मोबाइल की स्क्रीन पर “माँ” लिखा चमक रहा था। उँगलियाँ कांप रही थीं। गला सूख गया था। भीतर कहीं एक डर बैठा था—फोन उठाते ही माँ सवाल करेगी, और सवालों के आगे उसका झूठ पिघल जाएगा।
पर आज मजबूरी ने हर जिद तोड़ दी। उसने कॉल रिसीव किया और जैसे ही “हाँ माँ…” कहा, उधर से माँ की आवाज़ पहले से ही तनी हुई आई—
“अब याद आई? इतने दिन से फोन नहीं… क्या समझ रखा है तूने?”
उसकी आँखें भर आईं। वर्षों का दबा हुआ दर्द एकदम से बाहर आने को मचल गया। और यह देखकर कि माँ सचमुच नाराज़ है, उसका मन और घबरा गया—क्योंकि वह जानता था, माँ का गुस्सा जितना तेज़ होता है, उतना ही जल्दी पिघलता भी है… बस एक सच्ची पीड़ा की भनक मिल जाए तो।
उसने हिचकियों के बीच कहा, “माँ…!”
बस “माँ” सुनते ही उधर सन्नाटा छा गया। फिर एकदम से माँ का स्वर बदल गया, जैसे किसी ने भीतर की सारी सख्ती निकालकर ममता रख दी हो।
“क्या हुआ रे…? रो क्यों रहा है? जल्दी बता… मेरा मन घबरा रहा है!”
वह अस्पताल के कॉरिडोर में खड़ा था। सफेद दीवारें, दवा की गंध, ट्रॉली की चरचराहट, और दूर से आती किसी बच्चे के रोने की आवाज़—सब मिलकर उसके दिल को और भारी बना रहे थे। उसने रुलाई रोकने की कोशिश की, मगर आँसू जैसे महीनों से रास्ता ढूंढ रहे थे।
“माँ…” वह फूट पड़ा, “सुमन… एक महीने से अस्पताल में भर्ती है। ऑपरेशन हुआ था… फिर इंफेक्शन… डॉक्टर रोज़ नए टेस्ट लिख देते हैं। बच्चे… घर… स्कूल… अस्पताल… मैं… मैं थक गया हूँ माँ।”
उधर माँ की सांस तेज़ हो गई। पर घबराहट में भी उसकी आवाज़ में भरोसा था।
“तू अकेला कहाँ है रे? हम हैं ना! तेरा बाप जिंदा है, मैं जिंदा हूँ। तेरे दो भाई हैं, भाभियाँ हैं। बताने में इतना दिन क्यों लगा? अभी बैठ, तू फिक्र मत कर। दो घंटे में हम सब पहुँच रहे हैं।”
उसके भीतर जैसे किसी ने बुझती हुई आग में हवा भर दी। शरीर में जान लौट आई। उसे लगा, अब सच में सब कुछ ठीक हो जाएगा।
उसने फोन काटा तो उसके हाथ कांप रहे थे, पर दिल थोड़ा हल्का था। वह वार्ड के बाहर वाली बेंच पर बैठा, जहाँ से कांच के भीतर उसकी पत्नी दिख रही थी—नीली चादर, चेहरे पर पीलापन, हाथ में सुई, आँखों में बेबसी।
उसने अंदर जाकर धीरे से कहा, “सुमन… माँ आ रही है।”
सुमन की आँखें नम हो गईं। वह धीमी आवाज़ में बोली, “सच? परिवार… आ रहा है? मुझे लगा हम… अकेले रह गए हैं।”
उसने उसकी उंगलियाँ थाम लीं। “नहीं… अब नहीं।”
दो घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि अस्पताल के बाहर शोर-सा होने लगा। रिसेप्शन की तरफ कई लोगों के कदमों की आवाज़, किसी की आवाज़—“वार्ड नंबर क्या है?” और फिर परिचित-सी सख्त लेकिन अपनापन भरी पुकार—“अरे बेटा…!”
वह बाहर दौड़ा। सामने माँ खड़ी थी—सादी सी सूती साड़ी, कंधे पर शॉल, आँखों में चिंता, पर चेहरे पर वो दृढ़ता जो सिर्फ माँ के चेहरे पर होती है। उसके साथ पिता थे—धीमे कदमों से चलते, पर निगाहों में वही पुराना हौसला। पीछे दोनों भाई और उनकी पत्नियाँ, और एक हाथ में बड़ा सा टिफिन, दूसरे में फल-दूध का थैला।
माँ ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे एक ही नजर में उसके शरीर से थकान पढ़ रही हो। फिर बिना कुछ कहे उसका चेहरा दोनों हथेलियों में लिया और बोली, “कितना दुबला हो गया है तू…!”
बस यही सुनना था। वह अपने आप पिता के सीने से जा चिपका।
“माफ कर दो पापा… मैं… मैं संभाल नहीं पा रहा था।”
पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा, आवाज़ भारी थी, “रो मत… मैं हूँ ना।”
भाई पास आए। एक ने उसके कंधे पर हल्की सी थपकी मारी, “बहुत बड़ा हो गया क्या? इतनी बड़ी बात और हमें अब बता रहा है?”
दूसरे ने आँखें तरेरीं, “हमें पराया समझ लिया था क्या?”
उसकी आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
भाभियाँ बिना देर किए वार्ड के अंदर चली गईं। एक ने सुमन के माथे पर हाथ रखा, “बहन, डर मत… हम आ गए हैं।”
दूसरी ने नर्स से बात की, डॉक्टर का नाम पूछा, रिपोर्टें मंगाईं, और तीसरी ने उसके हाथ में टिफिन पकड़ा दिया, “पहले कुछ खा ले… तेरे पेट में कुछ गया भी है?”
वह हक्का-बक्का टिफिन देखता रहा। ढक्कन खुला तो भाप उठी—घर की रोटी, दाल, हल्की सब्जी, और साथ में थोड़ी-सी खीर।
वह तीन साल से शहर में था, और तीन साल से ऐसा “घर का खाना” उसने नहीं खाया था—ऐसा खाना जो सिर्फ स्वाद नहीं, सहारा भी देता है।
उसने पहला कौर लिया तो आँखें फिर भर आईं।
“क्या हुआ?” माँ ने डाँट की तरह पूछा।
वह मुस्कुराते हुए बोला, “कुछ नहीं… बस… स्वाद से याद आ गया कि मैं… घर का ही हूँ।”
माँ ने झट से उसके सिर पर हल्की थपकी दी, “अब ड्रामा बंद कर। पहले पेट भर। फिर नहा-धोकर आ। एक महीने से तूने ठीक से सोया भी नहीं होगा।”
उसने विरोध करना चाहा, “माँ, मैं सुमन को छोड़कर…”
माँ ने तुरंत काट दिया, “यहाँ सुमन को संभालने के लिए हम हैं। तू जाकर नहा, कपड़े बदल, फिर आकर बैठना। आदमी जब खुद टूट जाता है न, तो किसी का सहारा भी ठीक से नहीं बन पाता।”
उसकी आँखें झुक गईं। वह पहली बार महसूस कर रहा था कि माँ की डाँट में कितनी दवा होती है।
घर पहुँचा तो उस किराए के कमरे में अजीब सन्नाटा था। बच्चों की किताबें मेज पर पड़ी थीं, बर्तन सिंक में, और बिस्तर वैसा ही—बिखरा हुआ। उसने नहाया। जैसे ही पानी सिर पर गिरा, महीनों की घुटन बहने लगी।
और फिर… वह बेफिक्र होकर सो गया। एक महीने बाद, उसे चैन की नींद आई।
इधर अस्पताल में, घरवालों के आने से सुमन जैसे जाग उठी। उसका चेहरा जो कल तक बुझा-बुझा था, आज हल्का लग रहा था। माँ उसके पास बैठकर भजन धीरे-धीरे गुनगुनाती रही। पिता डॉक्टर से बात करते रहे। भाई बच्चों को स्कूल से लेने गए। भाभियों ने वार्ड में भी छोटे-छोटे नियम बना दिए—कौन कब बैठेगा, कौन दवा देगा, कौन रिपोर्ट लेकर जाएगा।
डॉक्टर अगले दिन राउंड पर आया तो उसने हैरानी से कहा, “कल से मरीज का रिस्पॉन्स बेहतर है… मनोबल बढ़ गया है।”
माँ मुस्कुरा दी। “डॉक्टर साहब, दवा तो आप दे रहे हैं, पर इलाज अपनों का साथ भी करता है।”
सातवें दिन सुमन की रिपोर्ट ठीक आई। डॉक्टर ने कहा, “अब घर ले जा सकते हैं, बस सावधानी रखनी होगी।”
उस दिन वह अस्पताल के बाहर खड़ा होकर पहली बार खुलकर सांस ले पाया। उसने अपने पिता का हाथ पकड़ा, “पापा… आपने मुझे… बहुत बड़ा सबक दिया।”
पिता ने बस इतना कहा, “सबक नहीं बेटा… याद दिलाया है। परिवार का मतलब यही है—मुश्किल में साथ।”
कुछ दिन बाद जब सब वापस गांव लौटने की तैयारी करने लगे, तो वह चुपचाप बैठा रहा। भीतर एक फैसला पक्का हो चुका था।
भाई बोले, “तू यही रहेगा?”
उसने शांत स्वर में कहा, “नहीं… हम भी चलेंगे।”
माँ ने चौंककर पूछा, “क्या? शहर की नौकरी?”
वह बोला, “नौकरी फिर मिल जाएगी माँ। पर यह महीना… मैं समझ गया कि पैसा, पद… सब बाद में। पहले अपने लोग। हम अलग रहेंगे तो भी जुड़े रहेंगे। पर इतना दूर होकर नहीं कि जरूरत में आवाज़ ही न पहुँचे।”
घर पहुंचकर सुमन ने भी धीरे से कहा, “मैं भी यही चाहती हूँ… मैं चाहती हूँ कि बच्चों को दादी-दादा का आंचल मिले। जो अपनापन यहाँ मिला, वो शहर में नहीं।”
जब वे गांव पहुंचे, तो माँ ने दरवाजे पर आरती उतारी। पिता ने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखा। भाभियाँ मुस्कुराईं।
उसने पहली बार महसूस किया—भीड़ में रहकर भी अकेले होने का दर्द क्या होता है, और अपनों के बीच रहकर साधारण जिंदगी में भी कितना सुकून होता है।
रात को वह छत पर लेटा था। गांव की हवा में मिट्टी की खुशबू थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। आंगन में माँ की आवाज़ आ रही थी—“कल सुबह दूध वाला जल्दी आएगा।”
उसने आंखें बंद कर लीं। मन में एक ही बात घूम रही थी—
आजकल दोस्ती-यारी अक्सर मतलब की हो जाती है, पर संकट में जो बिना पूछे साथ खड़ा हो, वही अपना होता है।
और उसने खुद से वादा किया—
अलग रहना गलत नहीं, पर अपनों से कट जाना सबसे बड़ी भूल है।
क्योंकि अपने… तो अपने होते हैं।
उनके बिना इंसान भीड़ में भी अकेला है।
लेखिका : रश्मि गुप्ता
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