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आ गई महारानी

 शहर के सबसे प्रतिष्ठित 'सिल्वर स्पून अवार्ड्स' के हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी। मंच पर माइक थामे खड़ी थी—शिखा। सादगी से पहनी हुई साड़ी और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक। उसे शहर की 'बेस्ट वूमेन एंटरप्रेन्योर' (सर्वश्रेष्ठ महिला उद्यमी) का पुरस्कार मिला था। उसकी कंपनी, जो हस्तनिर्मित आचार और मसालों का व्यापार करती थी, आज करोड़ों का टर्नओवर कर रही थी।

भीड़ में बैठी तान्या अपनी पुरानी कॉलेज की दोस्त को फटी आँखों से देख रही थी। तान्या खुद एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह अपनी नौकरी और घर के बीच संतुलन बनाने में बुरी तरह जूझ रही थी। उसका चेहरा थका हुआ और आँखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वह 'सुपरवूमन' बनने की होड़ में खुद को खो रही है।

समारोह के बाद, जब डिनर शुरू हुआ, तान्या ने शिखा को ढूँढ ही लिया।

"अरे शिखा! कमाल कर दिया यार तूने," तान्या ने गले मिलते हुए कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में बधाई से ज्यादा ईर्ष्या और हैरानी का मिश्रण था। "हम लोग तो ऑफिस की 9 से 5 की नौकरी में ही मरे जा रहे हैं, और तूने अपना पूरा साम्राज्य खड़ा कर दिया। सच बता, यह सब कैसे मैनेज करती है? तेरे पास तो जादू की छड़ी है क्या?"

शिखा हंसी, "जादू नहीं तान्या, बस थोड़ा सा टाइम मैनेजमेंट और..."

तान्या ने उसकी बात काट दी, "अरे छोड़ ये मैनेजमेंट की बातें। मुझे पता है तेरा राज़। तू ज़रूर अपने मायके वालों के पास रहती होगी या तेरी माँ तेरे साथ रहती होंगी। है न? क्योंकि ससुराल में रहकर, सास-ससुर की चिक-चिक के बीच इतना बड़ा बिज़नेस खड़ा करना नामुमकिन है। मेरी सास को देख ले, अगर मैं ऑफिस से दस मिनट लेट हो जाऊं, तो घर में महाभारत छिड़ जाती है। तू लकी है कि तुझे ऐसी 'तानाशाही' नहीं झेलनी पड़ती।"

शिखा के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गई। उसने तान्या के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "तान्या, यहाँ बहुत शोर है। मेरा घर पास ही है, चल घर चलते हैं। सुकून से कॉफी पिएंगे और बात करेंगे।"

तान्या ने हामी भर दी। उसे लगा कि शिखा के घर जाकर उसके शक की पुष्टि हो जाएगी कि शिखा की सफलता के पीछे उसकी अपनी माँ का हाथ है, जो उसे दामाद के घर में भी रानी की तरह रखती होंगी।

गाड़ी जब शिखा के आलीशान बंगले के सामने रुकी, तो रात के दस बज रहे थे। घर के अंदर दाखिल होते ही एक भीनी-भीनी अगरबत्ती की खुशबू और शांति का अहसास हुआ। ड्राइंग रूम एकदम व्यवस्थित था।

जैसे ही वे अंदर पहुंचे, एक बुजुर्ग महिला, जिनके बाल पूरी तरह सफ़ेद थे और आँखों पर मोटा चश्मा था, हाथ में एक डायरी और पेन लिए सोफे पर बैठी थीं। सामने लैपटॉप खुला था।

शिखा को देखते ही वो महिला बोलीं, "आ गई महारानी? अवार्ड मिल गया? ला इधर दिखा। और सुन, कल के ऑर्डर के लिए कच्चे आम कम पड़ रहे थे, मैंने शाम को ही वेंडर को फोन करके 50 किलो और मंगवा लिए हैं। और हाँ, तेरी वो पैकेजिंग वाली मशीन में कुछ आवाज़ आ रही थी, मैकेनिक को कल सुबह 10 बजे बुलाया है।"

तान्या यह देखकर हैरान थी। यह महिला घर की मालकिन कम और शिखा की पर्सनल सेक्रेटरी ज्यादा लग रही थीं। तान्या ने शिखा के कान में फुसफुसाया, "तेरी मम्मी तो बड़ी स्मार्ट हैं यार। मेरी माँ को तो व्हाट्सएप चलाना भी नहीं आता, और ये तो लैपटॉप और वेंडर सब संभाल रही हैं। इसीलिए तू इतनी सफल है। माँ का साथ हो तो बेटी दुनिया जीत ही लेती है।"

शिखा ने अपनी हंसी दबाते हुए जोर से कहा, "माँजी, ये मेरी दोस्त तान्या है। और तान्या, ये हैं मेरी 'सीईओ' और इस घर की असली बॉस—श्रीमती कावेरी देवी... मेरी सासू माँ।"

तान्या के हाथ से पर्स गिरते-गिरते बचा। "क्या? ये... ये तुम्हारी सास हैं?"

कावेरी देवी ने चश्मा नाक पर ठीक करते हुए तान्या को ऊपर से नीचे तक देखा और एक कड़क आवाज़ में बोलीं, "क्यों भई? सास इंसान नहीं होती क्या? या सास के माथे पर सींग लगे होते हैं जो तू इतनी हैरान हो रही है?"

तान्या झेंप गई। "नहीं... नहीं आंटी जी... वो बस..."

शिखा ने माहौल को हल्का करने के लिए कॉफी बनाने को कहा, लेकिन कावेरी देवी ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। "तू बैठ। दिन भर की थकी है, अवार्ड लेकर आई है, अब रसोई में घुस जाएगी तो साड़ी खराब कर लेगी। मैं रामू काका से कहती हूँ कॉफी लाने को।"

कॉफी की चुस्कियों के बीच शिखा ने बोलना शुरू किया।

"तान्या, तू कह रही थी न कि मैं 'लकी' हूँ क्योंकि मुझे तानाशाही नहीं झेलनी पड़ती? तुझे पता है, जब मेरी शादी हुई थी, तो माँजी इस शहर की सबसे सख्त सास मानी जाती थीं। मेरे पति, रोहन, अपनी माँ के सामने नज़रें उठाकर बात नहीं कर सकते थे। मुझे घर से बाहर निकलने की भी इज़ाज़त नहीं थी। आचार का बिज़नेस तो बहुत दूर की बात है।"

तान्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। "तो फिर यह सब कैसे बदला?"

कावेरी देवी ने अपनी डायरी बंद की और एक गहरी सांस ली। "बदला, क्योंकि एक दिन मैंने अपनी बहू को नहीं, बल्कि खुद को आईने में देखा।"

कावेरी देवी ने बताना शुरू किया, "शादी के दो साल बाद शिखा बीमार पड़ गई। डिप्रेशन में थी। डॉक्टर ने कहा कि इसे किसी काम में मन लगाने की ज़रूरत है। मुझे याद आया कि यह शादी से पहले एमबीए करना चाहती थी। उस दिन मुझे अपनी जवानी याद आ गई। मुझे गाने का शौक था, पर मेरी सास ने मेरा तानपूरा स्टोर रूम में रखवा दिया था। मैं सारी उम्र उस तानपूरे को दीमक लगते देखती रही और मेरे अंदर का कलाकार भी मर गया।"

वे शिखा की ओर मुड़ीं और उनकी आँखों में नमी आ गई। "जब मैंने शिखा को उसी तरह घुटते देखा, तो मुझे लगा कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। मैंने सोचा, अगर मैंने इसका साथ नहीं दिया, तो कल को यह भी एक चिड़चिड़ी सास बनेगी, जो अपनी बहुओं का जीना हराम करेगी। परंपराएं तोड़ने के लिए ही होती हैं, अगर वे किसी की जान ले रही हों।"

शिखा ने अपनी सास का हाथ थाम लिया। "तान्या, शुरुआत में बहुत मुश्किल था। रिश्तेदारों ने माँजी को बहुत ताने दिए। 'अरे, बहू से दुकान चलवाओगी?', 'घर की इज़्ज़त बाजार में बिकेगी?'। लेकिन माँजी ढाल बनकर खड़ी हो गईं। इन्होंने मुझसे एक डील की।"

"कैसी डील?" तान्या ने उत्सुकता से पूछा।

कावेरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने इससे कहा—देख बहू, मैं पुराने ज़माने की हूँ, मुझे रसोई और घर का कोना-कोना पता है। तू नए ज़माने की है, तुझे दुनिया और बाज़ार पता है। आज से घर का 'गृह मंत्रालय' मेरा, और 'वित्त मंत्रालय' तेरा। तू बाहर की लड़ाई लड़, घर के अंदर की राजनीति मैं संभालूँगी। तुझे इस बात की चिंता नहीं करनी पड़ेगी कि शाम को खाना क्या बनेगा, धोबी आया या नहीं, या मेहमानों को क्या परोसा जाएगा। वो मेरा विभाग है। लेकिन बदले में तुझे एक वादा करना होगा—तू हार नहीं मानेगी।"

शिखा की आँखों में गर्व था। उसने तान्या से कहा, "तुझे लगता है कि यह 'अकेले' हुआ? नहीं तान्या। कोई भी गृहस्थी या बिज़नेस अकेले नहीं संभाला जाता जब तक कोई दूसरा उसका 'बैकबोन' (रीढ़ की हड्डी) न बने। मेरे लिए यह मुमकिन नहीं होता अगर माँजी मेरा घर न संभालतीं। आज मैं जो स्टेज पर खड़ी थी, वो सिर्फ़ मेरा चेहरा था, लेकिन उसके पीछे की मेहनत और त्याग इनका था। मेरी सफलता इनकी 'अंडरस्टैंडिंग' का नतीजा है।"

तान्या सन्न रह गई। वह हमेशा सोचती थी कि सास का मतलब सिर्फ हुक्म चलाना और नुस्खे निकालना होता है। उसने कभी अपनी सास से बात करने की, उन्हें अपना साथी बनाने की कोशिश ही नहीं की थी। वह हमेशा उन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी (Competitor) मानती थी।

कावेरी देवी ने तान्या के चेहरे के भाव पढ़ लिए। वे बोलीं, "बेटी, हम औरतों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हम एक-दूसरे को दुश्मन समझ लेते हैं। सास को लगता है बहू बेटा छीन लेगी, और बहू को लगता है सास आज़ादी छीन लेगी। लेकिन अगर दोनों एक ही टीम में आ जाएं, तो दुनिया की कोई ताकत उन्हें हरा नहीं सकती। मैंने अपना तानपूरा तो खो दिया, लेकिन शिखा के सपनों में मैंने अपना संगीत ढूंढ लिया।"

तभी रोहन (शिखा का पति) और शिखा के बच्चे कमरे में आए। बच्चे दौड़कर कावेरी देवी की गोद में जा बैठे। "दादी! कल स्कूल के टिफिन में पास्ता चाहिए!"

कावेरी देवी ने हंसते हुए शिखा को देखा, "सुना मैडम? अब आप तो बिजनेस टायकून हैं, पास्ता तो मुझे ही बनाना पड़ेगा।"

शिखा ने हाथ जोड़कर कहा, "मालिक, आपकी जो आज्ञा।"

पूरा कमरा हंसी से गूंज उठा। तान्या ने देखा कि यह घर सिर्फ ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच के उस पुल से बना था जिसे 'विश्वास' कहते हैं।

जाते समय तान्या ने कावेरी देवी के पैर छुए। "आंटी, आज आपने मेरी आँखों से एक बहुत बड़ा पर्दा हटा दिया। मैं अपनी सास को हमेशा एक 'समस्या' मानती रही, कभी 'समाधान' बनने का मौका ही नहीं दिया।"

कावेरी देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा। "जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी... पर अपनी सास को साथ लेकर। देखना, बोझ आधा हो जाएगा।"

गाड़ी में वापस बैठते समय तान्या को शिखा की वो बात याद आ रही थी—"मेरे लिए भी ये मुनासिब नहीं होता अगर माँ घर संभालने में मेरी मदद नहीं करतीं।"

आज तान्या को समझ आ गया था कि 'सुपरवूमन' वो नहीं होती जो सब कुछ अकेले करती है, बल्कि वो होती है जो मदद मांगना और मदद स्वीकार करना जानती है। उसने अपना फोन निकाला और अपनी सास को एक मैसेज किया: "मम्मीजी, कल रविवार है। क्या हम दोनों मिलकर आपकी पसंद की गाजर की खीर बनाएं? मुझे आपसे वो पुरानी रेसिपी सीखनी है।"

उधर शिखा के घर में, लाइट्स बंद हो चुकी थीं। शिखा अपनी अवार्ड ट्रॉफी को अलमारी में रख रही थी, लेकिन उसने उसे सबसे ऊपर वाले शेल्फ पर नहीं रखा। उसने उसे उस शेल्फ पर रखा जहाँ कावेरी देवी की पुरानी रामायण और चश्मा रखा होता था। क्योंकि वह जानती थी कि असली विजेता वह ट्रॉफी नहीं, बल्कि वह बुजुर्ग हाथ थे जिन्होंने उस ट्रॉफी तक पहुँचने की सीढ़ी बनाई थी।

यह कहानी हमें सिखाती है कि अक्सर हम जिन्हें अपनी बेड़ियों की वजह मानते हैं, थोड़ी सी समझदारी और संवाद से वही हमारे पंख बन सकते हैं। घर की चारदीवारी में अगर सास और बहू के बीच 'पावर स्ट्रगल' की जगह 'पार्टनरशिप' आ जाए, तो हर घर से एक शिखा निकल सकती है।

लेखिका : संगीता चौबे


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