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पिता के काले हाथ और बेटी की उजली तकदीर

 "जिस पिता ने अपनी बेटी की कलम खरीदने के लिए अपने हाथों की लकीरें मिटा दीं, क्या वही बेटी अपनी हाई-प्रोफाइल शादी की सालगिरह पर उस पिता के मैले कपड़ों को अपना पाएगी? पढ़िए एक दिल को झकझोर देने वाली कहानी..."



"बस क्या? चुप रहो!" सुलोचना देवी का पारा सातवें आसमान पर था। "मेरी पचास हजार की साड़ी खराब कर दी। तुम्हारी पूरे साल की तनख्वाह भी इसकी कीमत नहीं चुका सकती। कौन हो तुम? किसी ड्राइवर के रिश्तेदार हो या मुफ्त का खाना खाने आए हो?"


स्टेज पर खड़ी अंजलि का दिल धक से रह गया। उसने देखा कि उसकी सास जिस बुजुर्ग को अपमानित कर रही हैं, वह कोई और नहीं, उसके पिता हैं। रोहन भी हैरान था, उसने अंजलि का हाथ पकड़ा।


शहर के सबसे पॉश इलाके के 'ग्रैंड हयात' होटल का बैंक्वेट हॉल रोशनी से नहाया हुआ था। झूमर की चमक, महँगे इत्र की खुशबू और वातानुकूलित हॉल की ठंडक बता रही थी कि आज यहाँ शहर के किसी रईसजादे की पार्टी है। यह पार्टी थी 'रोहन और अंजलि' की शादी की पहली सालगिरह की। रोहन, शहर के मशहूर उद्योगपति का बेटा था और अंजलि, एक मल्टीनेशनल कंपनी की वाइस प्रेसिडेंट। दोनों की जोड़ी को देखकर लोग कहते थे—'रब ने बना दी जोड़ी'।


लेकिन इस चकाचौंध से दूर, हॉल के प्रवेश द्वार के पास एक खम्भे की आड़ में साठ साल का एक बुजुर्ग खड़ा था। उसका नाम रामशरण था। उसके कपड़े साफ तो थे, लेकिन बहुत पुराने। सफेद शर्ट का कॉलर घिस चुका था और पतलून पर बार-बार इस्त्री करने के निशान थे। सबसे ज्यादा अजीब थे उसके हाथ—खुरदरे, काले पड़े हुए नाखून और हथेलियों पर कटे-फटे निशान, जो साबुन से धोने पर भी साफ नहीं दिखते थे। वह बार-बार अपने हाथों को जेब में छिपाने की कोशिश कर रहा था।


रामशरण कोई और नहीं, अंजलि का पिता था। वही अंजलि, जो आज हीरे के हार और लाखों की साड़ी में स्टेज पर खड़ी मुस्कुरा रही थी।


रामशरण की आँखों में आज नमी थी, लेकिन यह नमी खुशी की थी या संकोच की, यह कहना मुश्किल था। उसे अतीत का वह दौर याद आ रहा था जब वह एक छोटी सी गैरेज में मैकेनिक का काम करता था। दिन भर गाड़ियों के नीचे लेटे रहने से उसके कपड़े ग्रीस और मोबिल ऑयल से सने रहते थे।


अंजलि बचपन से ही पढ़ने में बहुत होशियार थी। एक दिन स्कूल से आकर उसने कहा था, "पापा, मुझे बड़े होकर बहुत बड़ी अफसर बनना है, ताकि आप ये गंदा काम छोड़ सकें।"


रामशरण ने अपनी मैली हथेलियों से बेटी के गाल को छूने की कोशिश की थी, फिर रुक गया था कि कहीं कालिख न लग जाए। उसने मुस्कुराकर कहा था, "तू बस पढ़ाई कर बिटिया, तेरे सपनों के लिए मैं अपनी चमड़ी भी बेच दूँगा।"


और रामशरण ने वही किया। अंजलि को इंजीनियरिंग करानी थी, फीस लाखों में थी। रामशरण ने अपनी पुश्तैनी छोटी सी जमीन बेच दी। फिर जब एमबीए की बारी आई, तो उसने अपना गैरेज भी गिरवी रख दिया और खुद उसी गैरेज में एक मामूली नौकर बनकर काम करने लगा। मालिक से नौकर बनने का सफर आसान नहीं था, लेकिन बेटी की मार्कशीट पर 'ए-ग्रेड' देखकर उसकी सारी थकान मिट जाती थी। उसने अपनी दवाइयाँ बंद कर दीं, ताकि अंजलि के लिए किताबें आ सकें। उसने कई रातें भूखे पेट गुजारीं, ताकि अंजलि को हॉस्टल में अच्छा खाना मिल सके।


आज अंजलि उस मुकाम पर थी जहाँ रामशरण ने उसे देखने का सपना देखा था। लेकिन आज रामशरण को यहाँ, इस पार्टी में, एक अजीब सा डर लग रहा था।


पार्टी शबाब पर थी। रोहन की माँ, यानी अंजलि की सास, श्रीमती सुलोचना देवी, अपनी हाई-सोसाइटी सहेलियों के साथ बैठी थीं। सुलोचना देवी को हमेशा से ही अपनी रईसी पर बहुत घमंड था। अंजलि उन्हें पसंद तो थी क्योंकि वह एक बड़े पद पर थी और खूब कमाती थी, लेकिन अंजलि के परिवार की 'गरीबी' उन्हें हमेशा खटकती थी।


रामशरण ने सोचा कि अब जाकर बेटी और दामाद को आशीर्वाद दे दूँ और चुपचाप निकल जाऊँ। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी मखमली डिब्बी निकाली। इसमें सोने की एक पतली सी चेन थी, जिसे खरीदने के लिए उसने पिछले एक साल से ओवरटाइम किया था।


वह हिम्मत करके भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा। वेटर ट्रे लेकर घूम रहे थे। रामशरण की नजर अंजलि पर थी। अचानक, जल्दबाजी में उसका कंधा एक वेटर से टकरा गया। वेटर के हाथ से जूस का एक गिलास छलक कर पास खड़ी सुलोचना देवी की महंगी शिफॉन साड़ी पर गिर गया।


"ओह माय गॉड!" सुलोचना देवी चिल्लाईं। "अंधे हो क्या? दिखलाई नहीं देता?"


वेटर घबरा गया, "सॉरी मैम, मेरी गलती नहीं थी, ये... ये अंकल टकरा गए थे।"


सुलोचना देवी की आग बबूला नजरें रामशरण पर पड़ीं। उन्होंने रामशरण को ऊपर से नीचे तक देखा—घिसे हुए कपड़े और वो काले, खुरदरे हाथ। उन्हें लगा यह कोई वेटर है या सफाई कर्मचारी।


"तुम लोग कैसे-कैसे लोगों को अंदर आने देते हो?" सुलोचना देवी ने होटल मैनेजर पर चिल्लाते हुए कहा। "लुक एट हिम (इसकी तरफ देखो)। फटेहाल कपड़े, गंदे हाथ... इसे पार्टी में घुसने किसने दिया? सिक्योरिटी कहाँ है?"


हॉल में सन्नाटा छा गया। संगीत बंद कर दिया गया। सभी मेहमानों की नजरें रामशरण पर टिक गईं। रामशरण का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह जमीन में गड़ जाना चाहता था।


"मैम... मैं... मैं तो बस..." रामशरण की आवाज कांप रही थी।


"बस क्या? चुप रहो!" सुलोचना देवी का पारा सातवें आसमान पर था। "मेरी पचास हजार की साड़ी खराब कर दी। तुम्हारी पूरे साल की तनख्वाह भी इसकी कीमत नहीं चुका सकती। कौन हो तुम? किसी ड्राइवर के रिश्तेदार हो या मुफ्त का खाना खाने आए हो?"


स्टेज पर खड़ी अंजलि का दिल धक से रह गया। उसने देखा कि उसकी सास जिस बुजुर्ग को अपमानित कर रही हैं, वह कोई और नहीं, उसके पिता हैं। रोहन भी हैरान था, उसने अंजलि का हाथ पकड़ा।


रामशरण ने अपनी कांपती उंगलियों से वह मखमली डिब्बी सुलोचना देवी की तरफ बढ़ाई, "समधन जी... मैं... मैं अंजलि का पिता हूँ।"


यह सुनते ही सुलोचना देवी को झटका तो लगा, लेकिन उनका अहंकार कम नहीं हुआ। अपनी सहेलियों के सामने अपनी 'इमेज' बचाने के लिए उन्होंने और तीखा व्यंग्य किया।


"ओह! तो तुम हो अंजलि के पिता?" उन्होंने एक उपहास भरी हंसी हंसी। "अंजलि, मैंने तुमसे कहा था न कि गेस्ट लिस्ट चेक कर लिया करो। अब देखो, तुम्हारे पिताजी ने यहाँ आकर तमाशा खड़ा कर दिया। और ये हाथ... कम से कम किसी अच्छे साबुन से तो धोकर आते। छी! इनसे मिलाया भी कैसे जा सकता है?"


रामशरण की आँखों से आंसू टपक कर उनके जूतों पर गिरे। उन्होंने धीरे से डिब्बी पास की मेज पर रखी और मुड़कर जाने लगे। उन्हें लगा कि उनका यहाँ होना उनकी बेटी की बेइज्जती का कारण बन रहा है।


"रुकिए पापा!"


एक आवाज गूँजी। यह अंजलि थी। वह स्टेज से उतरकर लगभग दौड़ती हुई अपने पिता के पास आई। उसने कसकर रामशरण का हाथ पकड़ लिया। वही काला, खुरदरा, ग्रीस लगा हुआ हाथ।


"कहाँ जा रहे हैं आप?" अंजलि ने सिसकते हुए पूछा।


"बेटा, मैं चलता हूँ। मुझसे गलती हो गई। मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ," रामशरण ने नजरें झुकाकर कहा।


अंजलि ने पिता का हाथ नहीं छोड़ा। वह उन्हें खींचकर हॉल के बीचों-बीच ले गई, जहाँ झूमर की सबसे तेज रोशनी थी। उसने माइक अपने हाथ में लिया। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन आवाज में एक शेरनी जैसी दहाड़ थी।


"लेडीज एंड जेंटलमैन," अंजलि ने बोलना शुरू किया, "माफ कीजियेगा, पार्टी में थोड़ी रुकावट आई। मेरी सासू माँ को अभी एक गलतफहमी हुई थी। उन्होंने कहा कि मेरे पिता के हाथ गंदे हैं।"


सुलोचना देवी का चेहरा पीला पड़ने लगा। रोहन अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया, लेकिन उसने अंजलि को नहीं रोका।


अंजलि ने अपने पिता के दोनों हाथों को ऊपर उठाया, ताकि सब देख सकें।


"गौर से देखिये इन हाथों को," अंजलि की आवाज भर्रा गई। "ये काले निशान गंदगी के नहीं हैं। ये वो निशान हैं जो मेरी तकदीर लिखने में पड़े हैं। जब मैं एसी कमरे में बैठकर पढ़ाई करती थी, तब ये हाथ तपती धूप में गाड़ियों के इंजन खोल रहे होते थे। जब मुझे ब्रांडेड जूते चाहिए थे, तब इन हाथों ने गर्म तेल के छीटें सहे थे ताकि मेरी ख्वाहिशें पूरी हो सकें।"


अंजलि ने एक पल के लिए सांस ली और सुलोचना देवी की आँखों में सीधे देखा।


"माँ जी, आप कह रही थीं कि आपकी साड़ी पचास हजार की है? मेरे पिता ने अपना गैरेज, अपनी जमीन, अपना स्वाभिमान, सब कुछ बेच दिया था ताकि मैं इस लायक बन सकूँ कि ऐसी दस साड़ियाँ रोज खरीद सकूँ। ये जो ग्रीस और कालिख इन हाथों में रची-बसी है न, ये मेरे लिए दुनिया के सबसे पवित्र चंदन से भी ज्यादा कीमती है। अगर ये हाथ काले न होते, तो आज मेरा भविष्य इतना उजला न होता।"


पूरे हॉल में सन्नाटा ऐसा था कि सुई गिरने की आवाज भी सुनाई दे। कई मेहमानों की आँखों में आंसू थे।


अंजलि ने पिता के सामने घुटनों के बल बैठकर उनके काले, खुरदरे हाथों को अपने चेहरे से लगा लिया और उन्हें चूम लिया।


"पापा, मुझे शर्म आती है कि मैं इतनी बड़ी हो गई, लेकिन आपका कर्ज नहीं उतार पाई। और आज आपकी वजह से मुझे शर्मिंदा नहीं, बल्कि घमंड महसूस हो रहा है। आप मेरी शान हैं। अगर किसी को आपके कपड़ों या आपके हाथों से दिक्कत है, तो उसे मेरी पार्टी से, मेरी जिंदगी से बाहर जाना होगा... चाहे वो कोई भी क्यों न हो।"


अंजलि का इशारा साफ था। सुलोचना देवी शर्म से पानी-पानी हो गई थीं। उन्हें अपनी छोटी सोच पर घिन आ रही थी। उनकी सहेलियाँ भी उन्हें हिकारत से देख रही थीं।


तभी रोहन आगे आया। उसने झुककर रामशरण के पैर छुए और उन्हें गले लगा लिया।


"पापा जी, मुझे माफ कर दीजिये," रोहन ने कहा। "अंजलि सही कह रही है। हम जिस महल में रहते हैं, उसकी नींव आपकी मेहनत के पसीने से ही जुड़ी है। आज से यह घर जितना हमारा है, उतना ही आपका भी है।"


रामशरण रो पड़े। उन्होंने कांपते हाथों से रोहन और अंजलि के सिर पर हाथ रखा।


सुलोचना देवी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनका घमंड टूट चुका था। उन्होंने रामशरण के सामने हाथ जोड़ लिए। "भाई साहब, मुझे माफ कर दीजिये। दौलत की चमक ने मुझे अंधा कर दिया था। आज आपकी बेटी ने मुझे सिखा दिया कि असली रईसी बैंक बैलेंस में नहीं, संस्कारों में होती है।"


रामशरण ने सरलता से मुस्कुराते हुए कहा, "अरे नहीं समधन जी, आप बड़ी हैं, माफी मत मांगिए। बस मेरी बिटिया को प्यार दीजियेगा।"


उस रात पार्टी में सबसे खास मेहमान कोई बिजनेसमैन नहीं, बल्कि वो मैकेनिक था जिसके मैले कोट पर उसकी बेटी के आंसुओं के निशान थे। उस रात सभी ने सीखा कि माता-पिता के पसीने की बदबू में, दुनिया के सबसे महँगे इत्र से भी ज्यादा खुशबू होती है—त्याग की खुशबू।


अंजलि ने वह सोने की चेन अपने गले में नहीं, बल्कि अपनी कलाई पर बांधी, ताकि जब भी वह किसी पेपर पर साइन करे, उसे याद रहे कि उस कलम को चलाने की ताकत उसे उसके पिता के उन्हीं 'काले हाथों' ने दी है।


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दोस्तों, आज हम अक्सर अपनी आधुनिकता की दौड़ में अपने माता-पिता के संघर्षों को भूल जाते हैं। हमें उनके पुराने विचार, उनके साधारण कपड़े या उनका रहन-सहन शर्मिंदा करने लगता है। लेकिन याद रखिये, जिस पेड़ की छाँव में हम आज सुकून से बैठे हैं, उसने न जाने कितनी धूप सहकर खुद को जलाया है। माता-पिता का सम्मान हमारी डिग्रियों से नहीं, हमारे व्यवहार से झलकता है।


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