बाहर लगातार हो रही बारिश की बूंदें जब पुरानी खिड़की के कांच से टकरा रही थीं, तब साठ वर्षीय सुधा अपनी आरामकुर्सी पर बैठी, हाथ में थमी अदरक वाली चाय की प्याली से उठते भाप को शून्य में विलीन होते देख रही थी। घर में एक अजीब सा सन्नाटा था। इतना गहरा सन्नाटा कि दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की 'टिक-टिक' भी हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी।
यह वही घर था जो कल तक शहनाइयों की गूंज, मेहमानों के ठहाकों और हल्दी-मेहंदी की खुशबू से महक रहा था। कल ही तो उसने अपने भतीजे, रोहन, को विदा किया था। रोहन अपनी नई-नवेली दुल्हन के साथ अमेरिका जा चुका था। और उससे पांच साल पहले, सुधा ने अपनी छोटी विधवा बहन, गरिमा, का पुनर्विवाह करवाकर उसे एक नए जीवन की ओर भेजा था।
आज, जब सब अपने-अपने घोंसलों में जा चुके थे, सुधा उस विशाल, खाली मकान में अकेली रह गई थी। वह 'त्याग की देवी' थी—यह उपाधि उसे समाज, रिश्तेदार और परिवार ने दी थी। लेकिन आज जब वह अपने जीवन की सांझ में खड़ी थी, तो यह उपाधि उसे किसी भारी पत्थर जैसी लग रही थी, जिसे ढोते-ढोते उसकी कमर झुक गई थी, पर मंजिल का कोई पता नहीं था।
सुधा की नज़र सामने रखी मेज पर पड़ी, जहां एक पुरानी एल्बम रखी थी। उसने कांपते हाथों से उसे खोला। एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर पर उसकी उंगलियां ठहर गईं। तस्वीर में एक नौजवान लड़का और लड़की कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठे हंस रहे थे। लड़का—विवेक, और लड़की—सुधा।
यादें, जो उसने जिम्मेदारी की मोटी परतों के नीचे दफन कर दी थीं, आज बारिश के पानी के साथ रिस कर बाहर आने लगीं।
सुधा को वह दिन याद आया जब वह पच्चीस साल की थी। विवेक के साथ उसका रिश्ता लगभग तय हो चुका था। दोनों की आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने थे। विवेक उसे शहर से दूर, पहाड़ों में बसने के सपने दिखाता था। लेकिन नियति ने एक ही रात में सब कुछ बदल दिया।
एक कार एक्सीडेंट में सुधा के माता-पिता और जीजाजी (बड़ी बहन गरिमा के पति) की मृत्यु हो गई। गरिमा उस समय गर्भवती थी और इस सदमे से वह अपनी मानसिक सुध-बुध खो बैठी थी। घर में सिवाय मातम और एक अजन्मे बच्चे की जिम्मेदारी के कुछ नहीं बचा था।
विवेक आया था। उसने सुधा का हाथ थामकर कहा था, "सुधा, हम गरिमा दीदी को अपने साथ रखेंगे। हम मिलकर सब संभाल लेंगे। शादी मत तोड़ो।"
लेकिन सुधा जानती थी कि गरिमा की हालत ऐसी नहीं थी कि उसे किसी दूसरे के घर ले जाया जा सके। उसे चौबीसों घंटे देखभाल की ज़रूरत थी। और आने वाला बच्चा? उसे एक पिता नहीं, तो कम से कम एक समर्पित 'मां' तो चाहिए थी। सुधा ने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनी, जो उसे अपने कर्तव्यों से बंधने को कह रही थी।
उसने विवेक से कहा था, "विवेक, मैं तुम्हारे सपनों की उड़ान में एक भारी बोझ नहीं बनना चाहती। गरिमा और उसके बच्चे को मेरी ज़रूरत है। मेरा जीवन अब मेरा नहीं रहा।"
विवेक ने बहुत समझाया, गिड़गिड़ाया, पर सुधा चट्टान की तरह अडिग रही। अंततः विवेक चला गया। सुना था उसने दो साल बाद माता-पिता के दबाव में शादी कर ली थी।
सुधा ने खुद को झोंक दिया। गरिमा के बेटे, रोहन, का जन्म हुआ। सुधा ने 'मासी' होते हुए भी 'यशौदा' का किरदार निभाया। गरिमा डिप्रेशन के अंधेरे कुएं में थी, उसे संभालने में सुधा की जवानी कब ढल गई, पता ही नहीं चला। रातों को जागकर रोहन को लोरी सुनाना, गरिमा को दवाइयां देना, और साथ ही साथ पिता की छोड़ी हुई छोटी सी दुकान को संभालना ताकि घर का खर्च चल सके।
लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। "सुधा जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता," "साक्षात देवी है," "इसने तो अपनी पूरी जिंदगी होम कर दी।" ये शब्द पहले मरहम जैसे लगते थे, पर धीरे-धीरे ये शब्द उन जंजीरों में बदल गए जिन्होंने सुधा को जकड़ लिया था। वह अब इंसान नहीं, एक 'मूर्ति' बन चुकी थी जिससे सिर्फ देने की उम्मीद की जाती थी, जिसे न भूख लगती थी, न जिसे प्रेम की प्यास थी।
समय का पहिया घूमा। रोहन बड़ा हुआ, समझदार निकला। गरिमा की हालत में भी सुधार आया। जब गरिमा चालीस की हुई और सामान्य जीवन जीने लायक हो गई, तो सुधा ने समाज से लड़कर उसका पुनर्विवाह करवाया। लोग बातें बनाते रहे, "बुढ़ापे में शादी?", "सुधा पागल हो गई है।" पर सुधा ने किसी की नहीं सुनी। उसे लगा कि गरिमा को एक साथी मिलना चाहिए।
गरिमा अपने नए पति के साथ दूसरे शहर चली गई। रोहन पढ़ाई के लिए हॉस्टल और फिर नौकरी के लिए विदेश। सुधा को गर्व था कि उसने अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर दीं। उसने एक टूटे हुए परिवार को अपने खून-पसीने से सींचकर फिर से खड़ा कर दिया था।
लेकिन आज? आज वह गर्व कहां था?
आज जब घुटनों में दर्द होता है, जब रात को प्यास लगने पर खुद उठकर पानी लेना पड़ता है, जब मन करता है कि कोई पूछे "सुधा, आज तुम्हारा दिन कैसा रहा?", तब वह गर्व आंसुओं में बह जाता है।
सुधा ने चाय की ठंडी प्याली मेज पर रख दी। उसे महसूस हुआ कि उसने दूसरों के घर बसाने के लिए अपनी खुद की नींव खोद दी। गरिमा खुश है, कभी-कभार फोन कर लेती है। रोहन भी "मासी, यू आर द बेस्ट" का मैसेज भेज देता है। पर क्या वीडियो कॉल उस अकेलेपन को भर सकता है जो इस विशाल घर में गूंजता है?
उसने सोचा, "क्या मेरा प्रेम, मेरा विवेक, मेरा अपना परिवार... सब कुछ एक छलावा था? क्या त्याग का फल यही अकेलापन है?"
तभी, दरवाजे की घंटी बजी।
सुधा चौंक गई। इस तूफानी शाम में कौन आया होगा? दूध वाला? या कोई पड़ोसी?
उसने शॉल ओढ़ा और धीरे-धीरे चलकर दरवाजा खोला।
सामने एक बुजुर्ग व्यक्ति खड़ा था। सिर पर चांदी जैसे सफेद बाल, चेहरे पर झुर्रियां, और हाथ में एक भीगा हुआ छाता। उसने एक लंबा ओवरकोट पहना था।
सुधा की धड़कनें एक पल के लिए रुक गईं। वह चेहरा... वह आंखें... समय ने लकीरें खींच दी थीं, पर पहचान मिटा नहीं पाया था।
"विवेक?" सुधा के मुंह से फुसफुसाहट निकली।
बुजुर्ग व्यक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया। "पहचान लिया? मुझे लगा पैंतीस साल बहुत होते हैं किसी को भूलने के लिए।"
सुधा अवाक थी। वह दरवाजे से हट गई और विवेक अंदर आ गया। उसने अपना छाता कोने में रखा।
"तुम... यहाँ? कैसे?" सुधा की आवाज़ कांप रही थी।
विवेक सोफे पर बैठ गया। उसने घर को चारों तरफ देखा। "सुना था रोहन की शादी थी। मैं शहर में ही था। हिम्मत नहीं हुई तब आने की। सोचा जब भीड़ छंट जाएगी, तब आऊंगा।"
सुधा अभी भी खड़ी थी। "चाय लाऊं?" उसने वही पूछा जो एक भारतीय गृहिणी की आदत होती है।
"अदरक वाली," विवेक मुस्कुराया। "जैसी कॉलेज कैंटीन में पीते थे।"
रसोई में चाय बनाते वक्त सुधा के हाथ कांप रहे थे। अतीत उसके सामने खड़ा था। वह अतीत जिसे उसने त्याग दिया था। चाय लेकर जब वह लौटी, तो विवेक एल्बम देख रहा था।
"तुमने बहुत संघर्ष किया सुधा," विवेक ने गंभीर स्वर में कहा। "गरिमा ठीक है?"
"हां, वह खुश है," सुधा ने कहा।
"और रोहन?"
"वह भी सेटल हो गया।"
"और तुम?" विवेक ने सीधे सुधा की आंखों में देखा। "क्या तुम खुश हो, सुधा?"
सुधा की आंखों से अनायास ही आंसू छलक पड़े। वह झूठ नहीं बोल सकी। वह जो मुखौटा दुनिया के सामने पहनती थी, वह विवेक के सामने पिघल गया।
"खुशी... पता नहीं विवेक। संतोष है कि जिम्मेदारियां पूरी कीं। पर अंदर... अंदर एक खालीपन है। ऐसा लगता है जैसे मैं एक स्टेशन थी, जहां गाड़ियां आईं, रुकीं, और अपनी मंजिल की ओर चली गईं। और मैं वहीं खड़ी रह गई, पटरियों को निहारती हुई।"
विवेक ने चाय का घूंट भरा और खिड़की के बाहर देखा। "मेरी पत्नी पांच साल पहले गुज़र गई, सुधा। कैंसर था। बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। मैं भी एक बड़े से घर में अकेला रहता हूं।"
सुधा ने चौंककर उसे देखा।
विवेक ने आगे कहा, "जीवन अजीब है न? हम जवानी में भागते हैं, कर्तव्य निभाते हैं, समाज के नियम मानते हैं। और अंत में, हम सब अकेले रह जाते हैं। चाहे जिसने त्याग किया हो, या जिसने गृहस्थी भोगी हो। सांझ का रंग सबके लिए एक जैसा होता है।"
उसने अपनी जेब से एक छोटा सा कागज का टुकड़ा निकाला। यह एक पुरानी मूवी टिकट थी, जो पीली पड़ चुकी थी। "यह याद है? हमारी आखिरी डेट की टिकट। मैंने इसे कभी नहीं फेंका।"
सुधा सन्न रह गई।
"सुधा," विवेक ने नरम आवाज़ में कहा, "हम अपना अतीत नहीं बदल सकते। तुमने जो किया, वह महान था। तुमने तीन जिंदगियां बचाईं। लेकिन क्या अब, जीवन के इस पड़ाव पर, हम अपने लिए कुछ नहीं कर सकते?"
"अब क्या हो सकता है विवेक? अब तो हम..."
"अब हम दोस्त बन सकते हैं," विवेक ने बीच में ही कहा। "मैं पास वाली कॉलोनी में शिफ्ट हो गया हूं। मैंने वहां एक छोटा सा म्यूजिक स्कूल खोला है। बच्चों को वायलिन सिखाता हूं। तुम्हें याद है तुम्हें पेंटिंग का कितना शौक था?"
सुधा को याद आया। रंगों की दुनिया, जिसे उसने गरिमा की देखभाल के चक्कर में छोड़ दिया था।
"मेरे घर के पीछे एक बगीचा है, वहां बहुत अच्छी रोशनी आती है," विवेक ने कहा। "क्या तुम कल शाम वहां आकर कैनवास पर कुछ रंग भरना चाहोगी? कोई उम्मीद नहीं, कोई वादा नहीं, कोई रिश्ता नहीं। बस दो पुराने दोस्त, जो अपनी जिंदगी की शाम साथ बैठकर चाय पी सकें और अपने अकेलेपन को बांट सकें।"
सुधा ने विवेक को देखा। उसकी आंखों में वही पुराना भरोसा था। उसे महसूस हुआ कि प्रेम सिर्फ युवावस्था का आवेग नहीं होता। प्रेम वह ठहराव है जो तूफानी जिंदगी के बाद आपको किनारे पर मिलता है। उसने महसूस किया कि जिम्मेदारियां खत्म हो चुकी हैं, और अब उसके पास वह समय है जो उसने हमेशा दूसरों को दिया था।
उसका 'त्याग' व्यर्थ नहीं था, लेकिन अब उस त्याग के अध्याय को बंद करके, 'स्वयं' के अध्याय को खोलने का समय आ गया था।
सुधा ने अपने आंसू पोंछे। उसके चेहरे पर वर्षों बाद एक वास्तविक मुस्कान आई, जिसमें कोई बोझ नहीं था।
"मेरे हाथ थोड़े कांपते हैं अब," सुधा ने कहा।
"मेरे भी," विवेक हंसा, "शायद इसीलिए हम दोनों के टेढ़े-मेढ़े ब्रश स्ट्रोक्स मिलकर एक अच्छी पेंटिंग बना पाएंगे।"
बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन अब वह सुधा को डरा नहीं रही थी। घड़ी की टिक-टिक अब हथौड़े की चोट नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की धड़कन लग रही थी।
उस शाम, सुधा ने सीखा कि जीवन की सांझ का मतलब सिर्फ अंधेरा नहीं होता। अगर सही साथी मिल जाए, तो सांझ का मतलब 'गोधूलि बेला' भी होता है—वह समय जब घर लौटने का सुकून सबसे ज्यादा होता है। उसने चाय की प्याली उठाई और विवेक के साथ खिड़की के पास खड़ी होकर बारिश देखने लगी।
उसकी तलाश खत्म नहीं हुई थी, बल्कि अब जाकर उसे अपनी मंजिल मिली थी—वह खुद। और उस मंजिल तक पहुंचने के लिए, उसका पुराना हमसफ़र वापस आ गया था।
लेखिका : आरती मिश्रा
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