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अभिमान

 मीरा ने हाथ में पकड़ी तारपीन के तेल की शीशी को एक तरफ रखा और मेज के कोने पर रखी पानी की बोतल उठा कर आर्यन की तरफ बढ़ा दी। आर्यन ने बोतल थाम ली, लेकिन उसी हड़बड़ाहट में उसकी उंगलियां मीरा की कलाई से हल्का सा रगड़ खा गईं। मीरा ने अपनी आँखों में कोई भाव नहीं आने दिया, जैसे वह स्पर्श हुआ ही न हो, और वापस अपने कैनवास की ओर मुड़ गई।

आर्यन ने पास रखे कांच के गिलास में पानी उंडेला और एक ही सांस में आधा गिलास खाली कर गया। गिलास को मेज पर रखते हुए उसने अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ कहा, ‘‘दादी कहती थीं कि पानी हमेशा गिलास से पीना चाहिए, सीधे बोतल से पीने पर प्यास तो बुझती है, पर तसल्ली नहीं मिलती।’’

मीरा के मन में आया कि कह दे—‘तुम्हारी दादी यह नहीं कहती थीं कि किसी के काम के वक्त बिना बुलाए उसके स्टूडियो में घुस आना बदतमीजी होती है?’ लेकिन उसने अपने होठों को कसकर भींच लिया। वह जानती थी कि आर्यन नादान है, अभी आर्ट कॉलेज के फाइनल ईयर में है और उसे दुनियादारी की समझ कम है। लेकिन मीरा की चिंता आर्यन की नादानी नहीं थी, उसकी चिंता यह थी कि किसी भी वक्त मिस्टर खन्ना वहां आ सकते थे।

मिस्टर खन्ना, शहर के सबसे बड़े आर्ट कलेक्टर और मीरा के सबसे बड़े क्लाइंट। वे अपने उसूलों के पक्के थे और उन्हें अपने काम में किसी तीसरे की दखलअंदाजी बिल्कुल पसंद नहीं थी। मीरा ने उन्हें वादा किया था कि यह पेंटिंग आज शाम तक पूरी तरह से रिस्टोर (पुनर्स्थापित) हो जाएगी। और आर्यन पिछले एक घंटे से यहाँ बैठकर सिर्फ उसका समय बर्बाद कर रहा था।

कॉफी का मग उठाते हुए आर्यन ने फिर से बातचीत का सिरा पकड़ने की कोशिश की। ‘‘मैम, आपने उस ब्लू स्ट्रोक को इतना गहरा क्यों रखा? मतलब, ओल्ड मास्टर्स तो हल्का रंग इस्तेमाल करते थे न?’’

मीरा ने ब्रश को कपड़े से पोंछते हुए रूखा सा जवाब दिया, ‘‘हर आर्टिस्ट ओल्ड मास्टर नहीं होता, आर्यन। और हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता।’’

उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ में सख्ती रखी थी ताकि आर्यन को इशारा मिल जाए कि वह अब और बात नहीं करना चाहती। मीरा ने पास रखे कुछ पुराने स्केच उठा लिए और उन्हें बहुत ध्यान से देखने का नाटक करने लगी, मानो उनमें कोई गहरा राज छिपा हो। उसका मकसद सिर्फ आर्यन को इग्नोर करना था ताकि वह बोर होकर खुद चला जाए।

मीरा को यूँ अपने काम में इतना व्यस्त और खुद से कटा हुआ देखकर आर्यन ने आखिरकार अपनी बैग उठाई। सोफे से उठते हुए उसने कहा, ‘‘तो फिर मैं चलता हूँ मैम। लगता है आप बहुत बिजी हैं।’’

‘‘हाँ-हाँ, ठीक है। तुम्हें अपने फाइनल प्रोजेक्ट की तैयारी भी तो करनी होगी,’’ मीरा ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, लेकिन उसके मन में एक ही बात चल रही थी—‘जाओ, बस जल्दी जाओ।’

वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि आर्यन के निकलने और मिस्टर खन्ना के आने के बीच कम से कम दस मिनट का फासला हो। अगर खन्ना ने यहाँ किसी कॉलेज के लड़के को देख लिया, तो वे सौ सवाल करेंगे—यह कौन है? क्या इसे पेंटिंग के बारे में पता है? क्या यह जासूसी करने आया है? उनकी शक्की मिजाज से मीरा भली-भांति परिचित थी।

आर्यन दरवाजे तक पहुँचा ही था कि बाहर तेज गड़गड़ाहट हुई और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। मीरा का दिल बैठ गया। उसने खिड़की की ओर देखा। बाहर ऐसा लग रहा था जैसे आसमान फट पड़ा हो।

‘‘अरे बाप रे!’’ आर्यन दरवाजे से वापस मुड़ते हुए बोला, ‘‘मैम, बाहर तो तूफान आ गया है। मेरी बाइक तो इसमें बह जाएगी। क्या मैं थोड़ी देर और रुक सकता हूँ? जब तक बारिश थोड़ी कम न हो जाए?’’

मीरा के पास ना कहने का कोई विकल्प नहीं था। इंसानियत के नाते वह उसे इस तूफान में बाहर नहीं धकेल सकती थी। उसने बेमन से सिर हिलाया, ‘‘ठीक है, लेकिन चुपचाप बैठना। मुझे एकाग्रता चाहिए।’’

आर्यन वापस सोफे पर बैठ गया। मीरा ने एक गहरी सांस ली और दोबारा पेंटिंग पर झुक गई। यह एक सदी पुरानी पेंटिंग थी, जिसे बहुत बारीकी से साफ किया जा रहा था। कमरे में सिर्फ बारिश के शोर और ब्रश के चलने की आवाज़ थी।

तकरीबन पंद्रह मिनट गुजरे होंगे कि आर्यन अचानक उठा और पेंटिंग के बिल्कुल करीब आ गया। मीरा खीझ कर उसे डांटने ही वाली थी कि आर्यन ने एक अजीब बात कही।

‘‘मैम, यह सिग्नेचर (हस्ताक्षर)... यह असली नहीं लग रहा।’’

मीरा का हाथ हवा में ही थम गया। उसने पलटकर आर्यन को देखा। ‘‘तुम्हें क्या पता असली और नकली के बारे में? तुम अभी सीख रहे हो।’’

‘‘नहीं मैम,’’ आर्यन की आवाज़ में अब वो बचपना नहीं था, एक अजीब सी गंभीरता थी। ‘‘यह पेंटिंग 'अविनाश रॉय' की बताई जा रही है, है न?’’

‘‘हाँ, तो?’’ मीरा ने अपनी धड़कनें काबू में करते हुए पूछा। मिस्टर खन्ना ने उसे यही बताया था कि यह अविनाश रॉय की एक दुर्लभ कृति है और इसे गुप्त रूप से नीलाम किया जाना है।

‘‘अविनाश रॉय मेरे परदादा थे,’’ आर्यन ने धीरे से कहा।

मीरा के हाथ से ब्रश छूटकर नीचे गिर गया। कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया, बाहर की बारिश का शोर भी जैसे थम गया।

‘‘क्या बकवास कर रहे हो?’’ मीरा ने अविश्वास से पूछा।

‘‘सच कह रहा हूँ मैम। बचपन से उनकी डायरियां, उनके स्केच और उनकी पेंटिंग्स देखते हुए बड़ा हुआ हूँ। दादाजी बताते थे कि परदादा अपने हर सिग्नेचर में 'R' अक्षर के नीचे एक बहुत बारीक सा डॉट (बिंदु) लगाते थे, जो नंगी आँखों से नहीं दिखता, पर मैग्नीफाइंग ग्लास से दिखता है। और वो कभी भी नीला रंग इस्तेमाल नहीं करते थे, उन्हें नीले रंग से नफरत थी क्योंकि उनकी पत्नी, मेरी परदादी की मौत नीला जहर पीने से हुई थी। उनकी हर पेंटिंग में उदासी होती थी, पर नीला रंग कभी नहीं।’’

मीरा सन्न रह गई। वह जिस 'ब्लू स्ट्रोक' को गहरा कर रही थी, और जिस पर आर्यन ने पहले सवाल उठाया था, वह अब उसे चीख-चीख कर गवाही दे रहा था। मीरा ने तुरंत अपना मैग्नीफाइंग ग्लास उठाया और सिग्नेचर को देखा। वहां कोई डॉट नहीं था।

उसका दिमाग चकरा गया। मिस्टर खन्ना उसे एक नकली पेंटिंग रिस्टोर करवा रहे थे? और वो भी इतनी गोपनीयता के साथ? इसका मतलब साफ़ था—वे इसे असली बताकर करोड़ों में बेचने वाले थे और अगर कल को बात खुलती, तो इल्जाम मीरा पर आता कि उसने रिस्टोरेशन के दौरान पेंटिंग के साथ छेड़छाड़ की होगी या उसने पहचान नहीं की। उसका करियर, उसकी साख, सब मिट्टी में मिल जाता।

तभी दरवाजे की घंटी बजी। मीरा का खून जम गया। यह मिस्टर खन्ना थे। समय से पहले।

मीरा ने घबराकर आर्यन की तरफ देखा। आर्यन समझ गया कि स्थिति गंभीर है।

‘‘मैम, वो आ गए?’’ आर्यन ने फुसफुसाया।

‘‘हाँ, और अगर उन्होंने तुम्हें देख लिया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी। वो नहीं चाहते कि किसी को इस पेंटिंग के बारे में पता चले। और अब तो मुझे समझ आ रहा है कि वो इतनी गोपनीयता क्यों बरत रहे थे,’’ मीरा के माथे पर पसीना था।

‘‘मैं क्या करूँ? छिप जाऊँ?’’ आर्यन ने पूछा।

‘‘नहीं, स्टूडियो में छिपने की जगह नहीं है। तुम... तुम बस एक स्टूडेंट हो। नॉर्मल रहना। कुछ मत बोलना। बस इतना दिखाना कि तुम यहाँ असाइनमेंट के लिए आए हो,’’ मीरा ने जल्दी-जल्दी उसे समझाया।

मीरा ने दरवाजा खोला। मिस्टर खन्ना अंदर दाखिल हुए। वे एक भारी-भरकम और रौबदार शख्सियत थे। उनका कोट बारिश से थोड़ा भीगा हुआ था।

‘‘मिस मीरा, काम कहाँ तक पहुँचा?’’ उन्होंने अंदर घुसते ही पूछा, और तभी उनकी नज़र कोने में खड़े आर्यन पर पड़ी। उनकी आँखें सिकुड़ गईं। ‘‘यह कौन है? मैंने कहा था न कि मुझे यहाँ कोई और नहीं चाहिए!’’

मीरा का गला सूख रहा था। ‘‘सर, यह... यह मेरा इंटर्न है। बारिश की वजह से फंस गया है। यह बस जा ही रहा था।’’

खन्ना ने आर्यन को ऊपर से नीचे तक घूरा। ‘‘इंटर्न? क्या इसने पेंटिंग देखी?’’

‘‘नहीं सर, यह दूसरे कमरे में फाइल्स जमा कर रहा था। अभी बस पानी पीने यहाँ आया,’’ मीरा ने झूठ बोला।

खन्ना ने एक राहत की सांस ली लेकिन उनका शक पूरी तरह गया नहीं था। वे पेंटिंग के पास गए और उसे गौर से देखने लगे।

‘‘बढ़िया। बहुत बढ़िया काम किया है तुमने मीरा। यह नीला रंग... बिलकुल जीवंत लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे अविनाश रॉय ने कल ही इसे रंगा हो,’’ खन्ना ने खुश होकर कहा।

आर्यन अपनी मुट्ठी भींच रहा था। उसे अपने पूर्वज की कला का यह अपमान बर्दाश्त नहीं हो रहा था। वह कुछ बोलने के लिए आगे बढ़ा। मीरा ने देख लिया। उसने अपनी आँखों से आर्यन को 'रुक जाओ' का सख्त इशारा किया।

खन्ना ने जेब से चेकबुक निकाली। ‘‘यह रहा तुम्हारा बाकी पेमेंट। और सुनो, कल सुबह यह पेंटिंग यहाँ से उठवा ली जाएगी। इसके बाद तुम भूल जाना कि तुमने कभी इस पर काम किया था। समझीं?’’

मीरा ने चेक की तरफ देखा। यह एक बहुत बड़ी रकम थी। इतनी बड़ी कि उसका स्टूडियो साल भर बिना किसी और काम के चल सकता था। लेकिन फिर उसकी नज़र आर्यन पर गई, जो अपमान और गुस्से से लाल हो रहा था। उसे आर्यन की कही बात याद आई—'दादी कहती थीं, पानी हमेशा गिलास से पीना चाहिए, तसल्ली मिलती है।'

पैसे से प्यास तो बुझ जाएगी, पर क्या तसल्ली मिलेगी? क्या वह एक कलाकार होने के नाते, एक झूठ का हिस्सा बनकर रात को चैन से सो पाएगी?

खन्ना ने चेक मेज पर रखा और जाने के लिए मुड़े।

‘‘मिस्टर खन्ना,’’ मीरा की आवाज़ गूंजी।

खन्ना रुके। ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मैं यह चेक नहीं ले सकती,’’ मीरा ने कहा।

‘‘क्यों? रकम कम है क्या?’’ खन्ना ने तेवर दिखाए।

‘‘नहीं, रकम बहुत ज्यादा है। एक नकली पेंटिंग को असली बनाने के लिए इतनी रकम बहुत ज्यादा है,’’ मीरा ने सपाट लहजे में कहा।

खन्ना का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम जानती हो तुम किससे बात कर रही हो? यह असली अविनाश रॉय है!’’

‘‘नहीं सर, यह असली नहीं है,’’ अब आर्यन बोल पड़ा। वह आगे आया और खन्ना की आँखों में आँखें डालकर बोला, ‘‘अविनाश रॉय नीला रंग इस्तेमाल नहीं करते थे। और उनके सिग्नेचर में एक गुप्त डॉट होता था। यह पेंटिंग एक बहुत अच्छी नकल है, शायद 1980 के दशक की, लेकिन यह मास्टरपीस नहीं है। और मैं यह इसलिए जानता हूँ क्योंकि मैं उनका पड़पोता हूँ।’’

खन्ना हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने आर्यन को, फिर मीरा को, और फिर पेंटिंग को देखा। उनका राज खुल चुका था।

‘‘तुम दोनों... तुम दोनों पछताओगे। इस शहर में तुम्हें कोई काम नहीं देगा,’’ खन्ना ने धमकी दी और अपना चेक वापस झपट लिया। ‘‘पेंटिंग मैं ले जा रहा हूँ। और अगर किसी ने मुंह खोला, तो अंजाम बुरा होगा।’’

खन्ना ने अपने ड्राइवर को बुलाया, पेंटिंग पैक करवाई और पैर पटकते हुए वहां से निकल गए।

दरवाजा बंद होने के बाद, स्टूडियो में फिर से वही सन्नाटा छा गया। लेकिन अब यह सन्नाटा डर का नहीं, बल्कि एक अजीब से सुकून का था।

मीरा धम्म से कुर्सी पर बैठ गई। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने अभी-अभी अपने शहर के सबसे ताकतवर इंसान से दुश्मनी मोल ली थी और लाखों का नुकसान भी किया था।

आर्यन उसके पास आया। ‘‘मैम... आई एम सॉरी। मेरी वजह से आपका नुकसान हो गया।’’

मीरा ने सिर उठाया और आर्यन को देखा। पहली बार, उसने आर्यन को एक नादान लड़के के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में देखा जिसके अंदर रीढ़ की हड्डी थी।

‘‘नुकसान नहीं हुआ आर्यन,’’ मीरा ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा। ‘‘तुमने मुझे बचा लिया। अगर आज यह पेंटिंग यहाँ से असली का ठप्पा लगाकर निकल जाती, और कल को यह बात खुलती, तो मैं जिंदगी भर अपनी नज़रें नहीं उठा पाती। तुमने मुझे मेरी ही नज़रों में गिरने से बचा लिया।’’

आर्यन मुस्कुराया। ‘‘दादी यह भी कहती थीं कि सच कड़वा होता है, पर हजम जल्दी हो जाता है। झूठ मीठा होता है, पर बाद में पेट खराब कर देता है।’’

मीरा जोर से हंस पड़ी। आज पहली बार उसे आर्यन की ये कहावतें बचकानी नहीं लगीं।

‘‘तुम्हारी दादी बहुत समझदार थीं,’’ मीरा ने कहा। उसने फिर से पानी की बोतल उठाई, लेकिन इस बार पीने से पहले उसने दो गिलास निकाले। एक आर्यन के लिए, एक अपने लिए।

‘‘बैठो, अभी बारिश रुकी नहीं है। मुझे अविनाश रॉय के बारे में और बताओ। उनकी डायरियों में क्या लिखा है?’’ मीरा ने उत्सुकता से पूछा।

आर्यन की आँखों में चमक आ गई। वह उत्साह से सोफे पर बैठ गया और अपने परदादा की कहानियाँ सुनाने लगा। मीरा सुन रही थी, इस बार सिर्फ टालने के लिए नहीं, बल्कि सीखने के लिए। उसे अहसास हुआ कि आज उसने एक क्लाइंट खोया था, लेकिन एक सच्चा शिष्य और शायद एक दोस्त पा लिया था।

बाहर बारिश अब धीमी हो चुकी थी, लेकिन स्टूडियो के अंदर, दो कलाकारों के बीच संवाद का एक नया मौसम शुरू हो चुका था। जिस 'टच' या स्पर्श से कहानी शुरू हुई थी, अब वह स्पर्श एक बौद्धिक और आत्मिक जुड़ाव में बदल गया था। मीरा को अब इस बात का डर नहीं था कि कोई उसे जज करेगा। उसने समझ लिया था कि कभी-कभी जिंदगी के सबसे बड़े सबक वे लोग दे जाते हैं, जिन्हें हम सबसे ज्यादा नादान समझते हैं।

शाम ढल रही थी, और चाय की एक और दौर की जरूरत महसूस हो रही थी। इस बार, चाय मीरा ने बनाई। बिना किसी झुंझलाहट के, पूरे मन से।

लेखिका : विभा चौबे


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