शेखर और अंजलि के घर जब शादी के आठ साल बाद किलकारी गूंजी, तो पूरा मोहल्ला झूम उठा था। ढोल-नगाड़े बजे, मिठाइयां बंटीं और बधाई देने वालों का तांता लग गया। हर कोई नन्हे 'आरव' की सुंदरता की तारीफ करते नहीं थकता था। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें और घुंघराले बाल देखकर लोग कहते, "बिल्कुल राजकुमार जैसा है।"
लेकिन समय का पहिया घूमा और वही समाज, जो कल तक आरव के जन्म पर उत्सव मना रहा था, अब तीन साल बाद अंजलि और शेखर को दया और सहानुभूति की नज़रों से देखने लगा था। कारण था आरव की 'खामोशी'। तीन साल का होने के बावजूद आरव ने अब तक एक शब्द भी नहीं बोला था। वह अपनी ही दुनिया में खोया रहता, न किसी से आँख मिलाता, न नाम पुकारने पर पलटकर देखता। डॉक्टर ने जब 'ऑटिज्म' शब्द का इस्तेमाल किया, तो शेखर और अंजलि की दुनिया एक पल के लिए थम गई थी।
लेकिन समाज का रवैया बीमारी से ज्यादा तकलीफदेह था।
एक शाम, पड़ोस की शर्मा चाची घर आईं। उन्होंने आरव को फर्श पर एक ही खिलौने को बार-बार गोल घुमाते देखा। उन्होंने अपनी नाक सिकोड़ी और अंजलि से कहा, "अरे अंजलि, अभी तक नहीं बोला? मैंने तो पहले ही कहा था, प्रेगनेंसी में तुमने ग्रहण के समय कुछ खा लिया होगा, उसी का असर है। किसी बाबा को दिखाओ, या फिर... दूसरा बच्चा प्लान कर लो। बुढ़ापे का सहारा तो चाहिए न। यह तो... भगवान जाने इसका क्या होगा।"
अंजलि के हाथ में चाय का कप कांप गया। यह ताना नया नहीं था। कोई उसे 'मंदबुद्धि' कहता, तो कोई 'पागल'। जो लोग कल तक आरव को गोद में लेने के लिए झगड़ते थे, अब वे अपने बच्चों को आरव से दूर रखने लगे थे। पार्क में जब आरव दूसरे बच्चों के पास जाता, तो उनकी माएं उन्हें खींच लेतीं, "बेटा, दूर रहो, वो तुम्हें मार देगा।" जबकि आरव तो बस उनके खिलौने के रंगों को छूना चाहता था।
शुरुआत में शेखर और अंजलि टूट गए। वे रातों को रोते, खुद को कोसते और डॉक्टरों के चक्कर काटते। लेकिन एक रात, जब शेखर ने देखा कि अंजलि आरव को सीने से लगाए सिसक रही है, तो उसने फैसला किया कि अब बहुत हो गया।
उसने अंजलि के आंसू पोंछे और कहा, "अंजलि, दुनिया को जो सोचना है सोचने दो। आरव बीमार नहीं है, वह बस अलग है। अगर हम ही उस पर भरोसा नहीं करेंगे, तो यह दुनिया उसे कभी नहीं अपनाएगी। आज से हम समाज की नहीं, अपने बेटे की सुनेंगे—भले ही वह जुबान से कुछ न बोले।"
उस दिन के बाद से, अंजलि और शेखर ने अपने घर के दरवाजे नकारात्मकता के लिए बंद कर दिए। उन्होंने रिश्तेदारों के ताने, पड़ोसियों की 'मुफ्त सलाह' और समाज की दया को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। उनकी दुनिया अब सिर्फ आरव के इर्द-गिर्द सिमट गई थी।
आरव का पालन-पोषण किसी तपस्या से कम नहीं था। जहाँ दूसरे माँ-बाप अपने बच्चों के स्कूल के नंबरों पर खुश होते, वहीं अंजलि और शेखर की खुशियां बहुत छोटी, मगर बहुत गहरी थीं।
उन्हें खुशी तब मिलती जब आरव पहली बार अंजलि की आँखों में देखता। उन्हें खुशी तब होती जब शेखर के ऑफिस से आने पर आरव हल्का सा मुस्कुरा देता। आरव का अपने आप चम्मच पकड़ना, अपनी पानी की बोतल मांगना (इशारे से)—ये छोटी-छोटी चीजें उनके लिए किसी ऑस्कर जीतने से कम नहीं थीं।
अंजलि ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी ताकि वह आरव को 'स्पीच थेरेपी' दे सके। शेखर ने अपने दोस्तों के साथ पार्टी करना छोड़ दिया ताकि वह शाम को आरव के साथ समय बिता सके। लोग कहते, "इन्होंने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली एक ऐसे बच्चे के पीछे जिसका कोई भविष्य नहीं है।"
लेकिन उन्हें नहीं पता था कि आरव के पास एक अद्भुत उपहार था।
एक दिन, जब आरव सात साल का था, शेखर ने देखा कि आरव दीवार पर कुछ बना रहा है। पहले शेखर को लगा कि उसने दीवार गंदी कर दी है, लेकिन पास जाने पर वह दंग रह गया। आरव ने कोयले के एक टुकड़े से खिड़की के बाहर बैठे कबूतर का हूबहू चित्र बनाया था। उसकी रेखाओं में जो परिपक्वता थी, वह किसी सात साल के बच्चे की नहीं, बल्कि एक मंझे हुए कलाकार की थी।
शेखर ने अंजलि को बुलाया। दोनों उस चित्र को देखते रह गए। आरव के पास शब्द नहीं थे, लेकिन उसके पास 'रंग' थे। वह जो बोल नहीं पाता था, उसे कैनवास पर उतारने लगा।
अंजलि और शेखर ने आरव की इस प्रतिभा को ही उसकी आवाज़ बनाने की ठानी। उन्होंने उसे महंगे स्कूल से निकालकर एक आर्ट स्कूल में डाला, जहाँ उसे समझा जा सकता था। घर अब कागजों, कैनवास और रंगों से भर गया था। आरव घंटों पेंटिंग करता रहता। जब वह पेंटिंग करता, तो उसका चेहरा शांत हो जाता, उसकी बैचेनी गायब हो जाती।
सालों बीतते गए। संघर्ष कम नहीं हुआ था। आरव को कई बार मेलtdowns (घबराहट के दौरे) होते, वह भीड़ में डर जाता, लेकिन शेखर और अंजलि ढाल बनकर उसके साथ खड़े रहते। रिश्तेदारों ने आना छोड़ दिया था क्योंकि उन्हें आरव का 'अजीब व्यवहार' बर्दाश्त नहीं था।
जब आरव अठारह साल का हुआ, तो शहर की सबसे बड़ी आर्ट गैलरी में एक प्रतियोगिता आयोजित हुई। शेखर ने आरव की कुछ पेंटिंग्स वहां भेजीं।
प्रतियोगिता के दिन, गैलरी खचाखच भरी थी। शहर के बड़े-बड़े आलोचक और अमीर लोग वहां मौजूद थे। शेखर और अंजलि, आरव का हाथ कसकर पकड़े हुए कोने में खड़े थे। आरव शोर से घबरा रहा था, उसने अपने कानों पर हेडफोन लगा रखे थे।
तभी जजों ने विजेता का नाम घोषित किया।
"और इस साल का 'यंग विजनरी आर्टिस्ट अवार्ड' जाता है... आरव मेहरोत्रा को, उनकी पेंटिंग 'द साइलेंट स्क्रीम' (खामोश चीख) के लिए।"
हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। शेखर और अंजलि की आँखों से आंसू बह निकले। वे आरव को मंच पर ले गए। आरव को समझ नहीं आ रहा था कि लोग तालियां क्यों बजा रहे हैं, लेकिन उसने अपनी माँ की भीगी हुई आँखें देखीं और धीरे से अपना अंगूठा अंजलि के गाल पर फेरा—जैसे कह रहा हो, 'माँ, रोना नहीं'।
उस शाम, आरव की पेंटिंग को एक विदेशी कला प्रेमी ने दस लाख रुपये में खरीदा। लेकिन शेखर और अंजलि के लिए वह दस लाख मायने नहीं रखते थे। उनके लिए मायने रखता था वह पल, जब वही शर्मा चाची (जो सालों पहले ताने देती थीं) भीड़ चीरकर उनके पास आईं।
शर्मा चाची ने अंजलि का हाथ पकड़ा और बोलीं, "अंजलि, मुझे माफ कर देना। मैं हमेशा कहती थी कि यह लड़का तुम दोनों पर बोझ है। लेकिन आज समझ आया कि भगवान ने इसे कुछ कम दिया, तो बहुत कुछ ज्यादा भी दिया। तुमने पत्थर को तराश कर हीरा बना दिया।"
अंजलि ने विनम्रता से मुस्कुराते हुए कहा, "चाची जी, वह पहले दिन से ही हीरा था। बस आप लोगों को जौहरी वाली नज़र नहीं थी। हमने कभी इसे बोझ नहीं समझा, यह तो हमारी पूंजी है।"
प्रदर्शनी के बाद, मीडिया वाले आरव का इंटरव्यू लेने आए। वे आरव से सवाल पूछ रहे थे, लेकिन आरव चुप था। वह बस मुस्कुरा रहा था।
शेखर ने माइक थामा और कहा, "मेरा बेटा बोलता नहीं है, यह महसूस करता है। और आज इसने अपनी रंगों की भाषा से आप सबको वह सुना दिया जो हम पिछले अठारह सालों से सुन रहे हैं। दुनिया के लिए यह 'स्पेशल चाइल्ड' हो सकता है, लेकिन हमारे लिए यह बस हमारा बेटा है, जिसने हमें सिखाया कि प्यार करने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती।"
घर लौटकर, रात को जब आरव सो गया, तो शेखर और अंजलि बालकनी में बैठे थे।
शेखर ने अंजलि के कंधे पर सिर रखा। "याद है अंजलि? लोग कहते थे कि दूसरा बच्चा कर लो, बुढ़ापे का सहारा चाहिए। आज उसी आरव ने हमारा नाम रोशन कर दिया।"
अंजलि ने आसमान में चमकते तारों को देखा और कहा, "शेखर, समाज की दिक्कत यह है कि वह 'सामान्य' होने को ही 'सही' होना मानता है। अगर हम भी समाज की बात मानकर आरव को बदलने की कोशिश करते, तो शायद आज हम एक बेहतरीन आर्टिस्ट को खो देते। हमने बस उसे वैसा ही प्यार किया जैसा वह था।"
आरव की सफलता ने समाज का मुंह बंद कर दिया था, लेकिन शेखर और अंजलि के लिए जीत यह नहीं थी। उनके लिए जीत वह सुबह थी, जब आरव अपनी पेंटिंग ब्रश लेकर उनके पास आता और इशारों में कहता—'देखो'।
उस रात, वे दोनों चैन की नींद सोए। उन्हें पता था कि उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ है, दुनिया अभी भी आरव के लिए कठिन जगह है। लेकिन उन्हें यह भी पता था कि उन्होंने अपनी खुशियाँ किसी और की शर्तों पर नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर खोजी हैं। जो लोग कल तक उनके 'दुख' पर चर्चा करते थे, आज वे उनकी 'परवरिश' की मिसालें दे रहे थे।
लेकिन शेखर और अंजलि के लिए, आरव का कैनवास पर एक नया रंग भरना, समाज की हजारों तालियों से कहीं ज्यादा कीमती था। और यही वह पूंजी थी, जिसे उन्होंने दुनिया की नज़रों से बचाकर, अपने प्यार से सींचा था।
संदेश: माता-पिता का विश्वास बच्चे की सबसे बड़ी ताकत होती है। जब दुनिया किसी बच्चे में कमियां ढूंढ रही हो, तब माता-पिता का उसे 'जैसा है वैसा अपनाना' ही चमत्कार कर सकता है।
लेखिका : अपर्णा मिश्रा
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