शहर की चकाचौंध से दूर, एक पुराने जर्जर मकान की बालकनी में बैठे अविनाश बाबू की आँखें सड़क के उस मोड़ पर टिकी थीं, जहाँ से कभी खुशियों की बारात गुजरी थी। लेकिन आज वहाँ सिर्फ धूल उड़ रही थी। अविनाश जी का बेटा, सुमित, अपनी पत्नी शालिनी और पांच साल के छोटे से मासूम आरव को लेकर कल ही शहर के नए फ्लैट में शिफ्ट हो गया था। पीछे छोड़ गया था तो बस एक बीमार पिता और सत्तर साल की बूढ़ी यादें।
शालिनी को शुरू से ही इस पुराने घर की सीलन और अविनाश जी की पुरानी खाँसी से चिढ़ थी। वह कहती थी, "सुमित, इस पुराने घर में मेरे सपनों का दम घुटता है। तुम्हारे पिता जी की सेवा करते-करते मेरी जवानी खत्म हो जाएगी। अगर तुम्हें अपनी तरक्की देखनी है, तो हमें अलग होना ही होगा।" सुमित, जो शालिनी की बातों के जादू में था, चुपचाप अपना सामान समेट लिया।
जाते वक्त आरव अपनी दादा जी की उंगली पकड़कर फूट-फूटकर रो रहा था। "दादू, आप भी चलो न हमारे साथ! मुझे आपकी कहानियों के बिना नींद नहीं आएगी।" लेकिन शालिनी ने झटके से आरव का हाथ खींचा और कार में बैठा दिया। अविनाश जी के लिए वह पल किसी जीते-जी मौत से कम नहीं था। उनके हाथ कांप रहे थे, लेकिन जुबान खामोश थी।
महीने भर के भीतर ही, अकेलेपन और दुख ने अविनाश जी के शरीर को पूरी तरह तोड़ दिया। एक रात अचानक दिल का दौरा पड़ा और वे बिना किसी को अलविदा कहे इस दुनिया से चले गए। सुमित आया, अंतिम संस्कार की रस्में निभाईं, लेकिन उसकी आँखों में पछतावे से ज्यादा जल्दी वापस जाने की हड़बड़ाहट थी। अब उस खाली घर में सिर्फ अविनाश जी की छोटी बहन, यानी सुमित की बुआ, सावित्री जी बची थीं।
सावित्री जी विधवा थीं और उनका अपना कोई नहीं था। अब सुमित पर बुआ की जिम्मेदारी आ गई थी। लेकिन शालिनी को यह बिल्कुल नागवार गुजरा। उसने घर में कोहराम मचा दिया, "एक मुसीबत टली नहीं कि दूसरी गले पड़ गई। मैं किसी फालतू रिश्तेदार का बोझ नहीं उठाऊँगी।"
सुमित ने बीच का रास्ता निकाला। उसने सावित्री बुआ को उसी पुराने घर में छोड़ दिया और हर महीने कुछ पैसे भेजने का वादा किया। लेकिन क्या पैसे रिश्तों का विकल्प हो सकते हैं?
दिन बीतते गए। सावित्री बुआ उस बड़े से घर में अकेले रहने लगीं। उनकी रातें दीवारों से बातें करते बीततीं। आरव अक्सर फोन पर छिपकर बुआ से बात करता और अपनी दादी जैसी बुआ के लिए रोता। शालिनी ने आरव को सख्ती से मना कर रखा था कि वह उस "मनहूस" घर में फोन न करे।
कहानी में मोड़ तब आया जब सुमित की कंपनी अचानक डूब गई। जिस फ्लैट पर शालिनी को नाज था, उसकी किस्तें भरनी मुश्किल हो गईं। कर्जदारों ने दरवाजे पर दस्तक देनी शुरू कर दी। शालिनी के तथाकथित 'हाई-प्रोफाइल' दोस्त गायब हो गए। सुमित पूरी तरह टूट चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए।
हार मानकर एक रात सुमित अपनी पत्नी और बच्चे के साथ उसी पुराने पुश्तैनी घर पहुँचा। उसे डर था कि सावित्री बुआ उसे दुत्कार देंगी। जैसे ही उसने दरवाजा खटखटाया, सावित्री बुआ बाहर आईं। सुमित ने सिर झुकाकर कहा, "बुआ, सब खत्म हो गया। हमारे पास रहने को जगह नहीं है।"
शालिनी को लगा कि आज बुआ अपना बदला लेंगी। लेकिन सावित्री बुआ ने मुस्कुराकर आरव को गले लगा लिया और कहा, "बेटा, घर कभी खत्म नहीं होता। घर की दीवारें बूढ़ी हो सकती हैं, लेकिन उनकी ममता कभी कम नहीं होती। तुम लोग अंदर आओ, मैंने चूल्हे पर दाल रखी है।"
शालिनी की आँखों से शर्म के आँसू बह निकले। जिस बुआ को वह 'बोझ' समझती थी, आज उसी ने उन्हें सिर छुपाने की छत दी थी। उसने देखा कि सावित्री बुआ ने अविनाश जी के कमरे को आज भी वैसा ही सजाकर रखा था, जैसे वे अभी लौटकर आने वाले हों।
उस रात उस पुराने घर की सीलन भरी दीवारों में फिर से आरव की हंसी गूँजी। शालिनी को समझ आ गया कि रिश्ते महलों से नहीं, बल्कि उस त्याग और प्रेम से बनते हैं जो समय आने पर दुश्मन को भी अपना बना लेता है।
अविनाश जी की तस्वीर दीवार पर मुस्कुरा रही थी, मानो कह रही हो—"इंसान के जाने के बाद उसकी अच्छाइयां ही घर को घर बनाए रखती हैं।"
क्या आपको भी लगता है कि आज की पीढ़ी रिश्तों की कीमत को बैंक बैलेंस से तौलने लगी है? क्या शालिनी का हृदय परिवर्तन देर से हुआ या यह एक नई शुरुआत थी? अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।
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