मूसलाधार बारिश की आवाज़ खिड़की के शीशों से टकरा रही थी, लेकिन नंदिनी के भीतर जो तूफ़ान चल रहा था, उसका शोर उस बारिश से कहीं ज़्यादा भयानक था। वह भागते हुए अपने बाबूजी के कमरे में आई और धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर लिया। उसकी साँसें फूल रही थीं, और आँखों से बहते आँसू उसके गालों को भिगो रहे थे।
बाहर हॉल में अभी भी ऊँची आवाज़ें गूँज रही थीं। भाभी सीमा की वो कड़वी बातें उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।
"मैंने पहले ही कहा था कि ननद का इस उम्र तक घर में बैठे रहना शुभ नहीं होता। अब देख लिया न नतीजा? मेरी अलमारी से बीस हज़ार रुपये गायब हैं और चाबी सिर्फ़ नंदिनी के पास थी। और कौन लेगा?"
नंदिनी का दिल छलनी हो गया था। पैसे चोरी करने का इल्ज़ाम? वह भी उस घर में जिसे उसने अपने खून-पसीने से सींचा था? लेकिन उससे भी ज़्यादा गहरा घाव उसे तब लगा जब उसके बड़े भाई, रजत, ने भी नज़रें चुरा लीं और दबी जुबान में कह दिया, "नंदिनी, अगर ज़रूरत थी तो मांग लेती, पर चोरी क्यों की?"
भाई के उस एक वाक्य ने नंदिनी के अस्तित्व को ही नकार दिया था।
वह घिसटते हुए उस पुराने लकड़ी के पलंग के पास गई जहाँ उसके बाबूजी पिछले तीन साल से लकवे (paralysis) के कारण पड़े थे। उनका शरीर शिथिल था, जुबान खामोश थी, लेकिन आँखें... वो आज भी सब देखती और समझती थीं।
नंदिनी ने अपना सिर बाबूजी के पैरों पर रख दिया और फफक-फफक कर रो पड़ी।
"बाबूजी... आप तो सुन रहे हैं न?" वह हिचकियों के बीच बोली। "आज मुझे चोर कहा गया। उसी घर में जहाँ मैंने अपनी जवानी के दस साल होम कर दिए। जब माँ गुज़री थीं, तो रजत भैया की नौकरी नई-नई थी और सीमा भाभी घर सँभालने को तैयार नहीं थीं। आपने कहा था, 'नंदिनी, तू घर की लक्ष्मी है, इसे बिखरने मत देना।' मैंने अपनी एम.ए. की पढ़ाई बीच में छोड़ दी, अपनी शादी के लिए आए रिश्तों को मना कर दिया, सिर्फ़ इसलिए कि आपके और इस घर की देखभाल कर सकूँ।"
बाबूजी की उंगलियों में एक हल्की सी हरकत हुई। शायद वे अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखना चाहते थे, उसे सांत्वना देना चाहते थे, पर उनका लाचार शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था। उनकी आँखों के कोरों से दो बूंद आँसू लुढ़क कर तकिये में समा गए।
नंदिनी ने सिर उठाया और बाबूजी की पथराई आँखों में देखा।
"बाबूजी, आज भैया को लगता है कि मैंने बीस हज़ार रुपयों के लिए अपना ईमान बेच दिया? उन्हें याद नहीं कि जब उनकी कंपनी बंद हुई थी, तो मैंने ही अपने स्त्री-धन के कंगन बेचकर घर का राशन चलाया था? तब तो मैं चोर नहीं थी? आज सीमा भाभी को लगता है कि मैं उन पर बोझ हूँ। वे कहती हैं कि मैं मुफ्त की रोटियाँ तोड़ रही हूँ।"
नंदिनी का गला रुंध गया। उसे याद आया कि कैसे सुबह से लेकर रात तक वह मशीन की तरह खटती है। बाबूजी के डायपर बदलने से लेकर, भतीजे की स्कूल बस, रसोई का काम—सब कुछ तो उसके ही भरोसे था। और बदले में क्या मिला? एक इल्ज़ाम।
"मुझे अब यहाँ नहीं रहना बाबूजी," नंदिनी ने एक कठोर निर्णय लेते हुए कहा। "जहाँ विश्वास न हो, वहाँ रिश्ते नहीं, सिर्फ़ सौदे होते हैं। भैया और भाभी को लगता है कि मेरे पास कोई ठिकाना नहीं है, इसलिए मैं सब कुछ सह लूँगी। पर अब और नहीं।"
तभी कमरे के बाहर फिर से शोर हुआ। दरवाज़ा खटखटाया गया।
"नंदिनी! दरवाज़ा खोल," यह रजत की आवाज़ थी। "बात को बतंगड़ मत बना। सीमा गुस्से में थी, बोल दिया। तू बाहर आ, हम बैठकर बात करते हैं।"
नंदिनी ने अपनी साड़ी के पल्लू से चेहरा पोंछा। वह उठी। आज उसकी चाल में एक अलग दृढ़ता थी। उसने दरवाज़ा खोला।
सामने रजत और सीमा खड़े थे। सीमा के चेहरे पर अभी भी वही तल्खी थी, लेकिन रजत थोड़ा असहज दिख रहा था।
"नंदिनी, देख..." रजत ने बोलना शुरू किया।
तभी घर की घंटी बजी। रजत रुका। सीमा ने जाकर दरवाज़ा खोला। बाहर पड़ोस की मिसेज वर्मा खड़ी थीं, हाथ में एक लिफाफा लिए।
"अरे सीमा बेटा," मिसेज वर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारे पतिदेव आज सुबह जल्दबाजी में अपनी जैकेट मेरे पति की गाड़ी में भूल गए थे, जब वे लोग साथ में कारपूल करके गए थे। यह लिफाफा उस जैकेट की अंदरूनी जेब में था। मेरे पति ने देखा तो कहा कि ज़रूरी होगा, अभी लौटा आऊं।"
सीमा ने हड़बड़ाते हुए लिफाफा लिया। उसने उसे खोलकर देखा। उसमें वही बीस हज़ार रुपये थे।
रजत का चेहरा फक पड़ गया। उसे याद आया कि कल रात उसने ही वो पैसे अलमारी से निकालकर अपनी जैकेट में रखे थे ताकि आज बैंक में जमा कर सके, और सुबह हड़बड़ी में भूल गया।
सन्नाटा। एक गहरा, शर्मिंदा करने वाला सन्नाटा पूरे हॉल में छा गया।
मिसेज वर्मा तो लिफाफा देकर चली गईं, लेकिन पीछे छोड़ गईं एक ऐसी खामोशी जो शोर से भी ज़्यादा चुभने वाली थी।
सीमा ने नज़रें झुका लीं। रजत की हिम्मत नहीं हुई कि वह नंदिनी की आँखों में देखे।
"नंदिनी... वो..." रजत हकलाया, "मुझे याद नहीं रहा था... गलती हो गई। माफ़ कर दे।"
नंदिनी हंसी। एक खोखली, सूखी हंसी।
"माफ़ी भैया?" उसने शांत स्वर में कहा। "पैसे मिल गए, हिसाब बराबर हो गया। लेकिन जो चरित्र आपने चंद मिनटों में तार-तार कर दिया, वो कैसे वापस आएगा? जो विश्वास का धागा आज टूटा है, उसमें अब गांठ पड़ चुकी है।"
वह वापस बाबूजी के कमरे में गई और एक छोटा सा बैग लेकर बाहर आई।
"तुम कहाँ जा रही हो?" रजत घबरा गया। "पागल मत बन, घर की बात थी, ग़लतफहमी थी, ख़त्म हो गई।"
"आपके लिए ग़लतफहमी थी भैया, मेरे लिए यह मेरा 'आईना' था," नंदिनी ने कहा। "मुझे आज समझ आ गया कि इस घर में मेरी हैसियत एक नौकरानी से ज़्यादा कुछ नहीं है, जिस पर कभी भी चोरी का इल्ज़ाम लगाया जा सकता है। मैं बाबूजी की सेवा करती थी क्योंकि मैं उन्हें प्यार करती हूँ, इसलिए नहीं कि मैं लाचार हूँ।"
नंदिनी बाबूजी के पास गई, उनके चरण स्पर्श किए। बाबूजी की आँखों से अब अविरल धारा बह रही थी। वे शायद उसे रोकना चाहते थे, या शायद उसे आशीर्वाद दे रहे थे कि वह अपने स्वाभिमान के लिए खड़ी हुई।
"बाबूजी, आपकी दवाइयाँ मैंने समझा दी हैं। नर्स आती ही है। और भैया..." नंदिनी ने मुड़कर कहा, "अब घर की ज़िम्मेदारी आपको और भाभी को उठानी होगी। मैं अपनी ज़िंदगी अब अपनी शर्तों पर जिऊँगी। मेरे पास मेरी डिग्री है और मेरा आत्मसम्मान। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
नंदिनी ने मुख्य द्वार की कुंडी खोली। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन अब उसे वो बारिश डरा नहीं रही थी। उसे लग रहा था जैसे प्रकृति उसके लिए रास्ता साफ़ कर रही है।
उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उस घर में अब सिर्फ़ तीन लोग थे—एक शर्मिंदा भाई, एक पछताती हुई भाभी, और एक बिस्तर पर पड़ा पिता जो खामोश रहकर भी अपनी बेटी के इस साहसिक कदम पर गर्व कर रहा था।
नंदिनी ने जब दहलीज लांघी, तो उसकी आँखों में आँसू नहीं, एक नई सुबह की चमक थी। उसने सीख लिया था कि दूसरों की नज़रों में अच्छा बनने के लिए अपनी नज़रों में गिरना ज़रूरी नहीं है।
मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश
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