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दो-चार दिन काम कर लेने से तुम्हारी मां मर नहीं जाएगी

 रात के ग्यारह बज रहे थे। अरावली विला के आलीशान ड्राइंग रूम में झूमर की रोशनी अपनी पूरी ताकत से चमक रही थी, लेकिन उस रोशनी के नीचे पसरा सन्नाटा किसी अंधेरे से कम डरावना नहीं था।

रसोई से बर्तनों के खटकने की आवाज़ आ रही थी। यह आवाज़ उस सन्नाटे को तोड़ नहीं रही थी, बल्कि उसे और गहरा बना रही थी।

सोफे पर विक्रांत बैठा था, हाथ में व्हिस्की का गिलास थामे। उसके चेहरे पर थकान कम और खीझ ज्यादा थी। सामने राधिका खड़ी थी। उसकी आँखों में आंसू थे, जो गालों पर सूख कर पपड़ी बन चुके थे। राधिका की नजरें बार-बार रसोई के उस दरवाजे की तरफ जा रही थीं, जहाँ से एक बूढ़ी काया झुककर बाहर आ रही थी और फिर अंदर जा रही थी।

वह राधिका की मां, सुमित्रा देवी थीं। उम्र 70 के पार। गठिया (arthritis) ने उनके घुटनों को टेढ़ा कर दिया था। चलने में उन्हें एक तरफ झुकना पड़ता था। लेकिन आज, इस आलीशान घर में होने वाली बड़ी पार्टी की तैयारी में, वे पिछले आठ घंटों से खड़ी थीं।

"विक्रांत, अब बस करो," राधिका की आवाज़ कांप रही थी। "मां से अब और नहीं होगा। डॉक्टर ने उन्हें पूरी तरह बेड रेस्ट के लिए कहा है। उनके पैरों में सूजन देखो। वे चप्पल भी नहीं पहन पा रही हैं।"

विक्रांत ने गिलास टेबल पर जोर से रखा। "राधिका, तुम फिर शुरू हो गई? कल मेरे बॉस और कंपनी के डायरेक्टर्स डिनर पर आ रहे हैं। यह कोई आम पार्टी नहीं है। मेरा प्रमोशन इस डिनर पर टिका है। और तुम्हें पता है कि बॉस को 'होम कुक्ड' कश्मीरी खाना कितना पसंद है। और वह स्वाद सिर्फ तुम्हारी मां के हाथ में है।"

"तो क्या प्रमोशन के लिए मां की जान ले लोगे?" राधिका चिल्लाई। "हम कैटरर्स से कश्मीरी खाना मंगा सकते थे। शहर के सबसे महंगे शेफ को बुला सकते थे।"

"शेफ के खाने में वह 'अपनापन' नहीं होता जो बॉस को चाहिए," विक्रांत ने चिढ़ते हुए कहा। "मैंने मां जी से सिर्फ दो डिश बनाने को कहा था। रोगन जोश और यखनी पुलाव। बाकी सब तो नौकर कर ही रहे हैं। इसमें इतना हंगामा क्यों?"

"सिर्फ दो डिश?" राधिका ने अविश्वास से उसे देखा। "विक्रांत, वो दो डिश बनाने के लिए खड़े-खड़े मसाले कूट रही हैं, घंटों से भून रही हैं। नौकरों को वो निर्देश दे रही हैं, लेकिन असली मेहनत तो वही कर रही हैं। उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा। अभी मैंने देखा, वो दर्द से कराहते हुए किचन स्लैब का सहारा ले रही थीं।"

विक्रांत खड़ा हो गया। वह राधिका के करीब आया। उसकी आँखों में एक अजीब सी क्रूरता थी जो शायद कॉर्पोरेट की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते उसके स्वभाव का हिस्सा बन गई थी।

"सुनो राधिका," उसने उंगली उठाते हुए कहा, "नाटक बंद करो। यह मौका मुझे पाँच साल की मेहनत के बाद मिला है। अगर कल का डिनर खराब हुआ, तो मेरा करियर दस साल पीछे चला जाएगा। और रही बात तुम्हारी मां की..."

उसने एक पल के लिए रसोई की तरफ देखा, जहाँ सुमित्रा देवी कांपते हाथों से भारी कड़ाही उतारने की कोशिश कर रही थीं।

विक्रांत ने वापस राधिका की आंखों में देखा और बेहद ठंडे स्वर में कहा, "दो-चार दिन काम कर लेने से आपकी मां मर नहीं जाएगी।"

राधिका सन्न रह गई।

ये शब्द किसी थप्पड़ से ज्यादा जोर से लगे थे। कमरे की हवा जैसे जम गई। "मर नहीं जाएगी"—कितनी आसानी से कह दिया उसने। जैसे सुमित्रा देवी कोई मशीन थीं, जिनमें थोड़ा तेल डालकर और चलाया जा सकता था। जैसे उनका दर्द, उनकी उम्र, उनकी बीमारी सब विक्रांत के करियर के आगे बेमानी थे।

इससे पहले कि राधिका कुछ जवाब दे पाती, रसोई से एक जोरदार धमाके की आवाज़ आई।

"मां!" राधिका चीखी और रसोई की तरफ भागी।

सुमित्रा देवी फर्श पर गिरी पड़ी थीं। गर्म ग्रेवी उनके हाथ पर छलक गई थी, लेकिन वे जलन से नहीं, बल्कि अपनी ही हड्डियों की कमजोरी से टूटी थीं। वे उठने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन शरीर ने जवाब दे दिया था। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन वे दर्द के नहीं, शर्मिंदगी के थे।

"मुझे माफ करना बेटा," सुमित्रा जी ने राधिका को देखते ही कहा, "हाथ फिसल गया। कड़ाही भारी थी। मैं... मैं अभी साफ कर देती हूँ। विक्रांत गुस्सा करेगा।"

राधिका ने अपनी मां को देखा। 70 साल की एक बुजुर्ग महिला, जो अपने दामाद के गुस्से से डर रही थी। वह दामाद, जिसे उन्होंने अपने बेटे से बढ़कर माना था।

राधिका ने मां को सहारा देकर उठाया। उसने देखा कि मां की कलाई बुरी तरह सूज गई थी और जलने का निशान गहरा था।

पीछे विक्रांत खड़ा था। उसके चेहरे पर चिंता नहीं, बल्कि झुंझलाहट थी। "हे भगवान! अब यह क्या मुसीबत है? राधिका, अब यह सब साफ कौन करेगा? और यखनी पुलाव का क्या होगा?"

राधिका धीरे से उठी। उसने मां को कुर्सी पर बिठाया। एक नैपकिन से उनका हाथ पोंछा। फिर वह पलटी और विक्रांत के सामने जाकर खड़ी हो गई। आज उसकी आंखों में आंसू नहीं थे। आज वहां एक अजीब सी शांति थी—वह शांति जो किसी तूफान के गुजर जाने के बाद आती है।

"यखनी पुलाव नहीं बनेगा, विक्रांत," राधिका ने बहुत धीमे स्वर में कहा।

"क्या मतलब?" विक्रांत गुर्राया। "दिमाग खराब है तुम्हारा? कल डिनर है!"

"डिनर कैंसिल कर दो," राधिका ने कहा। "या फिर डोमिनोज़ से पिज्जा मंगा लो। मुझे फर्क नहीं पड़ता।"

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?" विक्रांत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। "तुम्हें पता है इसका क्या मतलब है? तुम मेरी मेहनत पर पानी फेर रही हो सिर्फ इसलिए क्योंकि मां जी से थोड़ी सी सब्जी गिर गई?"

"सब्जी नहीं गिरी है विक्रांत, मेरा भ्रम गिरा है," राधिका ने कहा। "वह भ्रम जो मैंने पिछले सात सालों से पाल रखा था कि तुम एक अच्छे इंसान हो। तुम महत्वाकांक्षी हो सकते हो, लेकिन तुम अमानवीय हो, यह मुझे आज पता चला।"

राधिका बेडरूम में गई और अलमारी से एक बैग निकाला। वह उसमें अपने और मां के कपड़े भरने लगी।

विक्रांत उसके पीछे भागा। "तुम क्या कर रही हो? यह ड्रामा बंद करो। लोग क्या कहेंगे? कल पार्टी है और तुम घर छोड़कर जा रही हो?"

राधिका रुकी नहीं। उसने मां की दवाइयाँ बैग में डालीं।

"राधिका!" विक्रांत ने उसकी बांह पकड़ी। "मैंने बस गुस्से में कह दिया था। मेरा वो मतलब नहीं था। देखो, हम मां जी को डॉक्टर के पास ले जाएंगे। मैं सबसे अच्छी क्रीम ला दूंगा। लेकिन प्लीज, कल के लिए रुक जाओ। मेरी इज्जत का सवाल है।"

राधिका ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया। उसने विक्रांत की आंखों में सीधे देखा।

"तुमने कहा था न, कि दो-चार दिन काम करने से मां मर नहीं जाएगी?" राधिका ने याद दिलाया। "तुम सही थे, विक्रांत। मां काम करने से नहीं मरेंगी। लेकिन अगर मैं उन्हें यहाँ एक पल भी और रहने दूँ, तो उनका स्वाभिमान जरूर मर जाएगा। और एक बेटी होने के नाते, मैं अपनी मां को जीते-जी मरते हुए नहीं देख सकती।"

"तुम बहुत बड़ी गलती कर रही हो," विक्रांत ने चेतावनी दी। "अगर तुम आज इस दरवाजे से बाहर गई, तो वापस आने के रास्ते बंद हो जाएंगे। मैं अपनी शर्तों पर जीता हूँ।"

"मैं जानती हूँ," राधिका ने बैग कंधे पर टांगा। "तुम्हारी शर्तें सिर्फ जीत, पैसे और पद की हैं। उन शर्तों में 'इंसानियत' का कोई कॉलम नहीं है।"

राधिका रसोई में गई, मां का हाथ थाम कर उन्हें धीरे-धीरे बाहर लाई। सुमित्रा देवी घबराई हुई थीं। "बेटा, रहने दे। मैं ठीक हूँ। क्यों घर बिगाड़ रही है? मैं कर लूंगी काम। थोड़ा सा बाम लगा लूंगी तो ठीक हो जाएगा।"

"नहीं मां," राधिका ने मां के सिर पर चुन्नी ठीक की। "घर मैंने नहीं, इस आदमी की सोच ने बिगाड़ा है। और अब यह घर नहीं है, यह एक ऑफिस है जहाँ हम सब बस कर्मचारी हैं। और मुझे इस्तीफा देना है।"

जब वे मुख्य द्वार पर पहुंचे, तो विक्रांत ने आखिरी दांव खेला। "राधिका, सोच लो। तुम्हारी मां बीमार हैं। उनका इलाज, खर्चा... तुम अकेले कैसे संभालोगी? मेरे बिना तुम जीरो हो।"

राधिका दरवाजे पर रुकी। उसने मुड़कर उस आलीशान विला को देखा, जिसे सजाने में उसने अपनी जवानी के साल खपा दिए थे।

"शायद तुम सही हो," राधिका ने कहा। "शायद बहुत मुश्किलें आएंगी। शायद मुझे दोबारा नौकरी शुरू करनी पड़े। शायद हमें छोटे घर में रहना पड़े। लेकिन कम से कम उस घर में जब मां के हाथ से प्याला गिरेगा, तो कोई यह नहीं देखेगा कि फर्श गंदा हुआ या नहीं, बल्कि यह देखेगा कि उन्हें चोट तो नहीं लगी।"

उसने दरवाजा खोला। ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया।

"और हां विक्रांत," राधिका ने जाते-जाते कहा, "प्रमोशन मुबारक हो। उम्मीद है तुम्हारी कंपनी की बैलेंस शीट में रिश्तों के घाटे का कोई कॉलम नहीं होगा।"

दरवाजा बंद हुआ। एक भारी, अंतिम गूंज के साथ।

विक्रांत ड्राइंग रूम में अकेला खड़ा रह गया। झूमर की रोशनी अब भी वैसी ही तेज थी, लेकिन अब वह रोशनी कड़वी लग रही थी। किचन में गैस पर अब भी कुछ जल रहा था—शायद वह यखनी पुलाव था, या शायद विक्रांत का वह भविष्य, जिसे उसने अपनी ही क्रूरता से जला दिया था।

सड़क पर ऑटो का इंतजार करते हुए, सुमित्रा देवी ने राधिका का हाथ कस कर पकड़ लिया।

"तूने मेरे लिए अपना घर तोड़ दिया, पगली," मां ने रुंधे गले से कहा।

राधिका ने मां के जले हुए हाथ को अपने गाल से लगाया और मुस्कुराई—एक ऐसी मुस्कान जो आंसुओं से भी ज्यादा पवित्र थी।

"मां, घर ईंटों से नहीं बनता," राधिका ने कहा। "जहाँ आप सुरक्षित नहीं, वह घर हो ही नहीं सकता। और फिक्र मत करो, हम मर नहीं जाएंगे। हम जीएंगे। पहली बार, हम सच में जीएंगे।"

रात के अंधेरे में ऑटो की लाइट दूर जाती हुई दिखाई दी। पीछे अरावली विला खड़ा था—भव्य, रोशन, और बिलकुल खोखला। यह कहानी उस रात खत्म नहीं हुई, बल्कि उस रात राधिका की असली कहानी शुरू हुई—आत्मसम्मान की कहानी, जो उस एक वाक्य की राख से पैदा हुई थी।

लेखिका : रमा मिश्रा


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