"क्या कहा? मोहित ने मना कर दिया? उसे कहो कि यह कोई बच्चों का खेल नहीं है जो जब मन किया खेला और जब मन किया छोड़ दिया। आज की मीटिंग कितनी ज़रूरी है, यह उसे पता भी है? सिंघानिया ग्रुप के साथ डील फाइनल होनी है और साहबजादे कह रहे हैं कि उनसे नहीं हो पाएगा। अरे, गद्दी पर बैठने की उम्र हो गई है और अभी तक आत्मविश्वास नाम की चीज़ नहीं है उसमें।"
सेठ गिरिराज जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वे अपने आलीशान ड्राइंग रूम में चहलकदमी करते हुए लगातार बड़बड़ा रहे थे। सोफे के एक कोने में उनकी पत्नी, सावित्री देवी चुपचाप बैठी थीं, और दूसरे सोफे पर उनकी बेटी शिखा, जो छुट्टियों में मायके आई हुई थी, अपने पिता के तमतमाए हुए चेहरे को देख रही थी।
गिरिराज जी फिर गरजे, "अरे, समझ नहीं आता मुझे। जब अपने उन आवारा दोस्तों के साथ होता है, तब तो बड़ा शेर बनता है। सुना है उनके साथ मिलकर कोई ऑनलाइन स्टार्टअप शुरू करने की बात कर रहा था। वहां तो बड़ा ज्ञान झाड़ता है, मैनेजमेंट की बातें करता है। लेकिन जैसे ही मैं कहता हूँ कि दुकान पर जाकर पुरानी पार्टी से बात कर ले या तगादा कर ले, तो इसकी घिग्घी बंध जाती है। कहता है—'पापा, मुझे समझ नहीं आता वो लोग क्या कहेंगे, आप ही बात कर लो'। अब अगर यह दुकान पर बैठेगा ही नहीं, व्यापारियों से मिलेगा ही नहीं, तो धंधा क्या खाक संभालेगा?"
सावित्री देवी ने दबे स्वर में कहा, "जी, वो अभी नया है, शायद घबराता है बड़ों से बात करने में..."
"नया है?" गिरिराज जी ने बात काटते हुए कहा। "पच्चीस साल का हो गया है! मैं जब बीस का था, तो पिताजी के साथ पूरा कपड़ा बाज़ार संभालता था। यह तो बस जिम्मेदारी से भागना चाहता है।"
तभी शिखा ने अपनी चाय का कप मेज पर रखा और बहुत ही शांत स्वर में बोली, "पापा, भाई जिम्मेदारी से नहीं भाग रहा, वो आपके डर से भाग रहा है।"
गिरिराज जी ठिठक गए। उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए बेटी की ओर देखा। "क्या मतलब? मेरा डर? मैं तो उसे शेर बनाना चाहता हूँ।"
शिखा उठी और पिता के सामने आकर खड़ी हो गई। "पापा, आप उसे शेर बनाना चाहते हैं, लेकिन आपने उसे हमेशा पिंजरे में ही रखा। भाई अपने दोस्तों के साथ स्टार्टअप की बात इसलिए करता है क्योंकि वहां उसकी आवाज़ सुनी जाती है, उसे फैसले लेने की आज़ादी है। लेकिन यहाँ? यहाँ दुकान पर उसकी क्या हैसियत है? एक मुनीम से भी कम।"
"यह क्या कह रही है तू?" गिरिराज जी का स्वर थोड़ा नीचा हुआ, पर तेवर वही थे।
शिखा ने याद दिलाते हुए कहा, "पापा, याद कीजिए दो साल पहले की बात। मोहित ने जब एमबीए पूरा किया था, तो उसने कहा था कि दुकान का स्टॉक कंप्यूटर पर चढ़ा देते हैं, हिसाब-किताब आसान हो जाएगा। आपने क्या कहा था? आपने सबके सामने उसे डांटा था कि 'तुम्हें तजुर्बा नहीं है, मुनीम जी चालीस साल से बही-खाता लिख रहे हैं, उनके काम में टांग मत अड़ाओ'। भाई चुप हो गया।"
गिरिराज जी कुछ बोलने ही वाले थे कि शिखा ने हाथ के इशारे से रोक दिया।
"बात यहीं खत्म नहीं होती पापा। पिछले साल जब दिवाली पर माल उठाने की बात थी, तो मोहित ने कहा था कि इस बार बनारस से सिल्क मंगवाते हैं, डिमांड ज्यादा है। आपने उसे यह कहकर चुप करा दिया कि 'तुम अभी बच्चे हो, तुम्हें बाज़ार की समझ नहीं है, पैसा डुबो दोगे'। और जब बाद में पता चला कि बाज़ार में सिल्क की ही मांग थी, तो आपने अपनी गलती नहीं मानी। आपने आज तक उसे एक भी फैसला खुद लेने दिया है? जब भी वो गद्दी पर बैठता है, आप उसके सिर पर खड़े होकर हर ग्राहक के सामने उसे टोकते हैं—'ऐसे नहीं, वैसे बात करो', 'इतने का डिस्काउंट क्यों दिया', 'चाय के लिए क्यों नहीं पूछा'। जब आप हर पल उसे यह अहसास दिलाएंगे कि वो गलत है, तो उसका आत्मविश्वास कैसे बनेगा?"
कमरे में सन्नाटा छा गया। सावित्री देवी ने भी सिर हिलाया, मानो वे मूक समर्थन दे रही हों।
शिखा ने अपनी बात जारी रखी, "आज वो कह रहा है कि उससे नहीं हो पाएगा, क्योंकि उसे डर है कि अगर डील में कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो आप फिर से उसे वही ताना मारेंगे कि 'मैंने कहा था न तुमसे नहीं होगा'। दोस्तों के बीच उसे जज करने वाला कोई नहीं होता, इसलिए वो वहां खुलकर बोलता है। यहाँ उसे पता है कि उसका पिता उसकी ढाल नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा आलोचक है।"
गिरिराज जी धप्प से सोफे पर बैठ गए। शिखा के शब्द कड़वे थे, लेकिन उनमें सच्चाई का आईना था। उन्हें याद आने लगा। हाँ, यह सच था। जब भी मोहित ने कुछ नया करने की कोशिश की, गिरिराज जी ने अपने 'अनुभव' का हवाला देकर उसे दबा दिया। वे जिसे 'सिखाना' समझ रहे थे, दरअसल वह 'टोकना' था। उन्होंने बरगद के पेड़ की तरह इतनी छाया फैला दी थी कि मोहित रूपी नन्हे पौधे को धूप ही नहीं मिल पा रही थी।
"तो अब क्या करूँ?" गिरिराज जी का स्वर अब गुस्से वाला नहीं, बल्कि विवशता वाला था। "सिंघानिया ग्रुप वाले आधे घंटे में ऑफिस पहुँचने वाले हैं। और मेरी तबीयत आज सुबह से ही नासाज़ लग रही है, बीपी बढ़ा हुआ है। डॉक्टर ने सफर करने और तनाव लेने से मना किया है। जाना तो मोहित को ही पड़ेगा।"
शिखा ने मुस्कुराते हुए पिता के कंधे पर हाथ रखा। "पापा, इस बार तरीका बदलिए। आप फोन घुमाइए और मोहित से कहिए कि आज आप नहीं जा रहे हैं। और यह भी कहिए कि डील हो या न हो, फैसला उसे लेना है। उसे कहिए कि अगर नुकसान भी हुआ, तो आप उसके साथ खड़े हैं।"
गिरिराज जी ने कुछ पल सोचा। यह उनके स्वभाव के विपरीत था। वे हमेशा कमान अपने हाथ में रखते थे। लेकिन आज शरीर और परिस्थिति, दोनों साथ नहीं दे रहे थे। उन्होंने कांपते हाथों से फोन उठाया और मोहित को कॉल लगाया।
मोहित अपने कमरे में बंद था, तनाव में छत घूर रहा था। फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर 'पापा' देखकर उसका दिल बैठ गया। उसने डरते-डरते फोन उठाया।
"ह-हाँ पापा?"
"मोहित..." गिरिराज जी की आवाज़ में वह कड़कपन गायब था। "बेटा, मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। चक्कर आ रहे हैं। मैं मीटिंग के लिए नहीं जा पाऊँगा।"
"क्या? लेकिन पापा, वो सिंघानिया जी..." मोहित घबरा गया।
"तुझे जाना होगा बेटा।"
"पापा, मैं? इतनी बड़ी डील? अगर उन्होंने रेट कम करने को कहा तो? अगर उन्होंने क्वालिटी पर सवाल उठाए तो? आप जानते हैं न मैं गड़बड़ कर देता हूँ..." मोहित की आवाज़ कांप रही थी।
गिरिराज जी ने एक गहरी सांस ली और शिखा की तरफ देखा जो उन्हें आंखों से ही हिम्मत दे रही थी।
"मोहित, सुन। तूने एमबीए किया है। तूने बाज़ार को नए नज़रिए से देखा है। मुझे तेरे ऊपर भरोसा है। तू जो भी रेट तय करके आएगा, मुझे मंज़ूर होगा। अगर डील नहीं भी हुई, तो कोई बात नहीं, दूसरी पार्टी देख लेंगे। लेकिन आज सिंघानिया के सामने सेठ गिरिराज का बेटा नहीं, बल्कि इस कंपनी का नया डायरेक्टर बनकर जाना। जा, मेरी गाड़ी लेकर जा।"
मोहित को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। पिता ने 'भरोसा' शब्द का इस्तेमाल किया था? और 'नुकसान' की चिंता न करने को कहा था? उसके अंदर कहीं दबी हुई ऊर्जा अचानक जाग उठी।
"जी पापा... मैं... मैं कोशिश करूँगा।"
"कोशिश नहीं, करके आ। और सुन, वो फाइल में तेरी सिल्क वाली रिसर्च भी लगा दी है मैंने। शायद उन्हें पसंद आए," गिरिराज जी ने झूठ बोला, हालांकि वह फाइल उन्होंने कभी देखी भी नहीं थी, लेकिन उनका मकसद मोहित को ताकत देना था।
मोहित जब तैयार होकर नीचे आया, तो उसके चलने में एक अलग ही तेजी थी। वह हमेशा की तरह कंधे झुकाकर नहीं, बल्कि सिर उठा कर चल रहा था। शिखा ने उसे 'ऑल द बेस्ट' कहा और मोहित गाड़ी लेकर निकल गया।
अगले तीन घंटे गिरिराज जी के लिए पहाड़ जैसे थे। वे बार-बार घड़ी देख रहे थे। सावित्री देवी भगवान के सामने दीया जलाकर बैठी थीं। शिखा मजे से पत्रिका पढ़ रही थी क्योंकि उसे अपने भाई और अपनी सलाह, दोनों पर भरोसा था।
शाम के पांच बजे मोहित की गाड़ी गेट के अंदर आई। गिरिराज जी की धड़कनें तेज़ हो गईं। मोहित अंदर आया, उसके चेहरे के भाव पढ़ना मुश्किल था। वह सीधा पिता के पास आया और उनके पैर छुए।
"क्या हुआ बेटा? क्या कहा उन्होंने?" गिरिराज जी ने अधीर होकर पूछा।
मोहित ने धीरे से अपना ब्रीफकेस खोला और एक फाइल निकाली।
"पापा, उन्होंने पुरानी दरों पर डील करने से मना कर दिया था..."
गिरिराज जी का दिल बैठ गया। "कोई बात नहीं बेटा, मैंने कहा था न..."
"लेकिन," मोहित ने बीच में कहा, उसके होठों पर एक मुस्कान तैर गई, "लेकिन मैंने उन्हें हमारा नया 'डिजिटल इन्वेंटरी मॉडल' दिखाया और समझाया कि कैसे हम उन्हें बाकी सप्लायर्स से तीन दिन पहले माल दे सकते हैं। उन्हें मेरा प्रेजेंटेशन इतना पसंद आया कि उन्होंने न सिर्फ पुरानी डील साइन की, बल्कि अगले साल के लिए भी एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट दे दिया है। बस उन्होंने रेट में 2% की छूट मांगी थी, जो मैंने दे दी। आपको ठीक लगा न?"
गिरिराज जी सन्न रह गए। जिस डिजिटल सिस्टम को वे बेकार समझते थे, आज उसी ने उनकी सबसे बड़ी डील बचा ली थी। और जिस बेटे को वे नकारा समझते थे, उसने वह कर दिखाया जो शायद वे खुद भी अपनी पुरानी सोच के साथ नहीं कर पाते।
गिरिराज जी की आँखों में नमी आ गई। वे अपनी जगह से उठे और मोहित को गले लगा लिया।
"2% की छूट? अरे पगले, अगर तू 5% भी दे आता तो भी मुझे मंज़ूर होता। आज तूने सिर्फ डील नहीं की, आज तूने साबित कर दिया कि तू इस कुर्सी का असली वारिस है।"
शिखा पीछे खड़ी ताली बजा रही थी। उसने हंसते हुए कहा, "देखा पापा? शेर तो घर में ही था, बस आप उसे पिंजरे से बाहर निकालने से डर रहे थे। जब आपने उसे खुला आसमान दिया, तो उसने अपनी दहाड़ सुना दी।"
उस रात खाने की मेज पर माहौल बदला हुआ था। आज गिरिराज जी हर बात पर मोहित को टोक नहीं रहे थे, बल्कि उससे पूछ रहे थे—"अच्छा मोहित, वो ऑनलाइन वाले आईडिया में क्या स्कोप है? मुझे भी समझा ज़रा।"
मोहित का चेहरा उत्साह से चमक रहा था। वह अपने पिता को समझा रहा था और पिता एक शिष्य की तरह सुन रहे थे।
सावित्री देवी ने शिखा की थाली में एक्स्ट्रा हलवा रखते हुए धीरे से कहा, "तूने आज घर की नींव मजबूत कर दी बेटी।"
शिखा मुस्कुराई। उसे पता था कि समस्या काबिलियत की नहीं थी, समस्या मौके और भरोसे की थी। उसने अपने पिता को यह समझा दिया था कि बड़ों का फर्ज केवल रास्ता दिखाना नहीं होता, बल्कि कभी-कभी पीछे हटकर यह देखना भी होता है कि बच्चे अपना रास्ता खुद कैसे बनाते हैं। उस दिन के बाद से मोहित को कभी 'दोस्तों' के पास जाकर अपनी होशियारी साबित करने की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि अब उसका सबसे बड़ा दोस्त और समर्थक उसका पिता बन चुका था।
सीख: आत्मविश्वास रातों-रात पैदा नहीं होता, उसे भरोसे और प्रोत्साहन की खाद चाहिए होती है। अगर हम किसी को उड़ने का मौका दिए बिना उसके पंख काटते रहेंगे, तो हम उसे कभी आसमान छूते हुए नहीं देख पाएंगे।
लेखक : विनोद अग्निहोत्री
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