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ये रिश्ता क्या कहलाता है

 "माँ, अपना सूटकेस तैयार कर लो। परसों हम मसूरी जा रहे हैं।"

रजत ने जब यह बात कही, तो सावित्री देवी के हाथ में पकड़ी हुई माला एक पल के लिए थम गई। उन्होंने चश्मा नाक पर ठीक करते हुए अपने बेटे की ओर ऐसे देखा जैसे उसने कोई अजीब पहेली बुझा दी हो।

"मसूरी? इस उम्र में? और वो भी इतनी ठंड में? तेरा दिमाग तो ठिकाने पर है न रज्जू?" सावित्री देवी ने अविश्वास से पूछा। "बेटा, अब तो मेरे घुटने घर की सीढ़ियाँ चढ़ने में भी जवाब दे जाते हैं, तू मुझे पहाड़ चढ़ाना चाहता है? रहने दे, अब यह घूमने-फिरने की उम्र नहीं रही मेरी।"

रजत उनके पास आया और घुटनों के बल बैठकर उनके हाथ थाम लिए। "माँ, हम पहाड़ चढ़ने नहीं जा रहे। हम वहां किसी से मिलने जा रहे हैं। याद है, पिछले महीने तुमने पुरानी संदूकची साफ करते समय एक फोटो दिखाई थी? तुम्हारी बचपन की सहेली... सुधा मौसी?"

सावित्री देवी की आँखों में एक चमक कौंधी, लेकिन अगले ही पल वह बुझ गई। "सुधा... हाँ, चालीस साल हो गए उसे देखे। आखिरी बार तब मिली थी जब तुम्हारी बुआ की शादी थी। उसके बाद न कोई चिट्ठी, न कोई खबर। बस सुना था कि उसके पति के गुजरने के बाद वह मसूरी में अपने पुश्तैनी घर में रहती है। पर अब... अब क्या फायदा? पता नहीं वो मुझे पहचानेगी भी या नहीं, या शायद..." वह वाक्य अधूरा छोड़ गईं, पर रजत उनका डर समझ गया। उन्हें डर था कि कहीं बहुत देर न हो गई हो।

"माँ, मैंने पता लगा लिया है। वो वहीं रहती हैं। और मैंने उनसे फोन पर बात भी कर ली है। जब मैंने बताया कि मैं सावित्री का बेटा हूँ, तो वो फोन पर ही रो पड़ी थीं। वो तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं।"

सावित्री देवी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। चालीस साल? जीवन की एक पूरी उम्र बीत गई थी। "पर बेटा, घर... और तुम्हारी नौकरी? और बहू..."

रसोई से हाथ पोंछते हुए दीप्ति बाहर आई। "माँ जी, आप घर की चिंता बिल्कुल मत कीजिए। मैंने और रजत ने सब प्लान कर लिया है। बच्चे स्कूल ट्रिप पर जा रहे हैं, और मैं ऑफिस के काम से दो दिन के लिए पुणे जा रही हूँ। आप दोनों घर पर बोर ही होंगे। इससे अच्छा है कि आप अपनी सहेली से मिल आएं। और रजत है न, वो आपका पूरा ख्याल रखेगा।"

सावित्री देवी की आँखों में आँसू तैरने लगे। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, यह उनके अतीत के उस दरवाजे को खटखटाने जैसा था जिसे उन्होंने गृहस्थी की धूल में कहीं बंद कर दिया था।

ट्रेन का सफर आरामदायक था, लेकिन सावित्री देवी के मन में उथल-पुथल मची थी। वे बार-बार अपने बैग में रखी उस कश्मीरी शॉल को टटोल रही थीं जो उन्होंने सुधा के लिए खरीदी थी। देहरादून उतरकर जब वे टैक्सी से मसूरी की घुमावदार सड़कों पर चढ़ने लगे, तो ठंडक बढ़ने लगी।

"माँ, ठंड लग रही है?" रजत ने पूछा।

"नहीं बेटा," सावित्री देवी खिड़की से बाहर देवदार के पेड़ों को देख रही थीं। "ठंड नहीं, घबराहट हो रही है। सोच रही हूँ, हम दोनों कितनी बदल गई होंगी। तब हम सोलह साल की थीं, चोटियाँ गूंथते थे, और आज... बालों में सफेदी और चेहरों पर झुर्रियों का जाल है।"

रजत ने रियर व्यू मिरर में माँ को देखा। आज उनके चेहरे पर वह 'माँ' वाला भाव नहीं था, बल्कि एक 'किशोरी' की उत्सुकता थी।

गाड़ी 'क्लाउड एंड' के पास एक पुराने, लेकिन बेहद खूबसूरत कॉटेज के बाहर रुकी। गेट पर एक नेमप्लेट लगी थी—'सुधा-सदन'।

रजत ने सहारा देकर माँ को उतारा। सावित्री देवी के पैर कांप रहे थे, सिर्फ बुढ़ापे से नहीं, बल्कि भावनाओं के अतिरेक से। उन्होंने गेट खोला और धीरे-धीरे बरामदे की ओर बढ़ीं। वहां एक आरामकुर्सी पर एक बुजुर्ग महिला बैठी थी, जो ऊन का गोला लपेट रही थी।

सावित्री देवी के कदमों की आहट सुनकर उस महिला ने सिर उठाया। दोनों की नज़रें मिलीं। कुछ पल का सन्नाटा, जैसे वक्त थम गया हो। हवा में सिर्फ चीड़ के पेड़ों की सरसराहट थी।

"सवि?" उस महिला की आवाज़ कांपी।

"सुधा..." सावित्री देवी का गला रुंध गया।

सुधा ने ऊन का गोला फेंक दिया और जितनी तेज़ी से हो सकता था, उठीं। सावित्री देवी भी अपनी छड़ी छोड़कर आगे बढ़ीं। और अगले ही पल, दो वृद्ध शरीर एक-दूसरे से ऐसे लिपट गए जैसे दो बिछड़ी हुई आत्माएं मिल गई हों। न कोई शब्द, न कोई शिकायत, बस सिसकियों की आवाज़ गूंज रही थी।

रजत दूर खड़ा यह दृश्य देख रहा था। उसने अपनी माँ को हमेशा एक सख्त अनुशासन वाली महिला, एक जिम्मेदार गृहिणी और एक स्नेही दादी के रूप में देखा था। लेकिन आज वह एक 'सखी' को देख रहा था।

"तू कितनी मोटी हो गई है!" सुधा ने आंसू पोंछते हुए हंसकर कहा।

"और तेरे तो सारे दाँत ही गिर गए लगते हैं, मुंह कैसा पिचका हुआ है!" सावित्री देवी ने भी जवाब दिया और दोनों खिलखिलाकर हंस पड़ीं। वह हंसी इतनी खनकदार थी कि रजत हैरान रह गया। उसने माँ को घर में मुस्कुराते देखा था, पर ऐसे खुलकर हंसते हुए शायद ही कभी देखा हो।

सुधा उन्हें अंदर ले गई। घर पुराना था, लेकिन यादों से सजा हुआ। दोनों सोफे पर बैठ गईं और बातों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसका कोई अंत नहीं था।

"तुझे याद है वो मैथ्स वाले मास्टरजी? जिनकी साइकिल की हवा हमने निकाल दी थी?"

"और वो इमली का पेड़? जहाँ से गिरकर तेरी कोहनी टूटी थी?"

"तेरी शादी वाला लहंगा... वो आज भी मेरे पास है, उसकी ओढ़नी मैंने संभाल कर रखी है।"

रजत उनके लिए चाय और पकोड़े लाता रहा, पर उन दोनों को न खाने की सुध थी, न दुनिया की। वे चालीस साल के सुख-दुख एक ही शाम में साझा कर लेना चाहती थीं। सावित्री देवी बता रही थीं कि कैसे पति के जाने के बाद उन्होंने अकेले रजत को पाला। सुधा बता रही थीं कि कैसे निसंतान होने का दर्द उन्होंने समाज सेवा में भुलाया।

शाम ढलने लगी थी। मसूरी की ठंडक बढ़ गई थी।

सुधा ने अचानक कहा, "चल सवि, माल रोड (Mall Road) चलते हैं।"

सावित्री देवी सकपका गईं। "अरे, पागल हो गई है? मेरे घुटने काम नहीं करते। मैं नहीं चल पाऊंगी।"

सुधा ने हठ पकड़ ली। "अरे, टैक्सी कर लेंगे। पर आज तुझे मेरे शहर की वो मशहूर कॉफी पिलानी है। याद है, कॉलेज के दिनों में हम कॉफी हाउस में बैठकर घंटों भविष्य के सपने बुनते थे? आज फिर वही करेंगे।"

रजत ने देखा कि माँ ने पहले मना किया, लेकिन सुधा की जिद के आगे उनकी आँखों में भी एक चमक आ गई।

माल रोड पर, रजत दोनों के पीछे-पीछे चल रहा था। सावित्री देवी, जो घर पर पानी का गिलास उठाने के लिए भी कभी-कभी रजत को आवाज़ देती थीं, आज सुधा का हाथ थामे धीरे-धीरे ही सही, पर आत्मविश्वास से चल रही थीं। उन्होंने भुट्टा खाया, लकड़ी के खिलौने देखे और एक दुकान पर रंग-बिरंगी टोपियाँ पहनकर फोटो भी खिंचवाई।

एक बेंच पर बैठकर कॉफी पीते हुए सावित्री देवी ने कहा, "सुधा, आज लग रहा है कि मैं जी रही हूँ। इतने सालों से बस जिम्मेदारियाँ निभा रही थी। मैं भूल ही गई थी कि 'सावित्री' कौन है। सबके लिए मैं माँ थी, दादी थी, मामी थी... पर 'सवि' तो कहीं खो गई थी।"

सुधा ने उनके हाथ पर अपना झुर्रीदार हाथ रखा। "सवि, हम बूढ़े जरूर हो गए हैं, पर हमारा दिल आज भी वही है। यह समाज हमें याद दिलाता रहता है कि अब पूजा-पाठ करो और कोने में बैठ जाओ। पर खुश रहने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।"

रात को कॉटेज वापस लौटकर, दोनों ने पुराने गानों के रिकॉर्ड बजाए। रजत ने देखा कि माँ गुनगुना रही हैं—"लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो..." उनकी आवाज़ में कंपन था, पर एक अजीब सा सुकून भी।

सोते समय, सावित्री देवी ने रजत को पास बुलाया।

"बेटा, तूने आज मुझे जो दिया है, वो कोई तीर्थ यात्रा नहीं दे सकती थी। मैं कुंभ नहाने जाती तो शायद पाप धुल जाते, पर यहाँ आकर मेरे मन का मैल धुल गया। मुझे मेरी जवानी के वो बेफिक्र दिन वापस मिल गए।"

रजत ने माँ के पैर दबाते हुए कहा, "माँ, मुझे माफ करना। मुझे यह समझ ही नहीं आया कि तुम्हें भी एक दोस्त की जरूरत हो सकती है। हम बच्चे सोचते हैं कि माता-पिता की दुनिया बस हम तक सीमित है। हम भूल जाते हैं कि हमारे पैदा होने से पहले भी आपकी एक दुनिया थी, आपकी अपनी पहचान थी।"

सावित्री देवी ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। "अब समझ गया न? यही बहुत है।"

अगले दिन वापसी का वक्त था। विदाई बहुत मुश्किल थी। सुधा और सावित्री एक बार फिर गले मिले।

"अपना ख्याल रखना सवि। और सुन, अब चालीस साल मत लगाना। अगली गर्मियों में मैं आऊंगी तेरे घर। मुझे तेरे हाथ की वो कढ़ी खानी है," सुधा ने नम आँखों से कहा।

"जरूर आना। और अगर तू नहीं आई, तो मैं रज्जू को लेकर फिर आ जाऊंगी," सावित्री देवी ने हंसते हुए कहा, पर आंसू छलक ही आए।

गाड़ी जब वापस नीचे उतर रही थी, तो सावित्री देवी बार-बार पीछे मुड़कर हाथ हिला रही थीं, जब तक कि 'सुधा-सदन' ओझल नहीं हो गया।

घर लौटकर सावित्री देवी बदल गई थीं। अब वे शाम को सिर्फ भजन नहीं सुनती थीं, बल्कि कभी-कभी सुधा से वीडियो कॉल पर बात करती थीं। वे दीप्ति को अपनी कॉलेज की शरारतों के किस्से सुनातीं। उनके घुटनों का दर्द अब भी था, लेकिन अब वह दर्द उनके चलने के हौसले को रोक नहीं पाता था।

एक दिन दीप्ति ने रजत से कहा, "तुम्हें नहीं लगता माँ जी के चेहरे पर अब एक अलग ही चमक रहती है? पहले वो बुझी-बुझी सी रहती थीं।"

रजत ने मुस्कुराते हुए माँ के कमरे की ओर देखा, जहाँ से उनके हंसने की आवाज़ आ रही थी—शायद सुधा मौसी फोन पर थीं।

"हाँ दीप्ति," रजत ने कहा। "हम अक्सर सोचते हैं कि बुजुर्गों को सिर्फ सेवा और दवाइयों की जरूरत होती है। हम उनकी शारीरिक जरूरतों का तो ध्यान रखते हैं, पर उनकी भावनात्मक जरूरतों को अनदेखा कर देते हैं। उन्हें भी किसी ऐसे की जरूरत होती है जो उन्हें जज न करे, जो उन्हें उनकी उम्र से नहीं, बल्कि उनके नाम से बुलाए। माँ को 'माँ' कहने वाले तो हम सब हैं, पर उन्हें 'सवि' कहने वाला कोई नहीं था। उस एक नाम ने उनमें फिर से जान डाल दी।"

उस यात्रा ने सिर्फ सावित्री देवी को ही नहीं बदला था, उसने रजत को भी बदल दिया था। उसने सीख लिया था कि प्रेम का असली मतलब सिर्फ देखभाल करना नहीं, बल्कि सामने वाले को वो खुशी देना है जो उसकी आत्मा को तृप्त करे।

सावित्री देवी अब भी वही थीं, लेकिन अब उनकी आँखों में इंतज़ार नहीं, बल्कि यादों की एक सुंदर एल्बम थी, जिसके पन्ने पलटकर वे जब चाहें मुस्कुरा सकती थीं। और यह मुस्कान, किसी भी कुंभ के पुण्य से कहीं ज्यादा पवित्र और कीमती थी।

लेखिका : वंदना साह


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