Skip to main content

ऑफिस गर्ल

 कुछ देर तक नींद में डूबे समर के चेहरे को निहारती मैं अनायास मुस्कुरा उठी। उसकी पलकों की हल्की-सी फड़कन, माथे पर बिखरे बाल… सब कुछ वैसा ही था, जैसा शादी के शुरुआती दिनों में हुआ करता था। बस फर्क इतना था कि तब इस मुस्कान में कोई डर नहीं घुलता था। आज मुस्कान के पीछे एक अनकहा तनाव भी छिपा था।

मैंने धीरे से उसके कान के पास झुककर कहा, “मुझे बहुत भूख लगी है, जनाब।”

समर ने आंखें आधी खोलीं, वही शरारती अंदाज़ लौट आया। “तो फिर भूख मिटाने के लिए…,” उसने मुझे खींचने की कोशिश की।

मैं हंसते हुए पीछे हट गई। “अभी पेट में सचमुच चूहे दौड़ रहे हैं। खाने चलो।”

“जहाँ कहो,” वह उठकर बैठ गया।

“मुझे थाई खाना है,” मैंने कहा।

“थाई ही सही,” उसने सिर हिलाया, फिर अचानक मेरे चेहरे को गौर से देखने लगा। “पर तुम ऐसे पूछ रही हो जैसे… मेरे पास पहले से कोई प्लान हो।”

मेरी धड़कन एक पल को तेज हुई। यही तो वह नाज़ुक जगह थी, जहाँ हमारी हर बात आकर अटक जाती थी। मैंने हल्की-सी हंसी में बात उड़ा दी। “मैं बस यूं ही…।”

“यूँ ही मतलब?” समर का स्वर अचानक गंभीर हो गया। “तुम फिर से माया की बात छेड़ना चाहती हो?”

मैंने झट से कहा, “नहीं! मैं… मैं तो मज़ाक कर रही थी।”

समर ने एक लंबी सांस ली। “मैं सौ बार कह चुका हूँ—माया मेरे ऑफिस की सिर्फ एक कलीग है।”

मैंने उसकी बात पर विश्वास करने की कोशिश की। सच तो यह था कि समर से मुझे प्यार था—बहुत। मगर माया का नाम आते ही वह जो “अडियल” हो जाता था, वही मेरे भीतर की जमीन हिला देता था। कभी-कभी लगता, मैं जितना भरोसा दिखाती हूँ, वह उतना ही लापरवाह हो जाता है।

मैंने बात बदलने के लिए मुस्कुराकर कहा, “चलो, तैयार हो जाओ। आज भूख पहले, बाकी बातें बाद में।”

“ओके मैडम,” समर ने मेरी तरफ एक हवा में चुंबन उछाला और बाथरूम की ओर बढ़ गया।

मैं रसोई में गई तो नजर डायनिंग टेबल पर पड़े उस बिल पर पड़ी, जो कल रात ही आया था। किराया, बिजली, और मांजी की दवाइयाँ—सब जोड़कर एक लंबा-सा हिसाब। मन में एक टीस-सी उठी। मैंने खुद से कहा, “समीरा, तुम्हें मजबूत रहना है। अगर रिश्ते की डोर ढीली पड़ने लगी तो दोनों तरफ गिरावट आएगी।”

तैयार होकर हम बाहर निकले। बारिश की हल्की बूँदें पड़ रही थीं। समर ने कार का दरवाजा खोलकर मुझे बैठाया, और मैं इस छोटे से शिष्टाचार में भी उसे अपना “पुराना समर” ढूंढने लगी।

रेस्तरां पहुँचकर हमने खाना ऑर्डर किया। समर हँस-हँस कर बात कर रहा था—ऑफिस के किस्से, मैनेजर की नकल, किसी क्लाइंट की मूर्खता। मैं भी मुस्कुरा रही थी, पर अंदर का मन अलग ही दृश्य देख रहा था—पिछले तीन महीनों का, जब मैंने कई बार रात को समर के फोन पर “माया” नाम चमकता देखा था। उसने कभी छुपाया नहीं, पर हर बार एक वाक्य जरूर था, “तुम्हें शक करने की आदत क्यों है?”

शक? या चिंता? यह फैसला करना कठिन था।

खाना आ गया। मैंने पहली बाइट ली तो स्वाद सच में शानदार था। मैंने कहा, “वाह! यह तो बहुत अच्छा है।”

समर ने हँसकर कहा, “देखा, मैंने कहा था ना—भूख पहले, बाकी सब बाद में।”

मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा। “समर… एक बात पूछूं?”

“हम्म।”

“अगर… अगर तुम्हें पता चले कि मैं किसी लड़के से बार-बार बात कर रही हूँ, मैसेज कर रही हूँ… और मैं कहूँ कि वो सिर्फ दोस्त है… तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

समर का चेहरा एकदम बदल गया। “तुम किसकी बात कर रही हो?”

“कोई नहीं,” मैंने शांत स्वर में कहा, “बस समझना चाहती हूँ।”

वह कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “दिखो, अगर तुम कुछ छुपा रही हो, तो दिक्कत है। अगर खुलकर बता रही हो, तो नहीं।”

मैंने धीरे-धीरे कहा, “समर, मैं छुपाती नहीं। बस… मुझे लगता है, तुम्हारा और माया का रिश्ता सीमा लांघने लगा है।”

उसने चम्मच रख दिया। “ओह, फिर वही बात! मेरी एक महिला दोस्त है, तो क्या मैं गलत हो गया? तुम्हें अपने ऊपर भरोसा नहीं, या मुझ पर?”

मेरे भीतर दबा हुआ दर्द अचानक बाहर निकल आया। “भरोसा है, पर तुम्हारा रवैया ऐसा हो जाता है जैसे… मैं कुछ बोलूं तो मैं ही गलत।”

समर ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए कहा, “समीरा, तुम्हें पता है माया कैसी है? वह मेरी टीम में सबसे तेज है। अगर मैं उससे प्रोफेशनल बात करता हूँ, तो तुम उसे निजी क्यों बना देती हो?”

मैंने उसकी आंखों में सीधे देखा। “क्योंकि प्रोफेशनल बात रात के दस बजे के बाद भी चलती है, और कभी-कभी रविवार को भी। और क्योंकि तुम उससे हंसकर बातें करते हो, और घर आकर चुप हो जाते हो।”

समर के चेहरे पर पहली बार असहजता उतरी। वह कुछ बोलने लगा, फिर रुक गया। उसके गले में जैसे शब्द अटक गए हों।

वह धीरे से बोला, “तुम्हें लगता है मैं…?”

“नहीं,” मैंने उसकी बात काट दी। “मुझे बस इतना लगता है कि तुम मेरे डर को गंभीरता से नहीं लेते। और डर अगर बढ़ जाए, तो इंसान गलत दरवाजे की तरफ भी मुड़ सकता है।”

यह कहते ही मुझे अपनी ही बात से झटका लगा। मेरे मन में पिछले हफ्ते का दृश्य घूम गया—जब मेरे पुराने दोस्त नील ने मुझे मदद के नाम पर लंबी कॉल की थी। मैं तब समर से नाराज़ थी, और नील की “सहानुभूति” बहुत मीठी लगी थी। मीठी चीजें ही सबसे ज्यादा नुकसान करती हैं—यह मैं जानती थी।

समर ने मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में पहली बार चिंता थी। “तुम कहना क्या चाहती हो, समीरा?”

मैंने पानी का गिलास उठाया, एक घूंट लिया, और सच बोलने का फैसला किया। “मैं कहना चाहती हूँ—मैं कमजोर पड़ रही हूँ। तुम मुझे ऐसा महसूस कराते हो जैसे मैं ज़रूरत से ज्यादा सोचती हूँ। और जब मन अकेला पड़ता है, तो कोई भी ‘समझने वाला’ अच्छा लगने लगता है।”

समर के चेहरे का रंग उड़ गया। “क्या… तुम्हारा कोई…?”

“नहीं,” मैंने तुरंत कहा, “मैंने कुछ गलत नहीं किया। लेकिन डरती हूँ, कि अगर हम ऐसे ही दूर होते गए तो… मैं खुद को भी नहीं पहचानूँगी।”

हम दोनों के बीच कुछ देर चुप्पी छा गई। रेस्तरां की भीड़, प्लेटों की आवाज, बाहर बारिश… सब चल रहा था, पर हमारी दुनिया ठहर गई थी।

समर ने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें कभी अकेला नहीं करना चाहा।”

“पर हो रहा है,” मैंने बिना गुस्से के कहा। “और दोष किसका है, यह ढूंढने से पहले… हमें यह देखना चाहिए कि बचाना क्या है।”

समर ने मेरी उंगलियों पर अपना हाथ रख दिया। “मैं मानता हूँ, मैंने माया के साथ बातचीत को हल्के में लिया। मुझे लगा तुम धीरे-धीरे समझ जाओगी। पर शायद मैं ही समझ नहीं पाया कि तुम्हें कैसा लग रहा था।”

मेरी आंखें भर आईं। “मुझे तुम्हारा झूठ नहीं चाहिए, समर। मुझे बस तुम्हारी पारदर्शिता चाहिए।”

वह धीरे से बोला, “ठीक है। आज से कुछ बातें तय करते हैं। ऑफिस की बातें ऑफिस तक। घर में मैं फोन कम इस्तेमाल करूंगा। और अगर माया का कॉल आए भी, तो तुम्हारे सामने उठाऊंगा और तुम्हें बताऊंगा कि बात क्या है।”

मैंने उसकी तरफ देखा। “और मैं भी… अपना डर समय पर बोलूंगी। चुप नहीं रहूंगी।”

समर ने सिर हिलाया। “और अगर कभी तुमको लगे कि कोई तीसरा हमारे बीच जगह बना रहा है, तो… पहले मुझसे लड़ लेना, पर किसी और से सहारा मत लेना।”

मैंने धीमे से कहा, “मैं लड़ूंगी… क्योंकि मैं यह रिश्ता बचाना चाहती हूँ।”

हमने खाना फिर से शुरू किया, पर अब स्वाद अलग था। इसमें एक राहत घुल गई थी—जैसे दिल का बोझ थोड़ा उतर गया हो।

घर लौटते वक्त कार में समर ने अचानक कहा, “समीरा, क्या तुम मुझसे नाराज़ थीं तभी नील का कॉल…?”

मैं चौंकी। “तुम्हें कैसे पता?”

उसने एक पल को आंखें सड़क पर टिकाए रखीं। “उस दिन तुम्हारे फोन पर नाम चमका था… मैंने पूछा नहीं। लेकिन आज तुम्हारी बात सुनकर… कड़ियाँ जुड़ गईं।”

मैंने सच कहा, “हां, नील ने बात की। मैंने उसे भी साफ बता दिया कि मैं शादीशुदा हूं, और मुझे सीमाएं पता हैं। पर… उसके ‘तुम बहुत स्ट्रॉन्ग हो’ जैसे शब्द अच्छे लगे। और वही डर है, समर… कि तारीफ और सहानुभूति इंसान को बहका सकती है।”

समर ने धीमे से कहा, “तो फिर आज हमने समय रहते सही बात कर ली।”

घर पहुँचते ही मांजी (सुशीला जी) ने पूछा, “खाना हो गया?”

समर ने मुस्कुराकर कहा, “हां मां, और आज हमने सिर्फ खाना नहीं… कुछ और भी ठीक किया है।”

सुशीला जी ने हमें देखा। उन्होंने शायद सब समझ लिया, क्योंकि उन्होंने बस इतना कहा, “घर का खाना गरम रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है घर का मन गरम रखना। मन ठंडा पड़ गया तो घर में रोटी भी फीकी लगती है।”

रात को जब हम अपने कमरे में आए, तो समर ने मेरा हाथ पकड़कर कहा, “समीरा… मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”

मैंने उसके कंधे पर सिर रख दिया। “और मैं भी नहीं चाहती कि एक शक, एक गलतफहमी, हमें वहां ले जाए जहां से लौटना मुश्किल हो।”

उस रात हमने कोई बड़े वादे नहीं किए। बस एक छोटा-सा नियम बना लिया—जब दिल भारी हो, तो चुप नहीं रहना। और जब कोई तीसरा दरवाजा खटखटाए, तो पहले अपने ही घर की कुंडी कसकर पकड़ लेना।

क्योंकि रिश्ता तभी टूटता है जब हम उसे बचाने की कोशिश छोड़ देते हैं—और प्यार तभी बचता है जब हम अपनी कमजोरियों को छुपाने की जगह स्वीकार कर लेते हैं।

लेखिका : अंकिता मोहित 


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...