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स्वाभिमान का रंग

 यह कहानी एक ऐसी महिला की है जिसने ससुराल में हो रहे भेदभाव को आंसुओं से नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और काबिलियत से जवाब दिया।


शहर के सबसे पॉश मार्केट के उस बड़े से शोरूम में एसी की ठंडक थी, लेकिन सुमन के माथे पर पसीना चमक रहा था। चारों तरफ रंग-बिरंगे लहंगे, साड़ियाँ और अनारकली सूट सजे हुए थे। आज सुमन की ननद, प्रिया की शादी की शॉपिंग थी। सासू माँ, विमला जी, और प्रिया आगे-आगे चल रही थीं और सुमन उनके पीछे-पीछे ढेर सारे थैले उठाए चल रही थी।

सुमन की नज़र एक गहरे नीले रंग की बनारसी साड़ी पर पड़ी। वह साड़ी बेहद खूबसूरत थी। उस पर बारीक ज़री का काम था, बिलकुल वैसा जैसा सुमन को पसंद था। उसने अनजाने ही अपना हाथ उस साड़ी पर रख दिया और उसे सहलाने लगी।

तभी विमला जी की तीखी आवाज़ उसके कानों में पड़ी।

"अरे सुमन! हाथ हटा वहाँ से। जानती है उस साड़ी की कीमत क्या है? पूरे पंद्रह हज़ार! मैला कर देगी तो लेना पड़ जाएगा।"

सुमन ने झट से हाथ हटा लिया। उसने धीरे से कहा, "माँ जी, बहुत सुंदर है। क्या मैं इसे अपनी एनिवर्सरी के लिए ले सकती हूँ? अगले हफ्ते ही तो है।"

विमला जी ने अपनी नाक सिकोड़ी और व्यंग्य से हंसीं। "बहू, सपने अपनी चादर देखकर देखने चाहिए। पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं? अभी प्रिया की शादी का इतना खर्चा है। और वैसे भी, अगर तुम्हें यह साड़ी इतनी ही पसंद है, तो अपने मायके वालों से कहो न। तुम्हारे पिताजी ने शादी में दिया ही क्या था? अब यह शौक भी वही पूरे करें। हम तो अपनी बेटी के लिए आए हैं, और उसी का सामान लेंगे।"

सुमन का चेहरा फक पड़ गया। शोरूम के सेल्समैन और आस-पास खड़े कुछ ग्राहक भी यह सुनकर असहज हो गए। सुमन को वह पल याद आ गया जब घर से निकलते वक्त उसके ससुर जी ने विमला जी को पचास हज़ार रुपये अलग से दिए थे और कहा था, "विमला, दस-बीस हज़ार की कोई अच्छी साड़ी बहू को भी दिला देना, बेचारी कभी कुछ नहीं मांगती।"

लेकिन विमला जी ने वह पैसे अपने पर्स के सबसे अंदर वाले हिस्से में दबा लिए थे। प्रिया, जो अपनी माँ की लाड़ली थी, उसने भी माँ का ही पक्ष लिया, "हाँ भाभी, मम्मा सही कह रही हैं। यह साड़ी आप पर जंचेगी भी नहीं। थोड़ी 'क्लासी' चीज़ें पहना करो। और वैसे भी, भैया की कमाई पर इतना बोझ डालना ठीक नहीं।"

सुमन चुपचाप वहां से हट गई। उसकी आँखों में आंसू थे, पर उसने उन्हें गिरने नहीं दिया। उसे अपनी देवरानी, काव्या की कही बात याद आ गई। काव्या, जो दूसरे शहर में रहती थी, उसने फोन पर कहा था, "दीदी, उस घर में आपकी कद्र तब तक नहीं होगी जब तक आप आर्थिक रूप से उन पर निर्भर रहेंगी। ममी जी का स्वभाव ऐसा है कि वो बेटी पर लाखों लुटा देंगी, पर बहू को दस रुपये देने में भी उनकी जान निकलती है।"

सुमन ने उस दिन शॉपिंग में कुछ नहीं लिया। वह बस एक मूक दर्शक और सामान उठाने वाली सहायिका बनकर रह गई।

 

घर लौटने के बाद सुमन अपने कमरे में गुमसुम बैठी थी। उसका पति, निमेश, ऑफिस से आया तो उसने सुमन का उतरा हुआ चेहरा देखा।

"क्या हुआ सुमन? शॉपिंग कैसी रही? तुमने क्या लिया?" निमेश ने पूछा।

सुमन ने झूठ बोल दिया, "कुछ नहीं, मुझे कुछ खास पसंद नहीं आया।" वह निमेश को बताकर घर में क्लेश नहीं करना चाहती थी, क्योंकि वह जानती थी कि निमेश अपनी माँ के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता। विमला जी ने बचपन से ही बच्चों के दिमाग में यह भर दिया था कि माँ भगवान होती है और वह जो करती है, सही करती है।

लेकिन उस रात सुमन को नींद नहीं आई। उसने सोचा, "मैं एम.ए. पास हूँ, शादी से पहले फ्रीलांस कंटेंट राइटिंग करती थी। शादी के बाद 'घर संभालने' के नाम पर मैंने सब छोड़ दिया। और उसका सिला क्या मिला? ताने और अपमान?"

सुमन ने उसी रात अपना पुराना लैपटॉप निकाला। उस पर धूल जम गई थी—बिलकुल उसके आत्मविश्वास की तरह। उसने धूल साफ़ की और अपनी पुरानी क्लाइंट लिस्ट चेक की। उसने तय कर लिया कि अब वह 'मांगने वाली' नहीं बनेगी।

अगले दिन से सुमन की दिनचर्या बदल गई। वह सुबह 5 बजे उठती, घर का सारा काम 10 बजे तक निपटा देती। विमला जी खुश थीं कि बहू अब और जल्दी काम कर रही है। लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि दोपहर के उस खाली समय में, जब विमला जी अपनी सहेलियों से फोन पर गप्पें मारती थीं या टीवी देखती थीं, सुमन अपने कमरे में बंद होकर काम करती थी।

सुमन ने कुछ पुराने संपर्कों से बात की और उसे अनुवाद (Translation) और ब्लॉग लिखने के कुछ प्रोजेक्ट्स मिल गए। शुरुआत में पैसे कम थे, लेकिन सुमन का हौसला बुलंद था। वह रात को सबके सोने के बाद भी काम करती। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगे, लेकिन उसके चेहरे पर एक अलग तरह का तेज आने लगा था—आत्मनिर्भरता का तेज।


तीन महीने बाद: दिवाली की तैयारी

प्रिया की शादी हो चुकी थी और अब दिवाली का त्योहार सिर पर था। विमला जी का पुराना राग फिर शुरू हो गया।

"इस बार दिवाली पर रिश्तेदारों को देने के लिए बहुत सारे गिफ्ट्स लेने हैं। निमेश, तू मुझे पैसे दे देना," विमला जी ने नाश्ते की मेज पर कहा।

निमेश ने सिर हिलाया। तभी विमला जी ने सुमन की ओर देखकर कहा, "और सुन बहू, इस बार दिवाली पर तुझे वही पुरानी लाल साड़ी पहननी पड़ेगी। घर का खर्चा बहुत बढ़ गया है, तेरे लिए नए कपड़े लेने का बजट नहीं है। और तेरे मायके से तो उम्मीद करना ही बेकार है।"

सुमन ने अपनी चाय का घूंट भरा और शांत स्वर में कहा, "जी माँ जी, कोई बात नहीं।"

विमला जी मन ही मन खुश हुईं कि बहू को उसकी औकात याद है।

शाम को पूरा परिवार—विमला जी, ससुर जी, निमेश और सुमन—बाजार गया। विमला जी ने अपने लिए, निमेश के लिए और ससुर जी के लिए खूब खरीदारी की। जब भी सुमन किसी चीज़ को देखती, विमला जी उसे आँखों से ही डरा देतीं।

अंत में वे उसी महंगे शोरूम में पहुँचे जहाँ पिछली बार सुमन का अपमान हुआ था। विमला जी को एक सोने के बॉर्डर वाली शॉल पसंद आ गई। कीमत थी बीस हज़ार रुपये।

"निमेश, यह शॉल बहुत अच्छी है। कीर्तन में पहनकर जाऊँगी तो सब देखते रह जाएंगे," विमला जी ने कहा।

निमेश ने अपना वॉलेट चेक किया और हिचकिचाते हुए बोला, "माँ, इस महीने क्रेडिट कार्ड की लिमिट लगभग खत्म है और बैंक में भी बैलेंस कम है। यह थोड़ी महंगी है, अगली बार ले लेंगे?"

विमला जी का मुंह बन गया। "अरे, कैसी बात करता है? अपनी माँ के लिए इतना भी नहीं कर सकता? देख, वहां शर्मा जी की पत्नी खड़ी हैं, अगर खाली हाथ गए तो मेरी नाक कट जाएगी।"

तभी सुमन आगे बढ़ी। उसने सेल्समैन से कहा, "भैया, यह शॉल पैक कर दीजिए।"

विमला जी और निमेश दोनों ने चौंककर सुमन को देखा।

विमला जी तल्खी से बोलीं, "अरे महारानी, पैक तो करा रही है, पैसे क्या तेरे पिताजी भिजवाएंगे?"

सुमन ने उनकी बात का जवाब नहीं दिया। उसने अपने पर्स से एक चमचमाता हुआ प्लैटिनम डेबिट कार्ड निकाला और सेल्समैन के हाथ में थमा दिया।

"मैम, पिन डालिए," सेल्समैन ने मशीन आगे बढ़ाई।

सुमन ने पिन डाला। 'ट्रांजेक्शन सक्सेसफुल' की बीप के साथ रसीद बाहर आ गई।

पूरे शोरूम में सन्नाटा था। निमेश की आँखें फटी की फटी रह गईं। विमला जी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर तमाचा मार दिया हो।

"सुमन... तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आए?" निमेश ने हकलाते हुए पूछा।

सुमन ने बहुत ही सहजता से रसीद और शॉल का थैला लिया और विमला जी के हाथ में थमा दिया। फिर उसने सबकी ओर देखकर कहा, "निमेश, पिछले तीन महीनों से मैं दोबारा काम कर रही हूँ। फ्रीलांसिंग। यह मेरी मेहनत की कमाई है।"

फिर वह विमला जी की ओर मुड़ी। "माँ जी, यह शॉल मेरी तरफ से आपके लिए दिवाली का तोहफा। मेरे मायके वालों ने मुझे इतना तो सिखाया है कि बड़ों का आदर कैसे करना है और अपनी खुशियाँ कैसे खरीदनी हैं। आपने कहा था न कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते? सही कहा था। पैसे हुनर और मेहनत के पेड़ पर उगते हैं, जो मेरे पास है।"

फिर सुमन ने सेल्समैन की ओर इशारा किया, "भैया, वो नीले रंग की बनारसी साड़ी जो पिछली बार मैंने देखी थी, वो अभी भी है क्या?"

"जी मैम, बिलकुल है।"

"उसे भी पैक कर दीजिए। और हाँ, निमेश के लिए वो कुर्ता और पापा जी के लिए वो जैकेट भी।"

विमला जी के हाथ में वो बीस हज़ार की शॉल थी, लेकिन उन्हें वो शॉल अब अंगारों जैसी लग रही थी। उनका अहंकार चकनाचूर हो चुका था। जिस बहू को वे 'बेचारी' और 'परजीवी' समझती थीं, आज उसी ने भरी महफिल में उनकी लाज रखी थी और उन्हें आईना भी दिखाया था।


घर वापसी और नई सुबह

गाड़ी में घर लौटते वक्त सन्नाटा था, लेकिन यह सन्नाटा सुमन को काट नहीं रहा था, बल्कि उसे सुकून दे रहा था।

घर पहुँचकर ससुर जी ने सुमन के सिर पर हाथ रखा। "बेटा, मुझे माफ़ करना। मैं जानता था कि घर में क्या हो रहा है, पर मैं कभी कुछ बोल नहीं पाया। आज तुमने साबित कर दिया कि तुम इस घर की असली लक्ष्मी हो।"

निमेश भी सुमन के पास आया। "सुमन, मुझे नहीं पता था कि तुम काम कर रही हो। और मुझे शर्म आ रही है कि मैं अपनी पत्नी की छोटी-छोटी ख्वाहिशें पूरी नहीं कर पाया जिसकी वजह से उसे यह कदम उठाना पड़ा।"

सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा, "निमेश, यह कदम मैंने मजबूरी में नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उठाया। और यह अच्छा ही हुआ। अब मैं सिर्फ आपकी पत्नी या माँ जी की बहू नहीं हूँ, मैं 'सुमन' भी हूँ।"

विमला जी अपने कमरे में बैठी थीं। शॉल बेड पर पड़ी थी। उन्हें अपनी बेटी प्रिया का ख्याल आया, जो पिछले हफ्ते रोते हुए फोन पर कह रही थी कि उसके सास-ससुर उसे नौकरी नहीं करने दे रहे और हर खर्चे के लिए पति के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। आज विमला जी को अपनी बहू और अपनी बेटी की स्थिति में फर्क नज़र आ रहा था। उन्होंने महसूस किया कि आत्मनिर्भरता ही स्त्री का सबसे बड़ा गहना है।

अगली सुबह, जब सुमन काम करने के लिए अपना लैपटॉप लेकर बैठी, तो विमला जी हाथ में चाय का प्याला लेकर आईं।

"ले बहू, चाय पी ले। काम तो होता रहेगा," उनकी आवाज़ में वह पुराना तीखापन नहीं था, बल्कि एक झिझक भरी नरमी थी।

सुमन ने चाय का प्याला लिया और मुस्कुरा दी। उसने समझ लिया था कि सम्मान मांगा नहीं जाता, अपनी शर्तों पर हासिल किया जाता है। उस दिन उस घर में दिवाली कुछ दिन पहले ही आ गई थी—सिर्फ दीपों की नहीं, बल्कि विचारों की रोशनी के साथ।

सीख: किसी को कमजोर समझकर दबाने की कोशिश अंततः आपको ही छोटा साबित करती है। स्त्री का स्वाभिमान उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

लेखक : मनीष  त्रिवेदी


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