बनारस के अस्सी घाट की सीढ़ियों से टकराती गंगा की लहरों का शोर भी आज वाणी के मन में चल रहे तूफ़ान को शांत नहीं कर पा रहा था. हवेली के भीतर का सन्नाटा बाहर के शोर से कहीं ज्यादा डरावना था. 'स्वर-साधना' हवेली, जो पिछले सौ सालों से शास्त्रीय संगीत का गढ़ मानी जाती थी, आज एक अजीब से तनाव के साये में जी रही थी.
वाणी ने अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ा, जो डर और ठंड से पसीज रही थीं. उसने एक बार फिर उस बंद दरवाजे की तरफ देखा जिसके पीछे उसके ससुर, विख्यात शास्त्रीय गायक पंडित दीनानाथ मिश्र, रियाज कर रहे थे. तानपूरे की गूंज बाहर तक आ रही थी, लेकिन उस गूंज में आज वह सुकून नहीं था जो हमेशा होता था. आज उसमें एक कठोरता थी, एक अस्वीकार की ध्वनि थी.
यह सब शुरू हुआ था तीन दिन पहले. वाणी, जो खुद एक साधारण परिवार से थी लेकिन जिसके कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था, का विवाह इस प्रतिष्ठित घराने के वारिस, सात्विक से हुआ था. विवाह को अभी छह महीने ही हुए थे. वाणी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे और उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर इस विवाह में खर्च किया था, यह सोचकर कि उनकी बेटी को एक ऐसा घर मिल रहा है जहाँ संगीत की पूजा होती है. वाणी को लगा था कि यहाँ उसके सुरों को पनाह मिलेगी, लेकिन उसे क्या पता था कि यहाँ सुरों से ज्यादा परंपराओं और अहंकार का बोलबाला है.
तीन दिन पहले, घर की सबसे कीमती और गुप्त 'बंदिश'—जो पीढ़ियों से सिर्फ घर के बड़े बेटे को ही सिखाई जाती थी—इंटरनेट पर लीक हो गई थी. किसी ने उसे गाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया था. वह आवाज हूबहू वाणी की थी. या कम से कम, पंडित जी और बाकी घर वालों को यही लगा.
"यह खानदानी अमानत थी बहू!" पंडित दीनानाथ की वह दहाड़ अब भी वाणी के कानों में गूंज रही थी. "तुमने चंद रुपयों या सस्ती शोहरत के लिए हमारे घराने की इज्जत नीलाम कर दी? तुम्हें क्या लगा, हम नहीं पहचानेंगे?"
वाणी रोती रही, गिड़गिड़ाती रही कि उसने ऐसा नहीं किया. आजकल एआई (Artificial Intelligence) के जमाने में किसी की भी आवाज बनाई जा सकती है, लेकिन तकनीक से अनभिज्ञ और परंपरा के मद में चूर पंडित जी ने उसकी एक न सुनी. उन्होंने फरमान सुना दिया था—वाणी को वापस उसके मायके भेज दिया जाएगा.
"मैं अपनी पवित्रता साबित करने के लिए किसी भी परीक्षा से गुजरने को तैयार हूं बाबूजी," वाणी ने कल रात सबके सामने हाथ जोड़कर कहा था. "अगर सीता मैया की तरह अग्निपरीक्षा देनी पड़ी, तो मैं उसके लिए भी तैयार हूं… बस मुझे मेरे पति के घर में, इस संगीत के मंदिर में रहने दीजिए. मुझ पर चोरी का कलंक लगाकर मत निकालिए."
उसके ये शब्द हवेली की दीवारों से टकराकर लौट आए थे. सात्विक, उसका पति, जो उसे बेइंतिहा चाहता था, पिता के अनुशासन के आगे विवश था. वह जानता था कि वाणी निर्दोष है, लेकिन पिता के क्रोध के आगे उसकी जुबान नहीं खुली.
आज सुबह फैसला होना था.
दरवाजा खुला और पंडित दीनानाथ बाहर आए. उनके चेहरे पर एक कठोर निश्चय था. वाणी दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़ी.
"बाबूजी, मुझे मत निकालिए. संगीत ही मेरा जीवन है और सात्विक मेरा संसार. मैं कहां जाऊंगी इस कलंक के साथ?" वाणी का गला रुंध गया था.
पंडित जी ने अपनी खड़ाऊ की आवाज करते हुए उसे अनदेखा किया और आंगन में रखी तुलसी की तरफ बढ़ गए. पीछे-पीछे सात्विक और उसकी माँ भी थीं.
"सात्विक की माँ," पंडित जी ने बिना मुड़े कहा, "गाड़ी मंगवाओ. इसे अभी जाना होगा."
"बाबूजी!" वाणी ने हिम्मत जुटाई और खड़ी हो गई. उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन अब उनमें एक अजीब सी चमक भी थी—स्वाभिमान की चमक. "आपने मुझे अपनी सफाई देने का एक मौका भी नहीं दिया. क्या यही न्याय है इस घराने का? जहाँ सुरों की तो पूजा होती है, लेकिन सत्य को अनसुना कर दिया जाता है?"
पूरा आंगन स्तब्ध रह गया. आज तक किसी ने पंडित दीनानाथ की आँखों में आँखें डालकर बात करने की जुर्रत नहीं की थी.
पंडित जी मुड़े, उनकी आँखों में अंगारे थे. "सफाई? सबूत सामने है. वह रिकॉर्डिंग तुम्हारी आवाज है."
"आवाज मेरी हो सकती है, लेकिन रूह मेरी नहीं थी उसमें," वाणी ने दृढ़ता से कहा. "आपने मुझे कभी गाते हुए सुना ही नहीं बाबूजी. विवाह के बाद से 'वधू को सिर्फ सुनना चाहिए, सुनाना नहीं' की परंपरा के नाम पर आपने मेरे होंठ सिल दिए. अगर आप आज मुझे सुन लेते, तो जान जाते कि वह रिकॉर्डिंग एक धोखा है."
पंडित जी ने व्यंग्य से देखा. "तो अब तुम हमें संगीत सिखाओगी?"
"नहीं, मैं सिर्फ अपनी परीक्षा देना चाहती हूं," वाणी ने कहा. "हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जब राग भैरवी को सच्चे मन और पूर्ण पवित्रता से गाया जाता है, तो पत्थर भी पिघल जाते हैं. आज महाशिवरात्रि है. शाम को मंदिर में घराने की तरफ से प्रस्तुति है. मुझे वहां गाने दीजिए. अगर मेरे गायन में रत्ती भर भी खोट नजर आए, या आपको लगे कि मैंने उस लीक हुई रिकॉर्डिंग जैसा गाया है, तो मैं उसी क्षण, भरी सभा से हमेशा के लिए चली जाऊंगी. मैं मुड़कर भी नहीं देखूंगी."
सात्विक आगे बढ़ा, "बाबूजी, इसे एक मौका दे दीजिए. यह बहुत बड़ी बात कह रही है. महाशिवरात्रि के मंच पर आज तक घर की बहुओं ने नहीं गाया, यह परंपरा टूटेगी, लेकिन अगर यह सच बोल रही है तो..."
"परंपरा तो यह पहले ही तोड़ चुकी है," पंडित जी ने गुस्से में कहा, लेकिन फिर कुछ सोचकर रुक गए. संगीतकार होने के नाते, उन्हें वाणी की चुनौती में एक आत्मविश्वास दिखा. एक कलाकार ही दूसरे कलाकार के अहंकार और आत्मविश्वास के बीच का फर्क समझ सकता है. "ठीक है. आज शाम. लेकिन याद रखना, अगर तुम असफल रही, तो यह दरवाजा तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएगा."
शाम ढलते ही बनारस के घाट दीयों की रोशनी से जगमगा उठे. विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में शहर के गणमान्य संगीत रसिक जमा थे. यह वार्षिक संगीत सभा थी जहाँ 'स्वर-साधना' घराने की इज्जत दांव पर लगी थी.
वाणी जब मंच पर चढ़ी, तो उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे जमीन नहीं, अंगारे हैं. सफेद साड़ी में लिपटी वह किसी तपस्विनी जैसी लग रही थी. सामने पहली पंक्ति में पंडित दीनानाथ बैठे थे, जिनका चेहरा भावशून्य था. सात्विक तानपूरे पर उसके पीछे बैठा था, उसकी उंगलियां कांप रही थीं.
वाणी ने आँखें मूंद लीं. उसे वह अपमान याद आया, वह झूठा आरोप याद आया. उसे याद आया अपने पिता का चेहरा, जिन्होंने कर्ज लेकर उसकी शादी की थी. अगर आज वह हार गई, तो सिर्फ वह नहीं हारेगी, उसके पिता का विश्वास हार जाएगा.
उसने षड़ज (सा) लगाया.
आवाज का वह पहला कंपन ही इतना गहरा था कि श्रोताओं में पिन ड्रॉप साइलेंस हो गया. वाणी ने 'राग मारवा' चुना था—वियोग और अंधकार के बीच प्रकाश की किरण ढूंढने वाला राग. यह एक कठिन राग था, जिसमें सुरों का लगाव बहुत संभलकर करना पड़ता था.
जैसे-जैसे बंदिश आगे बढ़ी, वाणी भूल गई कि वह परीक्षा दे रही है. वह भूल गई कि सामने उसके कठोर ससुर बैठे हैं. वह बस गा रही थी—अपनी पीड़ा, अपनी सच्चाई, और अपने अस्तित्व के लिए. उसकी आवाज में वह दर्द था जो किसी डिजिटल रिकॉर्डिंग में कभी नहीं आ सकता था. हर 'मींड' और हर 'गमक' में उसकी रूह कांपती हुई महसूस हो रही थी.
उसने वह बंदिश गाई जो लीक हुई थी, लेकिन इस बार उसने उसे ऐसे गाया जैसे वह ईश्वर से शिकायत कर रही हो. लीक हुई रिकॉर्डिंग में सिर्फ सुर थे, लेकिन यहाँ 'भाव' था. तकनीक सुरों की नकल कर सकती थी, लेकिन उस तड़प की नकल नहीं कर सकती थी जो एक निर्दोष हृदय से निकलती है.
पंडित दीनानाथ, जो शुरुआत में परीक्षक की मुद्रा में बैठे थे, धीरे-धीरे अपनी आँखों को मूंदने पर मजबूर हो गए. उनका हाथ अनजाने में ही ताल देने लगा. एक जगह जब वाणी ने कोमल ऋषभ पर रुककर एक लंबी तान ली, तो पंडित जी के मुंह से अनायास ही निकल गया—"वाह!"
यह 'वाह' किसी सामान्य श्रोता की दाद नहीं थी, यह उस मुहर की तरह थी जिसने वाणी की पवित्रता पर अपनी स्वीकृति दे दी थी.
समापन पर जब वाणी रुकी, तो वातावरण में एक भारी निस्तब्धता थी. कुछ पल तक किसी ने ताली नहीं बजाई. लोग उस रूहानी अनुभव से बाहर आने में समय ले रहे थे. फिर अचानक, तालियों की गड़गड़ाहट से मंदिर प्रांगण गूंज उठा.
वाणी पसीने से लथपथ थी, हांफ रही थी, जैसे सचमुच अग्नि से निकलकर आई हो. उसने डरते-डरते अपनी आँखें खोलीं और पंडित जी की ओर देखा.
पंडित दीनानाथ अपनी जगह से उठे. परंपरा के विपरीत, वे मंच की सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आए. सात्विक ने डरकर वाणी को देखा, उसे लगा शायद कोई गलती हो गई.
पंडित जी वाणी के सामने आकर रुके. उन्होंने माइक को परे हटाया ताकि उनकी आवाज सिर्फ वाणी सुन सके.
"वह रिकॉर्डिंग..." पंडित जी की आवाज भर्राई हुई थी, "वह झूठी थी. मैं सुरों का व्यापारी बन गया था, इसलिए मशीन और इंसान के दर्द का फर्क भूल गया था. आज तुमने मुझे संगीत का असली मतलब फिर से सिखा दिया."
वाणी ने झुककर उनके पैर छूने चाहे, लेकिन पंडित जी ने उसे रोक लिया और अपने गले से मोतियों की माला उतारकर उसके गले में डाल दी.
"यह घर, यह घराना और यह संगीत... सब पर अब तुम्हारा उतना ही हक है जितना सात्विक का," उन्होंने माइक पर घोषणा की. "मेरी बहू ने आज सिद्ध कर दिया कि सत्य को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, वह स्वयं प्रकाशित होता है."
भीड़ जयकार कर रही थी, लेकिन वाणी के लिए वह शोर अब मायने नहीं रखता था. उसने सात्विक की ओर देखा, जिसकी आँखों में गर्व और प्रेम के आंसू थे.
अगली सुबह, हवेली का माहौल बदल चुका था. वाणी अब उस बंद कमरे के बाहर नहीं खड़ी थी. वह अंदर बैठी थी, तानपूरा उसकी गोद में था, और सामने पंडित दीनानाथ बैठे थे.
"चलो बहू," पंडित जी ने कहा, "आज हम 'राग भैरव' से शुरुआत करेंगे. और याद रखना, अब तुम्हें चुप नहीं रहना है. इस घर की दीवारों को तुम्हारी आवाज की आदत डालनी होगी."
वाणी ने मुस्कुराते हुए अपनी उंगलियां तारों पर फेरीं. यह उसके लिए सिर्फ एक कमरा नहीं था, यह उसका वह आसमान था जिसके लिए उसने अपनी अग्निपरीक्षा दी थी. और आज, वह आसमान पूरी तरह उसका था.
बाहर गंगा अब भी बह रही थी, लेकिन उसका शोर अब वाणी को डरा नहीं रहा था, बल्कि उसके सुरों के साथ ताल मिला रहा था. उसने पाया कि सम्मान मांगा नहीं जाता, उसे अपनी प्रतिभा और सत्य की आंच में तपकर कमाया जाता है. और उसने उसे कमा लिया था.
“अगर आप वाणी की जगह होते तो चुपचाप घर छोड़ देते या अपनी सच्चाई साबित करते?”
लेखिका : पुष्पा खंडेलवाल
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