शहर के पॉश इलाके 'गुलमोहर पार्क' में स्थित 'वर्धमान विला' आज रोशनी से नहाया हुआ था। बाहर महंगी गाड़ियों की कतार लगी थी। शहर के जाने-माने डॉक्टर, वकील और बिजनेसमैन हाथों में गुलदस्ते और महंगे तोहफे लिए अंदर जा रहे थे। आज घर के मुखिया, रिटायर्ड जज भानुप्रताप सिंह का 75वां जन्मदिन था।
हॉल के बीचों-बीच एक बड़ा सा झूमर लगा था, जिसके नीचे तीन लेयर का केक रखा था। भानुप्रताप जी अपनी व्हीलचेयर पर बैठे थे। उन्होंने एक महंगा शेरवानी सूट पहन रखा था, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन था। वे मुस्कुरा रहे थे, हाथ मिला रहे थे, लेकिन उनकी नज़रें बार-बार मुख्य दरवाज़े की ओर जा रही थीं।
उनके बड़े बेटे, विकास (जो अमेरिका में सेटल था) और छोटे बेटे, आकाश (जो मुंबई में बिल्डर था), मेहमानों की आवभगत में लगे थे। बहुएं अपनी डायमंड ज्वेलरी फ्लॉन्ट कर रही थीं।
तभी भानुप्रताप जी के दूर के चचेरे भाई, मिस्टर खन्ना, उनके पास आए। खन्ना जी ने भानुप्रताप जी के गले में एक शॉल डाली और बोले, "अरे भानु भाई, क्या किस्मत पाई है तुमने! यह विला देखो, राजमहल जैसा है। सुना है यहाँ ज़मीन का भाव पचास हज़ार रुपये गज हो गया है? मतलब तुम तो बैठे-बिठाए करोड़ों के मालिक हो। और यह शेरवानी... डिज़ाइनर लगती है। भाई हो तो ऐसा, जिसका रूतबा पूरा शहर मानता हो।"
भानुप्रताप जी ने फीकी मुस्कान दी। खन्ना जी ने उनके स्वास्थ्य के बारे में एक शब्द नहीं पूछा। उन्होंने यह नहीं पूछा कि पिछले हफ़्ते जो उनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ, वो कैसा रहा। उन्हें सिर्फ़ विला की कीमत और शेरवानी के ब्रांड में दिलचस्पी थी। यह था 'रिश्तेदारों' का प्यार—जो सिर्फ़ "हैसियत" देख रहे थे।
थोड़ी देर बाद, केक कटने का समय आया। "हैप्पी बर्थडे टू यू..." का शोर गूंजा। सबने तालियां बजाईं। फोटो खिंचवाई गईं।
जैसे ही भीड़ थोड़ी कम हुई, विकास और आकाश अपने पिता के पास आए। उन्होंने व्हीलचेयर को एक कोने में ले लिया, जहाँ शोर थोड़ा कम था।
"पापा, एक ज़रूरी बात करनी थी," विकास ने भूमिका बांधी।
"हाँ बोलो," भानुप्रताप जी ने केक का एक टुकड़ा खाते हुए कहा।
"पापा, देखिए आप अब बूढ़े हो रहे हैं," आकाश ने बात आगे बढ़ाई। "यह घर बहुत बड़ा है। इसकी मेंटेनेंस, नौकरों का खर्चा... बहुत सिरदर्दी है। और हम दोनों तो बाहर रहते हैं। माँ के जाने के बाद आप यहाँ अकेले कैसे रहेंगे?"
"तो?" भानुप्रताप जी ने बेटों की आँखों में देखा।
विकास ने अपनी जेब से एक फाइल निकाली। "पापा, हम सोच रहे थे कि इस प्रॉपर्टी को बेचकर लिक्विडेट (cash) कर लेते हैं। पैसा तीन हिस्सों में बंट जाएगा—एक हिस्सा आपके नाम पर फिक्स डिपाजिट कर देंगे, जिससे आपका खर्चा आराम से चलेगा। और बाकी हम दोनों बिज़नेस में लगा लेंगे। वैसे भी वसीयत में तो यह सब हमें ही मिलना है, तो क्यों न जीते जी इसका सेटलमेंट हो जाए? टैक्स भी बच जाएगा।"
भानुप्रताप जी के गले में केक का टुकड़ा अटक गया। आज उनका जन्मदिन था। वे उम्मीद कर रहे थे कि बेटे पूछेंगे, "पापा, आप हमारे साथ चलिए," या "पापा, हम आपके पास आकर रहेंगे।" लेकिन नहीं। बेटे वकीलों वाले कागज़ लेकर आए थे। उन्हें पिता की चिंता नहीं थी, उन्हें यह चिंता थी कि पिता के मरने के बाद प्रॉपर्टी का क्या होगा। वे "वसीयत" पूछ रहे थे।
"मैं... मैं सोचकर बताऊंगा," भानुप्रताप जी ने कांपते हुए कहा।
"पापा, सोचने का टाइम नहीं है। बायर (खरीदार) रेडी है। साइन आज ही हो जाएं तो अच्छा है," आकाश ने थोड़ा दबाव डाला।
भानुप्रताप जी का दम घुटने लगा। उस आलीशान हॉल की चकाचौंध उन्हें चुभने लगी।
"मुझे थोड़ी ताज़ी हवा चाहिए," कहकर उन्होंने अपनी व्हीलचेयर का बटन दबाया और बाल्कनी की तरफ बढ़ गए।
बाल्कनी में अंधेरा था और सन्नाटा भी। अंदर से संगीत और हंसी की आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन यहाँ बाहर सिर्फ़ अकेलापन था। भानुप्रताप जी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उनकी पत्नी सुमित्रा की याद आई। जब वो थीं, तो जन्मदिन पर खीर बनती थी, कागज़ों के सौदे नहीं।
तभी उन्हें गेट पर कुछ शोर सुनाई दिया। वॉचमैन किसी को रोक रहा था।
"अरे भाई, मुझे अंदर जाने दे। भानु मेरा यार है," एक बुज़ुर्ग की आवाज़ आई।
"बाबा, यह वीआईपी पार्टी है। तुम्हारा नाम लिस्ट में नहीं है," वॉचमैन ने डांटा।
भानुप्रताप जी ने बाल्कनी से नीचे झांका। गेट की पीली रोशनी में एक दुबला-पतला आदमी खड़ा था। उसने साधारण सा कुर्ता-पजामा पहना था और हाथ में एक पुराना कपड़े का थैला था।
भानुप्रताप जी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"किशन?"
उन्होंने तुरंत वॉचमैन को इंटरकॉम पर डांटा। "उन्हें अंदर भेजो! इज़्ज़त से!"
पाँच मिनट बाद, किशन बाल्कनी में था। किशन—भानुप्रताप का बचपन का दोस्त। वह कोई बड़ा अफ़सर नहीं बना था, गाँव में ही एक छोटा सा स्कूल चलाता था। दोनों की मुलाकात पिछले दस सालों से नहीं हुई थी।
किशन ने आते ही भानुप्रताप को गले नहीं लगाया। वह घुटनों के बल व्हीलचेयर के पास बैठ गया और भानुप्रताप के पैरों को टटोलने लगा।
"भानु, तेरे पैरों में सूजन क्यों है रे?" किशन ने चिंतित स्वर में पूछा।
भानुप्रताप सन्न रह गए। हज़ारों मेहमान आए, सबने घर देखा, कपड़े देखे, केक देखा। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि किडनी की बीमारी की वजह से उनके पैरों में सूजन थी।
"तू... तू यहाँ कैसे किशन?" भानुप्रताप की आवाज़ भर्रा गई।
"अरे, अख़बार में पढ़ा था कि शहर के मशहूर जज साहब का 75वां जन्मदिन है। सोचा, अपने यार को देख आऊं। दस साल हो गए। मन नहीं माना," किशन ने अपने थैले से एक छोटी सी स्टील की डिब्बी निकाली।
"ये क्या है?" भानुप्रताप ने पूछा।
"तेरे लिए," किशन ने डिब्बी खोली। उसमें 'गोंद के लड्डू' थे। "सुमित्रा भाभी बनाती थीं न? तुझे बहुत पसंद थे। भाभी तो नहीं रहीं, तो मैंने अपनी घरवाली से बनवाए। सोचा तुझे खिलाऊंगा तो तुझे अच्छा लगेगा। पर यार... तू बहुत कमज़ोर हो गया है। आँखें भी पीली लग रही हैं। दवाई ववाई ठीक से ले रहा है न? नींद आती है रात को?"
भानुप्रताप जी की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वे खुद को रोक नहीं पाए और बच्चों की तरह रोने लगे।
किशन घबरा गया। उसने भानुप्रताप का हाथ थाम लिया। "क्या हुआ भानु? किसी ने कुछ कहा? या लड्डू पसंद नहीं आए?"
"नहीं किशन," भानुप्रताप ने सिसकते हुए कहा। "लड्डू नहीं, तेरी बातों ने रुला दिया। आज सुबह से सैकड़ों लोग मिले। किसी ने मेरी हैसियत पूछी, किसी ने मेरी वसीयत पूछी। एक तू ही है पगले, जिसने मेरा 'हाल' पूछा।"
भानुप्रताप ने किशन को कसकर गले लगा लिया। उस आलिंगन में उन्हें वो सुकून मिला जो करोड़ों की प्रॉपर्टी के कागज़ों में नहीं था। किशन के मैले कुर्ते से आती पसीने और गाँव की मिट्टी की महक उन्हें किसी महंगे इत्र से ज़्यादा कीमती लगी।
अंदर से विकास बाहर आया। उसने किशन को देखा और नाक-भौं सिकोड़ी।
"पापा, यह कौन है? और आप यहाँ क्यों रो रहे हैं? अंदर चलिए, वो प्रॉपर्टी पेपर्स..."
भानुप्रताप ने आंसू पोंछे। उनके चेहरे पर अब वो लाचारी नहीं थी। एक अजीब सा तेज आ गया था।
"विकास," भानुप्रताप ने कड़क आवाज़ में कहा। "वो पेपर्स फाड़ दो।"
"क्या?" विकास चौंक गया।
"हाँ। यह घर नहीं बिकेगा। कम से कम मेरे जीते जी तो नहीं," भानुप्रताप ने किशन का हाथ पकड़ा। "तुम लोग अपनी 'वसीयत' और 'हैसियत' की दुनिया में वापस जाओ। अमेरिका जाओ या मुंबई। मुझे अब 'सहारे' की ज़रूरत नहीं है।"
"लेकिन पापा, आपकी देखभाल कौन करेगा?" आकाश भी आ गया।
"मेरा दोस्त करेगा," भानुप्रताप ने किशन की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा। "किशन, क्या तू मेरे साथ रहेगा इस महल में? हम दोनों बुड्ढे मिलकर शतरंज खेलेंगे, सुबह की सैर करेंगे और शाम को तेरी स्कूल की बातें करेंगे। रहेगा?"
किशन हंसा। "अरे, मैं तो तुझे लेने आया था। मेरे गाँव वाले घर में खुली हवा है, यहाँ तो दम घुटता है तेरा। पर चल, अगर तू ज़िद्द कर रहा है, तो कुछ दिन यहाँ भी रह लूँगा। पर शर्त एक है, खाना मेरी पसंद का बनेगा, यह केक-वेक मुझसे नहीं खाया जाता।"
भानुप्रताप ज़ोर से हंसे। इतनी खुलकर हंसी उन्होंने सालों बाद हंसी थी।
उन्होंने बेटों की तरफ देखा। "सुन लिया तुम लोगों ने? मुझे अब 'केयरटेकर' नहीं, 'कम्पैनियन' (साथी) चाहिए। और वो बाज़ार में नहीं मिलता, वो किस्मत से मिलता है। तुम लोग जाओ, अपनी पार्टी एन्जॉय करो।"
भानुप्रताप ने व्हीलचेयर को अंदर हॉल की तरफ मोड़ा, लेकिन इस बार वे मेहमानों के पास नहीं गए। वे किशन को लेकर अपने कमरे की तरफ चले गए, जहाँ शांति थी।
पीछे हॉल में संगीत बज रहा था, लोग अभी भी विला की तारीफ़ कर रहे थे, बेटे अभी भी कागज़ों का गणित लगा रहे थे। लेकिन भानुप्रताप जी अपने कमरे में किशन के साथ बैठकर 'गोंद के लड्डू' खा रहे थे।
उस रात उन्होंने अपनी डायरी में सिर्फ़ एक लाइन लिखी:
"खून के रिश्ते सिर्फ़ शरीर का हिस्सा होते हैं, लेकिन दोस्ती रूह का हिस्सा होती है। आज मुझे समझ आया कि जब दुनिया आपकी जेब टटोल रही हो, तब सिर्फ़ एक दोस्त ही होता है जो आपकी नब्ज़ टटोलता है।"
उस दिन के बाद, वर्धमान विला में सन्नाटा नहीं था। वहां दो दोस्तों की हंसी गूंजती थी। भानुप्रताप जी ने अपनी वसीयत बदल दी थी—जायदाद अब एक ट्रस्ट को जानी थी, लेकिन अपनी बची हुई ज़िंदगी उन्होंने अपने दोस्त के नाम कर दी थी।
क्योंकि सच यही था—रिश्तेदारों ने हैसियत देखी, बच्चों ने वसीयत देखी, पर दोस्त ने... दोस्त ने सिर्फ़ उस इंसान को देखा जो उस आलीशान मुखौटे के पीछे अकेला था।
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