“बाबू जी! आपसे कितनी बार कहा है—जो सामान जहाँ से लेते हैं, वहीं रखा कीजिए।
यह आपका घर नहीं है कि जैसे-तैसे रख देंगे और कोई कुछ नहीं बोलेगा।
ये गिलास टेबल पर क्या कर रहा है? इसे रसोई में सिंक में रख दीजिए।
थोड़ी देर में नैना ऑफिस से आएगी, तो गुस्सा करेगी। उसे बिखरा हुआ सामान बिल्कुल पसंद नहीं।
और अपना अख़बार, किताब, चश्मा, दवाई—सब यहाँ से हटाइए। ड्रॉइंग रूम साफ-सुथरा होना चाहिए।
अब तक मैं नैना के लिए कॉफी चढ़ा देता हूँ…
और प्लीज़, मेरा काम मत बढ़ाइए। समझे?”
गुस्से में रोहन अपने पिता हरिवंश सिंह से कहता हुआ रसोई में चला गया।
हरिवंश सिंह जी की आँखें उदास हो गईं। उन्होंने अपनी पत्नी सुधा देवी की तरफ देखा।
सुधा देवी ने हल्की मुस्कान के साथ इशारे से उन्हें चुप रहने को कहा।
कुछ दिन पहले ही हरिवंश सिंह जी के घुटनों का ऑपरेशन हुआ था। इलाज चल रहा था, दवाइयाँ समय पर लेनी थीं।
बेटा-बहू के शहर में इसलिए आए थे, ताकि अस्पताल की सुविधा मिल सके।
सुधा देवी ने बात बदलते हुए सामान समेटना शुरू किया और धीरे से बोलीं—
“कुछ काम का दबाव होगा, इसलिए थका हुआ है…
और ये सामान फैला देखकर नैना फिर गुस्सा करेगी।
लाइए, ये गिलास मैं अंदर रख देती हूँ।”
रसोई में जाकर सुधा देवी ने बड़े प्यार से कहा—
“अरे रोहन, तुम्हारे बाबू जी और मेरे लिए दो कप चाय बना देना। मौसम ठंडा हो रहा है…
तू कॉफी पी ले, हमें तो चाय ही अच्छी लगती है।”
रोहन झल्लाकर बोला—
“अरे मम्मी! अभी तो आप दोनों ने चाय पी थी। फिर से चाय?
थोड़ा अपने आप पर कंट्रोल रखना सीखो।
यहाँ आकर आप लोग कुछ ज्यादा ही खा रहे हो… दिन भर चाय पीते रहते हो!”
ये सुनते ही सुधा देवी जैसे ठिठक गईं।
वे बेटे के घर को अपना घर समझकर आई थीं…
पर अब उन्हें एहसास हो रहा था कि यहाँ वे “अपने” नहीं, बस “मेहमान” हैं—
जहाँ हर चीज़ नाप-तौलकर मिलती है।
रोहन चला गया।
सुधा देवी का मन भारी हो गया।
हरिवंश सिंह जी ने धीमे स्वर में कहा—
“रहने दे सुधा… मुझे चाय नहीं चाहिए।
गाँव में अपने घर में मन हुआ तो चाय पी ली, भूख लगी तो कुछ भी खा लिया…
पर यहाँ हर चीज़ के लिए मुँह ताकना पड़ता है।
क्योंकि ये हमारा घर नहीं है… बेटा समझता नहीं कि माँ-बाप का सम्मान क्या होता है।”
सुधा देवी ने आँसू दबाकर कहा—
“जी… इलाज हो जाए, फिर अपने गाँव लौट चलेंगे…
कम पढ़ी-लिखी हूँ… दवाइयों का समय, डॉक्टर—सब समझने के लिए यहाँ आना पड़ा।”
उन्हें याद आया—डॉक्टर के सामने रोहन ने एक दिन कहा था—
“मम्मी, इलाज के लिए आपके पास पूरे पैसे हैं ना?
तभी मैं आगे बात करूँगा… वरना आप देख लीजिए।”
यह बात सुधा देवी को अंदर तक तोड़ गई थी।
फसल बेचकर जो पैसे उन्होंने जुटाए थे, चुपचाप बेटे के हाथ में रख दिए…
तभी इलाज शुरू हुआ।
कुछ देर बाद बहू नैना ऑफिस से आ गई।
वह तेज़ स्वभाव की थी। सास-ससुर का हाल पूछना तो दूर—उनकी तरफ देखना भी जरूरी नहीं समझती।
शाम को घर में खाना बनाने वाली नहीं आई।
सुधा देवी की डायबिटीज की दवाइयाँ भी खत्म होने लगी थीं, उन्हें बार-बार भूख लग रही थी।
पर नैना की “रसोई” में बिना उसकी इजाज़त कोई कदम नहीं रख सकता था।
भूख असहनीय हुई तो सुधा देवी रसोई में गईं और दो ब्रेड सेकने लगीं।
तभी नैना अंदर आई… और गुस्से में उनका हाथ गर्म तवे पर दबा दिया!
“बुढ़िया! मेरी रसोई में घुसने की हिम्मत कैसे हुई?
गंदे हाथों से मेरे बर्तन छू रही है?
तुम्हारे बेटे से कहा था—तुम्हें वृद्धाश्रम में छोड़ दे!
और खबरदार! दुबारा रसोई में आई तो दूसरा हाथ भी जला दूँगी!”
सुधा देवी दर्द से चीख पड़ीं—
“हाय मेरी मैया… बहू, ऐसा मत कर… मुझे बहुत भूख लगी थी… दवा भी खत्म हो गई है…”
नैना तमतमाकर बोली—
“कोई अधिकार नहीं! भूख लगी है तो पड़ोसी से भीख माँग लो!
और हटो यहाँ से!”
सुधा देवी को धक्का देकर नैना ने बाहर निकाल दिया।
कभी-कभी रोहन काम से बाहर चला जाता…
तो नैना कई-कई दिनों के लिए रसोई में ताला तक लगा देती।
एक दिन सुधा देवी मजबूर होकर पड़ोसन रानी के दरवाज़े पहुँचीं।
दरवाज़ा खुला तो रानी ने उल्टा ताने मार दिए—
“आंटी, बार-बार दरवाज़ा क्यों ठोक रही हैं?
आप हर रोज़ किसी न किसी से खाना मांगने आ जाती हैं…
आपके बेटे-बहू आपका ख्याल नहीं रखते क्या?”
सुधा देवी शर्म से गड़ गईं।
काँपती आवाज़ में बोलीं—
“नहीं बेटा… ऐसी बात नहीं… आज के बाद नहीं आऊँगी…”
एक दिन फोन की घंटी बजी। सुधा देवी ने उठा लिया।
उधर से बेटी पायल की आवाज़ आई—
“माँ, कैसी हो?”
सुधा देवी ने आँसू छुपाकर कहा—
“ठीक हूँ बेटी… सब हमारा बहुत ख्याल रखते हैं…”
इतने में नैना की नींद खुल गई।
वह चिल्लाई—
“मेरे फोन को हाथ लगाने की हिम्मत कैसे हुई?
पहले रसोई में घुसी थीं… अब फोन!
अगर तुम्हारी बेटी ने कुछ सुन लिया, तो सज़ा तुम्हारे बीमार पति को भुगतनी पड़ेगी!”
सुधा देवी घबरा गईं और फोन काट दिया।
पर पायल सब समझ चुकी थी।
नैना झुंझलाकर बोली—
“छुट्टी वाले दिन कौन आया है? मुझे एक दिन तो चैन से रहने दो!”
दरवाज़ा खोला तो सामने पायल थी।
नैना का चेहरा उतर गया।
उसने तंज कसते हुए कहा—
“आ गईं? हमारे यहाँ डोरबेल की आवाज़ अंदर बहुत तेज़ आती है…
आपके घर में तो शायद दस्तक दी जाती है…”
और कमरे में चली गई।
रोहन ने पायल को बैठाया, ऊपर-ऊपर से बात की।
सुधा देवी बेटी को देखकर रो पड़ीं—
“बेटा, यहाँ हमारा रहना किसी को पसंद नहीं… फिर भी तुम क्यों आती हो?”
उसी वक्त पायल की नजर माँ के जले हाथ पर पड़ी।
“माँ! ये कैसे जला? सच बताओ!”
सुधा देवी ने पहले टाला… फिर रोते हुए सब बता दिया—
भूख, ताला, तवे का जुल्म, पड़ोसियों से अपमान…
पायल की आँखें भर आईं।
उसने बैग से दवा निकाली, माँ के हाथ पर लगाई और बोली—
“माँ, चलो मेरे साथ… बाबू जी का इलाज वहाँ भी हो सकता है।”
पर सुधा देवी बोलीं—
“बेटी के घर माँ-बाप का रहना अच्छा नहीं…
जब बेटे का घर अपना नहीं, तो बेटी का घर कैसे अपना मानें?”
हरिवंश सिंह जी ने गहरी साँस ली—
“बस बहुत हुआ… अब यह अपमान नहीं सहूँगा। चलो वापस गाँव।”
कुछ समय बाद नैना ने अपनी बर्थडे पार्टी रखी।
मेहमान आए… रिश्तेदार आए… और पायल का पति अमित भी परिवार सहित आया।
पायल घर सजाने लगी—तोरण लगाने लगी।
नैना ने रोक दिया—
“ये ओल्ड फैशन चीजें मेरे घर में मत लगाइए।
और मेरे घर में बिना मुझसे पूछे एक पत्ता भी नहीं हिलेगा!”
फिर वह सीमा (सुधा) पर तंज कसने लगी—
“मम्मी जी, अपनी बेटी को समझाइए…”
मेहमानों के सामने बात बढ़ गई।
नैना ने अपमान की हद पार कर दी—
अमित पर भी ताना मार दिया।
अमित ने शांति से कहा—
“मम्मी जी, आप क्यों माफी मांग रही हैं?
जब बेटा सम्मान नहीं दे पा रहा, तो आप इस घर में क्यों रह रही हैं?
आप हमारे घर चलिए… आप हमारे भी माता-पिता हैं।”
नैना भड़क गई—
“नंदोई जी! आपको हमारे घर के मामले में बोलने का हक किसने दिया?
अपनी बीवी को लेकर निकल जाइए!”
बस… यही सुनते ही सुधा देवी का सब्र टूट गया।
उन्होंने नैना के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया—
“बेशर्म औरत!
ना अपने माँ-बाप की इज्जत, ना सास-ससुर की!
दामाद पर बोलने का अधिकार किसने दिया?”
फिर हरिवंश सिंह जी आगे आए—
“अब बस!
हम गाँव जाकर इलाज करवा लेंगे…
और इस घर में अब तुम भी नहीं रहोगी।”
उन्होंने रोहन की तरफ देखा—
“तूने टैक्स बचाने के लिए घर के कागज़ात पर मेरे साइन करवाए थे।
इस घर में पैसे मेरे लगे हैं।
अब या तो पैसे लौटाओ, या घर खाली करो… वरना मैं पुलिस में शिकायत कर दूँगा।”
रोहन माफी मांगने लगा।
पर हरिवंश सिंह जी ने उसे थप्पड़ मारकर कहा—
“जब माता-पिता की इज्जत नहीं कर सकता, तो बेटा कहलाने लायक नहीं।”
अगले दिन दामाद अमित ने सास-ससुर का टिकट करवाया और सम्मान से गाँव भेज दिया।
वहाँ वे चैन से रहने लगे।
उधर रोहन और नैना को घर खाली करना पड़ा।
नैना के माँ-बाप ने भी उसे शरण नहीं दी—
“जो सास-ससुर की इज्जत नहीं कर सकी, वो हमारे घर में रहने लायक नहीं।
जो बोया है, वही काटना पड़ेगा।”
पायल ने भी भाई-भाभी से रिश्ते तोड़ दिए—
क्योंकि जहाँ इज्जत नहीं, वहाँ रिश्ता नहीं।
दोस्तों, यही है जिंदगी का नियम—
जो जैसा करता है, वह वैसा भरता है।
लेखक : शैलेंद्र : अग्रवाल
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