को घर पहुंचने की चिंता खाए जा रही थी। उसने हरिहर से कहा, “मेरी मां… 12वीं मंजिल पर अकेली… दवा…”

हरिहर ने तुरंत कहा, “आपका पता बताइए साब। रास्ता खुला तो हम छोड़ देंगे। अभी आप सुरक्षित रहिए।”

रात भर बारिश होती रही। समर एक स्कूल के अस्थायी राहत केंद्र में बैठा रहा। उसके हाथ में चाय का कप था, लेकिन होंठों तक पहुंचते-पहुंचते कांप जाता। उसने देखा—एक कोने में हरिहर गीले कपड़ों में बैठा है, फिर भी वह दूसरों के लिए कंबल बांट रहा है। किसी बच्चे को गोद में उठाकर दिलासा दे रहा है। किसी बूढ़ी औरत के पैरों में तेल लगा रहा है।

समर के भीतर कोई दीवार धीरे-धीरे गिर रही थी। उसे लगा जैसे उसकी ‘इमेज’ नाम की चमकदार परत के नीचे असली इंसान को पहली बार सांस मिल रही है।

सुबह होने पर बारिश धीमी हुई। रास्ते साफ होने लगे। हरिहर ने स्थानीय युवकों की मदद से समर को उसके अपार्टमेंट तक पहुंचाया। लिफ्ट अब भी बंद थी, लेकिन हरिहर ने कहा, “सीढ़ी से चलिए साब, मां जी इंतजार कर रही होंगी।”

बारह मंजिल चढ़ते-चढ़ते समर की हालत खराब हो गई। हरिहर आगे-आगे चल रहा था, बीच-बीच में रुककर कहता, “धीरे साब… सांस ले लीजिए।”

दरवाजे पर पहुंचकर समर ने बेल दबाई। अंदर से कांपती आवाज आई, “क…कौन?”

“मां, मैं समर… मैं आ गया।” समर की आंखें भर आईं।

दरवाजा खुला तो मां की आंखें रो-रो कर लाल थीं। उन्होंने समर को पकड़कर देखा—“बेटा, तू ठीक है?” फिर उनकी नजर हरिहर पर गई। “ये कौन है?”

समर की आवाज भारी हो गई, “मां… ये… इन्होंने मुझे बचाया… नहीं तो…”

मां ने तुरंत हरिहर के हाथ जोड़ दिए, “बेटा, भगवान भला करे तुम्हारा।”

हरिहर झेंप गया, “अरे मां जी, हम तो… इंसान का काम इंसान के काम आना ही है।”

घर के अंदर बैठकर समर की मां ने हरिहर को गर्म चाय और खाना दिया। समर चुपचाप सब देखता रहा। उसे याद आया—कल तक वह इसी आदमी को “बदबू” कहकर दूर करने की बात कर रहा था। आज वही आदमी उसके घर में बैठा था—और वह घर पहली बार सच में ‘घर’ लग रहा था।

हरिहर जाने लगा तो समर ने कहा, “काका… रुकिए… मैं… मैं आपका नंबर ले लूं… और… आपकी मदद—”

हरिहर ने मुस्कराकर कहा, “साब, मदद का हिसाब मत रखिए। बस इतना कर दीजिए—जब आपके सामने कोई छोटा दिखे, तो उसे छोटा मत समझिए।”

हरिहर चला गया। दरवाजा बंद हुआ तो समर देर तक वहीं खड़ा रहा। फिर उसने अपनी कलाई से वो महंगी घड़ी उतारी और टेबल पर रख दी—उस चमक में उसे अब खालीपन दिख रहा था।

अगले दिन ऑफिस पहुंचते ही समर ने सबसे पहले अनन्या को बुलाया। “कल रात… मैं फँस गया था। हरिहर जी ने बचाया।”
अनन्या की आंखों में चमक आ गई, “मैं जानती थी काका अच्छे इंसान हैं, सर।”

समर ने गहरी सांस ली, “और मैं… मैं कल तक अच्छा इंसान नहीं था।”
फिर उसने एक छोटा सा नोटिस जारी कराया—सफाईकर्मियों के लिए अलग रेस्ट एरिया, गरम पानी, मेडिकल चेकअप, और अतिरिक्त भुगतान की व्यवस्था। कुछ लोग बोले—“ये सब क्यों?”
समर ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि ये लोग हमारी बिल्डिंग साफ नहीं करते… ये हमारे भीतर की गंदगी भी दिखा देते हैं।”

उस शाम वह ऑफिस से निकलते हुए हरिहर को ढूंढता हुआ बेसमेंट तक गया। हरिहर अपनी बाल्टी भर रहा था। समर ने आगे बढ़कर कहा, “काका… कल मैंने आपको धन्यवाद नहीं कहा था… आज कह रहा हूँ।”

हरिहर ने उसे देखा, फिर मुस्कराया, “धन्यवाद मत बोलिए साब… बस इंसान बने रहिए।”

समर ने सिर झुका लिया। पहली बार किसी के सामने झुककर उसे छोटा महसूस नहीं हुआ—बल्कि हल्का महसूस हुआ।

और उसी हल्केपन में उसे समझ आया—जीवन में सबसे बड़ा सबक वही होता है, जो हमें हमारी ही आदतों के खिलाफ जाकर सिखाया जाता है।

“क्या आपने कभी किसी इंसान को

उसके काम या हैसियत से छोटा समझा है?

अगर हाँ, तो यह कहानी आपको क्या सिखाती है?

कमेंट में ज़रूर लिखें।”

लेखिका : मनीषा प्रसाद 


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