"मेरी बेटी... मेरी लाडो... ये क्या कर दिया उसने! नाक कटवा दी हमारी!" सुमित्रा देवी का विलाप पूरे घर में गूँज रहा था।
मामला उनकी इकलौती बेटी, जानकी, का था। जानकी, जो अभी उन्नीस साल की थी, आज सुबह अपने कमरे से गायब मिली थी। बिस्तर पर एक चिट्ठी पड़ी थी जिसमें लिखा था—"बापू, मैं अपनी ज़िंदगी का सौदा नहीं होने दूँगी। माफ़ करना।"
राजगढ़ गाँव की धूल भरी सड़कों पर सुबह की पहली किरण अभी ठीक से पड़ी भी नहीं थी कि 'ठाकुर निवास' में एक कोहराम मच गया। यह घर गाँव के सरपंच ठाकुर भवानी सिंह का था, जिनकी मूंछों का ताव और रसूख पूरे इलाके में मशहूर था।
हवेली के बड़े आंगन में भवानी सिंह अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे थे, लेकिन आज उनके चेहरे पर वो रौब नहीं, बल्कि एक अजीब सी बेचैनी थी। उनकी पत्नी, सुमित्रा देवी, ज़मीन पर बैठीं छाती पीट-पीट कर रो रही थीं।
"मेरी बेटी... मेरी लाडो... ये क्या कर दिया उसने! नाक कटवा दी हमारी!" सुमित्रा देवी का विलाप पूरे घर में गूँज रहा था।
मामला उनकी इकलौती बेटी, जानकी, का था। जानकी, जो अभी उन्नीस साल की थी, आज सुबह अपने कमरे से गायब मिली थी। बिस्तर पर एक चिट्ठी पड़ी थी जिसमें लिखा था—"बापू, मैं अपनी ज़िंदगी का सौदा नहीं होने दूँगी। माफ़ करना।"
कहानी की शुरुआत एक महीने पहले हुई थी। भवानी सिंह के बेटे, विक्रम, की शादी की बात चल रही थी। विक्रम को शहर की हवा लग चुकी थी, लेकिन उसकी हरकतें आवारागर्दी वाली थीं। न कोई ढंग का काम, न पढ़ाई। ऐसे लड़के के लिए किसी अच्छी घर की लड़की मिलना मुश्किल था।
तभी पास के गाँव, बिशनपुर, से एक रिश्ता आया। लड़की का नाम था राधिका। राधिका पढ़ी-लिखी, समझदार और सुंदर थी। उसके पिता, किशन लाल, एक गरीब किसान थे। भवानी सिंह को राधिका पसंद आ गई, लेकिन किशन लाल ने एक शर्त रख दी।
"ठाकुर साहब, मैं अपनी बेटी राधिका का ब्याह विक्रम से कर दूँगा, लेकिन बदले में आपको अपनी बेटी जानकी का ब्याह मेरे बेटे सूरज से करना होगा।"
सूरज... नाम तो सूरज था, लेकिन उसका जीवन अंधेरे में डूबा हुआ था। वह जन्म से मंदबुद्धि था और एक पैर से लंगड़ाकर चलता था।
भवानी सिंह सन्न रह गए थे। उनकी फूल सी जानकी और वो सूरज? लेकिन विक्रम के लिए राधिका जैसा रिश्ता दोबारा नहीं मिलता। और फिर गाँव में यह 'आटा-साठा' (बदले में शादी) कोई नई बात तो थी नहीं।
भवानी सिंह ने एक रात अपनी पगड़ी उतारकर मेज़ पर रखी और सुमित्रा से कहा, "विक्रम का घर बस जाएगा। जानकी का क्या है? लड़की जात है, आज नहीं तो कल पराये घर जानी ही है। सूरज भले ही कमज़ोर है, पर ज़मीन-जायदाद तो है उनके पास। राज करेगी हमारी बेटी।"
सुमित्रा देवी ने थोड़ा विरोध किया था, लेकिन बेटे के मोह के आगे वो भी झुक गईं।
जब जानकी को इस सौदे का पता चला, तो उसने विरोध किया। उसने अपने बापू के पैरों में गिरकर भीख मांगी, "बापू, मुझे कुएं में धकेल दो, पर उस सूरज के पल्ले मत बांधो। मैं पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती हूँ।"
लेकिन भवानी सिंह का फैसला पत्थर की लकीर था। "ज़बान दे दी है मैंने। अब पीछे नहीं हट सकता।"
शादी की तारीख पक्की हो गई। घर में शहनाई बजने लगी। लेकिन जानकी के कमरे में मातम छाया था। उसकी भाभी, सरोज, जो खुद एक ऐसे ही सौदे का शिकार होकर आई थी, जानकी का दर्द समझती थी।
एक रात पहले, सरोज जानकी के कमरे में आई। उसने जानकी के सिर पर हाथ फेरा और कहा, "जानकी, भाग जा। यहाँ से बहुत दूर। वरना तेरी ज़िंदगी भी मेरी तरह चूल्हे-चौके और आंसुओं में निकल जाएगी। मैंने हिम्मत नहीं की, तू कर ले।"
और जानकी ने हिम्मत कर ली।
आज सुबह जब बारात आने वाली थी, जानकी गायब थी।
गाँव भर में खबर आग की तरह फैल गई। "ठाकुर की बेटी भाग गई!" लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगे। कोई कह रहा था कि उसने नाक कटवा दी, कोई कह रहा था कि ज़रूर किसी लड़के के साथ भागी होगी।
तभी किशन लाल (राधिका के पिता) अपनी बारात लेकर नहीं, बल्कि गुस्से में अकेले आए।
"ठाकुर, यह क्या तमाशा है? आपकी बेटी भाग गई, तो अब मेरी बेटी राधिका भी आपके बेटे से नहीं ब्याही जाएगी। सौदा बराबरी का था। जब माल ही नहीं, तो कीमत कैसी?"
विक्रम, जो सेहरा बांधने की तैयारी कर रहा था, गुस्से से लाल हो गया। "मेरी शादी नहीं टूटेगी! उस जानकी को मैं पाताल से भी ढूंढ लाऊँगा और उसी मंडप में सूरज के साथ फेरे लगवाऊँगा।"
विक्रम अपने दोस्तों के साथ जीप लेकर निकल गया। भवानी सिंह ने भी अपने आदमियों को चारों दिशाओं में दौड़ा दिया। "ज़िंदा या मुर्दा, बस वापस लाओ उसे!" उनका आदेश था।
जानकी शहर जाने वाली बस में बैठी थी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने सरोज भाभी की दी हुई कुछ जमा-पूंजी और अपने गहने साथ रखे थे। वह जानती थी कि अगर पकड़ी गई, तो शायद आज उसका आखिरी दिन होगा।
बस शहर के बस स्टैंड पर रुकी। जानकी उतरी और भीड़ में खो जाने की कोशिश करने लगी। तभी उसे लगा कि कोई उसका पीछा कर रहा है। उसने मुड़कर देखा—विक्रम के दोस्त!
जानकी भागी। वह गलियों में, बाज़ारों में बेतहाशा दौड़ती रही। अंत में वह एक पुलिस स्टेशन के सामने जाकर रुकी। उसकी सांसें फूल रही थीं। क्या उसे पुलिस के पास जाना चाहिए? लेकिन पुलिस तो उसके बापू की जेब में रहती थी।
तभी एक महिला पुलिस अधिकारी, इंस्पेक्टर आरती, ने उसे देखा। आरती की नज़रें पारखी थीं। उसने जानकी की घबराहट को भांप लिया।
"क्या हुआ बेटा? किसी से डर रही हो?" आरती ने पूछा।
जानकी ने रोते हुए सारी बात बता दी। आरती ने उसे पानी पिलाया और कहा, "डरो मत। तुम बालिग हो। अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार है तुम्हें।"
आरती ने जानकी को एक 'महिला आश्रय गृह' (Women's Shelter Home) में भिजवा दिया और विक्रम को चेतावनी भिजवाई कि अगर उसने जानकी के आसपास भी भटकने की कोशिश की, तो उसे जेल की हवा खानी पड़ेगी।
गाँव में हंगामा मच गया। विक्रम की शादी टूट गई। भवानी सिंह का सिर शर्म से झुक गया। लेकिन यह शर्म उनकी अपनी गलती की थी, जिसे वे बेटी की गद्दारी मान रहे थे।
तीन साल बीत गए।
जानकी ने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक एनजीओ के साथ जुड़कर काम करने लगी। उसने गाँव की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम छेड़ी।
एक दिन, भवानी सिंह को दिल का दौरा पड़ा। विक्रम ने सारी ज़मीन-जायदाद अपने नाम करवा ली थी और अब वह शराब और जुए में सब उड़ा रहा था। उसने बीमार पिता के इलाज के लिए पैसे देने से मना कर दिया। "बुड्ढा मरता है तो मरने दो, वैसे भी बहुत जी लिया," विक्रम ने अपनी माँ सुमित्रा से कहा और घर से निकाल दिया।
सुमित्रा देवी, जो कभी अपनी बेटी को कोसती थीं, आज बेसहारा थीं। वे भवानी सिंह को लेकर सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में पड़ी थीं। कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं था।
तभी एक गाड़ी अस्पताल के बाहर रुकी। उसमें से एक आत्मविश्वास से भरी युवती उतरी। उसके साथ कुछ डॉक्टर्स भी थे।
वह जानकी थी।
जानकी ने जब सुना कि उसके बापू बीमार हैं और भाई ने उन्हें छोड़ दिया है, तो वह रह न सकी। वह अपने पिता के पास गई।
भवानी सिंह ने धुंधली आँखों से देखा। सामने उनकी वही बेटी खड़ी थी जिसे उन्होंने 'कुलकलंकनी' कहा था।
"बापू..." जानकी ने उनके हाथ थामे।
भवानी सिंह का गला रुंध गया। वे कुछ बोल न सके, बस आंसू बहने लगे।
जानकी ने उनका इलाज करवाया। उन्हें शहर के अच्छे अस्पताल में शिफ्ट किया। सुमित्रा देवी अपनी बेटी के पैरों में गिर पड़ीं। "माफ़ कर दे लाडो। हमने तुझे बेचने की कोशिश की, और तूने आज हमें खरीद लिया।"
जानकी ने माँ को उठाया और गले लगाया। "माँ, मैंने बदला लेने के लिए नहीं, बल्कि अपना फर्ज़ निभाने के लिए यह किया है। आपने मुझे बेटी नहीं समझा, पर मैं तो आपकी बेटी ही रहूँगी न।"
गाँव में जब यह खबर पहुँची, तो लोग सन्न रह गए। जिस बेटी को उन्होंने 'भागोड़ी' कहा था, आज उसी ने अपने मां-बाप की लाज रखी। और जिस बेटे के लिए उन्होंने बेटी की बली चढ़ाने की कोशिश की थी, उसने जीते जी मां-बाप को मार दिया था।
भवानी सिंह ठीक होकर गाँव लौटे, लेकिन अब वे बदल चुके थे। उन्होंने पंचायत बुलाई।
"भाइयो," भवानी सिंह ने अपनी कांपती आवाज़ में कहा, "मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत बड़ी गलती की। मैंने बेटे को बुढ़ापे की लाठी समझा और बेटी को बोझ। आज मेरी लाठी ने मुझे मारा, और जिसे बोझ समझा था, उसने मुझे कंधा दिया। आज से इस गाँव में 'आटा-साठा' बंद। कोई अपनी बेटी का सौदा नहीं करेगा।"
विक्रम को अपनी करनी का फल मिला। शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए उसका एक्सीडेंट हो गया और वह अपाहिज हो गया। अब वह उसी खाट पर पड़ा रहता है जिस पर कभी उसके पिता पड़े थे।
जानकी ने शादी नहीं की। उसने अपना जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया। वह अक्सर कहती है, "शादी ज़िंदगी का हिस्सा है, पूरी ज़िंदगी नहीं। और कोई भी रस्म या रिवाज़ किसी की आत्मा को मारने का हक़ नहीं रखता।"
आज 'ठाकुर निवास' में जानकी की तस्वीर लगी है, और उसके नीचे लिखा है—"हमारी गौरव"।
लेखिका : सविता गर्ग
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