संगीत की हल्की-हल्की धुन में घर के आँगन की दीवारें भी जैसे मुस्कुरा रही थीं। तुलसी के चौरे पर दीपक जल रहा था, और दरवाज़े पर रंगोली ताज़ा-ताज़ा बनी थी। पर उस चमक के बीच भी एक आदमी के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ साफ दिख रही थीं—हरिशंकर। बेटी की विदाई पास थी, पर उससे पहले उसकी आँखों में एक सवाल अटका था—क्या वह अपनी बेटी को सही घर दे रहा है?
विवाह के बाद पहली रस्म में जब समधी-समधन और रिश्तेदार आँगन में बैठे थे, तब बातों-बातों में कुछ ऐसा हुआ कि हरिशंकर का दिल बैठ गया। दूल्हे के कुछ रिश्तेदार, जो खुद को बहुत “समझदार” समझते थे, बड़े-बुज़ुर्गों पर टिप्पणी करने लगे। कोई मज़ाक के नाम पर तंज कस रहा था, तो कोई हरिशंकर की साधारण सी धोती-कुर्ते को देखकर हँस रहा था। हरिशंकर मुस्कुरा तो रहा था, पर भीतर कहीं चोट खा रहा था।
और फिर वह वाक्य आया, जिसने सारा माहौल बदल दिया।
दूल्हे के चाचा ने हँसते-हँसते कहा, “अरे भाई साहब, अब जमाना बदल गया है… बड़ों की इज़्ज़त तो ठीक है, पर इतना भी क्या? आखिर बेटी का घर तो अब ससुराल ही है… मायका बस नाम का।”
हरिशंकर की उंगलियाँ काँप गईं। उसके चेहरे की मुस्कान जैसे पत्थर हो गई। पर उससे पहले कि वह कुछ कहते, उसकी बेटी—मृदुला—धीरे से उठी। उसने पहले अपने पिता की ओर देखा, फिर सबके सामने शांत आवाज़ में बोली, “चाचा जी, मुझे एक बात कहने दीजिए।”
सभी चुप हो गए। दुल्हन का बोलना आम नहीं माना जाता, खासकर रस्मों के बीच। पर मृदुला की आँखों में डर नहीं था, सिर्फ साफ़ सच्चाई थी।
“मायका नाम का नहीं होता,” उसने कहा।ि “मायका वो छत है, जहाँ से मैंने उड़ना सीखा। और मेरे पापा… वो दीवार हैं, जिनके सहारे मैं खड़ी हुई। अगर किसी को लगता है कि बेटी का मायका बस ‘नाम’ रह जाता है, तो उन्हें समझना चाहिए—बेटी दूर जाती है, पर रिश्ते दूर नहीं होते।”
फुसफुसाहटें शुरू हुईं। कोई हैरान था, कोई नाराज़। दूल्हा—समीर—नीचे नज़र किए बैठा था, जैसे उसे ज़मीन में रास्ता मिल जाए।
मृदुला ने आगे कहा, “मैं आज यहाँ दुल्हन बनकर बैठी हूँ, पर सबसे पहले मैं अपने माता-पिता की बेटी हूँ। और जो व्यक्ति मेरे पापा का सम्मान नहीं कर सकता, वह मेरा सम्मान भी नहीं कर पाएगा। क्योंकि जिसने मेरे होने की वजह बनाई, उसके सामने मैं कभी झुकी नहीं देख सकती।”
हरिशंकर की आँखें भर आईं। उसकी पत्नी सविता ने पल भर को मुँह ढक लिया। पर असली झटका समीर को लगा—उसके अंदर कहीं कुछ टूट सा गया। वह उठ खड़ा हुआ। आवाज़ उसके गले में अटक रही थी, फिर भी उसने सबके सामने हाथ जोड़ दिए।
“बाबूजी,” समीर बोला, “मुझे माफ कर दीजिए। गलती मेरी भी है, क्योंकि मैंने अब तक कभी इन बातों का विरोध नहीं किया। मुझे लगा, चुप रहना ही समझदारी है। लेकिन आज आपकी बेटी ने मुझे समझा दिया कि चुप रहना कई बार अपराध होता है। आज के बाद मैं अपने घर में किसी भी बड़े के अपमान को चुपचाप नहीं सहूँगा।”
वह बोलते-बोलते मृदुला की तरफ मुड़ा, “और मृदुला… तुम्हारा साथ देने का वादा सिर्फ शादी के मंडप का नहीं है। आज से तुम्हारे माता-पिता मेरे भी माता-पिता हैं।”
यही वह पल था, जब दूल्हे के पिता—महेंद्र—जो अब तक सब कुछ भीतर ही भीतर सह रहे थे, उठे। वे भारी आवाज़ में बोले, “बहुत हुआ। मैंने रिश्ते निभाने के नाम पर अपनी ही आत्मा को दबा रखा था। पर आज मेरी बहू बनने आई बेटी ने मुझे भी आईना दिखा दिया है।”
महेंद्र धीरे से हरिशंकर के पास आए। उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा, “समधी जी, मैं आपके सामने हाथ जोड़कर आपको छोटा नहीं कर रहा, मैं आपकी परवरिश को सलाम कर रहा हूँ। आपने ऐसी बेटी बनाई है, जो रिश्तों का अर्थ समझती है।”
हरिशंकर घबरा गए। “नहीं-नहीं, आप ऐसा मत कीजिए…”
महेंद्र ने दृढ़ता से कहा, “आज मैं समझ गया कि बहू लेने नहीं, बेटी पाने का सौभाग्य भी होता है। और यह सौभाग्य ईश्वर हर किसी को नहीं देता। मृदुला सिर्फ समीर की पत्नी नहीं… हमारे घर की रोशनी है।”
समीर के चाचा, जो तंज कस रहे थे, उनकी आँखें झुक गईं। किसी में अब बहस की हिम्मत नहीं थी। माहौल एकदम बदल चुका था—जहाँ पहले ठहाके थे, वहाँ अब आत्मग्लानि की चुप्पी थी।
रस्में फिर शुरू हुईं, पर अब उन रस्मों में दिखावा नहीं था। अब हरिशंकर की पीठ सीधी थी, जैसे किसी ने उसके भीतर का टूटता हुआ सम्मान फिर से जोड़ दिया हो। सविता ने बेटी के माथे पर हाथ रखा, जैसे कह रही हो—“मेरी बेटी सच में बड़ी हो गई।”
विदाई का समय आया तो आँगन वही था, पर हवा बदल गई थी। मृदुला ने पिता के पैर छुए। हरिशंकर ने हिम्मत बाँधकर कहा, “बेटा, खुश रहना।”
मृदुला ने धीमे से कहा, “पापा, मैं खुश रहूँगी… क्योंकि अब मैं जा रही हूँ, पर आपकी इज़्ज़त लेकर जा रही हूँ। और जिस घर में आपकी इज़्ज़त रहेगी, वही मेरा घर होगा।”
महेंद्र ने आगे बढ़कर मृदुला को अपनी बाहों में भर लिया। “बेटी,” उन्होंने कहा, “अगर कभी तुम्हारी आँख में आँसू आया, तो सबसे पहले मुझे बताना। क्योंकि अब तुम्हारे पापा सिर्फ वहाँ नहीं… यहाँ भी हैं।”
समीर ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला, मृदुला बैठ गई। गाड़ी आगे बढ़ी तो पीछे रह गया एक आँगन, जहाँ अब भी तुलसी के पास दीपक जल रहा था। हरिशंकर की आँखें भीग गईं, पर इस बार उन आँसुओं में दर्द कम था—गर्व ज़्यादा।
कई बार बेटी विदा होकर दूर चली जाती है, पर उसी विदाई में वह अपने माँ-बाप की इज़्ज़त की मुहर भी लगा जाती है। और जब एक घर की बहू किसी दूसरे घर के बाप को पिता कह दे, तो समझिए—रिश्ते सच में “दूर प्रदेश” नहीं जाते, दिलों में बस जाते हैं।
लेखक : रमण राही
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