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Showing posts from February, 2026

मिट्टी की खुशबू

  *सुजाता को लगता था कि उसके सास-ससुर की 'देहाती' आदतें उसकी हाई-सोसाइटी इमेज पर धब्बा हैं, लेकिन एक पार्टी ने ऐसा सच उजागर किया कि उसका घमंड कांच की तरह बिखर गया और उसे समझ आया कि जड़ें जितनी गहरी होती हैं, पेड़ उतना ही ऊँचा जाता है।* --- शाम के सात बज चुके थे। 'ग्रीनवुड विला' की लॉन में रंग-बिरंगी लाइट्स जगमगा रही थीं। आज सुजाता और रवि की शादी की दसवीं सालगिरह थी। शहर के नामी-गिरामी लोग, बिजनेस टायकून और सुजाता की किटी पार्टी की सहेलियाँ—सबको न्योता दिया गया था। सुजाता ने इस पार्टी की तैयारी महीनों पहले शुरू कर दी थी। वह चाहती थी कि सब कुछ परफेक्ट हो। डेकोरेशन से लेकर खाने तक, हर चीज़ में 'क्लास' झलकनी चाहिए। लेकिन सुजाता के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। और उस चिंता का कारण कोई और नहीं, बल्कि उसके सास-ससुर, रामेश्वर जी और कावेरी देवी थे। वे दोनों गाँव से आए थे। सीधा-सादा पहनावा, ठेठ बोली और ज़मीन से जुड़े लोग। रामेश्वर जी धोती-कुर्ता पहनते थे और कावेरी देवी सूती साड़ी। सुजाता को हमेशा लगता था कि वे उसकी मॉडर्न लाइफस्टाइल में 'मिसफिट' हैं। जब भी घर पर कोई मेह...

दीवार पर टंगी बंद घड़ी

  जिस बड़े भाई ने अपनी जवानी गिरवी रखकर छोटे भाई को अर्श पर पहुँचाया, आज उसी भाई की सलाह को ‘बुढ़ापे की बड़बड़’ कहकर ठुकरा दिया गया। क्या इंसान की कीमत उसकी सांसों से नहीं, उसकी जेब के सिक्कों से तय होती है? रघुनाथ बाबू अपने ही घर के ड्राइंग रूम के एक कोने में प्लास्टिक की कुर्सी पर ऐसे बैठे थे, जैसे किसी शादी में बिन बुलाए मेहमान। सोफे पर उनका छोटा भाई, सुमित, और सुमित की पत्नी, नलिनी, बैठे थे। उनके सामने एक रियल एस्टेट एजेंट फाइलें फैलाए बैठा था। बात पुश्तैनी जमीन बेचने की चल रही थी। वही जमीन, जिसे रघुनाथ बाबू के पिताजी ने खून-पसीना एक करके खरीदा था। वही जमीन, जिसकी मिट्टी में रघुनाथ और सुमित का बचपन खेला था। “देखिए सुमित सर, मार्केट अभी डाउन है, लेकिन मैं आपको फिर भी बेस्ट रेट दे रहा हूँ। दो करोड़! सोच लीजिये, डील पक्की करें?” एजेंट ने कैलकुलेटर पर उंगलियां नचाते हुए कहा। सुमित की आँखों में चमक आ गई। दो करोड़! उसका बिजनेस पिछले कुछ महीनों से मंदी में था, यह रकम उसे फिर से खड़ा कर सकती थी। “हाँ, बिल्कुल! मुझे मंजूर है,” सुमित ने उत्साहित होकर कहा। “रुक जाओ सुमित!” कोने से एक भारी लेक...

कलंक या करुणा: एक माँ की अग्निपरीक्षा

   पति की तेरहवीं पर जब उसकी प्रेमिका की बेटी चौखट पर आ खड़ी हुई, तो एक निःसंतान पत्नी के सामने दो रास्ते थे—पति के धोखे का बदला उस मासूम बच्ची से लेना, या समाज के ताने सहकर उसे अपना लेना। पढ़िए सुधा के उस फैसले की कहानी जिसने रिश्तों की परिभाषा बदल दी। शमशान घाट से लौटी भीड़ अब छंट चुकी थी। घर के आंगन में बिछी सफेद चादरों पर कुछ रिश्तेदार अभी भी बैठे थे। अगरबत्ती की महक और रोने-धोने की आवाजों के बीच सुधा पत्थर की मूरत बनी बैठी थी। उसके पति, राघव, का एक्सीडेंट में देहांत हो गया था। शादी के बीस साल बाद सुधा की मांग उजड़ गई थी। इन बीस सालों में सुधा को बस एक ही गम था—उसकी गोद सूनी थी। राघव और उसने बहुत इलाज कराए, पर औलाद का सुख उनकी किस्मत में नहीं था। अचानक, घर के मुख्य द्वार पर एक हलचल हुई। एक बूढ़ी औरत, जिसके कपड़े फटे-पुराने थे, एक पाँच साल की बच्ची का हाथ पकड़े अंदर आई। बच्ची डरी हुई थी, उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में आंसू सूखे हुए थे। सुधा की जेठानी, विमला, ने आगे बढ़कर पूछा, “कौन हो तुम? और इस गमी के माहौल में यहाँ क्या कर रही हो?” बूढ़ी औरत ने कांपते हाथों से अपनी झोली फैलाई और सुधा की त...

“आंसुओं का मोल”

  क्या अपने ही घर के लोग आपके आंसुओं का तमाशा बना सकते हैं? एक बेटी को तब पता चला कि दुनिया के सामने रोना अपना दुख कम करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने जख्म कुरेदने का मौका देना है। वर्तिका के कमरे की खिड़की पिछले दो दिनों से बंद थी। अंदर अंधेरा था, ठीक वैसे ही जैसे उसकी जिंदगी में छाया हुआ था। शादी के महज छह महीने बाद ही वह अपना ससुराल छोड़कर मायके वापस आ गई थी। कारण था—अविनाश का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और ससुराल वालों की दहेज की कभी न खत्म होने वाली मांग। वर्तिका स्वभाव से बहुत ही भावुक और नाजुक थी। जरा सी बात पर उसकी आँखें भर आती थीं। उसे लगता था कि रोना कमजोरी नहीं, बल्कि मन का गुबार निकालने का जरिया है। लेकिन उसे नहीं पता था कि यह दुनिया उसके आंसुओं की भाषा नहीं समझती। शाम का समय था। घर के बाहर एक कार रुकी। वर्तिका की बुआ, सरिता जी और उनकी बहू, कोमल कार से उतरे। सरिता जी शहर की उन महिलाओं में से थीं जिन्हें दूसरों के घर की आग में हाथ सेंकने में बड़ा मजा आता था, लेकिन चेहरे पर वे इतनी हमदर्दी दिखाती थीं कि सामने वाला पिघल जाए। माँ ने दरवाजा खोला। “अरे जीजी, आप? आइए बैठिये।” सरिता जी ने ...