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खामोश हवेली में बहू बनी सरस्वती | दिल छू लेने वाली कहानी

 बनारस के घाटों की सीढ़ियों जैसी उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी में, सुरभि के घर का माहौल किसी उत्सव से कम नहीं था। सुरभि, जो अपने नाम की तरह ही महकती और चहकती थी, आज विदा होने वाली थी। उसके पिता, पंडित दीनानाथ जी, शहर के जाने-माने शास्त्रीय संगीत के शिक्षक थे। सुरभि के रग-रग में संगीत बसता था। सुबह की शुरुआत तानपूरे की झंकार से होती और शाम रियाज़ के साथ ढलती।

उसका विवाह शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी घराने, 'रायज़ादा परिवार' में तय हुआ था। रायज़ादा हवेली अनुशासन और गाम्भीर्य के लिए मशहूर थी। वहाँ की दीवारें भी मानो धीरे बोलती थीं। सुरभि के मन में एक अजीब सी घबराहट थी। एक तरफ नए जीवन का उत्साह, और दूसरी तरफ अपनी उन्मुक्त हंसी और संगीत को पीछे छोड़ जाने का डर।

विदाई की बेला आ गई। माँ ने सुरभि को गले लगाकर ढेर सारे आशीर्वाद दिए। गहने, कपड़े और गृहस्थी के सामान के साथ गाड़ियां भर दी गईं। लेकिन अंत में, पंडित दीनानाथ जी अपनी बेटी के पास आए। उनके हाथ में एक पुराना, मखमली कवर में लिपटा हुआ 'सितार' था। यह वही सितार था जिस पर सुरभि ने अपनी उंगलियां चलाना सीखा था।

"पापा, यह?" सुरभि की आँखों में आंसू तैर आए।

पंडित जी ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखा। "बेटा, मैं तुम्हें सोने-चांदी के साथ यह भी दे रहा हूँ। पर याद रखना, यह सिर्फ़ एक वाद्य यंत्र नहीं है। इसके तारों में एक रहस्य छिपा है।"

उन्होंने सितार के तुम्बे (निचले हिस्से) की तरफ इशारा करते हुए कहा, "जब तुम्हें लगे कि नए घर में तुम्हारे सुर नहीं मिल रहे, या खामोशी का शोर बहुत बढ़ गया है, तब इस सितार को खोलना। इसमें मैंने तुम्हारे लिए एक 'स्वर-लिपि' (नोटेशन) रखी है। उसे पढ़ना और फिर इसे बजाना।"

सुरभि ने पिता के चरण स्पर्श किए और उस सितार को अपनी सबसे कीमती धरोहर मानकर सीने से लगा लिया। रायज़ादा परिवार की बड़ी कार उसे लेकर चली गई, पीछे छूट गई गलियां और वो घर जहाँ हवाओं में भी संगीत था।

रायज़ादा हवेली में सुरभि का स्वागत हुआ। उसकी सास, दमयंती देवी, एक बेहद सख्त और नियम-कायदे वाली महिला थीं। उनका मानना था कि घर की बहुएं 'दिखनी' चाहिए, 'सुनाई' नहीं देनी चाहिए। घर में सन्नाटा इतना गहरा रहता था कि घड़ी की टिकटिक भी हथौड़े जैसी लगती थी। सुरभि के पति, शेखर, अपनी माँ का बहुत सम्मान करते थे और उनके किसी भी नियम के खिलाफ नहीं जाते थे।

शुरुआती कुछ दिन तो रस्मों-रिवाजों में बीत गए। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, सुरभि को उस घर का सन्नाटा खाने को दौड़ने लगा। उसे आदत थी गुनगुनाने की, पैर पटक कर चलने की, जोर से हंसने की। लेकिन यहाँ, अगर उसकी पायल की आवाज़ थोड़ी तेज़ हो जाती, तो दमयंती देवी की भृकुटी तन जाती थी।

"बहू," एक दिन दमयंती देवी ने टोक दिया, "धीरे चला करो। यह घर है, कोई नृत्यशाला नहीं। और यह क्या हर वक्त गुनगुनाती रहती हो? रसोइए और नौकर क्या सोचेंगे? बड़ों का लिहाज रखना सीखो।"

सुरभि की हंसी धीरे-धीरे मुरझाने लगी। उसने गुनगुनाना छोड़ दिया। वह सितार अपने कवर में लिपटा हुआ कमरे के एक कोने में पड़ा धूल फांक रहा था। शेखर अपने काम में व्यस्त रहता और घर आकर भी ज्यादा बात नहीं करता। सुरभि को लगने लगा जैसे वह एक सोने के पिंजरे में बंद हो गई है। उसका दम घुटने लगा था। वह अपने पिता को फोन करती, तो बस रो पड़ती, लेकिन अपनी पीड़ा शब्दों में नहीं कह पाती।

करीब दो महीने बीत गए। एक शाम घर में बड़ी पूजा का आयोजन था। शहर के तमाम बड़े लोग आने वाले थे। दमयंती देवी बहुत तनाव में थीं। हर चीज़ परफेक्ट होनी चाहिए थी। नौकरों पर चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं। माहौल में एक अजीब सा तनाव और कड़वाहट घुली हुई थी। शेखर भी ऑफिस से जल्दी आ गया था लेकिन वह भी माँ के गुस्से का शिकार हो रहा था।

सुरभि अपने कमरे में तैयार हो रही थी। उसका मन बहुत भारी था। उसे अपना मायका याद आ रहा था जहाँ पूजा का मतलब उल्लास होता था, डर नहीं। उसकी नज़र कोने में रखे सितार पर पड़ी। उसे पिता की बात याद आई—"जब खामोशी का शोर बहुत बढ़ जाए..."

उसने कांपते हाथों से सितार का कवर हटाया। सितार की लकड़ी चमक रही थी। उसने तारों को छेड़ा तो एक हल्की सी झनकार हुई, जिसने कमरे की उदासी को एक पल के लिए चीर दिया। सितार के तारों के नीचे एक लिफाफा फंसा हुआ था। सुरभि ने उसे निकाला। वह उसके पिता की चिट्ठी थी।

उसने चिट्ठी खोली। लिखावट वही सधी हुई थी, जो बचपन में उसकी कॉपी पर 'बहुत अच्छे' लिखती थी।

“मेरी प्यारी गुड़िया,

मैं जानता हूँ कि जिस दिन तुम यह चिट्ठी पढ़ रही होगी, उस दिन तुम्हारा मन भारी होगा। बेटा, जीवन और संगीत में बहुत गहरा रिश्ता होता है। मैंने तुम्हें यह सितार इसलिए दिया है ताकि तुम 'सामंजस्य' (Harmony) का मतलब समझ सको।

देखो, सितार के तार अगर बहुत ढीले छोड़ दिए जाएं, तो उनसे कोई सुर नहीं निकलता, सिर्फ़ बेसुरापन आता है। और अगर उन्हें बहुत कस दिया जाए, तो वे टूट जाते हैं। संगीत तभी पैदा होता है जब तारों में 'तनाव' और 'ढीलापन' का सही संतुलन हो।

तुम्हारी ससुराल भी इस सितार की तरह है। वहां के नियम-कायदे और लोगों का स्वभाव शायद बहुत सख्त (कसे हुए तार) हो, या शायद तुम खुद को बहुत ढीला (लापरवाह) महसूस कर रही हो। लेकिन बेटा, तार तोड़ने से संगीत नहीं बनता। एक कुशल कलाकार वही है जो हर तार को, चाहे वह कितना भी सख्त क्यों न हो, प्यार से और धैर्य से 'ट्यून' कर दे।

अपनी आवाज़ को दबाना मत, बल्कि उसे इतनी मधुर बना लेना कि वह शोर न लगे, बल्कि संगीत बन जाए। खामोशी को तोड़ने के लिए चिल्लाने की ज़रूरत नहीं होती, बस एक मीठी धुन छेड़नी होती है। आज इस सितार को बजाओ। अपने लिए नहीं, उस घर के लिए। उस घर की बेसुरी खामोशी को अपने प्रेम के राग से भर दो। याद रखना, तुम वो अगरबत्ती नहीं जो जलकर खत्म हो जाए, तुम वो संगीत हो जो वातावरण में घुल कर अमर हो जाता है।”

— तुम्हारा बाबा

सुरभि की आँखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार वे कमजोरी के नहीं, शक्ति के थे। उसे समझ आ गया कि वह क्या गलती कर रही थी। वह उस घर के ढांचे में खुद को मिटा रही थी, जबकि उसे उस घर में अपने रंग (अपना संगीत) भरने थे।

नीचे हॉल में मेहमान आ चुके थे। दमयंती देवी अभी भी किसी बात पर रसोइए को डांट रही थीं। माहौल बहुत भारी था। लोग फुसफुसा रहे थे। तभी...

तभी सीढ़ियों से एक आवाज़ आई। वह किसी के गिरने या चिल्लाने की आवाज़ नहीं थी। वह 'राग यमन' का एक मीठा आलाप था।

सा... रे... गा...

सितार की झंकार ने हवा में तैरते तनाव को एक पल में काट दिया। दमयंती देवी चौंक गईं। "यह कौन है? किसने जुर्रत की?"

वह गुस्से में सीढ़ियों की तरफ बढ़ीं। शेखर भी हैरान होकर पीछे आया। सारे मेहमानों की नज़रें ऊपर उठ गईं।

सीढ़ियों के ऊपरी हिस्से पर, सुरभि बैठी थी। उसने अपनी बनारसी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था और आंखें बंद करके सितार पर उंगलियां चला रही थी। वह किसी कुशल उस्ताद की तरह मग्न थी। उसके चेहरे पर एक दिव्य शांति थी।

दमयंती देवी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। "बहू! यह क्या तमाशा है? मेहमानों के सामने..."

लेकिन उनके मुंह से अगला शब्द नहीं निकला। क्योंकि जैसे ही सुरभि ने 'गत' (तेज़ लय) पकड़ी, वहां मौजूद हर व्यक्ति मंत्रमुग्ध हो गया। वह संगीत इतना पवित्र और सुकून देने वाला था कि दमयंती देवी को लगा जैसे उनके माथे की तनी हुई नसें ढीली पड़ रही हों।

सुरभि रुकी नहीं। वह बजाती रही। उसने अपनी सारी पीड़ा, सारी उम्मीदें और सारा प्यार उन तारों पर उड़ेल दिया। शेखर, जो अपनी पत्नी को हमेशा डरा-सहमा देखता था, आज उसे एक देवी के रूप में देख रहा था।

जब संगीत थमा, तो हॉल में पिन-ड्रॉप साइलेंस था। फिर अचानक तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। शहर के मेयर, जो मेहमानों में शामिल थे, ने आगे बढ़कर कहा, "अद्भुत! दमयंती जी, हमें पता ही नहीं था कि आपकी बहू साक्षात सरस्वती है। सालों बाद रूह को सुकून मिला।"

दमयंती देवी अवाक खड़ी थीं। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी नमी थी। सुरभि ने आँखें खोलीं और सास को सामने देखकर डर गई। उसने तुरंत सितार नीचे रखा और उठ खड़ी हुई।

"माफ़ कीजियेगा माँ जी... मैं... मैं बस..."

दमयंती देवी धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आईं। सुरभि को लगा आज तो प्रलय आएगी। शेखर भी बचाव के लिए आगे आया।

लेकिन दमयंती देवी ने सुरभि के पास आकर, ज़मीन पर पड़े उस खुले खत को देखा। उन्होंने चश्मा ठीक किया और उस खत को उठाया। शेखर ने भी माँ के कंधे के ऊपर से वह खत पढ़ा।

“तार तोड़ने से संगीत नहीं बनता... एक कुशल कलाकार वही है जो हर तार को प्यार से ट्यून कर दे।”

दमयंती देवी ने चिट्ठी बंद की और सुरभि की ओर देखा। उस सख्त चेहरे पर एक दरार पड़ गई थी।

"तुम्हारे पिता सही कहते हैं," दमयंती देवी की आवाज़ भर्राई हुई थी। "मैंने इस घर के तारों को इतना कस दिया था कि संगीत तो दूर, सांस लेने की जगह भी नहीं बची थी। मैं अनुशासन के नाम पर इस घर को जेल बना बैठी थी। मैं भूल गई थी कि घर दीवारों से नहीं, हंसी और आवाज़ों से बनता है।"

उन्होंने सुरभि का हाथ पकड़ा और उसे चूमा। "मेरी उंगलियां तो अब सख्त हो गई हैं बहू, क्या तुम मुझे भी सिखाओगी? बचपन में मुझे भी वीणा बजाने का शौक था, लेकिन मेरे ससुराल वालों ने उसे 'शोर' कहकर बंद करवा दिया था। मैंने वही गलती तुम्हारे साथ की। मैं अपनी सास की परछाई बन गई थी।"

शेखर की आँखों में आंसू थे। उसने अपनी माँ को बरसों बाद इतना भावुक और नरम देखा था।

"माँ," शेखर बोला, "आज घर सचमुच 'घर' लग रहा है।"

दमयंती देवी ने सुरभि के माथे को चूमा और कहा, "आज से यह सितार कोने में नहीं रहेगा। इसे हॉल में सजाया जाएगा। और सुनो, कल से सुबह की आरती टेप-रिकॉर्डर पर नहीं होगी, मेरी बहू गाएगी। और मुझे घर में 'पिन-ड्रॉप साइलेंस' नहीं चाहिए। मुझे संगीत चाहिए।"

सुरभि ने रोते हुए अपनी सास को गले लगा लिया। उस दिन उसने सिर्फ अपनी जगह नहीं बनाई थी, उसने उस घर की आत्मा को भी आज़ाद कर दिया था।

पंडित दीनानाथ जी की सीख ने कमाल कर दिया था। सुरभि ने घर के नियमों को तोड़ा नहीं था, उसने बस उन्हें 'सुर' में कर दिया था। अगरबत्ती की तरह जलकर खत्म होने की बजाय, उसने सितार की तरह उस घर के हर सदस्य के हृदय के तार झनझना दिए थे।

उस रात रायज़ादा हवेली में देर तक हंसी-ठिठोली गूंजती रही। बाहर से गुज़रने वाले लोग हैरान थे कि जिस घर से कभी ऊंची आवाज़ नहीं आती थी, आज वहां से उत्सव की महक आ रही थी। सच ही है, संस्कार वो नहीं जो आपको झुकना सिखाएं, संस्कार वो हैं जो आपको दूसरों को टूटने से बचाना और उन्हें अपने रंग में रंगना सिखाएं।


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