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बहन सिर्फ़ लेने नहीं आती

 सात साल... पूरे सात साल बाद अवनी बनारस की उन तंग गलियों में वापस लौटी थी। अमेरिका की चकाचौंध, बड़ी-बड़ी इमारतें और मशीनी जिंदगी से दूर, यहाँ की हवा में आज भी वही पुराना अपनापन था। लेकिन जैसे ही टैक्सी घर के पुराने लोहे वाले गेट पर रुकी, अवनी के दिल में एक अजीब सी धक-धक शुरू हो गई।

सामने बरामदे में एक शख्स बैठा था—चेहरे पर झुर्रियां, बालों में सफेदी और आंखों पर मोटा चश्मा। वह पुराने बही-खातों में सिर खपाए हुए था। अवनी की आँखों में आंसू आ गए। यह उसके बड़े भाई 'केशव' थे। वही केशव, जो कभी कॉलेज में अपने दोस्तों की जान हुआ करते थे, जिनकी हंसी से पूरा घर गूंजता था। आज पैंतीस साल की उम्र में ही वे पचास के लग रहे थे।

"भैया!" अवनी की आवाज़ में रुलाई फूट पड़ी।

केशव ने सिर उठाया। चश्मा ठीक किया और एक पल को तो पहचान ही नहीं पाए। फिर चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान आई। "अरे अवनी... तू आ गई गुड़िया?"

वह अपनी जगह से उठे, लेकिन उनकी चाल में वह पुरानी फूर्ती नहीं थी। वे थके हुए लग रहे थे। अवनी दौड़कर उनसे गले मिली। भाई के कुर्ते से वही पुरानी इत्र और मसाले की मिली-जुली गंध आ रही थी।

घर के अंदर का माहौल भी बदला हुआ था। पिताजी के गुजरने के बाद केशव ने ही सब संभाला था। पुश्तैनी मसालों की दुकान, माँ की बीमारी और अवनी की पढ़ाई। अवनी को याद आया कि कैसे केशव ने अपनी पीएचडी छोड़कर दुकान की गद्दी संभाली थी ताकि अवनी अमेरिका जाकर एमबीए कर सके।

अगले दो दिन अवनी घर के काम-काज और रिश्तेदारों से मिलने में व्यस्त रही। लेकिन उसकी नज़रें लगातार केशव का पीछा कर रही थीं। वह सुबह छह बजे उठते, दुकान जाते, दोपहर को आकर खाना खाते और फिर दुकान चले जाते। रात को देर से लौटते और थककर सो जाते। उनकी जिंदगी एक मशीन की तरह हो गई थी।

रक्षाबंधन के एक दिन पहले, अवनी घर की पुरानी स्टोर रूम की सफाई कर रही थी। वहां धूल से अटी पड़ी चीजों के बीच उसे एक पुराना, जंग लगा हुआ बक्सा मिला। अवनी ने उसे खोला। अंदर कुछ किताबें थीं और सबसे नीचे एक कैनवास (Canvas) और सूखे हुए पेंट के डिब्बे।

अवनी के हाथ कांप गए। उसे याद आया, केशव भैया सिर्फ पढ़ने में ही तेज नहीं थे, वे एक अद्भुत चित्रकार (Painter) थे। उनकी बनाई पेंटिंग्स को कॉलेज में अवॉर्ड मिलते थे। उनका सपना था कि वे पेरिस जाकर आर्ट गैलरी खोलें। लेकिन पिता की मृत्यु के बाद, उन्होंने ब्रश छोड़कर तराजू उठा लिया था।

उस शाम अवनी ने अपनी भाभी, सुमन से पूछा, "भाभी, भैया ने पेंटिंग करना कब से छोड़ दिया?"

सुमन ने उदास होकर सब्जी काटते हुए कहा, "जिस दिन तुम अमेरिका गई थी। उन्होंने कहा कि अब रंगों से पेट नहीं भरेगा, गुड़िया की फीस भरनी है। उन्होंने अपने सारे कैनवास इसी स्टोर रूम में बंद कर दिए। मैंने कई बार कहा कि रविवार को ही कुछ बना लिया करो, पर वो कहते हैं कि जिस हाथ से दिन भर हल्दी-मिर्च तौली हो, वो हाथ अब कूची (Brush) पकड़ने लायक नहीं रहे।"

अवनी को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो। उसकी सफलता, उसका अमेरिका का आलीशान घर, उसकी बड़ी गाड़ी—सब केशव भैया के उन मरे हुए सपनों की राख पर खड़ी थी।

उसने तय कर लिया। इस रक्षाबंधन वह भाई से कुछ लेगी नहीं, बल्कि उन्हें वह लौटाएगी जो उन्होंने खो दिया है।

रक्षाबंधन की सुबह आई। घर में खीर और पूड़ी की खुशबू थी। केशव ने नहा-धोकर वही पुराना कुर्ता पहना था। अवनी ने थाली सजाई। केशव के माथे पर तिलक लगाया और कलाई पर राखी बांधी।

केशव ने जेब से एक लिफाफा निकाला। "ले गुड़िया, इस बार धंधा थोड़ा मंदा था, तो ज्यादा शगुन नहीं दे पा रहा हूँ। पर तेरा भाई दिल से दुआ दे रहा है।"

अवनी ने वह लिफाफा थाम लिया, लेकिन उसे खोला नहीं। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से एक बड़ी सी फाइल निकाली और केशव के हाथ में रख दी।

"यह क्या है?" केशव ने हैरानी से पूछा। "मेरे लिए उपहार? पगली, उपहार भाई देता है, बहन नहीं।"

"खोलिए तो सही," अवनी ने आग्रह किया।

केशव ने फाइल खोली। अंदर कुछ कागजात थे। सबसे ऊपर एक ब्रोशर था जिस पर लिखा था—"द आर्ट ऑफ बनारस: सोलो एग्जीबिशन"। और उसके नीचे कलाकार का नाम लिखा था—केशव और उनकी नई शुरुआत।

केशव के हाथ कांपने लगे। "यह... यह क्या है अवनी?"

"भैया," अवनी ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, "मैंने बनारस की सबसे बड़ी आर्ट गैलरी 'कला-कुंज' को तीन महीने के लिए बुक किया है। और यह सिर्फ बुकिंग नहीं है। मैंने आपके नाम से एक ऑनलाइन आर्ट स्टूडियो भी रजिस्टर किया है। आपको अब दुकान पर बैठने की जरूरत नहीं है। मुनीम काका और मैंने मिलकर तय किया है कि दुकान अब ऑटोमेशन मोड पर चलेगी और मैं वहां एक मैनेजर नियुक्त कर रही हूँ जिसकी सैलरी मैं अमेरिका से भेजूंगी।"

केशव सन्न रह गए। "पर अवनी... मैं... मैं अब पेंटिंग नहीं कर सकता। मेरे हाथ कांपते हैं। दस साल हो गए मैंने ब्रश नहीं छुआ। तू पागल हो गई है? लोग हंसेंगे मुझ पर।"

"कोई नहीं हंसेगा भैया," अवनी ने दृढ़ता से कहा। "आप कहते थे न कि कलाकार कभी मरता नहीं, बस सो जाता है? तो अब जागने का वक्त है। दुकान की फिक्र छोड़ दीजिए। आपने मेरी जिंदगी बनाने के लिए अपनी जिंदगी की आधी उम्र उस दुकान के गल्ले पर बिता दी। अब आपकी बारी है। आपको अगले तीन महीने सिर्फ पेंटिंग करनी है। और यह मेरा हुक्म है, रक्षाबंधन का उपहार नहीं।"

केशव की आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे। सुमन भी दरवाजे पर खड़ी आँसू पोंछ रही थी। केशव ने अपने हाथों को देखा—जो वाकई सख्त हो गए थे।

"क्या मैं सच में कर पाऊंगा?" केशव ने एक बच्चे की तरह मासूमियत से पूछा।

"अगर आपने नहीं किया, तो मैं यह राखी खोल दूंगी," अवनी ने झूठी धमकी दी।

केशव ने फाइल को सीने से लगा लिया। उस दिन घर में एक अजीब सी खामोशी थी, लेकिन वह उदासी की नहीं, बल्कि एक नए जन्म की खामोशी थी।

अगले दिन से, घर का नक्शा बदलने लगा। अवनी ने स्टोर रूम खाली करवाया। वहां बड़ी-बड़ी खिड़कियां खुलवाईं ताकि रोशनी आ सके। उसने अमेरिका से लाए हुए महंगे पेंट्स और कैनवास भैया के कमरे में सजा दिए।

शुरुआत बहुत मुश्किल थी। पहले हफ्ते केशव कैनवास के सामने घंटों बैठे रहते, पर हाथ नहीं चलता था। उन्हें डर लगता था। उन्हें लगता था कि उनका हुनर खत्म हो चुका है। अवनी चुपचाप देखती रहती, लेकिन कुछ कहती नहीं।

एक शाम, बारिश हो रही थी। केशव छत पर खड़े गंगा को देख रहे थे। अवनी उनके पास गई और एक चाय का कप थमाया।

"भैया, याद है बचपन में आप कहते थे कि गंगा का पानी हर पल नया होता है, पर नदी वही रहती है? आपका हुनर भी वही नदी है।"

उस रात, केशव ने ब्रश उठाया। पहला स्ट्रोक टेढ़ा-मेढ़ा था। लेकिन जैसे ही रंग कैनवास पर बिखरा, केशव के अंदर का वह सोया हुआ कलाकार जाग उठा। उस रात वे सोए नहीं। सुबह जब अवनी उठी, तो देखा कि एक पेंटिंग तैयार थी—बरसात में भीगता हुआ बनारस का एक घाट। उसमें वह दर्द और गहराई थी जो शायद दस साल पहले वाली पेंटिंग में भी नहीं थी। यह अनुभव का रंग था।

तीन महीने बीत गए। अवनी की छुट्टियां खत्म हो रही थीं और केशव की प्रदर्शनी (Exhibition) का दिन आ गया था।

गैलरी खचाखच भरी थी। शहर के बड़े-बड़े लोग, कला प्रेमी और आलोचक आए थे। दीवारों पर टंगी पेंटिंग्स बोल रही थीं। उनमें एक मसाला बेचने वाले के संघर्ष की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसे इंसान की रूह थी जिसने जीवन के खुरदरेपन में भी खूबसूरती ढूंढ ली थी।

एक आलोचक ने केशव से पूछा, "मिस्टर केशव, आपकी पेंटिंग्स में इतना गहरा सन्नाटा और इतना शोर एक साथ कैसे है?"

केशव ने मुस्कुराते हुए अवनी की तरफ देखा, जो कोने में खड़ी गर्व से उन्हें देख रही थी।

केशव ने माइक पर कहा, "यह सन्नाटा मेरे उन दस सालों का है जब मैंने अपने सपनों को मार दिया था। और यह शोर मेरी बहन के उस विश्वास का है जिसने मुझे बताया कि सांस लेने और जिंदा रहने में फर्क होता है। आज मैं जो भी हूँ, अपनी बहन के उस एक उपहार की वजह से हूँ जिसने मुझे मेरा 'मैं' वापस लौटा दिया।"

हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

प्रदर्शनी के अंत में, केशव की सभी पेंटिंग्स बिक गईं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उनकी एक पेंटिंग को नेशनल मॉडर्न आर्ट गैलरी ने खरीदने का प्रस्ताव दिया।

अगले दिन अवनी को वापस अमेरिका जाना था। एयरपोर्ट पर विदाई का वक्त था। केशव अब वह झुके हुए कंधों वाले दुकानदार नहीं लग रहे थे। उन्होंने एक स्टाइलिश कुर्ता पहना था, आँखों में चमक थी और चेहरे पर आत्मविश्वास।

केशव ने अवनी का माथा चूमा। "गुड़िया, लोग कहते हैं कि बहन भाई से रक्षा मांगती है। पर तूने तो मेरी रक्षा की है—मेरे वजूद की रक्षा, मेरी आत्मा की रक्षा। तूने मुझे उस दुकान के पिंजरे से आज़ाद कर दिया।"

अवनी ने हंसते हुए कहा, "तो अब अगली बार जब आऊं, तो मुझे पेरिस वाली एग्जीबिशन का पास चाहिए।"

केशव ने हंसकर हामी भरी।

अवनी जब प्लेन में बैठी, तो वह खिड़की से बाहर देख रही थी। उसे संतोष था। उसने भैया को कोई कार या बंगला नहीं दिया था, उसने उन्हें उनकी जिंदगी वापस दी थी। और शायद यही असली रक्षाबंधन था—एक-दूसरे के सपनों की रक्षा करना।

उधर बनारस में, केशव अपनी दुकान के बाहर से गुजरे। उन्होंने देखा कि नया मैनेजर काम संभाल रहा है। वे मुस्कुराए, और अपनी गाड़ी को दुकान की जगह गंगा घाट की ओर मोड़ दिया, जहाँ उनका कैनवास और रंग उनका इंतज़ार कर रहे थे। अब वे सिर्फ 'केशव भाई मसाला वाले' नहीं थे, वे 'आर्टिस्ट केशव' थे। जिंदगी सच में बदल गई थी, सिर्फ एक राखी के फैसले से।

सीख: सच्चा उपहार वह नहीं जो कीमती हो, बल्कि वह है जो किसी को जीने की नई वजह दे दे।

लेखिका :सुमेधा झा


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