संगमरमर के विशाल बरामदे में झूमर की रोशनी ऐसे बिखर रही थी जैसे आकाश से तारे टूटकर ज़मीन पर आ गिरे हों। शहर के सबसे रईस उद्योगपति, रायसाहब विक्रमजीत सिंह की इकलौती वारिस, 'अवनि' का इक्कीसवां जन्मदिन था। चारों तरफ विदेशी फूलों की सजावट थी, शहर का हर बड़ा चेहरा वहां मौजूद था, और हवा में महंगे इत्र और वाइन की महक घुली हुई थी।
दूर एक कोने में खड़ी 'काव्या', अवनि को एकटक देख रही थी। काव्या, अवनि की कॉलेज की दोस्त थी—शायद 'दोस्त' कहना पूरी तरह सही न हो, क्योंकि अवनि की दुनिया में दोस्ती की परिभाषा भी अलग थी। काव्या एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी और स्कॉलरशिप पर उसी कॉलेज में पढ़ती थी जहाँ अवनि अपनी लग्जरी कार से, चार बॉडीगार्ड्स के साये में आती थी।
काव्या ने देखा कि अवनि मंच पर खड़ी केक काट रही है। उसके माता-पिता, विक्रमजीत और नलिनी देवी, उसके दोनों तरफ खड़े थे। उनके चेहरों पर गर्व और संतोष था। अवनि ने एक बेहद कीमती डिज़ाइनर गाउन पहना था, गले में हीरो का हार था जिसकी कीमत शायद काव्या के पूरे मोहल्ले की कुल संपत्ति से भी ज्यादा होगी। जैसे ही उसने केक काटा, तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा।
लेकिन काव्या की नज़रें अवनि की आँखों पर थीं। उन आँखों में वो चमक नहीं थी जो एक इक्कीस साल की लड़की की आँखों में होनी चाहिए। वहां एक अजीब सा, गहरा और डरावना सन्नाटा था। एक ऐसा खालीपन, जो हीरों की चमक से भी नहीं छिप पा रहा था।
काव्या सोचने लगी, "अवनि के पास क्या नहीं है? विक्रमजीत सिंह की सत्ता, नलिनी देवी का लाड़-प्यार। घर में नौकरों की फ़ौज है। अवनि के मुंह से शब्द निकलने से पहले उसकी इच्छा पूरी हो जाती है। पूरे कॉलेज में लड़कियां उसकी लाइफस्टाइल से जलती हैं। उसे कभी बस के धक्के नहीं खाने पड़े, कभी फीस भरने के लिए पिता को चिंतित नहीं देखना पड़ा, कभी अपनी पसंद की ड्रेस के लिए सेल का इंतज़ार नहीं करना पड़ा। फिर भी... अवनि खुश क्यों नहीं है?"
तभी पार्टी का शोरगुल काव्या को चुभने लगा। वह भीड़ से हटकर एक शांत कोने में, बगीचे की तरफ जाने वाली सीढ़ियों पर जाकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद, उसे किसी के आने की आहट हुई। उसने मुड़कर देखा—अवनि थी।
अवनि ने अपने हाथ में पकड़ा शैंपेन का गिलास साइड में रखा और अपनी हाई हील्स उतारकर ठंडी घास पर नंगे पैर खड़ी हो गई।
"तुम यहाँ क्यों आ गई अवनि? अंदर सब तुम्हें ढूंढ रहे होंगे," काव्या ने पूछा।
अवनि ने एक फीकी मुस्कान दी, "ढूंढ रहे हैं? नहीं काव्या, वो अवनि को नहीं ढूंढ रहे। वो 'विक्रमजीत सिंह की बेटी' को ढूंढ रहे हैं, उस गुड़िया को ढूंढ रहे हैं जिसे वो अपनी शानो-शौकत की नुमाइश के लिए सजाकर रखते हैं।"
काव्या ने हैरानी से उसे देखा। "यह तुम क्या कह रही हो अवनि? तुम्हारे माता-पिता तुमसे इतना प्यार करते हैं। तुम्हारी एक मुस्कान के लिए वो दुनिया कदमों में रख देते हैं।"
अवनि ने गहरी सांस ली और आसमान की ओर देखा। "प्यार? क्या इसे प्यार कहते हैं काव्या? या यह एक खूबसूरत क़ैद है?"
अवनि आकर काव्या के पास सीढ़ियों पर बैठ गई। उसका कीमती गाउन धूल में सन रहा था, लेकिन उसे परवाह नहीं थी।
"काव्या, क्या तुम्हें पता है भूख क्या होती है?" अवनि ने अचानक पूछा।
काव्या सकपका गई। "मतलब?"
"मतलब यह कि मुझे आज तक कभी भूख लगने का अहसास ही नहीं हुआ। मेरे भूख लगने से पहले ही मेरे सामने दुनिया भर के व्यंजन सजा दिए जाते हैं। क्या तुम्हें पता है कि थकना क्या होता है? मैं कभी नहीं थकी, क्योंकि मुझे कभी पैदल चलने ही नहीं दिया गया। अगर मैं कॉलेज के कॉरिडोर में भी तेज़ चलूं, तो पीछे से बॉडीगार्ड दौड़ पड़ता है कि कहीं 'मैम' गिर न जाएं।"
काव्या चुपचाप सुनती रही। अवनि के अंदर का ज्वालामुखी आज फट रहा था।
"तुम्हें पता है काव्या, उस दिन जब हम कॉलेज कैंटीन में बैठे थे और तुम अपनी माँ के हाथ की बनी सूखी सब्ज़ी और पराठा खा रही थी... और तुम्हारे टिफिन से तेल रिसकर तुम्हारी कॉपी पर लग गया था, तुम परेशान हो गई थीं। लेकिन मैं... मैं तुम्हें रश्क (जलन) से देख रही थी।"
"मुझसे जलन? क्यों?" काव्या ने अविश्वास से पूछा।
"क्योंकि तुम्हारी वो परेशानी 'असली' थी। तुम्हारा वो जीवन 'असली' था। मेरा जीवन एक स्क्रिप्टेड नाटक है, काव्या। मेरे लिए फैसले मेरे पैदा होने से पहले ही ले लिए गए थे। मैं क्या पहनूंगी, क्या खाऊंगी, किससे मिलूंगी, यहाँ तक कि मैं क्या सोचूंगी—यह सब तय है। मेरी माँ, नलिनी देवी, मुझे धूप में नहीं निकलने देतीं कि रंग सांवला पड़ जाएगा। मेरे पिता मुझे अकेले बाज़ार नहीं जाने देते कि कहीं कोई मुझे अगवा न कर ले। सुरक्षा के नाम पर उन्होंने मेरे चारों तरफ एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है।"
अवनि की आँखों में आंसू आ गए। "लोग कहते हैं मैं 'चांदी का चम्मच' लेकर पैदा हुई हूँ। लेकिन सच तो यह है कि मैं एक 'अपाहिज' हूँ, काव्या। एक मानसिक अपाहिज। मुझे दुनियादारी की कोई समझ नहीं है। अगर आज मेरे पिता की दौलत हटा दी जाए, तो मैं एक सड़क पार नहीं कर सकती, मैं दुकान से एक ब्रेड का पैकेट नहीं खरीद सकती क्योंकि मुझे पता ही नहीं कि मोल-भाव कैसे होता है। उन्होंने मुझे इतना सुरक्षित कर दिया है कि मैं जीवन के थपेड़ों से लड़ने के काबिल ही नहीं बची।"
काव्या को अब समझ आ रहा था। वह जिस चीज़ को 'किस्मत' समझ रही थी, वह अवनि के लिए 'बदकिस्मती' थी।
"तुम्हें याद है," अवनि ने आगे कहा, "पिछले साल मैंने पेंटिंग कम्पटीशन में हिस्सा लिया था?"
"हाँ," काव्या बोली, "और तुमने फर्स्ट प्राइज जीता था।"
अवनि कड़वाहट से हंसी। "फर्स्ट प्राइज? काव्या, वो प्राइज मैंने नहीं, मेरे पिता के नाम ने जीता था। बाद में मुझे पता चला कि जजेस को पहले ही बता दिया गया था कि विक्रमजीत सिंह की बेटी हिस्सा ले रही है। मेरी पेंटिंग साधारण थी, पर मुझे जीता दिया गया। उस दिन मैंने अपनी पेंटिंग ब्रश तोड़ दिए। मुझे अपनी काबिलियत पर शक होने लगा है। मुझे नहीं पता कि लोग मेरी तारीफ सच में करते हैं या सिर्फ मेरे बाप के डर से। क्या मेरा अपना कोई अस्तित्व है?"
काव्या ने अवनि का हाथ थाम लिया। उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।
"अवनि, तुम उनसे बात क्यों नहीं करती? उन्हें समझाओ कि तुम्हें स्पेस चाहिए, तुम्हें अपनी गलतियां खुद करनी हैं।"
"कोशिश की थी," अवनि ने सिर झुका लिया। "मैंने कहा था कि मुझे एमबीए के लिए विदेश जाना है, हॉस्टल में रहना है। माँ रोने लगीं। उन्होंने कहा, 'तुम्हें वहां खाना कौन देगा? तुम्हारे कपड़े कौन धोएगा? तुम अकेली कैसे रहोगी?' पापा ने कहा, 'बेटा, तुम्हें काम करने की क्या ज़रूरत है? मेरी सात पीढ़ियां बैठकर खा सकती हैं। तुम बस राज़ करो।' वो यह नहीं समझते कि मुझे राज़ नहीं करना, मुझे 'जीना' है। मुझे गिरना है, चोट खानी है, और फिर खुद उठना है। उनका यह अंधी ममता वाला प्यार मेरा दम घोंट रहा है।"
अवनि खड़ी हो गई। उसने अपने आंसू पोंछे और वापस पार्टी की ओर देखने लगी।
"देखो उन्हें," उसने अपने माता-पिता की ओर इशारा किया जो मेहमानों के बीच गर्व से बातें कर रहे थे। "वो बहुत अच्छे हैं, काव्या। वो मेरे दुश्मन नहीं हैं। वो बस यह नहीं जानते कि एक पौधे को पेड़ बनने के लिए सिर्फ़ पानी और खाद की नहीं, बल्कि तेज़ धूप और तूफ़ानों की भी ज़रूरत होती है। उन्होंने मुझे बोन्साई (बौना पेड़) बना दिया है। सजावट के लिए अच्छा, पर छाया देने के काबिल नहीं।"
काव्या के पास कहने को कुछ नहीं था। वह आज तक अपनी गरीबी, अपने संघर्षों को कोसती थी। उसे बुरा लगता था जब उसे बस के धक्के खाने पड़ते थे या अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को मारना पड़ता था। लेकिन आज उसे अहसास हुआ कि वही संघर्ष उसे इंसान बना रहे थे। वही उसे मज़बूत बना रहे थे।
अवनि ने काव्या की ओर मुड़कर एक अजीब सी इल्तजा भरी नज़रों से देखा। "काव्या, क्या तुम मुझे एक तोहफा दोगी?"
"हाँ, बोलो," काव्या ने कहा।
"मुझे यहाँ से ले चलो। सिर्फ़ एक घंटे के लिए। किसी ऐसी जगह जहाँ कोई मुझे न जानता हो। जहाँ मैं 'विक्रमजीत की बेटी' न हूँ। मैं सड़क किनारे खड़े होकर, वो... वो ठेले वाले गोलगप्पे खाना चाहती हूँ। क्या तुम खिलाओगी?"
काव्या मुस्कुरा दी। "चलो।"
दोनों ने चुपके से पिछले गेट से निकलने का फैसला किया। जैसे ही वे अंधेरे लॉन को पार करके पिछली दीवार के छोटे गेट से बाहर निकलीं, अवनि ने एक गहरी सांस ली। शहर की हवा में प्रदूषण था, शोर था, लेकिन अवनि के लिए यह आज़ादी की खुशबू थी।
सड़क के किनारे, एक पुराने ठेले पर दोनों ने गोलगप्पे खाए। अवनि को तीखा लगा, उसकी आँखों से पानी आया, नाक लाल हो गई। लेकिन वह हंस रही थी। वह हंसी, जो पार्टी हॉल में गायब थी, यहाँ सड़क की धूल और धुएं के बीच गूंज रही थी। उसने पहली बार अपनी जेब से (जो काव्या ने दी थी) दस रुपये का नोट निकालकर ठेले वाले को दिया। उस दस रुपये के नोट को देते वक्त उसके हाथ ऐसे कांप रहे थे जैसे वह कोई बहुत बड़ा सौदा कर रही हो।
"यह मेरी ज़िन्दगी का पहला सौदा है, काव्या," अवनि ने भावुक होकर कहा। "आज मुझे लग रहा है कि मैं ज़िंदा हूँ।"
तभी अवनि का फ़ोन बजा। उसके पिता का फ़ोन था।
अवनि के चेहरे का रंग उड़ गया। वह हंसी, वो आज़ादी का अहसास पल भर में गायब हो गया। वह वापस उसी सहमी हुई गुड़िया में बदल गई।
"हाँ पापा... मैं... मैं बस वॉशरूम में थी। आ रही हूँ," उसने झूठ बोला और फ़ोन काट दिया।
उसने काव्या की तरफ देखा। "मुझे जाना होगा, काव्या। सिंड्रेला का वक़्त खत्म हो गया। अगर उन्हें पता चला कि मैं बाहर थी, तो कल से मेरे साथ चार की जगह आठ गार्ड्स होंगे। और शायद तुम्हारा मुझसे मिलना भी बंद करवा दिया जाएगा।"
अवनि वापस उस विशाल गेट की तरफ बढ़ी। काव्या वहीं खड़ी उसे देखती रही।
काव्या ने देखा कि जैसे ही अवनि गेट के अंदर दाखिल हुई, उसकी चाल बदल गई। उसके कंधों पर फिर से 'खानदान की इज़्ज़त' और 'संस्कारों' का बोझ आ गया। वह उस सोने के पिंजरे में वापस चली गई जहाँ हर चीज़ की कीमत थी, पर आज़ादी अनमोल होकर भी नदारद थी।
काव्या ने मन ही मन सोचा, "तृप्ति... संतोष... यह सब दौलत से नहीं आता। अवनि दुनिया की नज़र में राजकुमारी है, लेकिन अपनी नज़र में वह एक कैदी है। एक ऐसी कैदी जिसकी बेड़ियाँ सोने की हैं, इसलिए कोई उन बेड़ियों को तोड़ने की वकालत भी नहीं करता।"
काव्या ने अपनी पुरानी स्कूटी स्टार्ट की। इंजन की आवाज़ खटारा थी, हेलमेट का पट्टा ढीला था, और जेब में सिर्फ़ सौ रुपये बचे थे। लेकिन जब उसने एक्सीलरेटर घुमाया और हवा उसके चेहरे से टकराई, तो उसे महसूस हुआ कि वह अवनि से कहीं ज्यादा अमीर है। उसके पास अपने रास्ते चुनने की दौलत थी, अपने हिस्से की गलतियां करने का अधिकार था, और अपनी शर्तों पर जीने की आज़ादी थी।
उधर, आलीशान हॉल के अंदर, अवनि फिर से मुस्कुरा रही थी—वही प्लास्टिक की मुस्कान जो कैमरों के लिए बनी थी। माता-पिता खुश थे कि उनकी बेटी कितनी सुशील है, कितनी सुरक्षित है। वे नहीं जानते थे कि उन्होंने अपनी बेटी को सुरक्षित रखते-रखते, उसे जीने के अनुभव से ही वंचित कर दिया था।
सच ही है, कभी-कभी 'बहुत कुछ होना' भी 'कुछ न होने' से ज्यादा भारी पड़ जाता है। अवनि उस भरे-पूरे समंदर के बीच खड़ी थी, और प्यास से मर रही थी।
लेखक : विक्रम गुप्ता
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