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कुछ सबक ज़िंदगी की किताब ही सिखाती है

 रवि शंकर... नाम तो साधारण था, मगर सपने असाधारण। एक छोटे से कस्बे में पले-बढ़े रवि के दिल में दुनिया बदलने का नहीं, पर अपनी छोटी सी दुनिया को जन्नत बनाने का ख्वाब जरूर था। वह स्वभाव से भावुक, दूसरों की मदद के लिए तत्पर और रिश्तों को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानने वाला इंसान था। पेशे से एक सरकारी स्कूल में क्लर्क, रवि की आय बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन संतोष का धन उसके पास भरपूर था।

रवि अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। उसके पिता, मनोहर लाल जी, एक सिद्धांतवादी व्यक्ति थे, जो जीवन भर अपनी शर्तों पर जिए। माँ, सुमित्रा देवी, ममता की मूरत थीं, जिन्होंने रवि को हमेशा यही सिखाया था कि रिश्तों में झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि मजबूती होती है। रवि अक्सर सोचता था कि जब उसकी शादी होगी, तो वह अपनी पत्नी को रानी बनाकर रखेगा। उसके मन में एक आदर्शवादी छवि थी—एक ऐसा वैवाहिक जीवन जहाँ कोई पर्दा न हो, जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक हों, न कि प्रतिस्पर्धी।

विवाह योग्य होने पर रवि के लिए रिश्ते आने लगे। एक दिन उसके मामाजी एक रिश्ता लेकर आए। लड़की का नाम था सीमा। सीमा देखने में साधारण मगर सलीकेदार थी। एम.ए. पास थी और सिलाई-कढ़ाई में निपुण। रवि के माता-पिता को लड़की पसंद आ गई। रवि ने भी जब सीमा की तस्वीर देखी, तो उसे लगा कि शायद यही वो साथी है जिसकी उसे तलाश थी।

रिश्ता तय करने से पहले रवि ने सीमा से मिलने की इच्छा जताई। दोनों की मुलाकात एक मंदिर के प्रांगण में हुई। रवि ने बड़ी शालीनता से अपनी स्थिति स्पष्ट की।

"सीमा जी," रवि ने झिझकते हुए कहा, "मैं एक साधारण नौकरी करता हूँ। मेरी तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं है, पर हम खुश रह सकते हैं। मेरे माता-पिता मेरे लिए भगवान समान हैं। मैं चाहता हूँ कि आप उन्हें भी उतना ही सम्मान दें जितना अपने माता-पिता को देती हैं।"

सीमा ने सिर झुकाकर धीमी आवाज में कहा, "जी, मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मैं भी एक संयुक्त परिवार से हूँ और बड़ों का आदर करना जानती हूँ।"

रवि को लगा जैसे उसने दुनिया जीत ली हो। सीमा की सादगी और उसकी बातों ने रवि का दिल जीत लिया।

विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं। लेकिन इस दौरान कुछ अजीब घटनाएं भी हुईं। सीमा के पिता ने शादी में दहेज देने की बात कही, तो रवि और उसके पिता ने साफ मना कर दिया।

"हमें दहेज नहीं, आपकी बेटी चाहिए," मनोहर लाल जी ने कहा था।

सीमा के परिवार वाले यह सुनकर हैरान भी हुए और खुश भी। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी—शादी के बाद सीमा को आगे की पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी जाए। रवि ने खुशी-खुशी हामी भर दी। उसे लगा कि एक शिक्षित पत्नी घर और समाज दोनों के लिए बेहतर होगी।

शादी धूमधाम से संपन्न हुई। सुहागरात की वो घड़ी आई, जिसके लिए रवि ने कई सपने संजोए थे। उसने फिल्मों और उपन्यासों में पढ़ा था कि पारदर्शिता ही सफल दांपत्य की कुंजी है। इसी भ्रम में, उसने सीमा से अपने अतीत का एक छोटा सा पन्ना साझा कर दिया। कॉलेज के दिनों में उसे एक लड़की से लगाव हुआ था, जो एक तरफा था और समय के साथ खत्म हो गया।

रवि ने सोचा था कि सीमा उसकी ईमानदारी की कद्र करेगी। लेकिन सीमा का चेहरा उतर गया। उसने कुछ कहा नहीं, बस करवट बदलकर लेट गई। उस रात जो दीवार खड़ी हुई, वो शायद कभी नहीं गिरनी थी।

शुरुआती दिन ठीक बीते। लेकिन धीरे-धीरे सीमा का असली स्वभाव सामने आने लगा। वह बात-बात पर चिढ़ने लगी। रवि की कही वो बात—कॉलेज वाली—अब उसका हथियार बन गई थी। जब भी कोई छोटा-मोटा झगड़ा होता, सीमा उस पुराने किस्से को उखाड़ देती।

"तुम तो पहले से ही किसी और को चाहते थे, मुझसे तो मजबूरी में शादी की है," सीमा ताना मारती।

रवि उसे समझाने की कोशिश करता, लेकिन सीमा की शक की सुई वहीं अटकी रहती।

सीमा की आगे की पढ़ाई की बात आई, तो रवि ने उसका दाखिला शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में बी.एड. के लिए करवा दिया। रवि चाहता था कि सीमा आत्मनिर्भर बने। लेकिन कॉलेज जाने के बाद सीमा के हाव-भाव बदलने लगे। उसे अब रवि का सीधा-साधापन और उसकी साधारण नौकरी खटकने लगी। उसके कॉलेज के दोस्त बड़ी गाड़ियों में आते थे, महंगे फोनों का इस्तेमाल करते थे। सीमा को अपनी ज़िंदगी फीकी लगने लगी।

घर में क्लेश का दौर शुरू हुआ। सीमा अब घर के कामों में हाथ बंटाने से कतराने लगी। सुमित्रा देवी की तबीयत खराब रहती थी, लेकिन सीमा उन्हें एक गिलास पानी देने में भी आनाकानी करती।

"मैं यहाँ नौकरानी बनने नहीं आई हूँ, मैं पढ़ाई कर रही हूँ," सीमा अक्सर चिल्लाकर कहती।

रवि पिसता रहा। एक तरफ बीमार माँ, दूसरी तरफ महत्वाकांक्षी पत्नी।

एक दिन, सीमा ने रवि से कहा, "मुझे अलग घर चाहिए। मैं तुम्हारे माता-पिता के साथ नहीं रह सकती। मुझे अपनी प्राइवेसी चाहिए।"

रवि सन्न रह गया। "सीमा, मैं इकलौता बेटा हूँ। मैं अपने बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर कहाँ जाऊंगा? और मेरी इतनी कमाई भी नहीं है कि मैं अलग घर का खर्चा उठा सकूं।"

"तो अपनी कमाई बढ़ाओ! या फिर मुझसे उम्मीद मत रखो," सीमा ने दो टूक कह दिया।

रवि ने कोशिश की कि घर का माहौल सुधरे। उसने अपनी जरूरतों में कटौती की, ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया ताकि सीमा की ख्वाहिशें पूरी कर सके। सीमा को नए कपड़े, बाहर खाना, घूमना-फिरना—सब कुछ देने की कोशिश की। लेकिन सीमा की प्यास समुद्र जैसी थी, जो कभी बुझती नहीं थी।

सीमा का बी.एड. पूरा हो गया और उसे एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी मिल गई। नौकरी मिलते ही सीमा का व्यवहार और भी उग्र हो गया। उसे अब रवि और भी छोटा लगने लगा। वह अक्सर देर से घर आती, घर के कामों को हाथ न लगाती और रवि या उसके माता-पिता से सीधे मुंह बात न करती।

रवि के मन में एक हीन भावना घर करने लगी। उसे लगने लगा कि शायद वह सीमा के लायक नहीं है। वह शक करने लगा कि कहीं सीमा का ऑफिस में किसी के साथ चक्कर तो नहीं चल रहा। सीमा की सुंदरता और उसका आधुनिक तौर-तरीका रवि के मन में असुरक्षा पैदा करता था।

इसी बीच, रवि के पिता मनोहर लाल जी को दिल का दौरा पड़ा। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। रवि के पास इतने पैसे नहीं थे। उसने सीमा से मदद मांगी, क्योंकि अब सीमा भी कमा रही थी।

सीमा ने साफ इनकार कर दिया। "मेरी कमाई मेरे लिए है। तुम्हारे बाप की बीमारी का ठेका मैंने नहीं ले रखा।"

रवि अंदर तक टूट गया। उसे कर्ज लेकर पिता का इलाज कराना पड़ा। पिता बच तो गए, लेकिन बिस्तर पकड़ लिया। घर का माहौल नर्क बन चुका था।

रवि ने एक दिन सीमा के मायके वालों से बात करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने उल्टा रवि को ही दोषी ठहराया।

"हमारी बेटी पढ़ी-लिखी है, कमाऊ है। तुम उसे दबाकर रखना चाहते हो," सीमा की माँ ने इल्जाम लगाया।

रवि को तब एहसास हुआ कि यह लड़ाई सिर्फ सीमा से नहीं, बल्कि उस पूरी मानसिकता से है जो रिश्तों को नफे-नुकसान के तराजू में तोलती है।

समय बीतता गया। रवि और सीमा का एक बेटा हुआ—अमन। रवि को लगा कि शायद बच्चे के आने से दूरियां मिट जाएंगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा। सीमा ने बच्चे को भी अपने और रवि के बीच की दीवार बना लिया। वह अमन को रवि के खिलाफ भड़काने लगी।

"तुम्हारे पापा तो बेकार हैं, कुछ नहीं कमाते," सीमा बचपन से ही अमन के दिमाग में जहर घोलने लगी।

रवि जब अमन को प्यार करने जाता, तो सीमा उसे रोक देती। "गंदे हाथों से मत छुओ मेरे बेटे को," वह कहती।

रवि एक हारे हुए जुआरी की तरह अपनी ही ज़िंदगी को बिखरते हुए देख रहा था। उसका आदर्शवादी सोच, उसका खुलापन—सब कुछ उसकी बर्बादी का कारण बन गया था। उसने सीमा को बराबरी का दर्जा दिया था, लेकिन सीमा ने उसे पायदान समझ लिया।

एक दिन, रवि को घर की सफाई करते हुए एक पुरानी डायरी मिली। यह सीमा की डायरी थी। न चाहते हुए भी रवि ने उसे खोल लिया। जो उसने पढ़ा, उसने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी।

डायरी में सीमा ने लिखा था कि वह शादी से पहले किसी और से प्यार करती थी। वह लड़का अमीर था, लेकिन दूसरी जाति का होने के कारण सीमा के घरवाले नहीं माने। सीमा ने मजबूरी में रवि से शादी की थी ताकि वह उस घर से निकल सके और अपनी पढ़ाई पूरी करके आत्मनिर्भर बन सके। रवि उसके लिए सिर्फ एक सीढ़ी था, एक जरिया था। उसने लिखा था कि उसे रवि के सीधेपन और उसके मध्यमवर्गीय जीवन से घिन आती है।

रवि डायरी हाथ में लिए घंटों बैठा रहा। उसे अपने आप पर हंसी आ रही थी और रोना भी। उसने जिस पारदर्शिता की उम्मीद की थी, वह एक तरफा थी। उसने अपना सच बताया और ताउम्र ताने सहे, जबकि सीमा ने इतना बड़ा झूठ छिपाए रखा और उसे हर दिन तिल-तिल मारा।

रवि ने फैसला किया कि अब बहुत हो चुका। उसने सीमा से बात की।

"सीमा, मैंने तुम्हारी डायरी पढ़ ली है," रवि ने शांत स्वर में कहा।

सीमा का चेहरा पीला पड़ गया, लेकिन फिर उसने ढिठाई से कहा, "तो क्या हुआ? पढ़ ली तो पढ़ ली। सच तो यही है कि मैं तुम्हें कभी पसंद नहीं करती थी।"

"तो तुमने मेरी ज़िंदगी क्यों बर्बाद की? तुम जा सकती थी," रवि की आवाज़ में दर्द था।

"कहाँ जाती? मेरे पास न नौकरी थी, न पैसा। अब मेरे पास सब कुछ है। मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं है," सीमा ने क्रूरता से कहा।

रवि ने उसी दिन एक बड़ा फैसला लिया। उसने सीमा से कहा, "ठीक है, अगर तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं है, तो तुम आज़ाद हो। मैं तुम्हें तलाक देता हूँ। लेकिन एक बात याद रखना, तुम भले ही कमाती हो, भले ही आज़ाद हो, लेकिन जो सुकून तुम्हें मेरे घर में मिल सकता था, वो तुम्हें अब कहीं नहीं मिलेगा। क्योंकि रिश्तों की बुनियाद चालाकी पर नहीं, विश्वास पर टिकी होती है।"

सीमा ने तलाक के लिए हामी भर दी। वह अपने बेटे अमन को लेकर अलग हो गई। रवि ने उसे नहीं रोका। वह जानता था कि एक जहर बुझे रिश्ते को ढोने से बेहतर है उसका अंत करना।

तलाक के बाद, रवि बिल्कुल अकेला रह गया। उसके माता-पिता भी कुछ समय बाद गुजर गए। घर वीरान हो गया। लेकिन रवि ने हार नहीं मानी। उसने अपनी नौकरी के साथ-साथ समाज सेवा शुरू की। उसने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। उसे उसमें एक अजीब सा सुकून मिलने लगा।

सालों बाद, एक दिन रवि को पता चला कि सीमा का वह पुराना प्रेमी, जिसके लिए वह रवि को छोड़ना चाहती थी, उसने सीमा को धोखा दे दिया। सीमा ने अपनी सारी जमा पूंजी उस पर लगा दी थी, और वह पैसे लेकर भाग गया। सीमा अब अकेली थी, बेटा अमन बड़ा हो गया था और वह भी अपनी माँ के संस्कारों पर चलकर स्वार्थी हो चुका था। उसने अपनी माँ को छोड़ दिया था और विदेश चला गया था।

रवि एक दिन बाजार में सीमा से टकराया। सीमा अब वैसी नहीं थी। उसके चेहरे की चमक गायब थी, आँखों में एक खालीपन था। वह एक साधारण सी साड़ी में थी, बाल सफेद हो चुके थे।

रवि को देखकर सीमा की नज़रें झुक गईं। वह वहां से भागना चाहती थी, लेकिन पैर नहीं उठे।

रवि ने उसे रोका नहीं, बस इतना कहा, "कैसी हो सीमा?"

सीमा फफक कर रो पड़ी। "रवि... मुझे माफ कर दो। मैंने सोने को पीतल समझकर फेंक दिया और पीतल के पीछे भागती रही। आज मेरे पास न पति है, न बेटा, न पैसा। मैं बिल्कुल अकेली हूँ।"

रवि ने गहरी सांस ली। उसके मन में अब सीमा के लिए नफरत नहीं, बल्कि दया थी।

"सीमा," रवि ने कहा, "माफी मांग कर तुम अपना बोझ हल्का कर सकती हो, लेकिन जो वक्त और जो विश्वास तुमने तोड़ा है, वो वापस नहीं आएगा। मैंने तुम्हें रानी बनाना चाहा था, लेकिन तुम खुद को बाज़ार की वस्तु समझ बैठी। कुदरत ने हमें अलग-अलग बनाया है—पुरुष को रक्षक और स्त्री को पोषाहार। लेकिन जब हम अपनी भूमिकाएं भूलकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगते हैं, तो परिणाम यही होता है जो आज हम दोनों भुगत रहे हैं। मैं अकेला हूँ, और तुम अनाथ।"

रवि वहां से चला गया। सीमा वहीं खड़ी उसे देखती रही। उसे एहसास हो गया था कि उसने अपनी आज़ादी और महत्वाकांक्षा की दौड़ में वह छांव खो दी थी, जो रवि के रूप में उसे मिली थी। उसने समानता की नहीं, प्रभुत्व की लड़ाई लड़ी थी, और उस लड़ाई में वह सब कुछ हार गई थी।

रवि आज अपने छोटे से घर में बच्चों को पढ़ाता है। वह उन्हें गणित और विज्ञान के साथ-साथ रिश्तों का गणित भी समझाता है। वह उन्हें बताता है कि जीवन फिल्मों की तरह नहीं होता। पारदर्शिता अच्छी है, लेकिन सामने वाले की पात्रता देखनी चाहिए। और सबसे बड़ी बात—समानता का मतलब एक जैसा होना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अंतर का सम्मान करना है। रवि अक्सर सोचता है कि अगर उसने वो फिल्मी चश्मा न पहना होता, तो शायद वह सीमा के असली चेहरे को पहले ही पहचान लेता। लेकिन शायद, कुछ सबक ज़िंदगी की किताब ही सिखाती है, किसी और की लिखी कहानी नहीं।

लेखिका : मोहिनी मिश्रा


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