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रिश्तों में पहल का इंतज़ार नहीं, संवाद का साहस ज़रूरी होता है।

 “आज चाय बहुत देर से बनी है,” अख़बार से नज़र उठाए बिना अरविंद ने कहा और अपने कमरे की ओर बढ़ गए।

कुछ देर बाद रिया चाय लेकर आई और बोली,
“मम्मी, पापा को चाय दे दी है, ये आपकी और अंश की चाय है।”

“अंश के कमरे में ही दे देती,” माया ने सहज-सा कहा।

रिया अचानक असहज हो गई।
“मम्मी, मैं नाश्ता बना रही हूँ… आप दे दीजिए न।”
इतना कहकर वह रसोई की ओर तेज़ी से चली गई।

माया को कुछ अजीब लगा, पर उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। वह अंश के कमरे में चाय लेकर पहुँची। माँ-बेटा साथ बैठकर चाय पी ही रहे थे कि तभी अरविंद वहाँ आ गए।

“अरे, आज तो माँ-बेटा साथ-साथ चाय पी रहे हैं,” उन्होंने मुस्कुराकर कहा।

“हाँ,” माया ने चाय का कप रखते हुए कहा,
“रिया सुबह से लगी हुई है, खुद चाय भी नहीं पी।”

रसोई में माया ने देखा, रिया मशीन की तरह काम कर रही थी। न कोई शिकायत, न कोई हँसी। वह जो हर छोटी-छोटी बात पर कुछ न कुछ बोलती रहती थी, आज असामान्य रूप से शांत थी।

नाश्ते की मेज़ पर भी वही चुप्पी। अंश रोज़ की तरह ऑफिस की बातें कर रहा था, अरविंद सुन रहे थे, लेकिन रिया बस प्लेट में रखे खाने को देख रही थी। माया का मन बेचैन हो उठा।

शाम को रिया ने सिरदर्द का बहाना किया और चाय का कप लेकर अपने कमरे में चली गई। अंश की चाय ड्रॉइंग रूम में ही रखी रह गई। वह अपने नए प्रोजेक्ट पर पापा से बात करने में मग्न था।

माया ने महसूस किया—कुछ बदला है। यह सिरदर्द या थकान नहीं, कुछ और था।

अगले दिन भी वही सिलसिला। रिया ने टिफ़िन माया को थमाते हुए कहा,
“मम्मी, अंश को दे दीजिएगा।”

अंश आया, टिफ़िन उठाया और बोला,
“थैंक्स रिया, मैं निकल रहा हूँ।”

रिया बिना नज़र उठाए अख़बार पढ़ती रही। अंश चला गया। माया ने गौर किया—जैसे ही अंश बाहर गया, रिया सामान्य हो गई, फोन पर बात की, बच्चों से हँसी। यह बदलाव साफ़ था।

माया को अपना अतीत याद आने लगा।

वह भी कभी ऐसी ही चुप्पी ओढ़ लेती थी। जब उसके और अरविंद के बीच कोई बात खटक जाती, तो वह बोलना बंद कर देती। मन में उम्मीद रहती कि अरविंद पूछेंगे—“क्या हुआ?”
पर अरविंद का स्वभाव अलग था। वह झगड़े से बचने के लिए सामान्य व्यवहार बनाए रखते। माया की चुप्पी और अरविंद की चुपचाप अनदेखी—दोनों मिलकर संवादहीनता की दीवार खड़ी कर देते।

एक दिन उनके छोटे बेटे अंश ने मासूमियत से पूछा था,
“मम्मी, क्या आप मुझसे नाराज़ हो? आप आजकल चुप क्यों रहती हो?”
उस दिन माया का दिल कांप उठा था।

आज वही चुप्पी उसे अपनी बहू रिया में दिखाई दे रही थी।

शाम को जब अंश घर लौटा और रिया सहेली के साथ बाहर गई हुई थी, तो माया ने चाय बनाते हुए कहा,
“आज कितने दिनों बाद मुझे अपने बेटे के साथ अकेले बैठने का मौका मिला है।”

अंश हँस पड़ा।
“मम्मी, आप चाहो तो रिया को उसके मायके भेज दें, फिर तो रोज़ बैठेंगे।”

“एक दिन भी रह पाएगा उसके बिना?” माया ने मुस्कुराकर पूछा।

अंश की आँखों में रिया के लिए अपनापन साफ़ झलक गया। उसी पल माया ने हिम्मत करके पूछ लिया,
“अंश, तुम्हारे और रिया के बीच सब ठीक है न?”

अंश चौंक गया।
“मम्मी, आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?”

“कुछ तो है,” माया ने दृढ़ता से कहा।

कुछ पल की चुप्पी के बाद अंश बोला,
“एक छोटी-सी बहस हुई थी। आप तो जानती हैं, रिया थोड़ी सेंसिटिव है। अब सब ठीक है।”

“बेटा,” माया ने प्यार से कहा,
“छोटी-छोटी बातें अगर मन में रह जाएँ, तो गांठ बन जाती हैं। बातचीत बंद हो जाए, तो रिश्तों में दीमक लग जाती है।”

अंश चुपचाप सुनता रहा।

“तुम्हें याद है,” माया बोली,
“मैं कभी-कभी चुप हो जाती थी, और तुम्हारे पापा सामान्य रहते थे? बाहर से सब ठीक लगता था, पर भीतर कितनी बातें अधूरी रह जाती थीं।”

अंश ने पहली बार माँ को इतने खुले मन से बोलते सुना।

उसी समय अरविंद वहाँ आ गए। उन्होंने माया और अंश को गंभीर मुद्रा में देखा, पर कुछ नहीं कहा। रात के खाने पर अजीब-सी खामोशी छाई रही।

खाने के बाद अरविंद ने माया का हाथ थामकर कहा,
“आज एहसास हुआ कि चुप्पी हमेशा समाधान नहीं होती। मैंने सोचा था, बहस से बेहतर मौन है। पर मौन भी कभी-कभी दूरी बना देता है।”

माया की आँखें भर आईं।
“शायद हम दोनों ने ही गलती की,” उसने कहा।
“मैं इंतज़ार करती रही कि तुम पहल करो, और तुम सोचते रहे कि समय सब ठीक कर देगा।”

दोनों के बीच वर्षों बाद खुलकर बात हुई।

उधर, देर रात अंश और रिया के कमरे से धीमी-धीमी बातचीत की आवाज़ें आने लगीं। माया समझ गई—संवाद लौट आया है।

सुबह रसोई में माया पहुँची तो एक सुखद दृश्य था। रिया चाय बनाते हुए कुछ कह रही थी और अंश मुस्कुराते हुए उसे देख रहा था।

माया चुपचाप बाहर आ गई। उसके चेहरे पर संतोष था।

संवाद लौट आया था।
चुप्पी की दीवार ढह चुकी थी।
रिश्तों पर जमी बर्फ पिघल गई थी।

माया मन ही मन सोच रही थी—
अब रिया को भी यह समझाना है कि रिश्तों में पहल का इंतज़ार नहीं, संवाद का साहस ज़रूरी होता है।

क्योंकि जहाँ बात होती है,
वहीं रास्ते निकलते हैं।


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