Skip to main content

दीवार पर टंगी बंद घड़ी

 जिस बड़े भाई ने अपनी जवानी गिरवी रखकर छोटे भाई को अर्श पर पहुँचाया, आज उसी भाई की सलाह को ‘बुढ़ापे की बड़बड़’ कहकर ठुकरा दिया गया। क्या इंसान की कीमत उसकी सांसों से नहीं, उसकी जेब के सिक्कों से तय होती है?


रघुनाथ बाबू अपने ही घर के ड्राइंग रूम के एक कोने में प्लास्टिक की कुर्सी पर ऐसे बैठे थे, जैसे किसी शादी में बिन बुलाए मेहमान। सोफे पर उनका छोटा भाई, सुमित, और सुमित की पत्नी, नलिनी, बैठे थे। उनके सामने एक रियल एस्टेट एजेंट फाइलें फैलाए बैठा था।


बात पुश्तैनी जमीन बेचने की चल रही थी। वही जमीन, जिसे रघुनाथ बाबू के पिताजी ने खून-पसीना एक करके खरीदा था। वही जमीन, जिसकी मिट्टी में रघुनाथ और सुमित का बचपन खेला था।


“देखिए सुमित सर, मार्केट अभी डाउन है, लेकिन मैं आपको फिर भी बेस्ट रेट दे रहा हूँ। दो करोड़! सोच लीजिये, डील पक्की करें?” एजेंट ने कैलकुलेटर पर उंगलियां नचाते हुए कहा।


सुमित की आँखों में चमक आ गई। दो करोड़! उसका बिजनेस पिछले कुछ महीनों से मंदी में था, यह रकम उसे फिर से खड़ा कर सकती थी।


“हाँ, बिल्कुल! मुझे मंजूर है,” सुमित ने उत्साहित होकर कहा।


“रुक जाओ सुमित!”


कोने से एक भारी लेकिन कांपती हुई आवाज़ आई। रघुनाथ बाबू ने हाथ उठाया।


कमरे में सन्नाटा छा गया। एजेंट ने पलटकर रघुनाथ की ओर देखा। सुमित के चेहरे पर झुंझलाहट आ गई।


“क्या है भैया? अब आप बीच में क्यों बोल रहे हैं?” सुमित ने रूखेपन से कहा।


रघुनाथ बाबू ने अपनी लाठी के सहारे उठने की कोशिश की। “सुमित, वो जमीन हमारे पुरखों की निशानी है। और दूसरी बात, यह एजेंट जो रेट बता रहा है, वो वहां के सरकारी रेट से भी कम है। मुझे खबर मिली है कि वहां से हाईवे निकलने वाला है। छह महीने रुक जाओगे तो कीमत चार गुनी हो जाएगी। अभी बेचना बेवकूफी होगी।”


सुमित हंसा। एक ऐसी हंसी जिसमें सम्मान नहीं, बल्कि उपहास था।


“भैया, प्लीज! आप अपनी 1980 की बुद्धि मत लगाइये। यह 2026 है। आपको मार्केट का ‘म’ भी नहीं पता। आप तो सरकारी नौकरी में थे, क्लर्क थे, वो भी रिटायर हो गए। बिजनेस की बातें आप क्या जानें?”


रघुनाथ के दिल पर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो। क्लर्क? हाँ, वे क्लर्क थे। लेकिन इसी क्लर्क की नौकरी से उन्होंने सुमित को एमबीए करवाया था। जब पिताजी गुजर गए थे, तब सुमित दस साल का था। रघुनाथ ने अपनी पढ़ाई छोड़ी, नौकरी पकड़ी और पिता बनकर सुमित को पाला। अपनी शादी इसलिए नहीं की कि कहीं छोटे भाई के भविष्य में कोई कमी न रह जाए। तब रघुनाथ का ‘वक्त’ था। तब रघुनाथ जो कहते थे, वो इस घर का कानून होता था। सुमित पानी पीने से पहले भी भैया की इजाजत लेता था।


लेकिन आज? आज रघुनाथ रिटायर थे। पेंशन के चंद रुपयों पर आश्रित। और सुमित? शहर का बड़ा बिजनेसमैन।


“सुमित,” रघुनाथ ने अपनी आहत भावनाओं को दबाते हुए कहा, “तजुर्बा पैसों का मोहताज नहीं होता। मैंने दुनिया देखी है। यह एजेंट तुम्हें ठग रहा है। जल्दबाजी मत कर।”


नलिनी, जो अब तक चुप थी, बीच में बोल पड़ी, “भाऊजी, आप क्यों खामख्वाह टेंशन लेते हैं? आपकी दवाइयां आ रही हैं न समय पर? आपको खाना मिल रहा है न? फिर इन पैसों के पचड़े में क्यों पड़ते हैं? सुमित जो कर रहे हैं, सही कर रहे होंगे। आखिर घर का खर्चा तो यही चलाते हैं।”


यह ताना सीधा रघुनाथ के स्वाभिमान के सीने में जा लगा। *‘घर का खर्चा यही चलाते हैं।’*


रघुनाथ की आँखें डबडबा गईं। उन्होंने सुमित की तरफ देखा, उम्मीद थी कि वह अपनी पत्नी को डांटेगा। कहेगा कि ‘नलिनी, भैया ने मुझे बनाया है’। लेकिन सुमित फाइल के पन्नों को पलटने में व्यस्त था। उसने एक बार भी ऊपर नहीं देखा।


रघुनाथ समझ गए। अब इस घर में ‘इंसान’ नहीं बोल रहा था, अब ‘वक्त’ बोल रहा था। और रघुनाथ का वक्त अब खोटा सिक्का बन चुका था।


उन्होंने गहरी सांस ली और वापस अपनी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने धीरे से कहा, “ठीक है। जो तुम्हें ठीक लगे, करो। मेरी तो अब कोई सुनता नहीं।”


सुमित ने डील साइन कर दी। जमीन बिक गई। एजेंट चेक देकर चला गया। घर में जश्न मना। मिठाइयां बंटीं। रघुनाथ बाबू ने भी मिठाई का टुकड़ा लिया, पर वो उनके गले से नीचे नहीं उतरा। वह कड़वा लग रहा था—अपमान जैसा कड़वा।


छह महीने बीत गए।


सुमित ने वह पैसा शेयर बाजार और एक नई पार्टनरशिप में लगा दिया। शुरुआत में सब अच्छा चला। नलिनी ने नई कार ले ली। घर रेनोवेट हो गया। रघुनाथ बाबू का कमरा, जो पहले हवादार था, उसे स्टोर रूम बना दिया गया और उन्हें पीछे वाले छोटे कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। “सामान ज्यादा हो गया है भाऊजी, आपको तो बस सोना ही है,” नलिनी ने तर्क दिया था। रघुनाथ चुप रहे। वक्त खराब था, जुबान चलाने का कोई फायदा नहीं था।


फिर एक दिन भूचाल आ गया।


जिस कंपनी में सुमित ने पार्टनरशिप की थी, वो फ्रॉड निकली। उसका पार्टनर सारे पैसे लेकर विदेश भाग गया। शेयर बाजार क्रैश हो गया। सुमित सड़क पर आ गया। लेनदार घर के चक्कर काटने लगे। बैंक ने घर की कुर्की का नोटिस भेज दिया।


और रही सही कसर उस खबर ने पूरी कर दी जो अखबार के पहले पन्ने पर छपी थी— *“हाईवे प्रोजेक्ट को मंजूरी, उस इलाक़े की ज़मीनों के दाम आसमान पर, किसान हुए मालामाल।”*


सुमित ने जब वह खबर पढ़ी, तो उसके हाथों से अखबार गिर गया। वही जमीन… जो उसने दो करोड़ में बेची थी, आज उसकी कीमत आठ करोड़ थी। अगर उसने भाई की बात मान ली होती, तो आज वह बर्बाद नहीं होता।


शाम को घर में मातम छाया हुआ था। नलिनी रो रही थी। सुमित सिर पकड़े बैठा था। बिजली का बिल न भरने के कारण कनेक्शन कटने वाला था।


तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। सुमित ने डरते-डरते दरवाजा खोला। उसे लगा कोई लेनदार आया होगा।


लेकिन सामने रघुनाथ बाबू खड़े थे। उन्होंने अपने पुराने संदूक से एक एफ.डी. (Fixed Deposit) के कागज निकाले और सुमित के हाथ में थमा दिए।


“भैया… ये?” सुमित हकलाया।


“यह मेरी रिटायरमेंट की पूरी जमा पूंजी है सुमित। पच्चीस लाख रुपये हैं। इससे बैंक का ब्याज और कुछ लेनदारों का मुंह बंद हो जाएगा। बाकी के लिए… मैंने अपने पुराने पी.एफ. ऑफिस में बात की है, कुछ पेंशन लोन मिल जाएगा,” रघुनाथ की आवाज़ में वही पुराना वाला दम था, वही बड़े भाई वाला अधिकार।


सुमित और नलिनी फटी आँखों से उन्हें देख रहे थे। जिस भाई को उन्होंने ‘बोझ’ समझा, जिसे ‘गुजरा हुआ वक्त’ कहकर दुत्कारा, आज वही उनकी ढाल बनकर खड़ा था।


सुमित रघुनाथ के पैरों में गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा। “भैया! मुझे माफ़ कर दीजिये! मैंने बहुत बड़ी गलती की। मैंने आपके तजुर्बे को नहीं, आपकी जेब को देखा। मैंने सोचा कि अब मैं कमाता हूँ तो मैं बड़ा हो गया। लेकिन आज समझ आया कि पेड़ चाहे कितना भी पुराना हो जाए, छाया देना बंद नहीं करता।”


रघुनाथ ने झुककर सुमित को उठाया। उन्होंने उसे गले नहीं लगाया, बस उसके कंधे पर हाथ रखा।


“उठो सुमित,” रघुनाथ ने शांत स्वर में कहा।


सुमित ने आँसू पोंछते हुए कहा, “भैया, आप उस दिन सही कह रहे थे। अगर मैंने आपकी बात सुनी होती… आप मुझे डांटिए, मारिये। कहिये कि मैं बेवकूफ हूँ।”


रघुनाथ बाबू ने दीवार पर टंगी उस पुरानी घड़ी की तरफ देखा जो बंद पड़ी थी। उन्होंने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा,


“सुमित, मैं क्यों डांटूँ? उस दिन मैं नहीं बोल रहा था, मेरा ‘खराब वक्त’ बोल रहा था, इसलिए तुम्हें मेरी बातें बकवास लगीं। और आज… आज भी मैं नहीं बोल रहा, आज मेरा ‘त्याग’ बोल रहा है, इसलिए तुम्हें मेरी बातें अमृत लग रही हैं।”


उन्होंने सुमित की आँखों में देखा और अपनी बात पूरी की, “इंसान की अपनी कोई आवाज़ नहीं होती मेरे भाई। जब उसकी जेब गर्म होती है, तो उसकी गालियां भी दुनिया को ‘उपदेश’ लगती हैं। और जब जेब ठंडी हो, तो उसका वेद-पुराण भी लोगों को ‘शोर’ लगता है। उस दिन मेरी जेब खाली थी, इसलिए मैं गलत था। आज तुम्हारे पास कुछ नहीं है और मेरे पास ये पच्चीस लाख हैं, इसलिए मैं सही हूँ।”


कमरे में सन्नाटा था। नलिनी सिर झुकाए खड़ी थी। उसे अपने कहे वो शब्द— *‘घर का खर्चा तो यही चलाते हैं’*—कांटो की तरह चुभ रहे थे। आज उसी ‘रिटायर्ड क्लर्क’ ने उनकी छत बचाई थी।


रघुनाथ बाबू अपनी लाठी टेकते हुए अपने छोटे कमरे की ओर मुड़े। जाते-जाते रुके और बोले,

“पैसा तो फिर आ जाएगा सुमित, वक्त का पहिया है, घूमता रहता है। लेकिन याद रखना, घर की नींव कभी पुरानी नहीं होती। नींव को खोदकर अगर तुम महल बनाओगे, तो वो महल गिरेगा ही। बड़ों की सलाह बैंक बैलेंस देखकर नहीं, उनके बालों की सफेदी देखकर मानी जाती है।”


रघुनाथ अपने कमरे में चले गए। सुमित और नलिनी वहीं खड़े रहे। उन्हें आज समझ आ गया था कि वक्त किसी का सगा नहीं होता, लेकिन परिवार… परिवार वही होता है जो बुरे वक्त में भी सगा बना रहे।


उस रात सुमित ने घर की बंद घड़ी में नई बैटरी डाली। घड़ी फिर से टिक-टिक करने लगी। लेकिन अब उस टिक-टिक में सुमित को सिर्फ समय नहीं, अपने भाई की वो बातें सुनाई दे रही थीं, जिन्हें उसने अनसुना कर दिया था। उसने कसम खाई कि अब वह कभी ‘वक्त’ के नशे में ‘रिश्तों’ को नहीं भूलेगा।


**समापन:**


दोस्तों, यह कहानी हर उस घर की हकीकत है जहाँ बुजुर्गों को सिर्फ इसलिए हाशिये पर डाल दिया जाता है क्योंकि अब वे कमाते नहीं हैं। हम भूल जाते हैं कि जिस छत के नीचे हम शान से रहते हैं, उसके स्तम्भ उन्हीं बुजुर्गों ने खड़े किये हैं। वक्त बदलता है, जवानी ढलती है और कमाई आती-जाती है, लेकिन अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। जब वक्त खराब हो, तो अपनों का साथ ही काम आता है, पैसा नहीं। अपने घर के बड़ों का सम्मान उनकी हैसियत देख कर नहीं, उनके त्याग देख कर कीजिये।


**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके साथ या आपके आस-पास कभी ऐसा हुआ है कि किसी समझदार व्यक्ति की सलाह सिर्फ इसलिए नहीं मानी गई क्योंकि उसका वक्त खराब चल रहा था? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें।


---


**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और सच्चाई से रूबरू कराती कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।**


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...