सुमित्रा ने सुबह से ही रसोई में जैसे तूफान मचा रखा था। आज उसके छोटे भाई किशोर और उसकी पत्नी वंदना आ रहे थे। पूरे तीन साल बाद वे लोग लंदन से वापस भारत लौटे थे और सीधे सुमित्रा के घर आ रहे थे। सुमित्रा की बेटी, रिया, तो सुबह से ही इतनी उत्साहित थी कि उसके पैर जमीन पर नहीं टिक रहे थे। रिया के लिए उसके 'किशोर मामा' और 'वंदना मामी' किसी सुपरहीरो से कम नहीं थे। बचपन में उन्होंने उसे जो लाड़-प्यार दिया था, उसकी यादें आज भी उसके मन में ताजा थीं।
रिया खुद अपनी स्कूटी लेकर स्टेशन उन्हें लेने गई थी। सुमित्रा ने सोचा था कि जब रिया वापस आएगी, तो घर खुशियों से भर जाएगा। वह कल्पना कर रही थी कि रिया आते ही चहकेगी, दिखाएगी कि मामी उसके लिए क्या लाई हैं और मामा ने कैसे उसे गले लगाया।
तकरीबन एक घंटे बाद दरवाजे की घंटी बजी। सुमित्रा हाथ पोंछते हुए दौड़कर बाहर आई। सामने किशोर और वंदना खड़े थे, और पीछे रिया सूटकेस लिए खड़ी थी। लेकिन सुमित्रा की नज़र सबसे पहले अपनी बेटी के चेहरे पर पड़ी। वह चेहरा, जो सुबह गुलाब की तरह खिला हुआ था, अब कुम्हलाया हुआ लग रहा था। आँखों में वह चमक गायब थी जो एक घंटे पहले थी।
औपचारिकताएं पूरी हुईं। पानी-नाश्ता हुआ। किशोर और वंदना अपने कमरे में आराम करने चले गए। सुमित्रा ने मौका पाकर रिया को अपने कमरे में बुलाया।
"रिया, क्या बात है बेटा? तू कुछ बुझी-बुझी सी लग रही है। तबीयत तो ठीक है न तेरी? सुबह तो तू इतनी खुश थी कि मामा-मामी आ रहे हैं, अब क्या हुआ? चेहरा क्यों उतरा हुआ है?"
रिया ने पहले तो टालने की कोशिश की, फिर झुंझलाते हुए सोफे पर बैठ गई। "कुछ नहीं मम्मी। बस... जैसा मैंने सोचा था, वैसा कुछ नहीं है। मामी वैसी नहीं रहीं जैसी वो वीडियो कॉल पर दिखती थीं। बहुत घमंडी हो गई हैं, और मामा भी बदल से गए हैं।"
सुमित्रा चौंक गई। "घमंडी? वंदना और घमंडी? पगली, तुझे कोई गलतफहमी हुई होगी। वो तो इतनी मिलनसार है।"
"नहीं मम्मी," रिया की आँखों में आंसू आ गए। "आपको पता है, जब मैं स्टेशन पहुंची, तो मैंने दौड़कर मामी को गले लगाना चाहा। उन्होंने मुझे रोका नहीं, पर खुद आगे बढ़कर गले भी नहीं मिलीं। बस दूर से ही 'हाय रिया' कह दिया और तुरंत अपने सनग्लासेस ठीक करने लगीं। उन्होंने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा कि मेरी पढ़ाई कैसी चल रही है। और तो और, पूरे रास्ते वो अपनी कार की पिछली सीट पर बैठीं फोन में लगी रहीं। जब मैंने पूछा कि लंदन कैसा है, तो उन्होंने बस इतना कहा—'तुम नहीं समझोगी, वहां का स्टैंडर्ड ही अलग है'। मुझे बहुत बुरा लगा मम्मी। ऐसा लगा जैसे हम उनके स्टैंडर्ड के नहीं हैं इसलिए वो बात नहीं करना चाहतीं।"
सुमित्रा ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा। "हो सकता है बेटा वे थके हों। जेट लैग (jet lag) भी तो होता है। तू दिल पर मत ले।"
लेकिन सुमित्रा का मन भी खटक गया था। शाम को जब चाय का समय हुआ, तो सुमित्रा ने गौर किया। वंदना वाकई बहुत चुप थी। उसने एक महंगी सिल्क की साड़ी पहनी थी और हाथों में डायमंड के ब्रेसलेट थे, लेकिन उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे जिन्हें मेकअप से छिपाने की कोशिश की गई थी। किशोर भी पहले जैसा चुलबुला नहीं लग रहा था। वह बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था और हर थोड़ी देर में बालकनी में जाकर किसी से फोन पर धीरे-धीरे बात कर रहा था।
रिया ने जो कहा था, वह सच होता दिख रहा था। वंदना ने चाय का कप उठाया और एक घूंट पीकर मेज पर रख दिया।
"दीदी, इसमें चीनी थोड़ी ज्यादा है। हम लोग अब हेल्थ कॉन्शियस हो गए हैं। और यह नमकीन... यह सब हम नहीं खाते," वंदना ने बहुत ही रूखे स्वर में कहा।
रिया ने सुमित्रा की तरफ देखा, जैसे कह रही हो—'देखा? मैंने कहा था ना?'
माहौल में एक अजीब सा तनाव आ गया। सुमित्रा ने महसूस किया कि उनके और उसके भाई के बीच एक दीवार खड़ी हो गई है—पैसे और रुतबे की दीवार। रात के खाने पर भी सन्नाटा रहा। किशोर ने बस खाने की तारीफ की, लेकिन खाया बहुत कम। वंदना ने तो बस सलाद खाकर छोड़ दिया।
रात को जब सब सोने चले गए, तो सुमित्रा को नींद नहीं आई। उसे अपना भाई याद आ रहा था जो कभी उसकी हाथ की बनी खीर के लिए लड़ पड़ता था। आज उसी भाई ने खीर को हाथ तक नहीं लगाया। क्या वाकई विदेश की हवा ने उन्हें इतना बदल दिया था?
प्यास लगने पर सुमित्रा पानी लेने रसोई की तरफ गई। तभी उसने देखा कि गेस्ट रूम की बत्ती जल रही है और दरवाजा हल्का सा खुला है। अंदर से धीमी आवाजों में बहस हो रही थी। सुमित्रा ठिठक गई। किसी की बातें सुनना गलत था, पर अपने भाई की चिंता उसे रोक न सकी।
"किशोर, मैंने तुमसे कहा था कि हमें यहाँ नहीं आना चाहिए," यह वंदना की आवाज़ थी। वह रो रही थी। "हम दीदी से कैसे नज़रें मिलाएंगे? वो हमारे लिए इतना कर रही हैं और हम..."
"तो क्या करते वंदना?" किशोर की आवाज़ में बेबसी थी। "लंदन में रहने का कोई ठिकाना नहीं बचा था। मकान मालिक ने घर खाली करवा लिया। वीज़ा खत्म होने वाला है। नौकरी छह महीने पहले ही छूट चुकी है। भारत आने के सिवा कोई रास्ता नहीं था।"
सुमित्रा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
वंदना सिसक रही थी, "मुझे रिया के सामने नाटक करते हुए बहुत बुरा लग रहा है किशोर। वो बच्ची इतने प्यार से मुझे गले लगाने आई थी, और मुझे उसे खुद से दूर रखना पड़ा। मेरे पास उसे देने के लिए एक चॉकलेट तक के पैसे नहीं थे। अगर मैं उससे ज्यादा बात करती, तो वो पूछती कि 'मामी मेरे लिए क्या लाई हो?' मैं उसे क्या जवाब देती? इसलिए मैंने घमंडी बनने का नाटक किया ताकि वो मुझसे दूर रहे और सवाल न पूछे। मेरा दिल टूट रहा था जब मैंने उसकी आँखों में मायूसी देखी।"
किशोर ने वंदना को चुप कराते हुए कहा, "हिम्मत रखो। मैंने पुराने दोस्त से बात की है। शायद यहाँ कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाए। जैसे ही हालात सुधरेंगे, हम दीदी को सब सच बता देंगे। अभी अगर बताया तो वो परेशान हो जाएंगी और शायद अपनी जमा-पूंजी हमें देने की कोशिश करेंगी। मैं दीदी पर बोझ नहीं बनना चाहता।"
दरवाजे के बाहर खड़ी सुमित्रा की आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। वह जिसे 'घमंड' समझ रही थी, वह दरअसल 'आत्मसम्मान' और 'विवशता' का पर्दा था। उसकी लाड़ली भाभी, जो कभी भरकर हंसती थी, आज अपनी गरीबी छिपाने के लिए अपने ही परिवार से बेरुखी का नाटक कर रही थी ताकि उसका भेद न खुले। वंदना ने चाय में चीनी की शिकायत इसलिए नहीं की थी क्योंकि वह 'हेल्थ कॉन्शियस' थी, बल्कि शायद इसलिए क्योंकि तनाव के कारण उसके गले से निवाला नहीं उतर रहा था।
सुमित्रा चुपचाप अपने कमरे में लौट आई। उसने फैसला कर लिया कि वह उन्हें शर्मिंदा नहीं होने देगी।
अगली सुबह नाश्ते की मेज पर माहौल फिर वही था। वंदना और किशोर तैयार होकर आए, चेहरों पर वही नकली मुस्कान और दूरी। रिया मुंह फुलाए बैठी थी।
सुमित्रा ने गरमा-गरम परांठे परोसते हुए सामान्य लहजे में कहा, "किशोर, तुझे याद है बचपन में जब पिताजी की नौकरी चली गई थी? छह महीने तक हमारे घर में सिर्फ दाल-रोटी बनती थी। तब तूने एक बात कही थी।"
किशोर चौंका। "क्या दीदी?"
"तूने कहा था—'दीदी, जब तक हम सब साथ हैं, ये सूखी रोटी भी दावत है। परिवार के सामने कैसा पर्दा?'"
किशोर और वंदना एक-दूसरे को देखने लगे।
सुमित्रा ने आगे कहा, "और वंदना, तुझे याद है मेरी शादी पर मेरे पास गहने नहीं थे? तूने अपनी माँ के कंगन मुझे दिए थे और कहा था—'दीदी, यह मेरा नहीं, हमारा है'।"
वंदना की नज़रें झुक गईं।
सुमित्रा उठी और वंदना के पास गई। उसने वंदना के हाथ से वह 'ब्रांडेड' पर्स लिया और साइड में रख दिया। फिर उसने वंदना का चेहरा अपने हाथों में लिया।
"अब बताओ, तुम दोनों मुझसे कब तक झूठ बोलोगे? लंदन का 'स्टैंडर्ड' दिखाने के लिए तुम्हें अपनी दीदी से पराया होने की क्या ज़रूरत थी? क्या मेरा घर सिर्फ तब तुम्हारा है जब तुम अमीर हो? जब जेब खाली हो, तो क्या यह बहन पराई हो जाती है?"
वंदना अब खुद को रोक नहीं पाई। वह सुमित्रा के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। वह दीवार, जिसे उन्होंने कल से खड़ा किया था, आंसुओं के सैलाब में ढह गई। किशोर भी अपनी कुर्सी पर सिर झुकाए रो रहा था।
रिया, जो यह सब देख रही थी, हक्की-बक्की रह गई। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
सुमित्रा ने रिया को इशारा किया। "रिया, तेरी मामी घमंडी नहीं हैं। वो बस डरी हुई थीं। उनके पास तुझे देने के लिए गिफ्ट नहीं थे, इसलिए वो तुझसे नज़रें चुरा रही थीं।"
यह सुनते ही रिया का बालमन पिघल गया। उसे अपनी नादानी पर बहुत पछतावा हुआ। वह जिसे 'एटीट्यूड' समझ रही थी, वह असल में 'शर्मिंदगी' थी। रिया दौड़कर वंदना के पास गई और उसे कसकर पकड़ लिया।
"मामी, मुझे माफ कर दो। मैंने आपको क्या-क्या नहीं सोचा। मुझे गिफ्ट्स नहीं चाहिए। आप आ गए, यही मेरे लिए सबसे बड़ा गिफ्ट है।"
वंदना ने रिया को चूम लिया। "मेरी गुड़िया, मैं मजबूर थी। मुझे लगा तुम सोचोगी कि मामी विदेश से आई और खाली हाथ आई।"
"अरे," सुमित्रा ने माहौल को हल्का करते हुए कहा, "खाली हाथ कहाँ आई हो? अपने साथ यह जो अनुभव लाई हो, वही बहुत है। और किशोर, सुन ले। यह घर जितना मेरा है, उतना ही तेरा है। पिताजी ने यह घर हम दोनों के लिए बनाया था। तू यहाँ मेहमान बनकर नहीं, इस घर का बेटा बनकर रहेगा। और रही बात काम की, तो तुझे पता है कि जीजाजी (सुमित्रा के पति) को अपने बिजनेस में एक भरोसेमंद मैनेजर की कितनी जरूरत है? तू लंदन का मैनेजमेंट पढ़कर आया है, उनसे बेहतर कौन संभालेगा उनका काम?"
किशोर ने भीगी आँखों से दीदी को देखा। "दीदी, मैं..."
"चुप रह," सुमित्रा ने उसे डांटा, बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में डांटती थी। "चुपचाप नाश्ता कर। और खबरदार जो अब कोई 'डाइट' की बात की। ये आलू के परांठे हैं, और इन्हें मक्खन के साथ ही खाना पड़ेगा।"
उस सुबह उस डाइनिंग टेबल पर जो हंसी गूंजी, वह किसी भी धन-दौलत से ज्यादा कीमती थी। रिया ने सीखा कि इंसान का व्यवहार हमेशा वैसा नहीं होता जैसा ऊपर से दिखता है। कभी-कभी खामोशी और बेरुखी के पीछे बहुत गहरा दर्द छिपा होता है।
कुछ दिनों बाद, किशोर ने सुमित्रा के पति के साथ काम संभाल लिया। वंदना, जो तनाव में मुरझा गई थी, अब फिर से खिल उठी थी। वह अब घर के काम में सुमित्रा का हाथ बंटाती और शाम को रिया को अंग्रेजी सिखाती।
एक शाम रिया ने वंदना से पूछा, "मामी, अब तो सब ठीक है, फिर आपने वो वाला महंगा पर्स क्यों नहीं लिया आज?"
वंदना मुस्कुराई और बोली, "बेटा, वो पर्स नकली था। हम अपनी हैसियत छिपाने के लिए दिखावा कर रहे थे। लेकिन अब जब मैं अपनों के बीच हूँ, तो मुझे किसी ब्रांड या दिखावे की ज़रूरत नहीं। असली सुकून तो इस बात में है कि मैं जैसी हूँ, तुम सब मुझे वैसे ही प्यार करते हो।"
रिया ने मुस्कुराते हुए मामी के कंधे पर सिर रख दिया। उस दिन उसे समझ आया कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दुख को बिना कहे समझ लेने से बनते हैं। तृप्ति (सुमित्रा) की वह चिंता जो कल सुबह एक शिकायत थी, आज एक गहरे विश्वास में बदल गई थी—कि जब तक परिवार साथ है, हर मुश्किल आसान है।
लेखिका : सीमा नूतन
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