रविवार की सुहावनी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्राइंग रूम के उस कोने को रोशन कर रही थी जिसे वंदना भाभी ने कल ही नए सिरे से सजाया था। मिट्टी के ख़ूबसूरत पॉट्स में लगे इंडोर प्लांट्स, दीवार पर लगी मधुबनी पेंटिंग और सोफे पर पड़े रंग-बिरंगे कुशन—सब कुछ इतना सलीके से रखा गया था कि घर किसी आर्ट गैलरी से कम नहीं लग रहा था।
सुमित अपने हाथ में चाय का प्याला लिए मुग्ध भाव से उस कोने को निहार रहा था। उसकी नज़रें उन बारीकियों पर टिकी थीं जो वंदना भाभी की कलात्मक समझ का परिचय दे रही थीं।
"कमाल है भाभी!" सुमित के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। "मानना पड़ेगा, आपके हाथों में जादू है। कल तक यह कोना कितना वीरान और बोरिंग लग रहा था, और आज देखिए, लग रहा है जैसे किसी इंटीरियर डेकोरेटर ने इसे डिज़ाइन किया हो। रंगों का चुनाव, यह प्लेसमेंट... उफ़्फ़! घर में घुसते ही मन तरोताज़ा हो जाता है।"
रसोई से पोहा लेकर आ रही पल्लवी के कदम ड्राइंग रूम की दहलीज पर ठिठक गए। सुमित की आवाज़ में जो उत्साह और प्रशंसा थी, वह पल्लवी के कानों में किसी पिघले हुए सीसे की तरह उतरी। यह पहली बार नहीं था। पिछले कुछ महीनों से, जबसे बड़े भैया की शादी वंदना से हुई थी, सुमित की जुबान पर बस 'भाभी के हुनर' के ही चर्चे रहते थे। कभी उनकी बनाई पेंटिंग की तारीफ़, कभी उनके कपड़े चुनने के ढंग की, तो कभी घर सजाने की।
पल्लवी ने एक गहरी साँस ली, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान ओढ़ी और ट्रे लेकर भीतर आई। उसने मेज पर नाश्ता रखा, लेकिन जोर थोड़ा ज़्यादा था, जिससे प्लेट की खनखनाहट गूँज गई।
"अरे पल्लवी, तुम भी देखो न," सुमित ने पल्लवी की नाराज़गी को अनदेखा करते हुए कहा, "भाभी ने वो पुराना लैंपशेड हटाकर वहां जो जूट का हैंगिंग लगाया है, उससे पूरा लुक ही बदल गया। सच में, घर को घर बनाना तो कोई भाभी से सीखे।"
पल्लवी के सब्र का बांध टूटने लगा। उसे अपनी मेहनत—जो वह सुबह पाँच बजे से उठकर झाड़ू-पोछा, कपड़े और टिफिन बनाने में खपाती थी—एकदम निरर्थक लगने लगी। घर को 'साफ़' रखना उसका काम था, लेकिन घर को 'सजाना' वंदना भाभी का शौक था। और विडंबना यह थी कि सुमित को सिर्फ़ सजावट दिखती थी, सफ़ाई नहीं।
पल्लवी ने तीखे स्वर में कहा, "हाँ, बहुत अच्छा लग रहा है। लेकिन सुमित, ज़रा सोचो इसमें धूल कितनी जमेगी? ये जूट और कपड़े के हैंगिंग्स... हफ़्ते भर में गंदे हो जाएंगे। और फिर साफ़ किसे करना पड़ेगा? मुझे ही न? सजाना आसान है, लेकिन उसे मेंटेन करना बहुत मुश्किल होता है। वैसे भी, मुझे लगता है कि घर को म्यूज़ियम बनाने की ज़रूरत नहीं है, घर में खुली जगह होनी चाहिए ताकि सांस ली जा सके।"
उसकी बातों में घर की सफ़ाई की चिंता कम और अपने पति द्वारा जेठानी की तारीफ़ किए जाने की कुढ़न ज़्यादा थी। वह यह बर्दाश्त ही नहीं कर पा रही थी कि जिस घर को उसने पिछले तीन सालों से अपनी मेहनत से सींचा है, उसका श्रेय चंद फूल-पौधे और कुशन लगाकर वंदना भाभी ले जा रही हैं।
सुमित ने पल्लवी की बात सुनकर माथे पर शिकन ला दी। "उफ़्फ़ पल्लवी! तुम हर ख़ूबसूरत चीज़ में नुक्स क्यों निकालने लगती हो? इसे 'नकारात्मकता' कहते हैं। धूल तो सादे घर में भी जमती है। बात नीयत और शौक की है। भाभी कम से कम कोशिश तो करती हैं माहौल को खुशनुमा बनाने की। तुम्हें तो बस..."
सुमित ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया, लेकिन पल्लवी समझ गई कि आगे क्या आने वाला था। 'तुम्हें तो बस काम का रोना रोना आता है'—यही कहने वाले थे वो।
तभी वंदना भाभी वहाँ आ गईं। उन्होंने सुमित और पल्लवी के बीच के तनाव को भांप लिया। सुमित ने फिर से तारीफ़ों के पुल बांधने शुरू कर दिए। "भाभी, मैं पल्लवी को यही बता रहा था कि आपकी चॉइस कितनी क्लासिक है। हमारे बेडरूम के लिए भी आप ही कुछ सजेस्ट कीजिये न। पल्लवी को तो समझ ही नहीं आता कि कौन सा पर्दा किसके साथ अच्छा लगेगा।"
यह पल्लवी के लिए अंतिम प्रहार था। उसके आत्मसम्मान को जैसे किसी ने कुचल दिया हो। वह जिस बेडरूम को अपनी दुनिया मानती थी, अब वहां भी उसे जेठानी की पसंद की मुहर चाहिए थी?
पल्लवी तमतमा उठी। "सुमित, अब बस भी करो! बहुत हो गया। हमारा कमरा है, जैसा भी है, मुझे पसंद है। मुझे नहीं चाहिए वहां कोई बदलाव। और रही बात क्लासिक चॉइस की, तो महंगें शो-पीस लाकर रख देना चॉइस नहीं होती, पैसों की बर्बादी होती है। हम मिडिल क्लास लोग हैं, हमें शोभा नहीं देता यह सब दिखावा। आप ज़रा अपने क्रेडिट कार्ड का बिल देखियेगा इस महीने का, तब सारी कलाकारी समझ आ जाएगी।"
पल्लवी का यह वार सीधा और क्रूर था। उसने वंदना की कला को 'पैसों की बर्बादी' करार दे दिया था। कमरे में सन्नाटा छा गया। वंदना का चेहरा उतर गया, वह बिना कुछ बोले वहां से चली गई।
सुमित ने पल्लवी को घूरकर देखा। "तुम्हें जलन हो रही है, पल्लवी? इतनी छोटी सोच कब से हो गई तुम्हारी? तुम्हें ख़ुश होना चाहिए कि घर सुंदर लग रहा है, पर तुम... तुम बस कमियां ढूँढ़ने में लगी हो क्योंकि यह तुमने नहीं किया।"
सुमित नाश्ता अधूरा छोड़कर उठ गया। पल्लवी अकेली ड्राइंग रूम में खड़ी रह गई। वह 'सजा हुआ कोना' अब उसे चिढ़ाता हुआ सा प्रतीत हो रहा था।
हकीकत में पल्लवी को घर की सजावट, धूल या क्रेडिट कार्ड के बिल से कोई दिक्कत नहीं थी। उसे दिक्कत थी सुमित की आँखों में दिखने वाली उस चमक से, जो वंदना के लिए थी। उसे डर था कि कहीं वंदना भाभी की यह 'परफेक्शन' उसे सुमित की नज़रों में 'औसत' न साबित कर दे। वह रोज उस घर को संवारती थी, पर सुमित ने कभी यह नहीं कहा था कि "वाह पल्लवी, फ़र्श कितना चमक रहा है।"
उसने पास रखे एक कुशन को उठाकर ज़ोर से सोफे पर पटका। मन का गुबार तो नहीं निकला, पर आँखों से दो बूंद आँसू ज़रूर टपक पड़े। यह लड़ाई सजावट की नहीं, वजूद की थी, जिसे पल्लवी हारती हुई महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था कि घर की दीवारों पर लगा नया पेंट, उसके अस्तित्व के रंग को फीका कर रहा है।
मूल लेखिका : बीना कुंडलियाँ
Comments
Post a Comment