“चलिए, नीचे कैंटीन चलकर कॉफी पीते हैं… यू विल फील बेटर,” वह बोला तो आर्या ने पहली बार उस अजनबी पर भरोसा किया।
दिन भर ऑफिस में मीटिंग्स और डेडलाइंस के बीच उसका सिर भारी हो गया था। आंखों के आगे धुंध-सी थी। जिस एग्ज़ाम-प्रोजेक्ट की तैयारी उसने महीनों से की थी, उसी दिन बॉस ने सबके सामने एक छोटी-सी गलती पर उसे झाड़ दिया। साथ में बैठी सहकर्मी भी जैसे मौका ढूंढ रही थी—“कुछ लोग बस दिखाने के लिए स्मार्ट होते हैं,” कहकर उसने तीर चला दिया। आर्या अपना बैग उठाकर बाहर निकली तो लिफ्ट के पास उसकी आंखें भर आईं।
“रोना मत,” सामने से वही लड़का आया—अमन। नई जॉइनिंग थी उसकी, मगर बोलने का तरीका ऐसा कि जैसे सालों से जानता हो। उसने पानी दिया, फिर कॉफी का पूछ लिया।
कैंटीन में बैठते ही आर्या के होंठों से बस इतना निकला, “मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है, अमन… मैं इतनी कमजोर क्यों पड़ जाती हूँ?”
अमन ने कप का ढक्कन हटाते हुए कहा, “कमज़ोरी नहीं है। इंसान जब बहुत दबाव में होता है, तो आंखें पहले बोल देती हैं। आप ठीक हैं… बस थक गई हैं।”
कॉफी खत्म होते-होते आर्या का मन थोड़ा हल्का हुआ। वह घर लौट आई, मगर रात भर दिमाग में वही बात घूमती रही—“यह लड़का अलग है…”
उसके बाद मुलाकातें बढ़ती गईं। कभी लंच के बाद, कभी प्रोजेक्ट के बहाने, कभी बस “हाय” कहकर। आर्या को भी अच्छा लगने लगा था कि कोई है जो बिना सलाह दिए बस सुन लेता है।
एक रविवार को अमन ने कहा, “आज मैं थोड़ा लेट हो जाऊंगा। कुछ ज़रूरी काम है।”
“ऑफिस का?” आर्या ने पूछा।
अमन मुस्कुराया, “ऑफिस से भी ज़्यादा।”
अगले हफ्ते आर्या और अमन एक छोटे से रेस्टोरेंट में बैठे थे। आर्या ने मेन्यू बंद ही किया था कि अमन का एक दोस्त वहां आ गया। दोनों एकदम उत्साह में किसी “क्लास,” “स्टूडेंट्स,” “टेस्ट सीरीज़,” “फंड” की बातें करने लगे।
आर्या ने बीच में पूछ लिया, “क्या चल रहा है? कहीं तुम लोग कोचिंग खोलने वाले हो क्या?”
अमन ने हंसकर कहा, “खोलने वाले नहीं… चला रहे हैं। मेरे तीन दोस्त और मैं हर रविवार एक कोचिंग में फ्री पढ़ाते हैं। वहां ऐसे बच्चे आते हैं जो होशियार हैं पर फीस नहीं दे सकते। हम उन्हें इंजीनियरिंग की तैयारी कराते हैं। और जो सच में मेहनती होते हैं, उनकी किताबें, टेस्ट फीस… कभी-कभी घर का किराया भी मिलाकर मदद कर देते हैं।”
आर्या के हाथ से चम्मच छूटते-छूटते बचा। वह कुछ पल चुप रही, फिर धीमे से बोली, “तुम… ये बात किसी को बताते क्यों नहीं?”
अमन ने कंधे उचका दिए, “इसमें बताने जैसा क्या है? बस इतना है कि किसी के लिए एक रविवार दे दूं तो मुझे भी लगता है… मेरी जिंदगी सिर्फ सैलरी नहीं है।”
उस दिन आर्या घर आई तो उसके पिता—हरिश मल्होत्रा—बरामदे में अखबार लेकर बैठे थे। मां—मीरा—रसोई में चाय बना रही थीं। छोटा भाई—देव—किताबों में सिर गड़ाए बैठा था। सब सामान्य था, पर आर्या का मन असामान्य हो गया था। उसे बार-बार अमन की बात याद आती रही।
रात को सोते समय उसने सोचा—“कितना अजीब है… हम किसी को उसकी सूरत, कपड़े, बोलचाल से आंकते हैं। असल का इंसान पता ही नहीं चलता।”
सुबह तड़के जोर का शोर सुनकर उसकी आंख खुली। मां की चीख, देव की घबराई आवाज़, और कमरे में भागते कदम। आर्या बाहर दौड़ी तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
पापा… खून की उल्टी कर रहे थे। चेहरा सफेद पड़ गया था। आंखें बंद होने लगीं। मां रो रही थीं—“हरिश जी… आंखें खोलिए।”
देव किसी तरह उन्हें संभाल रहा था, “दीदी जल्दी…!”
आर्या के हाथ-पैर सुन्न हो गए। उसने कांपती उंगलियों से एंबुलेंस कॉल की, फिर चिल्लाकर पड़ोसी को बुलाया। दस मिनट बाद एंबुलेंस आई और वे सिटी के “जीवनदीप हॉस्पिटल” पहुंचे।
इमरजेंसी में डॉक्टरों ने पापा को देखते ही स्ट्रेचर अंदर कर दिया। सीनियर डॉक्टर, डॉ. शरद मेहता, उन्हें पहचानते थे—पापा ने कभी उनके कैंप में रक्तदान के लिए सहयोग किया था। इलाज शुरू हो गया।
आर्या का सिर घूम रहा था। “अचानक… ऐसा कैसे…?”
उसने बिना सोचे अमन को फोन कर दिया।
“आर्या?” अमन की आवाज़ आते ही वह रो पड़ी।
“अमन… पापा… हॉस्पिटल… खून…”
“कहाँ?”
“जीवनदीप… इमरजेंसी…”
“मैं आ रहा हूँ। अभी।”
आधे घंटे में अमन पहुंच गया। बाल बिखरे थे, सांस तेज़ थी, पर आंखों में घबराहट नहीं—साफ़-साफ़ काम करने वाला ठहराव था। उसने तुरंत रिसेप्शन पर जाकर जानकारी ली, देव को पानी दिया, और मीरा आंटी को कुर्सी पर बैठाया।
“आंटी, आप बैठिए। हम हैं।”
आर्या ने पहली बार महसूस किया कि संकट में “हम” शब्द कितना मजबूत होता है।
शाम तक रिपोर्ट आ गई। डॉ. मेहता का चेहरा उतर गया। उन्होंने आर्या और देव को कुछ नहीं बताया, बस कहा, “हम कोशिश कर रहे हैं।”
पर अमन को शक हो गया। वह डॉक्टर को एक तरफ ले गया।
“डॉक्टर साहब, सच बताइए… क्या है?”
डॉ. मेहता ने इधर-उधर देखा। फिर धीमे से बोले, “ब्लड कैंसर… और बहुत आगे बढ़ चुका है। अब इलाज… बहुत सीमित है।”
अमन का चेहरा सख्त हो गया। “कितना समय?”
“शायद… पंद्रह दिन… या एक महीना।”
अमन के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई। उसने डॉक्टर की ओर देखा, फिर वार्ड की तरफ।
उसी वक्त हल्की आहट हुई। दोनों ने पलटकर देखा—हरिश जी जाग चुके थे। उनकी आंखें खुली थीं, और उन्होंने सब सुन लिया था।
हरिश जी के चेहरे पर एक अजीब-सी शांति उतर आई—जैसे किसी ने भविष्य का पर्दा हटाकर सच दिखा दिया हो। फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
“तो… यही है…” उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा। “मैं सोच रहा था… देव का करियर… आर्या की शादी… घर की जिम्मेदारी… अब…”
मीरा आंटी ने उनका हाथ पकड़ा, “आप ऐसी बातें मत बोलिए।”
हरिश जी ने सिर हिलाया, “मीरा… मुझे झूठ मत दिलाओ। मैंने सुन लिया है।” फिर उन्होंने आर्या की तरफ देखा, “बेटा… मुझे एक बात करनी है।”
आर्या आगे बढ़ी, “पापा…”
“मैं चाहता हूँ… तुम खुश रहो। और मैं… तुम्हें डोली में बैठा कर देखना चाहता हूँ।”
आर्या सिहर गई। “पापा, अभी…”
तभी अमन ने आगे बढ़कर कहा, “अंकल, आप चिंता मत कीजिए।”
उसी समय अमन के माता-पिता—विवेक शर्मा और रचना शर्मा—भी हॉस्पिटल पहुंच चुके थे। अमन ने रास्ते में उन्हें सब बता दिया था। रचना जी ने आते ही मीरा आंटी को गले लगा लिया।
हरिश जी ने विवेक जी की तरफ देखकर कहा, “मैं जानता हूँ… समय कम है। अगर… अगर आप अनुमति दें… तो…”
विवेक जी की आवाज़ भारी हो गई, “अनुमति कैसी, भाई साहब… बच्चे तो आपके ही हैं।”
पर रिश्ते-नाते, समाज, रस्मों का एक पहाड़ बीच में था। तभी हरिश जी ने खुद कहा, “मुझे धूमधाम नहीं चाहिए। बस… इतना चाहिये कि मेरी बेटी का हाथ सुरक्षित हाथ में दे दूं।”
रचना जी ने धीरे से कहा, “विवेक जी…”
विवेक जी कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, “ठीक है। अगर बच्चों की खुशी यही है… तो हम तैयार हैं।”
आर्या का चेहरा फक पड़ गया। “लेकिन… पापा… अस्पताल में…?”
अमन ने उसका हाथ थाम लिया। “आर्या, जब जिंदगी दरवाज़ा खटखटाती है न… तब इज्जत, दिखावा, भीड़… सब बाद में आते हैं। पहले इंसान आता है।”
देव ने भी आंसू पोंछते हुए कहा, “दीदी… पापा को यही चाहिए।”
मीरा आंटी की आंखें भर आईं, “अगर तुम्हारा मन…”
आर्या ने सिर झुका दिया। और फिर पहली बार उसने अमन की तरफ देखकर पूरी दृढ़ता से कहा, “हाँ।”
अमन ने तुरंत सब संभाल लिया। वही कोचिंग वाला अमन—जो बिना शोर किए काम कर लेता था—अस्पताल में भी वैसे ही काम करने लगा। किसी ने फूलों का इंतजाम किया, किसी ने पंडित जी को बुलाया, नर्सों ने वार्ड के कोने में छोटा सा स्थान खाली किया। अस्पताल के स्टाफ ने भी दिल से साथ दिया—किसी ने माला लाई, किसी ने मिठाई, किसी ने संगीत के लिए छोटा स्पीकर।
शाम होते-होते वार्ड में एक अलग ही रोशनी फैल गई। फूलों की हल्की खुशबू, मेहंदी का छोटा-सा डिब्बा, और पापा का कांपता हाथ जो बार-बार आर्या के सिर पर फिर रहा था।
पंडित जी ने मंत्र शुरू किए। अमन और आर्या ने एक दूसरे को वरमाला पहनाई। आर्या की आंखें बार-बार पापा की तरफ चली जातीं। हरिश जी का चेहरा पीला था, पर आंखों में चमक थी—जैसे उनकी सांसों को कोई अर्थ मिल गया हो।
फेरे की बारी आई तो आर्या ने धीरे से कहा, “पापा… मैं…”
हरिश जी ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया, “मेरी बेटी… चल।”
मगर उठने की ताकत नहीं थी। अमन आगे आया, “अंकल, आप चिंता न करें। आप बस अपना हाथ… आशीर्वाद के लिए उठा दीजिए।”
और उसने आर्या का हाथ थामकर फेरे पूरे करवाए।
उसी वक्त वार्ड के बाहर किसी का मोबाइल बज उठा। रिंगटोन—पुराना सा गाना—“दिल को देखो, चेहरा न देखो…”
आर्या की आंखों में आंसू आ गए, होंठों पर हल्की मुस्कान भी।
शादी पूरी होते ही हरिश जी ने अमन का हाथ पकड़ लिया।
“बेटा… मेरी बेटी… अब तुम्हारी…”
अमन ने झुककर उनके हाथ चूमे, “नहीं अंकल… आपकी बेटी हमेशा आपकी ही रहेगी। बस अब उसकी जिम्मेदारी भी मेरी है।”
डॉ. मेहता दूर खड़े यह दृश्य देख रहे थे। उनके चेहरे पर भी नमी थी। पास खड़ी नर्स ने धीरे से कहा, “सर… ऐसा मैंने पहली बार देखा… हॉस्पिटल में शादी… और सब… इतना सच्चा।”
डॉ. मेहता ने बस इतना कहा, “कभी-कभी इलाज दवा नहीं… भरोसा करता है।”
उस रात हरिश जी बहुत देर तक नहीं बोल पाए। पर उनकी आंखें बार-बार आर्या और अमन को देखती रहीं—जैसे आंखों से ही दुआ दे रहे हों।
अगले दिन सुबह उन्होंने मीरा आंटी का हाथ थामा, “मीरा… अब मैं… डर नहीं रहा।”
मीरा आंटी रो पड़ीं, “आपने हमें…”
हरिश जी ने धीरे से कहा, “मेरी बेटी का घर… देख लिया।”
और कुछ दिनों बाद, जैसे डॉक्टर ने कहा था, हरिश जी चले गए।
अस्पताल के उसी वार्ड में, जहां एक अनोखी शादी हुई थी, वहां उस दिन एक अलग-सी शांति थी। स्टाफ के कई लोग अंतिम दर्शन करने आए। कोई कह रहा था, “उनकी आंखों में कितना सुकून था…” कोई बोल रहा था, “ऐसा बेटा मिले हर बेटी को…”
घर लौटकर आर्या को लगता, पापा की कमी हर सांस में है। पर फिर जब अमन रात को चुपचाप उसके लिए पानी रख देता, देव की फीस की बात खुद संभाल लेता, मीरा आंटी के साथ बैठकर पुराने एल्बम देखता—आर्या को महसूस होता कि पापा ने “हाथ” नहीं छोड़ा। पापा ने उसे “हाथ पकड़ने वाला” दे दिया।
कुछ महीने बाद अमन उसे उसी कोचिंग इंस्टिट्यूट ले गया। वहां बच्चे बोर्ड पर सवाल हल कर रहे थे। किसी ने आर्या से पूछा, “मैम, आप भी पढ़ाने आएंगी?”
आर्या की आंखें भर आईं। उसने सिर हिलाया, “हाँ… मैं भी।”
उस दिन उसने मन ही मन पापा से कहा—
“आपने मुझे सिर्फ शादी नहीं दी… आपने मुझे जिंदगी को देखने की नई नजर दी।”
और वह समझ गई—चेहरा, कपड़े, स्टाइल… सब अपनी जगह हैं। मगर असली इंसान वह है जो किसी की तकलीफ में अपने ‘मैं’ को पीछे रख दे।
कभी-कभी जीवन बहुत कम समय देता है, पर उसी कम समय में सबसे बड़ा सच सिखा देता है—
प्यार का मतलब सिर्फ साथ रहना नहीं, साथ “खड़ा” रहना है।
लेखक : रितेश त्रिपाठी
बहुत ही सुन्दर सोच और कृति।प्रेरक और मार्ग दर्शक !!!
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