ये कहानी एक ऐसी माँ की है, जिसे उसका बेटा भूख-प्यास से तड़पता हुआ एयरपोर्ट पर छोड़कर चला गया…
और फिर वही माँ बनी करोड़पति…
और आखिर में उसने अपने बेटे को उसके बुरे कर्मों की सज़ा दी।
एयरपोर्ट पर एक सफाई कर्मचारी राम अपनी ड्यूटी कर रहा था।
उसने देखा—एक बुज़ुर्ग महिला कई घंटों से एक ही जगह बैठी है।
वह बार-बार अंदर की तरफ देख रही थी, मानो किसी का इंतज़ार कर रही हो।
राम सुबह आया था तब भी वह वहीं थी…
और अब दोपहर की लंच ड्यूटी भी निकल गई, फिर भी वह महिला उसी बेंच पर बैठी रही।
राम को तरस आ गया। वह पास गया और बोला—
“अम्मा जी… आप कहाँ जाएँगी? आप यहाँ किसका इंतज़ार कर रही हैं? क्या कोई आपको लेने आ रहा है?”
बुज़ुर्ग महिला बोली—
“बेटा, मेरा बेटा कमलेश अंदर गया है। पता नहीं इतना समय क्यों लग रहा है।
वो मुझे मुंबई लेकर जा रहा है। अगर हो सके, तो उसे बुला दो…”
राम समझ चुका था—ऐसे कई मामले वह पहले भी देख चुका था।
फिर भी वह बोला—
“अम्मा जी, अगर आपको भूख लगी हो तो मैं कुछ खाने को ले आऊँ?”
महिला हाथ जोड़कर मुस्कुराई—
“नहीं बेटा… मेरा बेटा बस आता ही होगा। मैं यहाँ से नहीं हटूँगी।
अगर मैं नहीं मिली तो वो परेशान हो जाएगा…”
राम ने धीरे से कहा—
“अम्मा जी… रोज़ यहाँ ऐसे लोग मिलते हैं… जिनके बच्चे उन्हें छोड़ जाते हैं…”
यह सुनकर महिला नाराज़ हो गई—
“मेरे बेटे के बारे में ऐसा मत बोलो! तुम उसे जानते भी नहीं!”
राम फिर भी अंदर जाकर देखा…
और लौटकर बोला—
“माँ जी… आपका बेटा अंदर कहीं नहीं है…”
महिला का चेहरा उतरा…
फिर भी वह खुद को समझाने लगी—
“कोई बात नहीं… शायद कोई काम आ गया होगा… थोड़ी देर में आ जाएगा…”
❄️ ठंडी रात, भूख और बेबसी
शाम ढल गई। ठंड बढ़ने लगी।
महिला साड़ी के पल्लू से खुद को ढककर काँप रही थी।
राम ने फिर पास आकर पूछा—
“माँ जी, आपका नाम क्या है?”
वह बोली—
“मेरा नाम मालती देवी है…”
राम ने शॉल देते हुए कहा—
“इसे ओढ़ लीजिए, रात में सर्दी बढ़ जाएगी।
और अगर जरूरत पड़े तो बताइएगा…”
मालती देवी शॉल लेकर बैठ गईं…
और पूरी रात भूख-प्यास में अपने बेटे का इंतज़ार करती रहीं।
अगली सुबह राम आया तो वह अब भी वहीं थीं।
राम ने पानी दिया… और सख्ती से बोला—
“माँ जी… अब सच मान लीजिए… आपका बेटा आपको छोड़कर चला गया है। वह वापस नहीं आएगा…”
यह सुनते ही मालती देवी रोने लगीं…
वह कमजोर होकर बेंच से गिर पड़ीं।
डॉक्टर को बुलाया गया—डॉक्टर बोला, “ये भूख और कमजोरी की वजह से बेहोश हुई हैं।”
राम उन्हें कैंटीन में ले गया, खाना खिलाया।
तब मालती देवी ने रोते हुए बताया—
“बेटा… मेरा बेटा मुझे लेने गाँव आया था और बोला—‘अब हम वापस नहीं आएँगे।’
उसने मेरा घर भी बिकवा दिया…
अब मेरे पास न पैसा है, न घर… मैं जाऊँ तो कहाँ?”
राम बेबस हो गया… पर मन में ठान लिया—ये माँ अब यूँ सड़कों पर नहीं रहेगी।
🐕 कुत्तों से बचाती माँ… और राम का फैसला
शाम को राम जा रहा था, तभी एयरपोर्ट के बाहर फुटपाथ पर मालती देवी दिखीं।
उनके पास कुत्ते भौंक रहे थे, और वह डरते हुए पत्थर उठाकर खुद को बचा रही थीं।
राम का दिल काँप गया।
उसने कुत्तों को भगाया… और तुरंत अपनी पत्नी रीना को कॉल किया—
“रीना… अगर इन माँ जी के साथ कुछ बुरा हो गया तो मैं खुद को माफ नहीं कर पाऊँगा।
क्या मैं इन्हें घर ले आऊँ?”
रीना बोली—
“ले आओ… जैसे हम खाते हैं, वैसे ही एक और सदस्य भी खा लेगा।
हमसे जो बनेगा, करेंगे…”
राम मालती देवी को घर ले आया।
घर छोटा था, पर दिल बड़ा।
रीना ने कहा—
“माँ जी, जगह कम है… लेकिन आपके लिए हमारे दिल में बहुत जगह है।
आज से आप इस घर की सदस्य हैं…”
मालती देवी की आँखों में आँसू थे—
“आज से तुम ही मेरे बेटा-बहू हो…”
धीरे-धीरे मालती देवी इस घर की जड़ बन गईं।
घर में सुकून लौट आया।
🎟️ किस्मत पलटी — लॉटरी और 10 करोड़
एक दिन मालती देवी सब्ज़ी लेने गईं।
रास्ते में 1 रुपये की लॉटरी टिकट बिक रही थी—इनाम 10 करोड़।
पता नहीं क्यों… उन्होंने एक टिकट खरीद ली।
फिर अगले कई दिनों तक कभी-कभी टिकट ले आतीं और रीना को देतीं—
“बेटा, संभाल कर रख लेना… क्या पता किस्मत खुल जाए।”
लॉटरी वाले दिन, राम के घर से निकलते ही
रीना और मालती देवी टीवी के सामने टिकट लेकर बैठ गईं।
तीसरा विजेता… नहीं।
दूसरा विजेता… नहीं।
अब बचा पहला—10 करोड़!
पहला नंबर घोषित हुआ… मैच नहीं हुआ।
दोनों निराश हो गईं।
तभी एंकर बोला—
“माफ कीजिए, नंबर पढ़ने में गलती हो गई थी… अब सही नंबर बताते हैं…”
सही नंबर आया… और वही नंबर मालती देवी की टिकट पर था!
रीना और मालती देवी खुशी से रोने लगीं—उछलने लगीं।
उसी वक्त राम घर कागज़ लेने लौट आया और सब देखकर चौंका—
“इतनी खुशी? क्या हुआ?”
रीना ने उसे गले लगाया—
“अब तुम ये छोटी नौकरी नहीं करोगे… हमारी लॉटरी लग गई है!”
📰 खबर में माँ दिखी… और बेटा लौट आया
यह खबर टीवी पर चली।
मालती देवी का बेटा कमलेश मुंबई में था।
उसने न्यूज़ में माँ को देखा—
“10 करोड़ की विजेता!”
उसकी आँखों में चमक आ गई।
वह माँ को “प्यार” नहीं… “पैसे” के लिए ढूँढने निकला।
उसने लोगों से पूछकर पता निकाला और राम के घर पहुँचा…
लेकिन राम परिवार शिफ्ट हो चुका था।
किसी तरह वह नई सोसायटी तक पहुँचा।
गेट पर गार्ड को बोला—
“यहाँ मालती देवी रहती हैं, मैं उनका बेटा कमलेश हूँ।”
गार्ड ने अंदर फोन किया।
मालती देवी ने गुस्से से कहा—
“वो मेरा बेटा नहीं। उसे वापस भेज दो।”
कमलेश चालाक था।
गार्ड के हटते ही वह चोरी से अंदर घुस गया।
और चिल्लाने लगा—
“माँ! आपका बेटा आ गया!”
मालती देवी ने उसे दूर धकेल दिया—
“भाग यहाँ से!”
राम दौड़कर आया।
कमलेश ने माँ के पैरों में गिरकर ड्रामा किया।
राम ने गुस्से में कहा—
“तू वही है ना, जिसने माँ को एयरपोर्ट पर छोड़ दिया था?”
कमलेश ने जेब से चाकू निकाला।
पहले खुद को मारने का नाटक किया…
फिर बोला—
“या तो मुझे पैसे दो, या मैं खुद को मारकर तुम्हें फँसा दूँगा!”
और अचानक उसने राम की गर्दन पर चाकू रख दिया—
“माँ! पैसे दो, वरना इसे मार दूँगा!”
मालती देवी घबरा गईं—
“नहीं! मेरे बेटे को कुछ मत करना… मैं पैसे दे दूँगी…”
ऊपर से रीना सब देख रही थी।
उसने चुपचाप पुलिस को फोन कर दिया।
कमलेश हँसने लगा—
“वाह! अपने सगे बेटे से नफरत… और इस पराए से इतना प्यार?”
मालती देवी की आँखों में आग थी।
वह बोलीं—
“सगा वही होता है जो साथ निभाए।
तूने मुझे मरने को छोड़ा था…
आज यही मेरा बेटा है… जिसने मुझे जीना सिखाया!”
🚔 बुरे कर्मों की सज़ा
पुलिस समय पर पहुँच गई।
कमलेश को रंगे हाथ पकड़ा गया।
चाकू छिना… और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
सबूत पूरे थे—जान से मारने की कोशिश।
कमलेश को उम्रकैद की सज़ा हुई।
और मालती देवी अपने “असल बेटे” राम और बहू रीना के साथ
खुशियाँ भरा जीवन जीने लगीं।
दोस्तों…
खून का रिश्ता हमेशा सगा नहीं होता।
और पराया रिश्ता हमेशा दूर नहीं होता।
इंसान का कर्म ही तय करता है—कौन अपना है और कौन नहीं।
लेखिका : प्रियंका अग्रवाल
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