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आत्मसम्मान को कभी मत बेचना

 शादी के पाँच साल भी पूरे नहीं हुए थे कि रिश्ता भीतर से खाली हो गया। बाहर से सब ठीक दिखता था—घर, जिम्मेदारियाँ, लोगों के सामने निभाई गई मुस्कानें—लेकिन भीतर एक ऐसी घुटन थी, जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके साँस छीनती जा रही थी। समीर की झूठी मर्दानगी वाली सोच—“औरत का काम बस घर और बच्चे”—ने मेरे आत्मसम्मान को बार-बार रौंदा था। जिस प्यार को मैंने सबसे ज़्यादा चाहा था, उसी ने मेरे दिल के हज़ार टुकड़े कर दिए थे। एक दिन मैंने खुद से कहा—अब बस। इस रिश्ते को खींचना नहीं, ख़त्म करना है। अदालत से तलाक लिया और अपनी छोटी बेटी सिया के साथ एक सुकून भरी जिंदगी चुन ली—कम से कम ऐसी जिंदगी जिसमें रोज़-रोज़ खुद को साबित नहीं करना पड़ता था।

साल बीत गए। काम, घर, बेटी की पढ़ाई—इन्हीं में दिन निकलते रहे। मैं मजबूत बन गई थी, पर हर मजबूत इंसान के भीतर कहीं एक कोना ऐसा होता है जहाँ वह अभी भी किसी अपने की आवाज़ सुनकर टूट जाता है। वही हुआ उस दिन, जब सुबह-सुबह फोन बजा।

“अदिति…” माँ की आवाज़ कांप रही थी।
“माँ… क्या हुआ?” मेरा दिल जैसे धक से रह गया।
“तेरे पापा… अब इस दुनिया में नहीं रहे बेटा…”

मेरे हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। आँखों से आँसू ऐसे बहने लगे जैसे बरसों से रुका कोई बाँध टूट गया हो। सिया दौड़कर मेरे पास आई, “मम्मा क्या हुआ?” मैं बोल नहीं पाई। बस उसे बाँहों में भरकर रोती रही।

माँ ने फिर कहा, “बेटा… तेरे पापा की आख़िरी इच्छा थी कि उनकी बेटी और बेटा मिलकर उनका क्रिया-कर्म करें। जीते जी तो वो तुझसे मिल ना सके, पर अब… अब उनकी इच्छा पूरी कर दे। आत्मा को शांति मिल जाएगी।”

जीते जी… मिल न सके… ये शब्द मेरे सीने में कील की तरह धँस गए। पापा ने हमेशा मुझे संभाला था—कभी डाँटकर, कभी हँसकर, कभी बस मेरे सिर पर हाथ रखकर। शादी के समय उन्होंने मुझे बहुत समझाया था—“समीर की सोच ठीक नहीं, बेटी… प्यार बस शब्द नहीं होता, इज्जत भी होता है।” पर मैं ज़िद पर अड़ गई थी। और आज… आज वही पिता नहीं रहे, जिनके होने से मुझे लगता था कि अगर पूरी दुनिया भी उल्टी हो जाए, तो भी मेरे पीछे एक दीवार खड़ी है।

उस रात मैंने सोने की कोशिश की, पर आँखें बंद करते ही यादों की रेलगाड़ी चल पड़ती। पापा की पुरानी खाँसी की आवाज, उनका अख़बार मोड़कर रखना, और सबसे ज्यादा—उनका वही वाक्य, “बेटी, तू अकेली नहीं है।”

सुबह स्टेशन पर हम दोनों माँ-बेटी बैठे थे। सिया चुप थी, शायद मेरी आँखों का लालपन देखकर उसे भी समझ आ गया था कि आज मम्मा का दिल भारी है। ट्रेन धीमे-धीमे प्लेटफॉर्म पर रुकी। मैं खिड़की से बाहर देखती रही। लगा जैसे हर गुजरता खंभा मेरे भीतर के साल गिना रहा हो—तलाक के साल, अकेलेपन के साल, और वो साल जिनमें मैंने अपने मायके से दूरी बना ली थी, क्योंकि उस रिश्ते के टूटने के बाद मैं खुद को सबके सामने कमजोर नहीं दिखाना चाहती थी।

“मम्मा… उतरें?” सिया ने धीरे से मेरा हाथ दबाया।
मैंने उसकी ओर देखा। लगा जैसे मेरे कंधे पर किसी ने अपना हाथ रखा हो। एक पल को लगा—पापा हैं। वही भरोसा… वही स्पर्श…
मैंने झटके से पलटकर देखा, तो पापा नहीं थे। सिया थी। लेकिन उस पल समझ आया—पापा का दिया हुआ सहारा अब मेरी बेटी के हाथों में उतर आया है।

स्टेशन के बाहर एक कार खड़ी थी। सामने मेरा भाई—रोहन। चेहरे पर थकान थी, आँखों में वही पुरानी जिद और आज एक अनकहा दुख। मुझे देखते ही वह कुछ पल के लिए ठिठक गया। जैसे तय नहीं कर पा रहा हो कि पहले गले लगाए या रो पड़े। फिर बस आगे बढ़ा और धीमे से बोला, “दीदी…”

मैंने भी बस इतना ही कहा, “रोहन…”
और हम दोनों भाई-बहन, जो कभी छोटी-छोटी बातों पर उलझ जाते थे, उस दिन बिना कुछ कहे एक-दूसरे के दर्द में शामिल हो गए। रोहन ने मेरा बैग लिया, सिया को गोद में उठाकर गाड़ी में बिठाया और हम घर की ओर चल पड़े।

पीहर की देहरी पर कदम रखते ही मुझे लगा जैसे समय ने करवट बदल ली है। वही दीवारें, वही आँगन, वही तुलसी का पौधा… पर घर का चेहरा बदल गया था। घर के बीचोंबीच पापा की फोटो पर माला थी। धूप की गंध थी। और माँ… माँ का बिलखता चेहरा देखकर मेरा धैर्य टूट गया।

“माँ…”
माँ ने मुझे सीने से लगा लिया।
“बेटा… तू आ गई…”
हम दोनों माँ-बेटी जी भरकर रोईं। सात सालों का दर्द, मेरी हार, मेरी चुप्पी, मेरी मजबूरी—सब एक ही बार में माँ के आँचल में बह गया। और माँ का अपना दुख—पति खोने का, जीवनसाथी खोने का—वो मेरी बाँहों में उतर आया।

शाम तक घर रिश्तेदारों से भर गया। कुछ लोग सहानुभूति जताने आए, कुछ रस्में बताने। लेकिन मेरे भीतर एक ही बात चल रही थी—मैंने कितनी देर कर दी। मैं पापा को जीते जी “पापा” कहकर गले नहीं लगा पाई। मैं उनकी डाँट सुनकर हँस नहीं पाई। मैं उनके हाथ का बना वो हल्का मीठा दूध नहीं पी पाई जो वो मेरे लिए खास बनाते थे।

रात को माँ मेरे पास बैठीं। बोलीं, “बेटा, तेरे पापा जाते-जाते बस यही कहते रहे—‘मेरी बेटी आएगी… मेरी बेटी आएगी…’”

मेरे कलेजे में जैसे कोई हाथ डालकर कुछ मरोड़ गया।
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा, “माँ… उन्होंने मुझे माफ कर दिया होगा न?”
माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरा, “बेटा, पापा कभी नाराज़ थे ही नहीं। वो बस चिंतित थे।”

अगले दिन क्रिया-कर्म का समय आया। रोहन ने सब तैयारी कर रखी थी। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। मैं बैठी थी, हाथ में पूजा की सामग्री, मन में तूफान। रोहन ने मेरी ओर देखा—उस नज़र में शिकायत नहीं थी, सिर्फ साथ था।
“दीदी… पापा की इच्छा…”
मैंने सिर हिलाया। और पहली बार मुझे लगा—मैं घर वापस लौटी हूँ। सिर्फ रस्म निभाने नहीं, बल्कि उस रिश्ते को पकड़ने जिसे मैंने अपने दुख के डर से छोड़ दिया था।

रस्मों के बाद जब सब लोग जाने लगे, मैं पापा की फोटो के सामने बैठ गई। सिया पास आकर बोली, “नाना अब कहाँ गए, मम्मा?”
मैंने उसे गोद में लेकर कहा, “नाना… हमारे अंदर हैं बेटा। जब हम सही काम करते हैं, तो नाना खुश होते हैं।”

उस रात माँ ने मेरे लिए वही पुराना कमरा खोल दिया। वही पुरानी अलमारी, जिसमें पापा मेरे बचपन की कॉपी रख देते थे। माँ ने एक छोटा सा लिफाफा दिया।
“तेरे पापा ने तेरे लिए रखा था… बहुत दिन से।”

लिफाफे में एक चिट्ठी थी। पापा की लिखावट। मैं काँपते हाथों से पढ़ने लगी—

“मेरी गुड़िया,
गलतियाँ सब करते हैं। पर जो अपनी गलती से सीख ले, वह हारता नहीं। तूने जिंदगी में जो भी देखा, उससे मजबूत बन। अपने आत्मसम्मान को कभी मत बेचना। और हाँ, जब भी लगे कि तू अकेली है—तो इस घर की देहरी याद कर लेना। ये तेरी है। हमेशा तेरी रहेगी।
—तुम्हारे पापा”

मैं फूट-फूटकर रो पड़ी। पर इस बार आँसू सिर्फ दुख के नहीं थे। इस बार आँसू उस अपनापन के थे, जिसे मैं भूलने लगी थी।
उस रात मुझे लगा—एक माँ ने पति खोया है, एक बेटी ने पिता खोया है… पर उसी के साथ एक बेटी ने अपना मायका फिर से पा लिया है। और शायद, पापा की आख़िरी इच्छा सिर्फ क्रिया-कर्म नहीं थी… उनकी आख़िरी इच्छा यह थी कि मैं अपने घर लौट आऊँ—अपने लोगों के पास, अपनेपन के पास।

सुबह उठकर मैंने माँ के हाथ की चाय पी और पहली बार बरसों बाद कहा, “माँ… अब मैं जल्दी-जल्दी चला नहीं करूंगी। जब भी मन भारी होगा, मैं आ जाया करूंगी।”
माँ की आँखें भर आईं।
“बस यही तो तेरे पापा चाहते थे बेटा…”

लेखिका : मालती सिन्हा 


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