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क्या मैं सच में पिता हूँ

 सुबह की पहली किरण खिड़की के पर्दे के किनारे से फिसलकर कमरे में आई तो तेरह साल का कबीर चौंककर उठ बैठा। आज फादर्स डे था। पिछली रात वह देर तक जागा था—कभी कागज़ पर रंग फैलाता, कभी शब्दों को काटकर फिर से लिखता। उसके हाथों में गोंद लगा हुआ था और आंखों में नींद कम, उत्साह ज्यादा।

उसने अपने बनाए कार्ड को तकिए के नीचे से निकाला। ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था—“हैप्पी फादर्स डे” और नीचे एक छोटा-सा घर, जिसमें एक पेड़ बना था। पेड़ की जड़ें बहुत गहरी थीं, और उसकी शाखाओं पर छोटे-छोटे दिल लटक रहे थे। कबीर ने जानबूझकर पेड़ की जड़ें ज्यादा गहरी बनाई थीं—जैसे किसी के सहारे घर टिकता है, वैसे ही।

वह उछलता हुआ बाहर निकला। पहले उसने मां को खोजा। घर में सुबह का सन्नाटा था, पर रसोई से चाकू के चलने की टक-टक आवाज़ आ रही थी। वह चुपचाप रसोई के दरवाजे पर रुका। सामने मां—स्नेहा—आम काट रही थी। पास ही एक बड़ा-सा मर्तबान रखा था, लाल मिर्च और मसालों की गंध कमरे में तैर रही थी। स्नेहा की आंखें हल्की सूजी थीं, जैसे रात देर तक जागी हो। पर उसके हाथों में कोई थकान नहीं थी। वे बड़ी निपुणता से आम काट रही थी, जैसे हर टुकड़े के साथ अपनी चिंता भी बारीक करके किसी डिब्बे में बंद कर रही हो।

कबीर पीछे से जाकर मां को बाहों में भरते हुए बोला, “मम्मा… आप कितनी बहादुर हो। आप एक औरत होकर भी पूरा घर संभाल रही हो। पापा तो… बस…”

उसकी आवाज़ अनायास धीमी हो गई। शब्द वहीं अटक गए। “बस” के बाद जो सच था, वो कहने में उसके गले में गांठ पड़ जाती थी।

स्नेहा ने हाथ रोक दिए। वह पलटी, कबीर का माथा चूमा और थोड़ी देर उसे यूं ही देखती रही, जैसे आंखों के सामने उसके चेहरे पर कुछ पढ़ रही हो। उसकी पलकें भीग गईं—पर उसने मुस्कान को मजबूती से पकड़ लिया।

“बेटा,” उसने प्यार से कहा, “आज फादर्स डे है। आज पापा के लिए कुछ अच्छा करो। तुम्हारा कार्ड?”

कबीर के हाथ अपने आप पीछे चले गए, जैसे वह कार्ड छिपा रहा हो। “हां… बनाया है,” उसने हकलाकर कहा, “पर… पहले मैं चाय बना दूं। आप अपना अचार का काम कर लो।”

स्नेहा कुछ कहने ही वाली थी कि कबीर तेजी से गैस के पास पहुंच गया। उसने दूध चढ़ाया। चाय की पत्ती, अदरक, इलायची… सबकुछ उसने बड़े ध्यान से डाला। जैसे आज उसे सिर्फ चाय नहीं बनानी थी, उसे अपनी उलझन को भी किसी सही ताप पर उबालकर ठीक करना था।

रोटी का डिब्बा खोलकर उसने ब्रेड निकाली। कढ़ाई में मक्खन डाला। ब्रेड सेंकते हुए उसने एक पल के लिए आंगन की ओर देखा। मां अब आम काटते-काटते किसी पुरानी याद में खो गई थी।

आंगन के दूसरे छोर पर कमरे का दरवाज़ा बंद था। भीतर उसके पिता—अमर—अभी भी पड़े रहते थे। कभी-कभी कबीर दरवाज़े के पास से गुजरता तो हल्की शराब की गंध उसकी नाक में चुभ जाती। घर में वह गंध धीरे-धीरे दीवारों में बस चुकी थी, जैसे दुख अपनी आदत बना लेता है।

अमर… कभी घर की शान था। कॉलेज में वह बहुत तेज था, नौकरी लगी तो मोहल्ले भर में मिठाई बंटी थी। कबीर को याद था—जब वह छोटा था, पिता उसे कंधों पर बैठाकर मेला घुमाते थे। उसे गुब्बारे दिलाते, कभी हाथ पकड़कर सड़क पार कराते और कहते, “देख बेटा, आदमी का सबसे बड़ा धन उसकी इज्जत होती है।”

फिर कबीर बड़ा होने लगा, और पिता छोटे होने लगे—मन से, हिम्मत से, आत्मविश्वास से। नौकरी छूट गई। पहले बहाने बने—“ऑफिस की राजनीति,” “बॉस का दुश्मन,” “किस्मत खराब है।” फिर बहानों के साथ चुप्पी जुड़ गई। और चुप्पी के साथ बोतल।

स्नेहा ने बहुत कोशिश की थी। कभी समझाया, कभी रोई, कभी गुस्सा किया। उसने रिश्तेदारों से मदद मांगी, दोस्त बुलाए। कुछ महीनों तक अमर ने वादा किया, फिर टूट गया। एक दिन उसने स्नेहा की आंखों में ऐसा खालीपन देखा कि उसे लगा—अब यह औरत टूटेगी नहीं, बस भीतर-भीतर पत्थर बन जाएगी।

और सच यही हुआ। स्नेहा ने उस दिन अपनी साड़ी का पल्लू कमर में कस लिया। उसने मां की पुरानी रेसिपी वाले अचार-मुरब्बे फिर से शुरू किए। पहले छोटी-सी बिक्री हुई, फिर लोगों को स्वाद पसंद आया, फिर ऑर्डर बढ़ने लगे। स्नेहा ने घर को दुकान बना लिया—घर के दुख के बीच एक मेहनत की खुशबू पैदा कर ली।

कबीर भी उसके साथ लग गया। स्कूल के बाद वह बोतलें धोता, लेबल चिपकाता, पैकेट बांधता। उसे अब समझ आने लगा था—प्यार सिर्फ बातें नहीं होता, प्यार बंधे हुए बालों, थकी हुई उंगलियों, और समय पर भरी गई फीस के रसीदों में भी होता है।

चाय बनकर तैयार हुई। कबीर ने ट्रे में दो कप रखे, साथ में प्लेट में सैंडविच। फिर कमरे में जाकर कार्ड उठाया। कार्ड देखते हुए उसका मन फिर डगमगा गया।

“फादर्स डे… किसका?” उसके भीतर कोई सवाल उठता। “उसका, जो दरवाज़े के पीछे पड़ा है? या उसका, जिसने यह घर बचाया?”

वह ट्रे लेकर आंगन में मां के पास आया। ट्रे उसने धीरे से वहीं रख दी। फिर कार्ड निकालकर मां के सामने रखा।

स्नेहा के चेहरे पर एक पल के लिए असली खुशी चमकी। उसने कार्ड को हाथ में लिया, उंगलियों से उसके किनारों को छुआ, जैसे कबीर की मेहनत को सहला रही हो।

“बहुत सुंदर बनाया है,” वह बोली, “अब जाओ… पापा को बुला लाओ। उन्हीं को अपने हाथ से चाय देना। उन्हें अच्छा लगेगा। शायद… तुम्हारे लिए… कुछ बदल जाए।”

“मम्मा…” कबीर की आवाज़ कांप गई।

“बेटा, यही तो रिश्तों की बात है,” स्नेहा ने प्यार से कहा, “हम लोग चाहे जितना नाराज़ हों, पर एक मौका फिर भी दे देते हैं। जाओ।”

कबीर उठ तो गया, पर उसका पैर जैसे जमीन से चिपक गया। वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा, फिर रुक गया। उसके भीतर इतना गुबार था कि फट पड़ने का डर था।

“मम्मा,” वह फुसफुसाया, “अगर मैं… मैं पापा को कार्ड दूं… और वो… फिर वही… तो?”

स्नेहा ने उसके सिर पर हाथ रखा। “तुम अपना काम करो बेटा। बाकी… भगवान देखेंगे।”

कबीर ने गहरी सांस ली। फिर उसने अचानक कार्ड मां के हाथ में ही थमा दिया और उसी क्षण सैंडविच का एक टुकड़ा उठाकर मां के मुंह में डाल दिया।

स्नेहा चौंकी, “अरे… ये क्या कर रहा है?”

कबीर की आंखों में पानी भर आया। उसने आवाज़ दबाकर कहा, “हैप्पी फादर्स डे… मम्मा।”

स्नेहा का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। उसके होंठ कांप गए। वह कुछ कह नहीं पाई। सिर्फ उसके हाथ कबीर के सिर पर टिक गए—जैसे आशीर्वाद भी रो पड़े हों।

उसी समय कमरे के दरवाज़े की ओट में कोई खड़ा था। अमर। नशे से लाल आंखें, बिखरे बाल, और चेहरे पर वो शर्म जो शब्दों में नहीं उतरती। उसने सब सुन लिया था।

“हैप्पी फादर्स डे… मम्मा…”

एक बेटे के मुंह से निकला वह वाक्य अमर के सीने में किसी हथौड़े की तरह लगा। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी सारी झूठी ढालें तोड़कर सच्चाई उसके सामने रख दी हो।

वह वहीं खड़ा नहीं रह सका। उसके हाथ कांपने लगे। उसने धीरे से पीछे हटकर कमरे में कदम रखा। भीतर वही पुरानी अलमारी, वही बिस्तर, वही चादर—जिस पर पड़े-पड़े वह खुद को मर्द समझता था, और असल में धीरे-धीरे खत्म हो रहा था।

अमर ने पहली बार अपने आप से सवाल किया—“क्या मैं सचमुच पिता हूं?”
उसने कबीर के स्कूल फॉर्म नहीं भरे, उसकी फीस नहीं दी, उसे कभी डॉक्टर नहीं ले गया। उसे बस “बेटा” कहकर एक अधिकार का भ्रम पाल लिया था।

उसने याद किया—कल रात कबीर ने खाना खाया या नहीं, उसने पूछा भी नहीं।
उसने याद किया—स्नेहा के हाथों में छाले हुए थे, उसने देखा भी नहीं।

बाहर आंगन में स्नेहा की चुप्पी टूट रही थी। वह अपने आंसू पोंछते हुए कबीर से कह रही थी, “बेटा… तुमने मुझे…”

कबीर ने मां का हाथ पकड़ लिया, “मम्मा, मैं गलत नहीं कह रहा। आप ही… आप ही तो…”

अमर को लगा, उसका घर उसके सामने खड़ा है—उजड़ता हुआ, पर फिर भी किसी एक स्त्री के दम पर सांस लेता हुआ।

उसने बाथरूम की तरफ कदम बढ़ाए। नल खोला। ठंडा पानी चेहरा धोने लगा। वह आईने में खुद को देख रहा था—और पहली बार उसे अपने चेहरे पर घृणा आई।

उसने अलमारी खोली। तलाक के कागज़ नहीं थे, घर छोड़ने की धमकी नहीं थी—बस अपनी पुरानी फाइलें थीं। उसने उनमें से एक कागज़ निकाला—पुरानी नौकरी का अनुभव पत्र। उसने उस पर हाथ फेरा।

“मैं कभी ऐसा था…”
और फिर वही आवाज भीतर से आई—“तो फिर अब क्यों नहीं?”

उसने फोन उठाया। हाथ कांप रहे थे। उसने एक नंबर डायल किया—अपने पुराने दोस्त का, जो कभी उसे काम के लिए कहता था और वह हर बार टाल देता था।

“हलो… समर… मैं अमर बोल रहा हूं,” अमर ने टूटे स्वर में कहा। “मुझे… मदद चाहिए। मुझे… काम चाहिए। और… मुझे… इलाज चाहिए। मैं… मैं ठीक होना चाहता हूं।”

दूसरी तरफ कुछ पल चुप्पी रही, फिर दोस्त की आवाज़ आई, “अमर… तू सच में?”

अमर ने आंखें बंद कर लीं। “हाँ। आज… मेरे बेटे ने… मेरे सामने आईना रख दिया।”

उसने फोन रख दिया। फिर धीरे से कमरे से बाहर निकला।

आंगन में स्नेहा और कबीर बैठे थे। ट्रे पर चाय ठंडी हो रही थी। आम के टुकड़ों पर मसाला पड़ा था, पर किसी का ध्यान वहाँ नहीं था।

अमर ने हिचकते हुए कहा, “स्नेहा…”

स्नेहा ने पलटकर देखा। उसकी आंखों में दर्द था, पर भीतर कहीं उम्मीद की एक झलक भी थी—जो वह खुद भी नहीं स्वीकारती थी।

कबीर चौंका। उसने पिता को ऐसे खड़े देखा जैसे कोई अपराधी खुद सज़ा मांगने आया हो।

अमर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसके कदम भारी थे। उसने ट्रे से कप उठाया और कांपते हाथों से स्नेहा के सामने रख दिया।

“मैं… मैं आज… कोई कार्ड नहीं मांगने आया,” अमर ने कहा। “मैं… बस… माफी मांगने आया हूं। कबीर… बेटा… तुमने आज… मुझे… जगा दिया।”

कबीर की आंखें फैल गईं। उसके भीतर गुस्सा भी था, डर भी, और कहीं एक बचा-खुचा प्यार भी।

अमर ने नजरें झुका लीं। “मैं पिता नहीं बन पाया… पर अगर तुम दोनों… एक मौका…”

स्नेहा की आंखों से आंसू बह निकले। उसने कप उठाया नहीं, लेकिन उसकी उंगलियां कप के पास जा रुकीं, जैसे वह सोच रही हो—क्या यह गर्मी भरोसे की है या फिर धोखे की?

कबीर ने धीरे से कार्ड उठाया। उसके हाथ कांप रहे थे। वह कुछ क्षण देखता रहा—“हैप्पी फादर्स डे।”

फिर उसने कार्ड पलटा और अंदर लिखा एक वाक्य पढ़ा—“पापा, मुझे फिर से वो वाले आप चाहिए, जो मुझे कंधे पर बैठाते थे।”

कबीर ने कार्ड पिता की तरफ बढ़ाया। यह कोई उत्सव का उपहार नहीं था, एक शर्त थी, एक उम्मीद थी।

अमर ने कांपते हाथों से कार्ड लिया। उसकी आंखों से पहली बार सच के आंसू निकले—वे आंसू जो शराब से नहीं, शर्म से जन्म लेते हैं।

“मैं… कोशिश करूंगा,” उसने कहा। “मैं वादा नहीं… कोशिश।”

स्नेहा ने धीरे से कहा, “कोशिश ही शुरुआत है।”

उस दिन घर में कोई बड़ा जश्न नहीं हुआ। न मिठाई बंटी, न फोटो खिंची। पर आंगन में ठंडी पड़ चुकी चाय के साथ, तीन लोगों के बीच एक नया समझौता हुआ—कि टूटे रिश्तों को भी जोड़ने के लिए एक धागा चाहिए, और वह धागा अक्सर बच्चों के मासूम सच से बनता है।

फादर्स डे उस घर में उस दिन “पिता” का उत्सव नहीं था। वह दिन “जिम्मेदारी” का था—और उस जिम्मेदारी का पहला पाठ एक बेटे ने अपनी मां को “हैप्पी फादर्स डे” कहकर पढ़ा दिया था।

मूल लेखिका 

नीरजा कृष्ण 


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