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मिट्टी की खुशबू

 *सुजाता को लगता था कि उसके सास-ससुर की 'देहाती' आदतें उसकी हाई-सोसाइटी इमेज पर धब्बा हैं, लेकिन एक पार्टी ने ऐसा सच उजागर किया कि उसका घमंड कांच की तरह बिखर गया और उसे समझ आया कि जड़ें जितनी गहरी होती हैं, पेड़ उतना ही ऊँचा जाता है।*


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शाम के सात बज चुके थे। 'ग्रीनवुड विला' की लॉन में रंग-बिरंगी लाइट्स जगमगा रही थीं। आज सुजाता और रवि की शादी की दसवीं सालगिरह थी। शहर के नामी-गिरामी लोग, बिजनेस टायकून और सुजाता की किटी पार्टी की सहेलियाँ—सबको न्योता दिया गया था। सुजाता ने इस पार्टी की तैयारी महीनों पहले शुरू कर दी थी। वह चाहती थी कि सब कुछ परफेक्ट हो। डेकोरेशन से लेकर खाने तक, हर चीज़ में 'क्लास' झलकनी चाहिए।


लेकिन सुजाता के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। और उस चिंता का कारण कोई और नहीं, बल्कि उसके सास-ससुर, रामेश्वर जी और कावेरी देवी थे।


वे दोनों गाँव से आए थे। सीधा-सादा पहनावा, ठेठ बोली और ज़मीन से जुड़े लोग। रामेश्वर जी धोती-कुर्ता पहनते थे और कावेरी देवी सूती साड़ी। सुजाता को हमेशा लगता था कि वे उसकी मॉडर्न लाइफस्टाइल में 'मिसफिट' हैं। जब भी घर पर कोई मेहमान आता, सुजाता कोशिश करती कि सास-ससुर अपने कमरे में ही रहें।


"रवि, मैंने तुमसे कहा था न कि मम्मी-पापा को समझा देना। आज की पार्टी बहुत खास है। मिस्टर खन्ना आ रहे हैं, जो हमारे नए प्रोजेक्ट के इनवेस्टर हैं। अगर मम्मी-पापा ने उनके सामने कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया या अपनी गाँव की बातें शुरू कर दीं, तो मेरी नाक कट जाएगी," सुजाता ने बेडरूम में तैयार होते हुए झुंझलाकर कहा।


रवि टाई की गांठ ठीक करते हुए बोला, "सुजाता, वे मेरे माँ-बाप हैं। उन्हें कमरे में बंद करना ठीक नहीं लगता। और वे इतने भी नासमझ नहीं हैं।"


"अरे, नासमझी की बात नहीं है रवि! बात 'प्रेजेंटेशन' की है। तुम्हें पता है न पिछली बार मम्मी ने मिसेस मेहरा से क्या पूछ लिया था? कि 'भैंस कितना दूध देती है?' उफ़! मुझे तो याद करके ही शर्म आती है," सुजाता ने मुँह बनाया।


रवि चुप रह गया। वह जानता था कि सुजाता का स्वभाव थोड़ा दिखावे वाला है, लेकिन वह अपने माता-पिता का अपमान भी नहीं सह सकता था। उसने बीच का रास्ता निकाला। वह रामेश्वर जी के कमरे में गया।


रामेश्वर जी और कावेरी देवी तैयार बैठे थे। रामेश्वर जी ने एक नई धोती और सिल्क का कुर्ता पहना था, और कावेरी देवी ने अपनी सबसे अच्छी बनारसी साड़ी। वे दोनों बहुत खुश लग रहे थे।


"अरे लल्ला, देख तो हम कैसे लग रहे हैं? तेरी बहुरिया को पसंद आएंगे न हम?" कावेरी देवी ने उत्साह से पूछा।


रवि का गला भर आया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बहुत अच्छे लग रहे हो माँ। बस... सुजाता कह रही थी कि आज बहुत वी.आई.पी. लोग आ रहे हैं, तो आप लोग थोड़ा कम ही बोलिएगा। मतलब... वो लोग अंग्रेजी में बात करते हैं, तो शायद आपको बोरियत हो।"


रामेश्वर जी की बूढ़ी आँखों में एक समझदार चमक थी। वे तुरंत समझ गए कि बेटा क्या कहना चाहता है। उन्होंने कावेरी का हाथ दबाया और रवि से बोले, "चिंता मत कर बेटा। हम बस आशीर्वाद देने आएंगे और फिर एक कोने में बैठ जाएंगे। तेरी पार्टी में कोई खलल नहीं पड़ेगा।"


पार्टी शुरू हुई। सुजाता ने एक बेहद कीमती गाउन पहना था और वह मेहमानों के स्वागत में व्यस्त थी। रामेश्वर जी और कावेरी देवी एक कोने में सोफे पर सिमट कर बैठे थे। सुजाता ने उन्हें सख्त हिदायत दी थी कि वे वेटर को आवाज़ न दें, वेटर खुद उनके पास आएगा।


मिस्टर खन्ना, जो शहर के सबसे बड़े बिल्डर और रईस आदमी थे, पार्टी में दाखिल हुए। उनके साथ उनकी पत्नी और एक विदेशी डेलीगेट (प्रतिनिधि), मिस्टर जॉनसन भी थे। सुजाता दौड़कर उनके पास गई।


"वेलकम सर! सो ग्लैड यू कुड मेक इट," सुजाता ने अपनी बेस्ट इंग्लिश में कहा।


मिस्टर खन्ना ने मुस्कुराकर जवाब दिया। वे लोग ड्रिंक्स लेकर बातें करने लगे। सुजाता की नज़र बार-बार कोने में बैठे सास-ससुर पर जा रही थी। उसे डर था कि कहीं कोई उनसे बात न कर ले।


तभी मिस्टर जॉनसन की नज़र रामेश्वर जी पर पड़ी। वे अपनी ड्रिंक छोड़कर सीधे उनकी तरफ बढ़े। सुजाता का दिल धक से रह गया। 'हे भगवान! अब क्या होगा? जॉनसन को तो हिंदी आती नहीं, और पापा जी को अंग्रेजी का ए-बी-सी-डी नहीं आता। अब तमाशा होगा।'


सुजाता और रवि तेजी से उस ओर लपके ताकि स्थिति संभाल सकें। लेकिन वहां पहुँचने से पहले ही जो नज़ारा उन्होंने देखा, उसने उनके पैरों को जड़ कर दिया।


मिस्टर जॉनसन ने झुककर रामेश्वर जी को 'नमस्ते' किया। और रामेश्वर जी ने न केवल नमस्ते का जवाब दिया, बल्कि बहुत ही सहजता से अंग्रेजी में बोले, *"Welcome to India, Mr. Johnson. I hope you are enjoying the hospitality."*


सुजाता की आँखें फटी की फटी रह गईं। पापा जी? और अंग्रेजी?


मिस्टर जॉनसन ने हंसते हुए कहा, *"Indeed! I heard a lot about Indian culture. But seeing traditional attire in such a modern party is refreshing. You look majestic, Sir."*


रामेश्वर जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, *"Clothes cover the body, but culture covers the soul. We believe in keeping our roots alive, even if the branches touch the sky."*


(कपड़े शरीर को ढकते हैं, पर संस्कृति आत्मा को। हम मानते हैं कि जड़ें ज़िंदा रहनी चाहिए, चाहे शाखाएं आसमान छू लें।)


सुजाता और रवि सन्न थे। मिस्टर खन्ना भी वहां आ गए। वे भी रामेश्वर जी की बातें सुन रहे थे।

"अरे रामेश्वर जी! आप यहाँ? मैं तो आपको पहचान ही नहीं पाया इस लिबास में," मिस्टर खन्ना ने हैरानी और आदर से कहा।


सुजाता ने हकलाते हुए पूछा, "सर... आप... आप पापा जी को जानते हैं?"


मिस्टर खन्ना हंसे। "सुजाता जी, आप शायद नहीं जानतीं। रामेश्वर जी हमारे स्टेट के रिटायर्ड एग्रीकल्चरल साइंटिस्ट (कृषि वैज्ञानिक) हैं। इन्होंने हाइब्रिड बीजों पर जो रिसर्च की थी, उसी की बदौलत आज हमारे किसानों की फसल दुगुनी हो गई है। मैं खुद इनसे मिलने इनके गाँव जाया करता था। ये तो बहुत सादगी पसंद इंसान हैं, कभी अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा नहीं पीटते।"


सुजाता को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मार दिया हो। उसे तो बस इतना पता था कि ससुर जी खेती-बाड़ी करते थे। उसने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की कि वे असल में क्या थे। उसे तो बस उनकी धोती और गाँव की बोली दिखाई देती थी।


मिस्टर जॉनसन रामेश्वर जी से खेती और भारतीय दर्शन पर चर्चा करने लगे। रामेश्वर जी की अंग्रेजी में भले ही वो बनावटी 'एक्सेंट' नहीं था, लेकिन उनके शब्दों में जो गहराई और ज्ञान था, उसने जॉनसन को मंत्रमुग्ध कर दिया था।


थोड़ी देर बाद, खाने की टेबल पर।

सुजाता ने कॉन्टिनेंटल खाना बनवाया था। पास्ता, लज़ानिया, और तरह-तरह के सलाद। कावेरी देवी ने प्लेट उठाई, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या लें। सुजाता फिर से शर्मिंदा महसूस करने लगी।


तभी मिस्टर जॉनसन ने कावेरी देवी से पूछा, *"Mam, what is the secret of your glow? Is it the organic food?"*


कावेरी देवी ने रवि की तरफ देखा। रवि अनुवाद करने ही वाला था कि कावेरी देवी ने अपनी टूटी-फूटी लेकिन प्यारी अंग्रेजी में कहा, *"No organic canned food. Fresh milk, homemade ghee, and happy heart. That is secret."*


सब हंस पड़े। जॉनसन ने कहा, *"I would love to taste something homemade."*


सुजाता घबरा गई। मेन्यू में तो सब इटालियन था।

कावेरी देवी ने सुजाता से धीरे से कहा, "बहू, अगर बुरा न माने तो मैं किचन से कुछ ले आऊं? मैंने रवि के लिए गाजर का हलवा बनाया था और अपने गाँव के तरीके से बाटी-चोखा भी लाया था।"


सुजाता के पास कोई विकल्प नहीं था। उसने 'हां' कर दी।


जब कावेरी देवी ने घी में डूबी बाटी और लाल-लाल गाजर का हलवा परोसा, तो उसकी खुशबू ने पूरे इटालियन खाने की महक को फीका कर दिया। मिस्टर जॉनसन और मिस्टर खन्ना ने उंगलियां चाट-चाट कर खाया।


"सुजाता जी," मिस्टर खन्ना ने हाथ पोंछते हुए कहा, "पार्टी की जान तो यह खाना और आपके सास-ससुर हैं। असली क्लास इसमें है, उन बेस्वाद पास्ता में नहीं। आप बहुत किस्मत वाली हैं कि आपके घर में ऐसे संस्कार और ऐसी जड़ें मौजूद हैं।"


पार्टी खत्म हुई। मेहमान चले गए। लेकिन सुजाता अब भी वहीं खड़ी थी, सिर झुकाए। उसका मॉडर्न होने का गुमान, उसकी 'क्लास' की परिभाषा—सब कुछ बदल चुका था। उसे याद आया कि कैसे वह अपने ससुर को एक कोने में बिठाना चाहती थी, वही ससुर जो आज पूरी महफिल की शान बने थे।


वह धीरे-धीरे रामेश्वर जी के पास गई। वे अपनी धोती ठीक कर रहे थे।

"पापा जी..." सुजाता की आवाज़ में कंपन था।


रामेश्वर जी ने प्यार से देखा। "क्या हुआ बेटी? कुछ गलती हो गई क्या हमसे? वो अंग्रेज साहब को बुरा तो नहीं लगा?"


सुजाता की आँखों से आंसू बह निकले। वह रामेश्वर जी के पैरों में गिर पड़ी।

"मुझे माफ़ कर दीजिये पापा जी। मैं बहुत बुरी हूँ। मैंने आपको हमेशा अपनी शान के खिलाफ समझा। मुझे लगा आप गंवार हैं, आपको दुनियादारी की समझ नहीं। लेकिन असली गंवार तो मैं निकली। मैंने हीरे को पत्थर समझकर कोने में फेंक दिया था।"


कावेरी देवी ने दौड़कर उसे उठाया। "अरे पगली! माफ़ कैसी? तू तो हमारी बेटी है। और सुन, हम गाँव के लोग हैं, हमारे कपड़े भले ही पुराने हों, पर हमारा दिल नया ही रहता है। हमें पता था कि तू अपनी दुनिया में खुश रहना चाहती है, इसलिए हमने कभी अपनी डिग्रियां या ज्ञान तेरे सामने नहीं झाड़ा। रिश्तों में प्यार चाहिए होता है बेटा, क्वालिफिकेशन नहीं।"


रवि भी वहां आ गया। उसने अपने माता-पिता को गले लगा लिया।


सुजाता ने उस दिन एक बड़ा सबक सीखा। उसने अगले दिन ही अपने घर से वो सारे दिखावटी सजावट के सामान हटा दिए जो उसे 'स्टेटस सिंबल' लगते थे। उसने सास-ससुर के कमरे को घर के सबसे अच्छे कमरे में शिफ्ट किया।


अब जब भी सुजाता के घर पार्टी होती, तो वह गर्व से कहती, "मिलिए मेरे ससुर जी से, जो एक महान वैज्ञानिक हैं, और मेरी सासू माँ से, जिनके हाथ के खाने में दुनिया का सबसे बेहतरीन स्वाद है।"


सुजाता समझ गई थी कि इंसान की पहचान उसके कपड़ों या अंग्रेजी बोलने के लहज़े से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, अनुभव और संस्कारों से होती है। इत्र की खुशबू तो हवा के झोंके के साथ उड़ जाती है, लेकिन गीली मिट्टी की सोंधी महक रूह में बस जाती है।


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**कहानी का सार:**

हम अक्सर आधुनिकता की दौड़ में अपने बुजुर्गों को 'पिछड़ा' मान लेते हैं। हमें लगता है कि उन्हें आज की दुनिया की समझ नहीं। लेकिन हम भूल जाते हैं कि उन्होंने वो दुनिया देखी है और बनाई है जिसमें हम आज जी रहे हैं। उनका अनुभव हमारी किताबों से कहीं ज्यादा बड़ा होता है। अपनी जड़ों का सम्मान कीजिये, क्योंकि जड़ें ही पेड़ को आंधी में गिरने से बचाती हैं।


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**अंत में एक सवाल:**

क्या आपके घर में भी ऐसे बुजुर्ग हैं जिन्हें आप 'पुराने ख्यालात' का मानकर इग्नोर करते हैं? क्या सुजाता की तरह आपको भी कभी अपनी सोच पर पछतावा हुआ है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।


**“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी सोच को नई दिशा दी, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। अपने बुजुर्गों का मान बढ़ाएं। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली और प्रेरक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**


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