अगली सुबह ठीक सात बजे सुलोचना जी की आँख खुल गई। नए घर में पहली रात थी, मगर नींद गहरी नहीं आई थी। उन्हें आदत थी अपने घर की—जहाँ सुबह की चूल्हे की आँच, सरसों के तेल की खुशबू और गरम-गरम पराठों की सोंधी महक से दिन शुरू होता था। यहाँ… सब कुछ चमकदार और शांत था। इतना शांत कि उन्हें अपनी साँसों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
वे उठकर हॉल में आईं। सामने दीवार पर हल्के रंग के फ्रेम, कोने में छोटा सा गमला, और सोफे पर करीने से जमे कुशन। बहू ने सच में घर को “मैगज़ीन वाला घर” बना दिया था। सुलोचना जी का मन खुश हुआ। उन्होंने धीरे से कहा, “वाह… इत्ती सलीकेदार है ये छोरी।”
उसी वक्त बहू अनुष्का रसोई में कुछ खनखनाती आवाज़ों के साथ नाश्ते की तैयारी कर रही थी। बेटा गौरव अख़बार लेकर आया और मुस्कुरा कर बोला, “माँ, कैसी लगी पहली रात?”
“रात तो ठीक है,” सुलोचना जी ने कहा, “पर घर बड़ा सुंदर सजाया है। बहू की पसंद बढ़िया है।”
गौरव के चेहरे पर गर्व चमका। “देखा? मैंने कहा था न, अनुष्का बहुत क्रिएटिव है।”
थोड़ी देर बाद सब लोग डाइनिंग टेबल पर बैठे। सुलोचना जी की नजर सीधे ढक्कन वाले बाउल्स पर टिक गई। उन्हें लगा अब ढक्कन उठेगा और अंदर से आलू की सब्जी, गरम पूरी, या कम से कम पोहा-उपमा तो दिखेगा।
अनुष्का ने मुस्कुराकर ढक्कन हटाए—एक कटोरे में कटे हुए फल, दूसरे में कॉर्नफ्लेक्स, और एक जग में दूध।
सुलोचना जी की आँखें जरा देर के लिए ठहर गईं। फिर उन्होंने नकली-सी मुस्कान चिपकाई, “ये… यही नाश्ता होता है?”
“हाँ मम्मी जी,” अनुष्का ने बड़े प्यार से कहा, “सुबह का नाश्ता हल्का और हेल्दी। आपको अच्छा लगेगा।”
गौरव ने जल्दी से समर्थन किया, “बिलकुल माँ, हेल्दी स्टार्ट जरूरी है।”
सुलोचना जी ने मन ही मन कहा—हेल्दी स्टार्ट? हमारे यहाँ तो स्टार्ट ही पराठे से होता है! मगर बोली कुछ नहीं। चम्मच उठाया, दूध में कॉर्नफ्लेक्स डाले, और ऐसे खाया जैसे परीक्षा में पेपर लिख रही हों।
नाश्ता खत्म होते-होते उनकी नजर अपने लाए बैग पर चली गई। उस बैग में घर से बना अचार, पापड़, और उनकी खास “मठरी” का डिब्बा रखा था। मन किया अभी खोलकर खा लें, मगर फिर सोचा, पहले दिन बहू के सामने क्या ही करूँ। दोपहर तक रोटी-चावल तो मिलेगा ही।
दोपहर में टेबल फिर सजा। सुलोचना जी अब ढक्कन उठाने से थोड़ा डरने लगी थीं, फिर भी उम्मीद के सहारे बैठीं। अनुष्का ने ढक्कन हटाया—सब्जी थी, पर उसकी सूरत अजीब। न ज्यादा लाल, न ज्यादा पीली… बस चमकती-सी, हल्की-सी।
पहला कौर मुँह में गया तो सुलोचना जी की भौंहें अपने आप उठ गईं। स्वाद… न जाने कैसा। न सरसों का तीखापन, न देशी घी की खुशबू। उन्होंने धीरे से बगल में बैठे गौरव को कोहनी मारी, “बेटा… ये स्वाद अटपटा नहीं लग रहा?”
गौरव के लिए तो ये स्वाद “नॉर्मल” था, क्योंकि अनुष्का का खाना अक्सर ऐसा ही होता। मगर माँ की आँखों में हल्की-सी बेबसी देखकर उसका दिल भी पसीजा और हँसी भी दबानी पड़ी। उसने होंठ दबाकर कहा, “माँ, धीरे बोलो… अनुष्का सुन लेगी।”
सुलोचना जी ने चुपचाप दो कौर और निगलने की कोशिश की। पेट में भूख के मरोड़े थे, पर जी नहीं मान रहा था। आखिर उन्होंने पूछ ही लिया, “बहू… ये खाना किस तेल में बनाती हो?”
अनुष्का खुशी से चमक उठी, “मम्मी जी, ऑलिव ऑयल। हार्ट के लिए बहुत अच्छा होता है। हल्का, साफ, हेल्दी।”
सुलोचना जी ने सिर हिलाया, लेकिन अंदर से उनका मन कर रहा था कि चिल्लाकर कहें—हमारा हार्ट तो सरसों की खुशबू से ही चलता है! उन्होंने अपने हिस्से की रोटी-सीखी-सीखी खाई, फिर आखिर में फल खाकर पेट भरा।
शाम को वे कमरे में गईं तो बैग फिर आँखों के सामने आ गया। अचार तो खोल दूँ क्या? फिर खुद को रोक लिया। अभी नहीं…
रात में सोते ही उन्हें सपना आया। सपना क्या, जैसे किसी होटल में शाही थाली लगी हो—दाल मखनी, मटर पनीर, बटर नान, सलाद, और मिठाई में उनके हाथ की गरमागरम बालूशाही। वे खुशी से थाली की ओर बढ़ीं ही थीं कि सपने में अनुष्का आ गई—सफेद एप्रन पहनकर—और मुस्कुराकर बोली, “नहीं मम्मी जी, ये सब हैवी है। ऑलिव ऑयल वाला खाना खाइए… लाइट रहेगा। है न?”
सुलोचना जी झल्ला गईं। सपने में ही चिल्ला पड़ीं, “अरे बस कर! ये ‘हेल्दी-हेल्दी’ मत लगा! मुझे नहीं खाना तेरी ऑलिव वाली सब्जी!”
“मम्मी जी… मम्मी जी…”
आवाज सुनते ही सुलोचना जी की आँख खुल गई। सामने गौरव और अनुष्का दोनों खड़े थे। गौरव मुँह दबाकर हँस रहा था। अनुष्का का चेहरा भी मुस्कान से भरा था।
सुलोचना जी शर्म से लाल हो गईं। “क्या… क्या मैं… जोर से बोल रही थी?”
गौरव हँसते-हँसते बोला, “माँ, आप तो पूरी पंचायत को सुना देतीं। आपने सपने में ऑलिव ऑयल को जेल भेज दिया।”
सुलोचना जी झेंप गईं। “अरे… मैं तो…”
अनुष्का ने आगे बढ़कर सुलोचना जी को गले लगा लिया। “मम्मी जी, आप पहले ही दिन बता देतीं न। मुझे लगा आपको पसंद आ रहा है, इसलिए मैं खुश थी। आपकी पसंद मेरे लिए ज़रूरी है।”
सुलोचना जी का गुस्सा पिघल गया। उनकी आँखें थोड़ी नम हो गईं। “बेटा, मैं… मैं बस तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती थी। नया घर, नई बहू… मैंने सोचा पहले दिन एडजस्ट कर लूँ।”
अनुष्का ने प्यार से कहा, “एडजस्टमेंट दोनों तरफ से होता है, मम्मी जी। अब ऐसा करेंगे—सुबह आपका पराठा, दोपहर सरसों तेल वाली सब्जी, और शाम को कभी-कभी मेरा हल्का खाना। हेल्दी भी रहेगा और दिल भी खुश रहेगा।”
गौरव ने तुरंत हामी भरी, “और मिठाई में… माँ की बालूशाही! डील पक्की।”
सुलोचना जी हँस पड़ीं। “और सुन बहू, मेरी बात कान खोलकर सुन लो—मेरी मठरी का डिब्बा मैं ही खोलूँगी।”
अनुष्का ने आँख मारकर कहा, “ठीक है! लेकिन फिर आप मुझे भी सिखाएँगी।”
सुलोचना जी ने पहली बार इस घर में अपनेपन की गर्मी महसूस की। उन्हें समझ आ गया—रिश्तों में स्वाद सिर्फ तेल या मसाले का नहीं होता, स्वाद होता है एक-दूसरे की सुनने की आदत का। अगर बात दिल से हो जाए, तो सरसों का तेल भी अपना लगता है और ऑलिव ऑयल भी पराया नहीं लगता।
और उस रात, जब अनुष्का रसोई में सरसों तेल का तड़का लगा रही थी, सुलोचना जी ने कमरे से आवाज़ दी, “बहू… जरा तड़का जोर का लगाना! पड़ोसियों को भी पता चलना चाहिए कि घर में माँ आई है!”
गौरव हँस पड़ा, और अनुष्का ने भी—क्योंकि अब ये घर सच में “घर” लगने लगा था।
लेखिका : रमा मिश्रा
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