Skip to main content

“आंसुओं का मोल”

 क्या अपने ही घर के लोग आपके आंसुओं का तमाशा बना सकते हैं? एक बेटी को तब पता चला कि दुनिया के सामने रोना अपना दुख कम करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने जख्म कुरेदने का मौका देना है।


वर्तिका के कमरे की खिड़की पिछले दो दिनों से बंद थी। अंदर अंधेरा था, ठीक वैसे ही जैसे उसकी जिंदगी में छाया हुआ था। शादी के महज छह महीने बाद ही वह अपना ससुराल छोड़कर मायके वापस आ गई थी। कारण था—अविनाश का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और ससुराल वालों की दहेज की कभी न खत्म होने वाली मांग। वर्तिका स्वभाव से बहुत ही भावुक और नाजुक थी। जरा सी बात पर उसकी आँखें भर आती थीं। उसे लगता था कि रोना कमजोरी नहीं, बल्कि मन का गुबार निकालने का जरिया है। लेकिन उसे नहीं पता था कि यह दुनिया उसके आंसुओं की भाषा नहीं समझती।


शाम का समय था। घर के बाहर एक कार रुकी। वर्तिका की बुआ, सरिता जी और उनकी बहू, कोमल कार से उतरे। सरिता जी शहर की उन महिलाओं में से थीं जिन्हें दूसरों के घर की आग में हाथ सेंकने में बड़ा मजा आता था, लेकिन चेहरे पर वे इतनी हमदर्दी दिखाती थीं कि सामने वाला पिघल जाए।


माँ ने दरवाजा खोला। “अरे जीजी, आप? आइए बैठिये।”


सरिता जी ने सोफे पर बैठते ही अपना ‘नाटक’ शुरू कर दिया। “अरे भाभी, सुना वर्तिका वापस आ गई है? हाय राम! मुझे तो रात भर नींद नहीं आई। इतनी प्यारी बच्ची और उसके साथ ऐसा हो गया? कहाँ है मेरी गुड़िया?”


माँ ने दबी आवाज में कहा, “अपने कमरे में है जीजी। किसी से बात नहीं करती। बस रोती रहती है।”


सरिता जी तुरंत उठीं। “मैं देखती हूँ। अपना खून है, दुख तो होगा ही।”


सरिता जी वर्तिका के कमरे में गईं। वर्तिका बिस्तर पर लेटी छत को घूर रही थी। बुआ को देखते ही वह उठ बैठी। सरिता जी ने दौड़कर उसे गले लगा लिया।


“मेरी बच्ची… यह क्या हाल बना रखा है? मैंने सुना उस अविनाश ने तुझे घर से निकाल दिया? हाय! कैसा जमाना आ गया है।”


बुआ के गले लगते ही वर्तिका का बांध टूट गया। वह फफक-फफक कर रोने लगी। उसे लगा कि कोई अपना आया है, कोई ऐसा जो उसके दर्द को समझेगा। उसने बुआ की गोद में सिर रखकर अपने दिल का सारा हाल कह सुनाया। कैसे अविनाश उसे मारता था, कैसे सास उसे ताने देती थी, कैसे उसे भूखा रखा जाता था। वह रोती जा रही थी और बोलती जा रही थी। उसकी आँखें सूज गई थीं, नाक लाल हो गई थी।


सरिता जी बड़े ध्यान से सुन रही थीं। बीच-बीच में वे “हाय राम!”, “हे भगवान!”, “कितना जुल्म सहा मेरी बच्ची ने” जैसे शब्द बोलकर उसे और उकसा रही थीं। करीब एक घंटे तक वर्तिका रोती रही और सरिता जी उसे सांत्वना देती रहीं।


जब सरिता जी जाने लगीं, तो उन्होंने वर्तिका के सिर पर हाथ फेरा। “तू चिंता मत कर बेटी। सब ठीक हो जाएगा। भगवान उन पापियों को सजा देगा।”


वर्तिका को लगा कि मन थोड़ा हल्का हो गया है। उसने सोचा कि परिवार का साथ हो तो इंसान बड़े से बड़ा दुख भी झेल सकता है।


लेकिन वर्तिका की यह गलतफहमी दो दिन बाद ही टूट गई।


रविवार का दिन था। पड़ोस में शर्मा जी के बेटे की सगाई थी। वर्तिका जाना नहीं चाहती थी, लेकिन माँ ने जिद की। “बेटा, कब तक कमरे में बंद रहेगी? लोग बातें बनाएंगे। चल, थोड़ा मन बहल जाएगा।”


वर्तिका बेमन से तैयार होकर समारोह में पहुंची। वहां काफी भीड़ थी। वर्तिका ने एक कोने में कुर्सी ले ली। तभी उसे कुछ जानी-पहचानी आवाजें सुनाई दीं। थोड़ी दूर पर सरिता जी, कोमल और मोहल्ले की तीन-चार औरतें गोल घेरा बनाकर खड़ी थीं। वर्तिका उनकी नजरों से ओझल थी, लेकिन उनकी बातें उसे साफ सुनाई दे रही थीं।


“अरे छोड़ो भी बहन,” यह सरिता जी की आवाज थी। “लड़की में ही कुछ कमी होगी। मैंने तो परसों जाकर देखा। बस रोए जा रही थी। मगरमच्छ के आँसू! मैंने पूछा कि अविनाश ने क्यों छोड़ा, तो कहने लगी वो मारता था। अब तुम ही बताओ, बिना बात के कोई मर्द हाथ उठाता है क्या? जरूर इसकी जुबान कैंची की तरह चलती होगी।”


“हाँ बुआ जी,” कोमल ने ही-ही करते हुए कहा। “और वैसे भी, भाभी बहुत ज्यादा ही इमोशनल हैं। हर बात पर रोना-धोना। आदमी तो तंग आ ही जाएगा न। वहां भी ड्रामा करती होगी। मुझे तो लगता है अविनाश का कोई अफेयर नहीं है, बस इससे पीछा छुड़ाने के लिए बहाना बनाया है।”


“वही तो मैं कह रही हूँ,” सरिता जी ने एक समोसा उठाते हुए कहा। “आजकल की लड़कियों में सहनशक्ति तो है ही नहीं। हमारे जमाने में तो पति कुछ कह भी देता था तो हम आँसू पी लेते थे, घर की बात बाहर नहीं निकालते थे। और यह महारानी? परसों मेरे कंधे पर सिर रखकर इतना रोई कि मेरा नया ब्लाउज गीला कर दिया। मुझे तो बड़ी हंसी आ रही थी उसके नाटक पर, पर क्या करती, चुप कराना पड़ा।”


वहां खड़ी सारी औरतें जोर-जोर से हंसने लगीं।


वर्तिका को लगा जैसे किसी ने उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो। उसका शरीर सुन्न पड़ गया। जिस बुआ को उसने अपना हमदर्द समझकर अपने जख्म दिखाए थे, वो भरी महफिल में उन जख्मों का मजाक उड़ा रही थीं? उसके आंसुओं को ‘मगरमच्छ के आँसू’ और उसके दर्द को ‘नाटक’ कहा जा रहा था?


उसे चक्कर आने लगे। वह वहां एक पल भी नहीं रुक सकी। वह उल्टे पैर भागी और घर आकर सीधे अपने पिता, कर्नल वर्मा के कमरे में घुस गई।


पिता अपनी आराम कुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। वर्तिका को बदहवास और कांपते देख वे खड़े हो गए।

“क्या हुआ वर्तिका?”


वर्तिका ने पिता को पकड़ लिया और चीख पड़ी। “पापा, सब झूठे हैं! सब धोखेबाज हैं! बुआ जी ने मेरा मजाक उड़ाया… मैंने उन्हें सब बताया था… मैं उनके सामने रोई थी… और वो…”


उसका गला रुंध गया। कर्नल वर्मा ने बेटी को पानी पिलाया और पास बैठाया। जब वर्तिका शांत हुई और उसने पूरी बात बताई, तो कर्नल वर्मा के चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक गंभीर शांति थी।


उन्होंने वर्तिका की आँखों में देखा। “बेटा, गलती बुआ की नहीं है। गलती तुम्हारी है।”


वर्तिका हैरान रह गई। “मेरी? पापा, मैं दुखी हूँ, मैं रोई, इसमें मेरी क्या गलती?”


कर्नल वर्मा ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। “वर्तिका, रोना बुरी बात नहीं है। इंसान हैं, दर्द होता है तो आँसू निकलते हैं। लेकिन बेटा, हर किसी के सामने रोना बुरा है। ये जो तुम्हारे आँसू हैं न, ये पानी नहीं हैं। ये तुम्हारी भावनाएं हैं, तुम्हारा आत्म-सम्मान हैं, तुम्हारी आत्मा का हिस्सा हैं। और इस दुनिया में हर कोई इतना अमीर नहीं है कि वो इन मोतियों की कीमत समझ सके।”


उन्होंने खिड़की की ओर इशारा किया। “देखो बाहर। वो जो भीड़ है, वो तमाशा देखने के लिए खड़ी है। जब तुम उनके सामने रोती हो, तो तुम उन्हें खुद को तोड़ने की इजाजत देती हो। तुम उन्हें बताती हो कि तुम कमजोर हो, तुम हारी हुई हो। सरिता जैसी औरतें तुम्हारे आंसुओं से हमदर्दी नहीं जतातीं, वो उनसे अपनी गपशप का मसाला तैयार करती हैं। तुमने अपना दर्द गलत जगह बांट दिया।”


वर्तिका सिसक रही थी, लेकिन अब वो पिता की हर बात को पी रही थी।


“मेरी बात याद रखना गुड़िया,” पिता ने सख्त लेकिन प्यार भरी आवाज में कहा। “अपना दुख सिर्फ उसे बताओ जो तुम्हारी खामोशी भी पढ़ सके। जो तुम्हारे आंसुओं को पोंछे, न कि उनका विज्ञापन करे। और अगर ऐसा कोई न मिले, तो बाथरूम में शावर चलाकर रो लो, तकिए में मुंह छिपाकर रो लो, या मेरे पास आ जाओ। लेकिन इन गिद्धों के सामने कभी मत रोना। तुम्हारी एक बूंद भी इनके लिए मनोरंजन से बढ़कर कुछ नहीं है।”


उस रात वर्तिका सो नहीं पाई। पिता की बातें उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही थीं। *“ये आँसू तुम्हारी भावनाएं हैं, और हर कोई इसके काबिल नहीं होता।”*


अगली सुबह जब वर्तिका उठी, तो उसकी आँखों में सूजन थी, लेकिन एक नई चमक भी थी। उसने तय कर लिया था कि अब वह अपनी भावनाओं का नंगा नाच नहीं होने देगी।


दो महीने बाद, अविनाश और वर्तिका का तलाक का केस कोर्ट में था। परिवार वाले, रिश्तेदार सब आए थे। सरिता बुआ भी आई थीं, यह देखने कि ‘बेचारी वर्तिका’ का क्या हाल है। उन्हें उम्मीद थी कि वर्तिका कोर्ट के बाहर रोती-बिलखती मिलेगी, पति के पैरों में गिरती हुई दिखेगी।


लेकिन जब वर्तिका कार से उतरी, तो सब देखते रह गए। उसने हल्के नीले रंग का सूट पहना था, बाल सलीके से बंधे थे, और आँखों पर काला चश्मा था। उसकी चाल में वो लड़खड़ाहट नहीं थी जो दो महीने पहले थी।


सरिता बुआ लपककर उसके पास आईं। “बेटी, डरना मत। हम सब तेरे साथ हैं। आज फैसला हो जाएगा। बहुत रोना आ रहा होगा न तुझे?” बुआ ने फिर वही पुराना जाल फेंका।


वर्तिका ने अपना चश्मा थोड़ा नीचे किया और बुआ की आँखों में सीधे देखा। उसके चेहरे पर एक हल्की, रहस्यमयी मुस्कान थी।


“नहीं बुआ जी,” वर्तिका की आवाज में गजब का ठहराव था। “रोना क्यों आएगा? मैं तो एक नई जिंदगी शुरू करने जा रही हूँ। कचरा घर से बाहर जाए, तो घर साफ होता है, उस पर रोया नहीं जाता।”


बुआ का मुंह खुला का खुला रह गया। कोमल भी हक्की-बक्की थी। अविनाश, जो दूर खड़ा था, उसे उम्मीद थी कि वर्तिका उसे देखकर कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन वर्तिका ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। वह अपने वकील के साथ पूरे आत्मविश्वास से अंदर चली गई।


कोर्ट रूम में जिरह के दौरान कई कड़वी बातें हुईं। अविनाश के वकील ने वर्तिका पर झूठे आरोप लगाए। एक पल के लिए वर्तिका की आँखें डबडबा गईं। उसे बहुत तेज रोना आया। उसका दिल चीखना चाहता था। लेकिन तभी उसे पापा का चेहरा याद आया— *“हर कोई इसके काबिल नहीं होता।”*


उसने टेबल के नीचे अपनी मुट्ठी भींची, एक गहरी सांस ली, और आंसुओं को वापस पी गई। उसने जज के सामने अपनी बात इतनी मजबूती और तार्किकता से रखी कि पूरा कोर्ट रूम सन्न रह गया। उसने दया की भीख नहीं मांगी, उसने अपना हक मांगा।


फैसला वर्तिका के हक में आया।


बाहर निकलकर, सरिता बुआ और बाकी रिश्तेदार फिर उसे घेरने आए। वे कुरेदना चाहते थे कि अंदर क्या हुआ, उसे कैसा लग रहा है।


“अरे वर्तिका, तू तो बड़ी पत्थर दिल निकली। पति से अलग होकर भी तेरे चेहरे पर शिकन नहीं?” एक चाची ने ताना मारा।


वर्तिका मुस्कुराई। “चाची जी, मेरा दिल पत्थर का नहीं, हीरे का है। और हीरे को तिजोरी में रखा जाता है, चौराहे पर नहीं। मेरी भावनाएं अब सिर्फ मेरे अपनों के लिए हैं, तमाशबीनों के लिए नहीं। अब आप लोग समोसे खाइये, मेरी गॉसिप का पेट तो आज आपको नहीं भरने वाला।”


वर्तिका वहां से शान से निकल गई और सीधे अपने पिता के पास गई जो कार के पास खड़े थे। उसने कार का दरवाजा खोला, अंदर बैठी, और जैसे ही पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा, वह रो पड़ी।


वह जी भरकर रोई। बच्चों की तरह रोई। लेकिन इस बार वह कार के बंद शीशों के पीछे थी, अपने पिता के सुरक्षित साये में थी। बाहर खड़ी दुनिया को उसकी एक सिसकी भी सुनाई नहीं दी।


कर्नल वर्मा ने उसे रोने दिया। जब वह शांत हुई, तो उन्होंने उसे पानी दिया और मुस्कुराए। “हल्का महसूस कर रही हो?”


वर्तिका ने आंसू पोंछे और हंस दी। “हाँ पापा। और जानते हैं? आज मेरे आंसुओं का मोल कम नहीं हुआ। आज मैंने उन्हें उन लोगों पर जाया नहीं किया जो इनकी कीमत नहीं जानते थे।”


वर्तिका समझ गई थी कि मजबूत होने का मतलब यह नहीं है कि आपको दर्द नहीं होता। मजबूत होने का मतलब है कि आप दुनिया को यह अधिकार नहीं देते कि वे आपके दर्द का इस्तेमाल आपके खिलाफ कर सकें। उसने अपनी भावनाओं की रखवाली करना सीख लिया था।


**समापन:**


दोस्तों, यह कहानी हमें जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ाती है। हम अक्सर भावुक होकर किसी के भी सामने अपना दिल खोल देते हैं, यह सोचकर कि वे समझेंगे। लेकिन कड़वा सच यह है कि 90% लोगों को आपकी समस्याओं से कोई मतलब नहीं होता, और बाकी 10% खुश होते हैं कि आपको समस्याएं हैं। अपने आंसुओं को, अपनी कमजोरियों को और अपने गहरे राज को हर किसी के सामने मत रखिये। एक ‘मजबूत’ इंसान वह नहीं जो कभी न रोए, बल्कि वह है जो यह जानता हो कि ‘कहाँ’ और ‘किसके सामने’ रोना है। अपनी भावनाओं की इज़्ज़त कीजिये, तभी दुनिया आपकी इज़्ज़त करेगी।


**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि आपने अपना दुख किसी को बताया हो और बाद में उसी ने आपका मजाक उड़ाया हो? आप उस स्थिति से कैसे निपटे? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।


---


**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और जीवन की सच्चाई से जुड़ी कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद।**


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...