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परछाई

 सुधा के ड्राइंग रूम में आज तनाव इतना घना था कि उसे चाकू से काटा जा सकता था। सोफे के एक तरफ 26 वर्षीय नैना बैठी थी, जिसकी आँखों से आंसुओं की धार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उसके बगल में उसकी माँ, सरोज जी, गुस्से में तमतमाई हुई बैठी थीं। सामने वाले सोफे पर नैना के पति, आकाश, और उसकी सास, रेवती जी, सिर झुकाए बैठे थे।

मामला "घरेलू हिंसा" या "दहेज" जैसा गंभीर नहीं था, लेकिन रिश्तों की डोर इतनी उलझ चुकी थी कि बात अब "फैसले" तक आ पहुंची थी। सरोज जी अपनी बेटी को वापस अपने घर ले जाने की जिद पर अड़ी थीं।

माहौल को संभालने के लिए आकाश के मामाजी, पंडित रघुनंदन, को बुलाया गया था। रघुनंदन जी शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल के रिटायर्ड प्रिंसिपल थे और सुलझे हुए व्यक्ति माने जाते थे। उन्होंने अपनी चश्मे के ऊपर से पूरे कमरे का जायजा लिया।

"तो सरोज जी," रघुनंदन जी ने अपनी गंभीर आवाज़ में पूछा, "आप कह रही हैं कि नैना इस घर में खुश नहीं है? आकाश और उसका परिवार इसे परेशान करता है?"

"और नहीं तो क्या?" सरोज जी भड़क उठीं। "मेरी फूल सी बच्ची को इन्होंने नौकरानी बना रखा है। दिन भर काम, काम और काम। न इसे अपनी मर्जी से जीने देते हैं, न खाने-पीने की आज़ादी है। कल रात नैना ने मुझे रोते हुए फोन किया कि आकाश ने उस पर चिल्लाया है। बस, अब बहुत हो गया। मैं अपनी बेटी को इस नर्क में नहीं छोड़ सकती।"

आकाश कुछ बोलने को हुआ, "लेकिन मामाजी..."

रघुनंदन जी ने हाथ उठाकर उसे शांत रहने का इशारा किया। "ठहरो आकाश। मुझे पहले पूरी बात समझने दो।"

उन्होंने नैना की ओर देखा। "बेटी नैना, तुम निडर होकर बताओ। क्या आकाश तुम पर हाथ उठाता है?"

नैना ने सिसकते हुए सिर हिलाया, "नहीं मामाजी, कभी नहीं।"

"क्या तुम्हारी सास, रेवती भाभी, तुम्हें ताने मारती हैं या दहेज के लिए प्रताड़ित करती हैं?"

नैना ने अपनी सास की ओर देखा, जिनकी आँखों में इस वक्त सिर्फ़ बेबसी थी। "नहीं मामाजी, मम्मीजी (सास) तो मुझे अपनी बेटी ही मानती हैं।"

"तो क्या तुम्हें भरपेट खाना नहीं मिलता? या तुम्हें मायके जाने से रोका जाता है?"

"नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है," नैना ने धीमे स्वर में कहा।

सरोज जी ने बीच में टोकते हुए कहा, "अरे भाई साहब, आप ये कैसे सवाल पूछ रहे हैं? ज़रूरी नहीं कि मार- पिटाई हो तभी उसे 'दुख' कहा जाए। मानसिक प्रताड़ना भी तो कोई चीज़ होती है! मेरी बेटी की कोई सुनता ही नहीं है यहाँ। हर छोटी बात पर इसे टोकते हैं। इसे अपने तरीके से घर चलाने की आज़ादी ही नहीं है।"

रघुनंदन जी ने एक गहरी सांस ली। वे कुछ पल चुप रहे, जैसे गणित का कोई जटिल सवाल हल कर रहे हों। फिर उन्होंने नैना से पूछा, "नैना, कल रात आकाश ने तुम पर क्यों चिल्लाया था?"

नैना चुप रही।

आकाश ने हिम्मत जुटाई और बोला, "मामाजी, कल रविवार था। मैंने और नैना ने प्लान बनाया था कि हम शाम को फिल्म देखने जाएंगे और डिनर बाहर करेंगे। हम निकलने ही वाले थे कि नैना के फोन पर सासु माँ (सरोज जी) का वीडियो कॉल आ गया। नैना बात करने लगी। मैंने इशारा किया कि देर हो रही है, शो छूट जाएगा। लेकिन नैना बात करती रही। आधा घंटा, एक घंटा...। जब मैंने थोड़ा जोर देकर कहा कि फोन रखो, तो माँजी ने उधर से सुन लिया और नैना से कहा कि 'देख रही हो, कैसे तुम्हें मेरे से बात करने से रोक रहा है'। बस इसी बात पर बहस हुई और नैना ने जाने से मना कर दिया।"

सरोज जी तपाक से बोलीं, "तो ग़लत क्या कहा मैंने? माँ से बात करना गुनाह है क्या? मैं तो बस हाल-चाल ले रही थी। इसे बता रही थी कि गाजर का हलवा कैसे बनाना है क्योंकि आकाश को पसंद है।"

रघुनंदन जी ने हल्का मुस्कुराते हुए सरोज जी की ओर देखा।

"सरोज जी, आप बागवानी (Gardening) की बहुत शौकीन हैं, मैंने सुना है?"

सरोज जी इस अचानक बदले हुए विषय से थोड़ी हैरान हुईं, पर गर्व से बोलीं, "जी हाँ, मेरे बगीचे के गुलाब पूरे मोहल्ले में मशहूर हैं। पर इसका यहाँ क्या मतलब?"

रघुनंदन जी ने अपनी कुर्सी थोड़ी आगे खिसकाई। "बहन जी, एक बात बताइए। जब आप नर्सरी से कोई नया, नाजुक पौधा खरीदकर लाती हैं और उसे अपने बगीचे की ज़मीन में लगाती हैं, तो आप क्या करती हैं?"

सरोज जी ने उत्साह से कहा, "मैं बहुत सावधानी बरतती हूँ। उसे नई मिट्टी में लगाती हूँ, खाद-पानी देती हूँ और धूप-छांव का ध्यान रखती हूँ।"

"बिल्कुल सही," रघुनंदन जी ने कहा। "लेकिन मान लीजिये, आपने पौधा ज़मीन में लगा दिया। अब अगर आप हर आधे घंटे में उस पौधे को मिट्टी से उखाड़कर यह चेक करें कि उसकी जड़ें फैलीं या नहीं, तो क्या होगा?"

सरोज जी ने झट से कहा, "अरे, ऐसे तो पौधा मर जाएगा! जड़ें पकड़ ही नहीं पाएंगी। उसे नई मिट्टी में सेट होने के लिए छोड़ना पड़ता है, उसे थोड़ा 'शॉक' लगता है जगह बदलने का, पर अगर हम उसे बार-बार छेड़ेंगे तो वो कभी खड़ा नहीं हो पाएगा।"

"और अगर..." रघुनंदन जी ने बात आगे बढ़ाई, "आप उस पौधे को ज़मीन में लगाने के बाद भी, उसके चारों तरफ नर्सरी वाली पुरानी मिट्टी की ही परत चढ़ाए रखें और उसे नई ज़मीन की मिट्टी से दूर रखें, तो?"

"तो उसकी जड़ें फैलेंगी ही नहीं भाई साहब। जड़ों को फैलने के लिए नई ज़मीन की मिट्टी को छूना और अपनाना ज़रूरी है," सरोज जी ने एक अनुभवी माली की तरह समझाया।

रघुनंदन जी ने चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। उनकी आवाज़ अब बहुत शांत और गहरी हो गई थी।

"बस सरोज जी, यही ग़लती आप अपनी बेटी के साथ कर रही हैं। नैना वह पौधा है जिसे आप नर्सरी (मायके) से उखाड़कर इस नई ज़मीन (ससुराल) में रोपने के लिए लाई हैं। लेकिन आप इसे 'सेट' होने का मौका ही नहीं दे रहीं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। सरोज जी का मुंह खुला का खुला रह गया।

रघुनंदन जी ने नैना की ओर इशारा किया। "आप दिन में दस बार इसे फोन करती हैं। सुबह क्या बनाना है, शाम को क्या पहनना है, सास से क्या कहना है, पति को कैसे हैंडल करना है—हर चीज़ का 'रिमोट कंट्रोल' आप अपने हाथ में रखती हैं। आप हर घंटे इसकी जड़ें उखाड़कर देख रही हैं कि यह खुश है या नहीं। नतीजा यह हो रहा है कि नैना शारीरिक रूप से तो यहाँ है, लेकिन मानसिक रूप से अभी भी आपके घर में बैठी है।"

नैना ने सिर झुका लिया। उसे एहसास हो रहा था कि मामाजी सच कह रहे हैं। जब भी घर में कोई छोटा सा भी मुद्दा होता, वह उसे सुलझाने के बजाय तुरंत माँ को फोन लगा देती थी। और माँ वहां से बैठकर आग में घी डालने का काम करती थीं, अनजाने में ही सही।

रघुनंदन जी ने आकाश की ओर देखा और फिर सरोज जी से बोले, "आप कह रही थीं कि आकाश इस पर चिल्लाया। क्यों चिल्लाया? क्योंकि वह अपनी पत्नी के साथ वक्त बिताना चाहता था, आपकी बेटी के साथ नहीं। जब एक पति अपनी पत्नी के पास आता है, तो वह चाहता है कि उसकी पत्नी का पूरा ध्यान उस पर हो, न कि वह हर वक्त अपनी माँ के निर्देशों का पालन कर रही हो।"

"लेकिन मेरा फर्ज है उसे गाइड करना, वो अभी नादान है," सरोज जी ने दबी आवाज़ में बचाव किया।

"सरोज जी," रघुनंदन जी ने दृढ़ता से कहा, "गाइड करना और दखलंदाजी करना, इन दोनों में बहुत महीन फर्क होता है। जब तक आप उसे यहाँ की 'मिट्टी' (तौर-तरीकों) को छूने नहीं देंगी, उसकी जड़ें यहाँ मजबूत कैसे होंगी? अगर उसे हर छोटी बात के लिए आपकी बैसाखी की ज़रूरत पड़ेगी, तो वह कभी भी एक समझदार पत्नी और बहू नहीं बन पाएगी। आप उसे कमजोर बना रही हैं।"

उन्होंने नैना से पूछा, "नैना, सच बताना। क्या कभी ऐसा हुआ कि रेवती भाभी (सास) ने तुम्हें कुछ सिखाने की कोशिश की और तुमने यह कहकर मना कर दिया कि 'मेरी मम्मी तो ऐसे नहीं करतीं'?"

नैना की आँखें छलक आईं। उसने धीरे से 'हाँ' में सिर हिलाया। उसे याद आया कि कैसे हर बार जब सास उसे कोई डिश सिखातीं या घर सजाने की राय देतीं, तो वह तुरंत अपनी माँ के तरीके को बेहतर बताकर उन्हें चुप करा देती थी।

रघुनंदन जी ने पानी का गिलास नैना की ओर बढ़ाया।

"बेटा, शादी सिर्फ़ दो शरीरों का मिलन नहीं है, यह दो संस्कृतियों का भी मिलन है। तुम एक नए घर में आई हो। यहाँ के नियम अलग हो सकते हैं, खाने का स्वाद अलग हो सकता है। अगर तुम हर चीज़ की तुलना अपने मायके से करोगी और अपनी माँ की ही सुनोगी, तो तुम इस घर को कभी 'अपना' नहीं बना पाओगी। तुम यहाँ मेहमान बनकर रह जाओगी।"

फिर वे सरोज जी की तरफ मुड़े। "सरोज बहन, आप एक माँ हैं, आपकी चिंता जायज़ है। लेकिन यह भी तो सोचिये, कल को अगर नैना का अपना घर टूट गया, तो क्या वह आपके पास वापस आकर खुश रह पाएगी? एक माली का सबसे बड़ा सुख यह होता है कि उसका लगाया हुआ पौधा दूसरी जगह जाकर इतना विशाल वृक्ष बने कि अपनी छाया दूसरों को दे सके। उसे गमले (मायके) से निकालकर ज़मीन (ससुराल) दे दी गई है, अब उसे बढ़ने दीजिये। उसे धूप, बारिश और तूफ़ान खुद झेलने दीजिये। तभी उसकी जड़ें मजबूत होंगी।"

सरोज जी की आँखों से आंसू बहने लगे। उन्हें अपनी भूल का अहसास हो गया था। उन्हें समझ आ गया था कि उनका अत्यधिक प्रेम और सुरक्षा घेरा ही उनकी बेटी के वैवाहिक जीवन का दम घोंट रहा था। वह जिसे 'देखभाल' समझ रही थीं, असल में वह 'नियंत्रण' था।

सरोज जी उठीं और आकाश के पास गईं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "बेटा, मुझे माफ़ कर दे। मैं ममता में इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल गई कि अब नैना सिर्फ़ मेरी बेटी नहीं, तुम्हारी पत्नी भी है। मैंने अनजाने में तुम दोनों के बीच दीवार खड़ी कर दी थी।"

आकाश ने तुरंत उन्हें रोका और उनके पैर छुए। "नहीं माँजी, आप माफ़ी मत मांगिये। बस हमें थोड़ा समय और स्पेस (Space) दीजिये। हम अपनी दुनिया खुद संभाल लेंगे।"

नैना ने भी अपनी माँ को गले लगा लिया। "माँ, मामाजी सही कह रहे हैं। मुझे अब बड़ा होना होगा। मुझे अपनी गृहस्थी खुद चलानी होगी। आपकी ज़रूरत होगी तो मैं सलाह लूंगी, लेकिन हर कदम पर उंगली पकड़कर चलना अब छोड़ना होगा।"

रघुनंदन जी ने मुस्कुराते हुए अपना चश्मा पहना। "तो तय रहा? अब से नैना 'गमले का पौधा' नहीं, बल्कि 'आंगन का वृक्ष' बनेगी। और सरोज जी, आप खाद-पानी (आशीर्वाद) देंगी, लेकिन जड़ें नहीं खोदेंगी।"

कमरे का तनाव अब हंसी और आंसुओं में पिघल चुका था। रेवती जी (सास) ने आगे बढ़कर अपनी समधन को गले लगाया और कहा, "बहन जी, चिंता मत कीजिये। नैना को इस नई मिट्टी में जमाने की ज़िम्मेदारी अब मेरी है। हम मिलकर इसे सींचेंगे, लेकिन इसे बढ़ने की आज़ादी भी देंगे।"

सरोज जी जब वापस अपने घर जा रही थीं, तो उनका मन भारी ज़रूर था, लेकिन उसमें एक संतोष भी था। उन्हें समझ आ गया था कि बेटी की विदाई का मतलब सिर्फ़ उसे डोली में बैठाना नहीं होता, बल्कि उसे अपने मन से भी विदा करना होता है ताकि वह दूसरे घर में पूरी तरह बस सके।

जीवन का सार:

विवाह के बाद माता-पिता का अत्यधिक हस्तक्षेप अक्सर बेटियों के घर बसाने में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। जिस तरह पौधे को बार-बार उखाड़ने से वह पनप नहीं पाता, उसी तरह एक विवाहित स्त्री को यदि बार-बार मायके के रिमोट कंट्रोल से चलाया जाए, तो वह ससुराल में कभी अपनी जगह नहीं बना पाती। सच्चा प्रेम उसे स्वतंत्र होकर अपने नए रिश्तों को गढ़ने देने में है, न कि उसे अपनी परछाई बनाकर रखने में।

लेखिका : रश्मि प्रकाश


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