मीरा अभी एक महीना पहले ही इस घर की बहू बनकर आई थी। उसके पति, अर्णव, शहर के जाने-माने आर्किटेक्ट थे और सास-ससुर, यानी गायत्री देवी और विश्वनाथ जी, शहर के प्रतिष्ठित लोग माने जाते थे।
मीरा ने आते ही महसूस कर लिया था कि यह घर बाहर से जितना भव्य और रसूखदार दिखता है, अंदर से उतना ही ठंडा और बेजान है।
गायत्री देवी एक बेहद अनुशासित महिला थीं। सुबह पांच बजे उठना, स्नान करना, पूजा करना और फिर घर की व्यवस्था देखना। उनके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक कभी नहीं पहुँचती थी। दूसरी ओर, विश्वनाथ जी पिछले पांच सालों से लकवे (paralysis) के कारण व्हीलचेयर पर थे। उनका शरीर आधा काम नहीं करता था, और वे बोलने में भी असमर्थ थे, बस टूटी-फूटी आवाज़ें और इशारे ही कर पाते थे।
मीरा ने एक अजीब बात नोटिस की थी। गायत्री देवी अपने पति की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ती थीं। वे उन्हें समय पर नहलातीं, कपड़े बदलतीं, दलिया खिलातीं और दवाइयाँ देतीं। सब कुछ घड़ी की सुई के हिसाब से होता था। लेकिन, इस पूरी प्रक्रिया में एक भी शब्द नहीं बोला जाता था।
गायत्री देवी विश्वनाथ जी के मुंह में चम्मच डालतीं, पर उनकी आँखों में नहीं देखती थीं। वे उनके तकिए ठीक करतीं, पर कभी उनके माथे पर हाथ नहीं फेरती थीं। विश्वनाथ जी की आँखों में एक याचना होती थी, एक तड़प होती थी कि उनकी पत्नी उनकी तरफ देखे, शायद मुस्कुरा दे, लेकिन गायत्री देवी किसी नर्स की भांति अपना 'काम' निपटाकर वहां से हट जाती थीं।
एक दिन अर्णव ऑफिस गया हुआ था। मीरा ड्राइंग रूम में बैठी थी। अचानक विश्वनाथ जी के कमरे से ज़ोरदार आवाज़ आई। शायद पानी का जग गिर गया था। मीरा दौड़कर गई।
उसने देखा कि विश्वनाथ जी व्हीलचेयर से झुककर पानी लेने की कोशिश कर रहे थे और जग गिर गया था। वे अब फर्श पर गिरे हुए थे और कांप रहे थे।
मीरा उन्हें उठाने के लिए आगे बढ़ी ही थी कि गायत्री देवी वहां आ गईं। उनके चेहरे पर न घबराहट थी, न चिंता। उन्होंने मीरा को रोका और बड़ी सहजता से, बिना किसी हड़बड़ाहट के, अकेले ही अपनी ताकत से विश्वनाथ जी को उठाया और वापस व्हीलचेयर पर बैठा दिया।
फिर उन्होंने फर्श साफ किया, दूसरा जग रखा और कमरे से बाहर जाने लगीं।
विश्वनाथ जी ने अपनी कांपती उंगलियों से गायत्री देवी का पल्लू पकड़ने की कोशिश की और एक अस्पष्ट सी आवाज़ निकाली— "ग... गा... य... त्रि..."
गायत्री देवी रुकीं। उन्होंने मुड़कर देखा नहीं। बस धीरे से अपना पल्लू छुड़ाया और बाहर निकल गईं।
मीरा सन्न रह गई। उसे लगा यह क्रूरता है। एक पत्नी अपने लाचार पति के साथ इतना पत्थर दिल कैसे हो सकती है?
उस रात मीरा से रहा नहीं गया। जब अर्णव आया, तो उसने दबी जुबान में पूछा, "अर्णव, माँ जी पापा जी से नाराज़ हैं क्या? वो उनकी सेवा तो करती हैं, पर उनसे कोई लगाव नहीं दिखता। पापा जी की आँखों में देख कर मुझे रोना आता है।"
अर्णव ने अपनी शर्ट उतारते हुए गहरी सांस ली। "मीरा, यह कहानी बहुत पुरानी है। मैंने जब से होश संभाला है, माँ को ऐसे ही देखा है। हम इस बारे में बात नहीं करते। तुम भी मत करना।"
लेकिन मीरा का मन नहीं माना। उसे गायत्री देवी में एक ममतामयी माँ दिखती थी, तो फिर एक पत्नी के रूप में इतनी निष्ठुरता क्यों?
दो दिन बाद की बात है। विश्वनाथ जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी। डॉक्टर को घर पर बुलाया गया। डॉक्टर ने चेकअप के बाद कहा कि स्थिति गंभीर नहीं है, लेकिन उन्हें भावनात्मक सहयोग की ज़रूरत है। "दवा से ज़्यादा इन्हें अपनेपन की ज़रूरत है," डॉक्टर ने जाते-जाते कहा।
उस पूरी रात, मीरा ने देखा कि गायत्री देवी विश्वनाथ जी के कमरे में कुर्सी डालकर बैठी रहीं। वे सोई नहीं। वे हर पल उनकी सांसों की गति चेक करती रहीं। लेकिन फिर भी... उन्होंने विश्वनाथ जी का हाथ नहीं थामा।
अगले दिन जब स्थिति सामान्य हुई, तो मीरा रसोई में गायत्री देवी के पास गई।
"माँ जी," मीरा ने झिझकते हुए कहा, "आप पापा जी की इतनी परवाह करती हैं, रात भर जागीं... फिर भी आप उनसे बात क्यों नहीं करतीं? वो तरसते हैं आपकी आवाज़ सुनने के लिए।"
गायत्री देवी ने सब्जी काटना रोक दिया। उन्होंने चाकू रखा और मीरा की ओर देखा। उनकी आँखों में एक ऐसा समुद्र था जो बरसों से तूफ़ान को अपने अंदर समेटे हुए था।
"आज रात मेरे कमरे में आना," गायत्री देवी ने बस इतना कहा।
रात को जब घर शांत हो गया, मीरा सास के कमरे में गई। गायत्री देवी अपनी अलमारी के पास खड़ी थीं। उन्होंने एक पुराना, धूल जमा हुआ लकड़ी का बॉक्स निकाला।
"बैठो मीरा," उन्होंने कहा।
मीरा बिस्तर के किनारे बैठ गई। गायत्री देवी ने वह बॉक्स खोला। उसमें कोई गहने नहीं थे, बल्कि फटे हुए कागज़ के टुकड़े और एक टूटी हुई कलम थी।
"मीरा," गायत्री देवी ने खिड़की की ओर देखते हुए बोलना शुरू किया, "तुम्हें लगता है मैं पत्थर दिल हूँ? तुम्हें लगता है कि मैं एक बीमार आदमी को सज़ा दे रही हूँ?"
"नहीं माँ जी, पर..."
"सज़ा तो मैं दे रही हूँ," गायत्री देवी ने काटा, "लेकिन यह सज़ा 'बीमारी' की नहीं है। यह सज़ा 'मौन' की है।"
मीरा चुप रही।
"तीस साल पहले की बात है," गायत्री देवी की आवाज़ में एक अजीब सी लर्ज़िश आ गई। "विश्वनाथ जी तब शहर के मेयर बनने की दौड़ में थे। उनकी छवि एक आदर्शवादी पुरुष की थी। मैं एक कॉलेज में प्रोफेसर थी और साथ ही स्थानीय अखबारों में सामाजिक मुद्दों पर लेख लिखती थी।"
गायत्री देवी ने बॉक्स से एक फटा हुआ अखबार का टुकड़ा उठाया।
"उस साल शहर में एक बड़ा घोटाला हुआ था। एक रसूखदार बिल्डर ने गरीबों की ज़मीन हड़प ली थी। इत्तेफाक से वह बिल्डर विश्वनाथ जी के चुनाव प्रचार का मुख्य फंडर (sponsor) था। मुझे जब सबूत मिले, तो मैंने एक आर्टिकल लिखा। वह आर्टिकल छपने से पहले ही बवाल मच गया।"
गायत्री देवी की मुट्ठियाँ भिंच गईं। "एक शाम, वह बिल्डर और उसके गुंडे हमारे घर आए। ड्राइंग रूम में विश्वनाथ जी बैठे थे। उन लोगों ने मेरे चरित्र पर उंगली उठाई। उन्होंने कहा कि मैं ब्लैकमेलर हूँ, कि मेरे संबंध दूसरे मर्दों से हैं, और मैं यह सब पैसे ऐंठने के लिए कर रही हूँ। उन्होंने विश्वनाथ जी के सामने मुझे वेश्या तक कहा।"
मीरा के रोंगटे खड़े हो गए। "फिर? पापा जी ने क्या किया?"
गायत्री देवी की आँखों से एक आंसू लुढ़क कर गाल पर आ गया। वह हंसीं, एक सूखी और वीरान हंसी।
"यही तो बात है मीरा। उन्होंने 'कुछ नहीं' किया। वे वहां बैठे रहे, सिर झुकाए। उन्हें अपना चुनाव, अपनी कुर्सी और अपना फंडर प्यारा था। उनकी पत्नी की इज़्ज़त सरेआम नीलाम हो रही थी, उन गुंडों ने मेरे लिखे कागज़ात फाड़कर मेरे मुंह पर फेंके, मेरी कलम तोड़ दी... और मेरा पति, जिसे मैं अपना रक्षक मानती थी, वह 'मौन' रहा।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा इतना भारी था कि मीरा को अपना दम घुटता महसूस हुआ।
"उस रात," गायत्री देवी ने आगे कहा, "जब वे लोग चले गए, तो विश्वनाथ जी मेरे पास आए। उन्होंने कहा—'गायत्री, राजनीति में यह सब सहना पड़ता है। तुम चुप रहो, इलेक्शन के बाद देख लेंगे।' बस उसी पल... उसी एक पल में मेरे अंदर की 'पत्नी' मर गई।"
गायत्री देवी ने मीरा की आँखों में देखा। "मैंने उनसे कहा था—'विश्वनाथ, आज आपने अपनी कुर्सी बचाने के लिए मेरी आबरू को गूंगा कर दिया। ठीक है। मैं आज से चुप रहूँगी। मैं इस घर की बहू होने का फर्ज निभाऊंगी, बच्चों की माँ बनूँगी, आपकी सेवा करूँगी क्योंकि वह मेरे संस्कार हैं... लेकिन मैं आपकी पत्नी कभी नहीं रहूँगी। आज के बाद आप मेरी आवाज़ सुनने के लिए तरस जाएंगे।'"
मीरा की आँखों में आंसू थे। उसे अब समझ आ रहा था कि वह चुप्पी अहंकार की नहीं, बल्कि एक टूटे हुए स्वाभिमान की थी।
"तीस साल हो गए मीरा," गायत्री देवी ने आंसू पोंछे। "मैंने अपना वादा निभाया। मैंने इनका घर संभाला, इनका करियर संभाला, अर्णव को बड़ा किया। जब ये बीमार पड़े, तो दुनिया ने कहा छोड़ दो, पर मैंने सेवा की। क्योंकि सेवा मेरा धर्म है। लेकिन प्रेम? प्रेम तो उसी रात उस ड्राइंग रूम में उन फटे कागज़ों के साथ जल गया था।"
"लेकिन माँ जी," मीरा ने धीरे से कहा, "अब तो पापा जी की यह हालत है। वो बोल भी नहीं सकते। क्या अब भी माफ़ी की कोई गुंजाइश नहीं?"
गायत्री देवी उठीं और बॉक्स बंद कर दिया।
"माफ़ी गलती की होती है मीरा, गुनाह की नहीं। और सबसे बड़ा गुनाह वह होता है जब एक मर्द अपनी ताकत का इस्तेमाल करने के बजाय कायरता की चादर ओढ़ ले, और उसकी कीमत उसकी औरत को चुकानी पड़े। आज वो व्हीलचेयर पर हैं तो तुम्हें दया आ रही है। लेकिन जब मैं भरी सभा में अकेली खड़ी थी, तब मेरी रूह भी तो अपाहिज हो गई थी? उसे किसने देखा?"
गायत्री देवी ने मीरा के कंधे पर हाथ रखा।
"जाओ सो जाओ। और याद रखना, औरत सब कुछ सह सकती है—गरीबी, दुख, बीमारी। लेकिन वह यह कभी नहीं भूलती कि जब उसे अपने आदमी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब वह आदमी कहाँ खड़ा था। विश्वनाथ जी का यह हाल कुदरत का न्याय है। उनकी जुबान ने तब साथ नहीं दिया था जब ज़रूरत थी, आज कुदरत ने उनसे उनकी जुबान हमेशा के लिए ले ली।"
मीरा भारी कदमों से अपने कमरे की ओर लौटी। रास्ते में उसने विश्वनाथ जी के कमरे में झांका। वे जाग रहे थे, छत को घूर रहे थे। अब मीरा को उनकी आँखों में सिर्फ लाचारी नहीं, बल्कि एक गहरा 'पछतावा' दिखाई दे रहा था।
उसने समझ लिया था कि इस घर की शांति असल में शांति नहीं, बल्कि एक युद्धविराम (ceasefire) थी। एक ऐसा युद्ध जो बिना हथियारों के लड़ा गया और जिसमें दोनों पक्ष हार गए। पति ने अपनी पत्नी खो दी, और पत्नी ने अपनी आत्मा।
मीरा ने अपने कमरे में जाकर अर्णव का हाथ कसकर थाम लिया। अर्णव नींद में बड़बड़ाया। मीरा ने मन ही मन प्रार्थना की—"हे ईश्वर, हमें कभी ऐसी परीक्षा में मत डालना जहाँ शब्दों की कीमत रिश्तों से ज़्यादा हो जाए।"
बाहर रात गहरी थी, और शांति-कुंज में पसरा वह सन्नाटा अब मीरा को डरावना नहीं, बल्कि एक सबक लग रहा था—कि कभी-कभी 'कुछ न कहना' ही सब कुछ खत्म कर देता है। मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश
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