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आधुनिकता का अर्थ

 बनारस के एक पुराने मोहल्ले की संकरी गलियों में सुबह की अजान और मंदिर की घंटियों के साथ ही सावित्री देवी की आवाज भी गूंजने लगती थी। सावित्री देवी का घर मोहल्ले का सबसे ऊंचा और पक्का मकान था, जिसे वो अपनी नाक और शान दोनों मानती थीं। उनके घर के ठीक सामने एक पुराना, ईंटों वाला मकान था, जिसकी दीवारों से पलस्तर झड़ रहा था, लेकिन उस घर की छत हमेशा हरे-भरे पौधों और रंग-बिरंगे फूलों से लदी रहती थी। उस घर में रहती थी अवनि।

अवनि की उम्र यही कोई अट्ठाईस-तीस के आसपास रही होगी। बिखरे बाल, आंखों पर मोटा चश्मा, और अक्सर कपड़ों पर या तो मिट्टी लगी होती या फिर पेंट के दाग। सावित्री देवी रोज सुबह अपनी बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हुए अवनि को देखतीं और नाक-भौं सिकोड़ लेतीं। अवनि का काम ही कुछ ऐसा था। वह शहर के एक एनजीओ के लिए काम करती थी जो अनाथ बच्चों और बेजुबान जानवरों के लिए कार्य करता था, साथ ही वह एक फ्रीलांस आर्टिस्ट भी थी। लेकिन सावित्री देवी के लिए 'नौकरी' का मतलब सिर्फ सुबह नौ बजे टिफिन लेकर निकलना और शाम को छह बजे वापस आना था।

सावित्री देवी की अपनी दुनिया बड़ी व्यवस्थित और चमक-दमक वाली थी। उनका बेटा विकास एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर था और बहू प्रीति, जो खुद को किसी फैशन मॉडल से कम नहीं समझती थी, दिन भर ब्रांडेड कपड़ों और किटी पार्टियों में व्यस्त रहती थी। सावित्री देवी को इस बात का बहुत घमंड था कि उनकी बहू देखने में अप्सरा है और बेटा लाखों में कमाता है। जब भी अवनि अपनी स्कूटी स्टार्ट करती, जो अक्सर दूसरी या तीसरी किक में स्टार्ट होती थी, तो सावित्री देवी अपनी पड़ोसन विमला से कहना नहीं भूलती थीं।

"देख रही हो विमला? फिर निकल पड़ी आवारागर्दी करने। न समय का ठिकाना, न कपड़ों का ढंग। कुर्ता देखो, जैसे किसी मजदूर का हो। और बाल? जैसे चिड़िया का घोंसला। पता नहीं इसके मां-बाप ने इसे क्या सिखाया है। अरे, लड़की जात है, थोड़ा सलीका होना चाहिए, थोड़ा रूप-रंग निखारने का शौक होना चाहिए। कौन करेगा इससे शादी? जो भी करेगा, वो तो गया काम से।"

विमला भी हां में हां मिलाते हुए कहती, "सही कह रही हो दीदी। अब अपनी प्रीति बिटिया को ही देख लो, घर में भी रहती है तो ऐसे तैयार रहती है जैसे किसी शादी में जाना हो। और एक ये अवनि है, देखकर लगता ही नहीं कि किसी अच्छे घर की लड़की है। दिन भर उन गंदे कुत्तों और गरीब बच्चों के बीच रहती है। छीः, मुझे तो घिन आती है।"

अवनि सब सुनती थी। गलियों में आवाजें गूंजती हैं। लेकिन उसने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया। वह बस मुस्कुरा देती और अपनी पुरानी स्कूटी को धक-धक करते हुए आगे बढ़ा देती। उसके लिए जीवन का अर्थ कपड़ों की चमक नहीं, बल्कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना था।

समय बीतता गया। दिवाली का त्यौहार सिर पर था। सावित्री देवी का घर रोशनी से नहाया हुआ था। उन्होंने पूरे मोहल्ले में ऐलान कर दिया था कि इस बार की दिवाली वो इतनी भव्य मनाएंगी कि लोग देखते रह जाएंगे। बेटा विकास विदेश से खास तरह की लाइटें मंगवा रहा था और बहू प्रीति ने अपने लिए पचास हजार की साड़ी पसंद की थी। दूसरी तरफ, अवनि के घर में बस मिट्टी के दीये सूख रहे थे। उसने मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा किया था और उन्हें दीयों पर पेंटिंग करना सिखा रही थी।

सावित्री देवी ने जब यह देखा तो प्रीति से बोलीं, "देख रही है? हम यहाँ हजारों रुपए की सजावट कर रहे हैं और वो भिखारियों की तरह मिट्टी के दीये रंग रही है। अरे, स्टैंडर्ड भी कोई चीज होती है। हमारे घर के सामने यह सब कूड़ा-कबाड़ा अच्छा नहीं लगता।"

प्रीति ने मुंह बनाते हुए कहा, "मम्मीजी, आप भी किन लोगों की बात कर रही हैं। इनका क्लास ही अलग है। छोड़िये न, हमें अपनी पार्टी की तैयारी करनी है।"

दिवाली की रात आई। सावित्री देवी का घर जगमगा रहा था। मेहमानों का तांता लगा था। मंहगी शराब और लजीज खाने की खुशबू उड़ रही थी। अवनि ने अपने घर की मुंडेर पर बस कुछ तेल के दीये जलाए थे, लेकिन उनकी रोशनी में एक अजीब सा सुकून था। वह अनाथ आश्रम के बच्चों के साथ फुलझड़ियां चला रही थी।

तभी अचानक, रात के करीब ग्यारह बजे, सावित्री देवी के घर के बाहर एक पुलिस जीप और सायरन की आवाज से पूरा मोहल्ला दहल गया। संगीत बंद हो गया। मेहमान सन्नाटे में आ गए। पुलिस के साथ कुछ इनकम टैक्स वाले भी थे। पता चला कि विकास की कंपनी किसी बड़े घोटाले में फंसी है और विकास के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी का आरोप है। इतना ही नहीं, विकास ने जुए और सट्टेबाज़ी में घर के कागज़ात तक गिरवी रख दिए थे, जिसकी भनक सावित्री देवी को तो क्या, प्रीति को भी नहीं थी।

पुलिस विकास को हथकड़ी लगाकर ले जाने लगी। सावित्री देवी बदहवास होकर पुलिसवालों के पैरों में गिर पड़ीं। "मेरे बेटे को मत ले जाओ, यह निर्दोष है! इसने कुछ नहीं किया!" वह चिल्ला रही थीं। लेकिन पुलिस ने एक न सुनी। अधिकारियों ने घर को सील करने का आदेश दे दिया।

"मैडम, आपको अभी घर खाली करना होगा। यह संपत्ति अब बैंक और सरकार के कब्जे में है," एक अधिकारी ने रूखे स्वर में कहा।

सावित्री देवी को लगा जैसे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई हो। जिस घर पर, जिस बेटे पर उन्हें इतना नाज़ था, वह सब एक पल में ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। सबसे बड़ा झटका उन्हें तब लगा जब उनकी लाडली बहू प्रीति ने अपना बैग उठाया।

"तुम कहाँ जा रही हो बहू?" सावित्री देवी ने कांपते हुए पूछा।

प्रीति ने एक बार भी सास की तरफ नहीं देखा और बोली, "मैं अपने पापा के घर जा रही हूं। मुझे नहीं पता था कि आपका बेटा अपराधी है। मैं अपनी जिंदगी ऐसे बर्बाद नहीं कर सकती। और प्लीज, मुझे फोन मत कीजियेगा।" प्रीति बाहर खड़ी अपनी कार में बैठी और चली गई।

सावित्री देवी सड़क पर अकेली रह गईं। उनके शरीर पर वही भारी-भरकम रेशमी साड़ी थी और गले में वह नौलखा हार, जो अब उन्हें फांसी के फंदे जैसा लग रहा था। जो पड़ोसी कुछ देर पहले तक उनकी पार्टी में कबाब और शराब का मजा ले रहे थे, अब अपने दरवाजों की ओट से तमाशा देख रहे थे। कोई आगे नहीं आया। विमला, जो उनकी सबसे पक्की सहेली बनती थी, उसने भी अपनी खिड़की बंद कर ली थी। पुलिस ने घर पर ताला जड़ दिया और सील लगा दी।

रात के बारह बज रहे थे। ठंड बढ़ने लगी थी। सावित्री देवी सड़क के किनारे चबूतरे पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगीं। उनका अहंकार, उनका "स्टैंडर्ड", सब चकनाचूर हो चुका था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो जाएं तो जाएं कहाँ। रिश्तेदारों को फोन किया, लेकिन खबर टीवी पर आ चुकी थी, इसलिए किसी ने फोन नहीं उठाया।

तभी उन्हें अपने कंधे पर एक शॉल महसूस हुई। उन्होंने चौंककर ऊपर देखा। सामने अवनि खड़ी थी। हाथ में गर्म चाय का एक कुल्हड़ था।

"चाचीजी, चाय पी लीजिये। ठंड बहुत है," अवनि ने बेहद शांत स्वर में कहा।

सावित्री देवी शर्म से गड़ी जा रही थीं। जिस लड़की को उन्होंने हमेशा अपमानित किया, जिसके पहनावे और रहन-सहन का मजाक उड़ाया, आज वही उनके पास खड़ी थी।

"तुम... तुम यहाँ क्यों आई हो? तमाशा देखने?" सावित्री देवी ने रुंधे गले से कहा, हालांकि उनके स्वर में अब वह पहले वाली अकड़ नहीं थी।

"तमाशा तो दुनिया देख रही है चाचीजी। मैं तो बस आपको घर ले जाने आई हूं। चलिए, बाहर ठंड है," अवनि ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा।

सावित्री देवी ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, "मैं तुम्हारे घर... उस कबाड़खाने में नहीं जाउंगी।"

अवनि ने बुरा नहीं माना। वह जानती थी कि यह अहंकार की आखिरी फड़फड़ाहट है। उसने नरमी से कहा, "चाचीजी, कबाड़खाना ही सही, लेकिन वहां छत है और इज्जत है। आज की रात आप सड़क पर नहीं गुजार सकतीं। कल जो करना हो कर लीजियेगा, लेकिन अभी चलिए।"

सावित्री देवी के पास कोई विकल्प नहीं था। वह चुपचाप अवनि के साथ चल दीं। जब वह अवनि के घर के अंदर दाखिल हुईं, तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। बाहर से जो घर जर्जर दिखता था, वह अंदर से किसी कला-दीर्घा (Art Gallery) जैसा था। दीवारों पर खूबसूरत पेंटिंग्स टंगी थीं। हर कोने में एक कलात्मकता थी। फर्नीचर पुराना था लेकिन बेहद सलीके से सजाया गया था। किताबों का एक बड़ा सा रैक था। वह घर 'गंदा' नहीं था, बस वह सावित्री देवी की 'सिंथेटिक' दुनिया से अलग, 'आर्गेनिक' और जीवंत था।

अवनि ने उन्हें सोफे पर बिठाया और खाने के लिए सादी खिचड़ी परोसी। सावित्री देवी ने एक निवाला खाया तो उनकी आंखों से आंसू टपक कर थाली में गिर गए। उन्हें याद आया कि प्रीति ने आज पार्टी के चक्कर में उन्हें दोपहर का खाना तक नहीं पूछा था, और यह लड़की, जिसे वो कोसती थीं, रात के एक बजे उनके लिए गरम खाना बना रही थी।

अगली सुबह जब सावित्री देवी उठीं, तो उन्होंने देखा कि अवनि फोन पर किसी से अंग्रेजी में बात कर रही थी। उसका लहज़ा बेहद प्रभावशाली और कड़क था।

"सर, मैं जानती हूं कि मामला गंभीर है, लेकिन मिसेज सावित्री का इस फ्रॉड से कोई लेना-देना नहीं है। वह एक सीनियर सिटीजन हैं। आप उनके रहने की वैकल्पिक व्यवस्था के बिना उन्हें बेघर नहीं कर सकते। मैं ह्यूमन राइट्स कमीशन और वूमेन सेल दोनों को लेटर लिख रही हूं। और हाँ, मुझे उस एफआईआर की कॉपी चाहिए अभी के अभी।"

सावित्री देवी अवाक थीं। यह वही अवनि थी जिसे वो गवार समझती थीं? फोन रखने के बाद अवनि ने मुड़कर देखा और मुस्कुराई।

"चाचीजी, घबराइये मत। मैंने अपने एक वकील दोस्त से बात की है। विकास भैया की जमानत तो मुश्किल है, लेकिन आपके स्त्री-धन और आपके नाम पर जो पुश्तैनी गांव वाला घर है, उसे हम इस कुर्की से बचा लेंगे। पुलिस ने जल्दबाजी में सील लगाई है, क़ानूनी तौर पर वे आपको सड़क पर नहीं छोड़ सकते।"

"तुझे... तुझे इतना सब कैसे पता?" सावित्री देवी ने हकलाते हुए पूछा।

"चाचीजी, मैं जिस एनजीओ में काम करती हूं, वहां हम रोज ऐसे ही मुकदमों से जूझते हैं। गरीब औरतों को उनका हक दिलाना मेरा काम है। कपड़े गंदे जरूर होते हैं मेरे, लेकिन कानून और समाज की समझ साफ़ रखती हूं," अवनि ने हंसते हुए कहा।

अगले कुछ दिनों तक अवनि ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। वह पुलिस स्टेशन गई, वकीलों से मिली, और बैंक के अधिकारियों से भी बात की। सावित्री देवी ने देखा कि जिस पुलिस थाने में जाने से अच्छे-अच्छे डरते हैं, वहां अवनि को देखकर बड़े अफसर भी कुर्सी से खड़े होकर 'मैम' कहकर बात करते थे। पता चला कि अवनि को शहर में उसके समाज सेवा कार्यों के लिए कई बार सम्मानित किया जा चुका था। वह सिर्फ एक 'पेंटर' नहीं थी, बल्कि एक सशक्त आवाज़ थी जिसे शहर का प्रशासन भी पहचानता था।

आखिरकार, अवनि की मेहनत रंग लाई। कोर्ट ने सावित्री देवी के गांव वाले पुश्तैनी मकान को कुर्की से मुक्त कर दिया और उनके जेवर (जो उनके निजी थे) उन्हें वापस दिलाने का आदेश दिया।

जिस दिन सावित्री देवी को गांव जाने के लिए निकलना था, उन्होंने अवनि का हाथ पकड़ लिया। उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे।

"बेटी, मैंने तुझे क्या-क्या नहीं कहा। तेरे कपड़ों का, तेरे काम का मजाक उड़ाया। मेरी आंखों पर दौलत और झूठी शान की पट्टी बंधी थी। मुझे लगा था कि मेरा बेटा और वो मॉडर्न बहू ही मेरी दुनिया हैं। लेकिन जब मुसीबत आई, तो वही मॉडर्न बहू भाग गई और जिसे मैं गवार समझती थी, उसने मुझे बेटी बनकर संभाला।"

अवनि ने उनके आंसू पोंछे और बोली, "चाचीजी, कपड़े तो शरीर को ढकने के लिए होते हैं, संस्कार तो आत्मा में होते हैं। और वैसे भी, हम पड़ोसी हैं, और पड़ोसी तो पहला रिश्तेदार होता है।"

"नहीं बेटी," सावित्री देवी ने सिर हिलाया, "तू पड़ोसी नहीं है। तूने साबित कर दिया कि असली 'क्लास' बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में किसी के साथ खड़े होने में होता है। काश, मैंने विकास को भी यही सिखाया होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता।"

सावित्री देवी गांव चली गईं। वहां से वह अक्सर अवनि को पत्र लिखती थीं। अब सावित्री देवी गांव की औरतों को इकट्ठा करके स्वयं सहायता समूह चलाती हैं, जिसकी प्रेरणा उन्हें अवनि से मिली थी। उधर, विकास को अपनी गलती की सजा मिल रही थी और प्रीति ने दूसरी शादी कर ली थी।

मोहल्ले में अब भी अवनि उसी पुरानी स्कूटी से आती-जाती है, कपड़ों पर अब भी पेंट के दाग होते हैं। लेकिन अब जब वह निकलती है, तो गली की औरतें यह नहीं कहतीं कि "कैसी गंदी रहती है", बल्कि अपनी बेटियों से कहती हैं, "बन्ना है तो अवनि दीदी जैसा बनो, जो अपने पैरों पर भी खड़ी हैं और दूसरों को गिरते हुए संभालना भी जानती हैं।"

इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके बाहरी आवरण, ब्रांडेड कपड़ों या अंग्रेजी बोलने के लहजे से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, उसकी मानवीयता और संकट के समय उसके व्यवहार से होती है। आधुनिकता का अर्थ सिर्फ पश्चिमी पहनावा नहीं, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता और संवेदनाओं का विस्तार है। अवनि ने बिना किसी दिखावे के यह सिद्ध कर दिया कि एक साधारण दिखने वाले व्यक्ति के भीतर एक असाधारण व्यक्तित्व छिपा हो सकता है।


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