आज 70 वर्षीय ठकुराइन शांति देवी बेहद परेशान थीं। वह कमरे में टहल रही थीं। बार-बार उनके मन में एक ही बात घूम रही थी और उसे सोचते ही उनका शरीर काँप उठता।
“नहीं… मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता…”
वह खुद को समझातीं, फिर भी डर उनके चेहरे पर साफ दिखता।
पसीने से तरबतर शांति देवी का गला सूख गया। वह रसोई की ओर पानी पीने चली गईं।
रसोई में उनकी बहू मीतू जग से गिलास में पानी भर रही थी। गिलास भर चुका था, लेकिन मीतू अनजाने में लगातार पानी उड़ेलती जा रही थी। पानी बाहर गिरकर फर्श पर फैलने लगा।
शांति देवी ने पुकारा—
“मीतू बेटा… मीतू!”
आवाज़ सुनते ही मीतू चौंकी।
शांति देवी बोलीं, “बेटा, ध्यान कहाँ है? सारा पानी फर्श पर फैल गया।”
मीतू घबरा गई—
“अरे माँ जी, ध्यान नहीं रहा… अभी साफ करती हूँ।”
वह जल्दी से पोछा लेने भागने लगी।
शांति देवी ने उसे रोक दिया—
“नहीं बेटा, तुम रहने दो। हरिया साफ कर देगा।”
मीतू को यूँ घबराया देखकर शांति देवी का शक और गहरा हो गया। कई दिनों से मीतू पहले जैसी नहीं थी। जो बहू दिन भर चहकती रहती थी, अब बिल्कुल चुप और उदास रहने लगी थी।
शांति देवी ने हरिया को आवाज़ दी—
“हरिया, फर्श साफ कर देना।”
फिर मीतू ने पूछा—
“माँ जी, आपको कुछ चाहिए था?”
“हाँ बेटा… पानी पीने आई थी।”
मीतू बोली—
“आप बैठिए, मैं पानी ले आती हूँ।”
शांति देवी ने प्यार से समझाया—
“बेटा, तुम्हारा नौवां महीना चल रहा है। तुम्हें आराम करना चाहिए। खुश रहो।”
मीतू ने झूठी मुस्कान से कहा—
“माँ जी, बस कमरे में बैठ-बैठकर बोर हो गई थी…”
लेकिन शांति देवी अब और नहीं रुक पाईं।
उन्होंने कहा—
“हरिया, मेरे लिए चाय और बहू के लिए एक गिलास जूस मेरे कमरे में रख जाना।”
और मीतू का हाथ पकड़कर उसे अपने कमरे में ले आईं।
मीतू घबराकर बोली—
“माँ जी, आप परेशान क्यों हैं? मुझे ऐसे कहाँ ले जा रही हैं?”
शांति देवी ने उसे बिस्तर पर बिठाया, खुद पास की कुर्सी पर बैठ गईं और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—
“बेटा, मैं तुम्हें कई दिनों से उदास देख रही हूँ। इन दिनों तुम्हें खुश रहना चाहिए, दुखी नहीं।”
हरिया चाय और जूस रखकर चला गया। शांति देवी ने दरवाज़ा बंद करवा दिया।
उन्होंने नरमी से पूछा—
“बेटा, क्या हमारी किसी बात का बुरा लगा? मैं तुम्हारी माँ जैसी हूँ… बताओ, क्या बात है?”
मीतू ने घबराकर कहा—
“नहीं माँ जी… आप तो मेरा ख्याल अपनी बेटी जैसा रखती हैं…”
“तो फिर क्या बात है?” शांति देवी ने फिर पूछा।
मीतू की आँखें भर आईं। वह कुछ पल चुप रही, फिर टूटते हुए बोली—
“माँ जी… आप जानती हैं… पहले मेरी दो बेटियाँ हैं… अगर इस बार भी बेटी हुई तो…
डॉक्टर ने कहा है कि इसके बाद मैं माँ नहीं बन पाऊँगी…”
उसकी आवाज़ काँपने लगी।
“माँ जी, अगर इस बार भी बेटा नहीं हुआ… तो ठाकुर वीर प्रताप वारिस के लिए दूसरी शादी कर लेंगे… फिर मेरा क्या होगा? मैं कहाँ जाऊँगी? इतनी ज़मीन-जायदाद कौन संभालेगा?”
कहते-कहते मीतू शांति देवी की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगी।
शांति देवी की आँखें भी नम हो गईं। उन्होंने उसे संभाला—
“बेटा, डर मत। मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
मीतू रोते हुए बोली—
“माँ जी, उन्हें कौन समझाएगा?”
शांति देवी ने गहरी साँस ली और बोलीं—
“बेटा, आज मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी की एक कहानी सुनाती हूँ। शायद तुम्हारी समस्या का हल उसी में हो…”
(बीच की पुरानी कहानी — अब सुधरी और नाम बदले)
आज से 30 साल पहले, सुल्तानपुर के बड़े जमींदार थे ठाकुर अजय प्रताप। धन-दौलत, इज़्ज़त—सब कुछ था, लेकिन एक कमी थी—वंश का वारिस।
तीन बेटियों के बाद भी बेटा न होने पर वह अपनी पत्नी को दूसरी शादी की धमकी देने लगे। उनकी पत्नी ठकुराइन शांति देवी भीतर ही भीतर टूटती जा रही थीं, मगर घर की मर्यादा के कारण किसी से कह नहीं पातीं।
घर में उन्हें पालने वाली 70 वर्षीय दाई माँ धनवती थीं। एक दिन शांति देवी ने रोते हुए अपना दुख दाई माँ से कह दिया।
दाई माँ ने एक प्रसिद्ध वैद्य हरिनाथ जी के पास ले चलने की बात कही।
पर अनुमति जरूरी थी, इसलिए दाई माँ ने बड़ी ठकुराइन कमला देवी से बात की।
कमला देवी ने कहा—
“अगर इससे घर का वंश चलेगा, तो जाओ… मगर यह बात बाहर न जाए।”
शांति देवी दाई माँ के साथ वैद्य जी के पास पहुँचीं। वैद्य जी ने नब्ज देखकर कहा—
“बेटी, तुम स्वस्थ हो… जरूरी नहीं कमी स्त्री में ही हो… पुरुष में भी हो सकती है।”
उन्होंने तीन पुड़िया दीं—
“यह तीन दिन अपने पति को खिलाना।”
शांति देवी घबरा गईं… यह बात पति को कैसे कहें?
उन्होंने बुद्धि से काम लिया—
“यह बांके बिहारी का प्रसाद है, तीन दिन खाना है।”
और दही-शक्कर में मिलाकर पति को खिला दिया।
कुछ समय बाद घर वालों ने दूसरी शादी की तैयारी शुरू कर दी। शांति देवी अंदर से टूट गईं।
एक दिन वह पति के कुर्ते से लिपटकर रो रही थीं, तभी ठाकुर अजय प्रताप पीछे खड़े हो गए।
उन्होंने शांति देवी का हाथ पकड़कर कहा—
“मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। बेटे की चाह में मैं अपना प्यार नहीं खो सकता।
मुझे ऐसे बेटे की जरूरत नहीं, जो हमारे प्रेम को खत्म कर दे।”
उन्होंने दूसरी शादी से मना कर दिया।
कुछ महीने बाद शांति देवी गर्भवती हुईं। और प्रसव के दिन संकट आया—दाई माँ बोलीं,
“मालिक, माँ या बच्चा… एक को बचाना पड़ेगा।”
ठाकुर अजय प्रताप बोले—
“मुझे मेरी पत्नी चाहिए… बेटा नहीं।”
पर भगवान की कृपा से माँ और बच्चा—दोनों बच गए।
इस बार बेटा हुआ और हवेली खुशियों से भर गई।
वापस वर्तमान में
कहानी खत्म करके शांति देवी बोलीं—
“मीतू… वो ठकुराइन मैं ही थी।”
मीतू दंग रह गई—
“क्या सच में, माँ जी… आप?”
शांति देवी की आँखें भर आईं—
“हाँ बेटी… और तुम्हारे ससुर ने बेटे से ज्यादा अपनी पत्नी को चुना था।”
तभी दरवाज़ा खुला। सामने ठाकुर वीर प्रताप खड़े थे।
वह दौड़कर माँ के चरणों में गिर पड़े—
“माँ… मुझे माफ कर दीजिए। आज मैंने पहली बार पिताजी की असली कहानी सुनी…
और मैं अपनी पत्नी को रोज़ बेटे के लिए डराता रहा…”
वह मीतू का हाथ पकड़कर बोला—
“मीतू, मुझे माफ कर दो। मैं गलत था।”
मीतू रोते हुए मुस्कराई—
“सुबह का भूला अगर शाम को लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते…”
तीनों ने एक-दूसरे को गले लगाया।
शांति देवी के चेहरे पर सुकून था—
आज उनका बेटा गलत रास्ते पर जाने से बच गया था।
लेखक : रमेश मल्होत्रा
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